शनिवार, 4 सितंबर 2010

आंतकवाद का रंग, धर्म और मजहब

इन दिनों भगवा आतंक के नाम पर आतंकवाद के रंग की चर्चा छिड़ गयी है। चिदम्बरम् के गृहमंत्री बनने से जिनके दिल जल रहे थे, वे कांग्रेसी ही अब मजा ले रहे हैं। यह सौ प्रतिशत सच है कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। यदि कोई भगवा, हरा, काला, नीला या अन्य किसी रंग को आतंक का प्रतीक बताता है, तो वह गलत है। ये सब रंग प्रकृति की अनुपम देन हैं। भगवा शब्द भगवान या ईश्वर का प्रतीक है। श्रीमद् भगवद्गीता, भगवद्ध्वज, भगवद्कृपा आदि शब्दों का उद्गम एक ही है।

जहां तक आतंकवाद के धर्म की बात है, तो धर्म और आतंकवाद का भी कोई संबंध नहीं है। धर्म की परिभाषा ‘धारयति इति धर्मः’ है। अर्थात जो धारण करता है, वह धर्म है। धर्म का अर्थ है वे नियम, कानून, परम्परा और मान्यताएं, जिनसे किसी संस्था, समाज, परिवार या देश का अस्तित्व बना रहता है।

धर्म को दूसरे शब्दों में कर्तव्य भी कहा जा सकता है। इसलिए माता, पिता, गुरू, छात्र, पुत्र, पुत्री, अध्यापक, व्यापारी, किसान, न्यायाधीश, राजा आदि के धर्म कहे गये हैं। एक व्यक्ति कई धर्म एक साथ निभाता है। घर में वह पिता, पति और पुत्र का धर्म निभाता है, तो बाहर किसान, व्यापारी या कर्मचारी का।
धर्म का पूजा पद्धति से कोई संबंध नहीं है। मनु स्मृति के अनुसार -

धृति क्षमा दमो अस्तेयम्, शौचम् इन्द्रिय निग्रह
धीर्विद्या सत्यम् अक्रोधो दशकम् धर्म लक्षणम्।।

(धैर्य, क्षमा, बुरे विचारों का दमन, चोरी न करना, अंतर्बाह्य शुद्धता, इंद्रियों पर नियन्त्रण, बुद्धि, विद्या, सत्य बोलना तथा क्रोध न करना धर्म के दस लक्षण हैं।) इनमें देवता, अवतार या किसी कर्मकांड की चर्चा नहीं है। सर्वाेच्च न्यायालय ने भी हिन्दू को पूजा पद्धति की बजाय एक जीवन शैली स्वीकार किया है।

सच तो यह है कि धर्म पूरे विश्व में एक ही है, जिसे मानव धर्म कह सकते हैं। इसकी एकमात्र पहचान मानवता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार -

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे
यह पशु प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे।।

और


अष्टादश पुराणेशु व्यासस्य वचनम् द्वयम्
परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्।।

(अठारह पुराणों में व्यास जी ने दो ही बात कही हैं कि परोपकार करना पुण्य और दूसरे को सताना पाप है।)

मानव धर्म के इन लक्षणों को हिन्दुस्थान के मूल निवासियों ने इतनी गहराई से अपने मन, वचन और कर्म में समाहित कर लिया कि दोनों पर्याय हो गये। अब कोई मानव धर्म कहे या हिन्दू धर्म, बात एक ही है। ऐसे श्रेष्ठ विचार या धर्म को आतंक से जोड़ना मानसिक दिवालियेपन के अतिरिक्त कुछ और नहीं है।

लेकिन यही बात मजहब के साथ नहीं कही जा सकती। मजहब का पर्याय रिलीजन तो है; पर धर्म नहीं। धर्म किसी एक ग्रन्थ, अवतार या कर्मकांड से बंधा हुआ नहीं है; पर मजहब में एक किताब, एक व्यक्ति और एक निश्चित कर्मकांड जरूरी है। मजहब में विरोध के लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए जहां-जहां मजहब गया, वहां हिंसा, हत्या, आगजनी और अत्याचार भी पहुंचे। यद्यपि आगे चलकर मजहब में भी सत्ता, सम्पदा, व्यक्ति और कर्मकांड के आधार पर सैकड़ों गुट बने; पर वे भी अपने जन्मजात स्वभाव के अनुसार सदा लड़ते ही रहते हैं।

मुसलमानों में शिया, सुन्नी और अहमदियों के झगड़े; ईसाइयों में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के झगड़े तथा कम्युनिस्टों में माओवादी, नक्सली आदि के आपसी झगड़े इसी का परिणाम है। ये तो कुछ प्रमुख गुट हैं; पर इनमें भाषा, क्षेत्र, जाति, कबीलों आदि के नाम पर भी झगड़ों की भरमार रहती है।

विश्व में इस समय मुख्यतः तीन मजहब प्रचलित हैं। इस्लाम और ईसाई स्वयं को आस्तिक कहते हैं, जबकि कम्युनिस्ट नास्तिक; पर ये तीनों हैं मजहब ही। मजहब की एक विशेष पहचान यह है कि वह सदा अपने जन, धन और धरती का विस्तार करता रहता है और इसके लिए वह हर मार्ग को उचित मानता है। पूरी दुनिया में युद्धों का इतिहास इसका साक्षी है। रूस, चीन, अरब, इराक, ईरान, अफगानिस्तान, बंगलादेश, पाकिस्तान, अमरीका, इंग्लैंड आदि सदा लड़ते और दूसरों को लड़ाते ही रहते हैं।

कुछ विचारक मजहब को अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक दल मानते हैं। इसलिए इस्लाम के पैगम्बर के कार्टून डेनमार्क में बनने पर भी दंगे भारत में किये जाते हैं। चीन और रूस में देशद्रोही मुसलमानों का दमन होने पर दुनिया भर के मुसलमान उत्तेजित हो जाते हैं। इसीलिए 1962 में भारत पर आक्रमण करने वाली चीन की सेनाओं का भारत के कम्युनिस्टों ने ‘मुक्ति सेना’ कहकर स्वागत किया था और इसीलिए जनता शासन (1977-79) में जब भारत में लोभ, लालच और जबरन धर्मान्तरण पर प्रतिबन्ध लगाने का विधेयक श्री ओमप्रकाश त्यागी ने संसद में प्रस्तुत किया, तो उसका दुनिया भर के ईसाइयों ने विरोध किया था।

भारत के क्षुद्र मनोवृत्ति वाले राजनेता अपने वोट बढ़ाने या बचाने के लिए प्रायः किसी क्षेत्र, वर्ग या जाति के लिए सदा विशेष मांगों को लेकर शोर करते रहते हैं। यही स्थिति मजहबों की है। जहां और जब भी मजहबी लोग एकत्र होंगे, वे अपने लिए कुछ विशेष अधिकारों, सुविधाओं और आरक्षण की मांग करेंगे। जनसंख्या कम होने पर वे सभ्यता का आवरण ओढ़कर प्यार और मनुहार की भाषा में बात करते हैं; पर जैसे-जैसे उनकी जनसंख्या बढ़ती है, वे आतंक की भाषा बोलने लगते हैं। कश्मीर को हिन्दुओं से खाली करा लेने के बाद अब सिखों को मुसलमान बनने या घाटी छोड़ने की धमकी इसका ताजा उदाहरण है।

आतंकवाद सदा मजहब के कंधों पर ही आगे बढ़ता है, क्योंकि मजहबी किताबें इसे ठीक बताती हैं। आतंकवादी इन किताबों से ही प्रेरणा लेते हैं। कभी इकबाल ने ‘सारे जहां से अच्छा..’ लिखा था, जिसे हम मूर्खतावश आज भी ‘कौमी तराने’ के रूप में गाते हैं। इसकी एक पंक्ति ‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना’ के उत्तर में किसी कवि ने लिखा था, ‘मजहब ही है सिखाता, आपस में बैर रखना’। 1947 के विभाजन और लाखों हिन्दुओं की हत्या ने बता दिया कि कौन सही था और कौन गलत।

चिदम्बरम्, दिग्विजय या पासवान मुस्लिम वोट के लालच में चाहे जो कहें; पर वैश्विक परिदृश्य चीख-चीख कर मजहब और आतंकवाद के गर्भनाल रिश्तों को सत्य सिद्ध कर रहा है।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

शठे शाठ्यम समाचरेत्

ममता बनर्जी बंगाल में सत्ता पाने को इतनी आतुर हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि और विवेक खो दिया है। ज्ञानेश्वरी रेल दुर्घटना के आरोपी उमाकांत महतो और उससे पूर्व आंध्र के एक कुख्यात नक्सली आजाद की पुलिस मुठभेड़ में हुई मृत्यु पर भी वे प्रश्न उठा रही हैं। आश्चर्य तो यह है कि प्रणव मुखर्जी जैसा जिम्मेदार व्यक्ति भी उनकी हां में हां मिला रहा है।

ये दोनों क्रूर नक्सली चाहे जैसे मारे गये हों; वे मुठभेड़ में मरे हों या सुरक्षा बलों ने उन्हें पकड़कर पास से गोली मारी हो, यह हर दृष्टि से उचित है। हमारे शास्त्र हमें शठे शाठ्यम समाचरेत् (जैसे को तैसा) का पाठ पढ़ाते हैं। अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार उचित है।

जो नक्सली, कम्युनिस्ट, माओवादी या मजहबी आतंकवादी निरपराध लोगों को निशाना बना रहे हैं, उन्हें मारने को हत्या नहीं, वध कहते हैं। कंस ने हजारों निरपराध ब्रजवासियों की हत्या की; पर श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। रावण ने हजारों ऋषियों की हत्या की; पर श्रीराम ने उसका वध किया। हत्या सदा अनुचित है और वध सदा उचित। हत्यारे को दंड दिया जाता है, जबकि वध करने वाले को पुरस्कार; और वध के लिए साम, दाम, दंड, भेद जैसे सब तरीके भारतीय शास्त्रों ने उचित बताये हैं।

श्रीराम का जीवन यदि देखें, तो उन्होंने छिपकर बाली का वध किया। उन्होंने विभीषण के माध्यम से रावण के आंतरिक भेद जानकर फिर उसका वध किया। हनुमान ने अहिरावण को पाताल में जाकर मारा। क्योंकि रावण अधर्मी था; और अधर्मी को अधर्मपूर्वक मारना गलत नहीं है। महाभारत युद्ध में भी श्रीकृष्ण ने भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, जयद्रथ, दुर्योधन जैसे महारथियों को ऐसे ही छल से मरवाया; इसके बाद भी पूरा देश इन दोनों को अपराधी नहीं, भगवान मानता है।

इसलिए जिन वीर सुरक्षाकर्मियों ने आजाद, महतो या उन जैसे किसी भी आतंकी का वध किया हो, उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए। यदि शासन न करे, तो जनता उनका सम्मान करे। केवल आतंकी ही क्यों, उनके लिए साधन और समर्थक जुटाने वाले लेखक, पत्रकार, वकील, आतंकाधिकारवादी, साधुवेश आदि को भी यदि इसी तरह जहन्नुम पहुंचा दिया जाए, तो बहुत शीघ्र आतंकवाद की कमर टूट जाएगी।

हम कितने मूर्ख हैं ?


पाकिस्तान इस समय भीषण बाढ़ के संकट से जूझ रहा है। भारत ने मानवता के नाते उसे अरबों रुपये की सहायता दी है; पर उसका दिल कितना काला है, यह इसी से पता लगता है कि उसने एक सप्ताह तक भारत से राशि नहीं ली। अब उसने इस शर्त पर इसे स्वीकार किया है कि यह पहले संयुक्त राष्ट्र के कोष में जाएगी और फिर वह इसे पाकिस्तान के राहत कार्यों में खर्च करेगा।

सचमुच हम कितने मूर्ख हैं। पाकिस्तान हमारा शत्रु देश है। वह हर समय भारत को परेशान करने का प्रयास करता है। 1947, 65, 71 और 99 में वह हमारे विरुद्ध खुला युद्ध कर चुका है। एक समय पंजाब में खालिस्तानी उभार के पीछे वही था। कश्मीर समस्या को खाद-पानी वही दे रहा है। वह हिन्दुओं को क्रमशः समाप्त कर रहा है। बाढ़ में फंसे हिन्दुओं को गोमांस खाने पर मजबूर कर रहा है। घुसपैठ का उसका नियमित कार्यक्रम जारी ही है; और हम मूर्ख उसे पैसे दे रहे हैं।

यही काम गांधी ने किया था। पाकिस्तान कश्मीर पर कब्जा करने के लिए सेना भेज रहा था और गांधी महोदय उसे 55 करोड़ रु0 दिलाने के लिए अनशन पर बैठे थे। इसी से नाथूराम गोडसे विचलित हो गया और....।

वस्तुतः हमारे पास यह सुअवसर था कि हम उस पर हमला कर अपना कश्मीर वापस ले लेते। शेष पाकिस्तान के भी दो-तीन टुकड़े कर उसे सदा के लिए अपंग बना देते, जिससे वह कभी भारत की ओर आंख तिरछी करने का साहस न कर सके। कोई कह सकता है कि दुख के समय तो पड़ोसी की सहायता करना मानवता है। बात ठीक है; पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मानवता का व्यवहार मानवों से किया जाता है, शत्रुओं से नहीं।

यहां महाभारत का प्रसंग याद करना उचित होगा। जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया और वह उसे ठीक करने के लिए नीचे उतरा, तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा कि इस दुष्ट को दंड देने का यही समय उचित है। इस पर कर्ण धर्म की दुहाई देने लगा। वह बताने लगा कि जब विपक्षी के हाथ में शस्त्र न हों, जब वह किसी संकट में फंसा हो, तब उससे युद्ध नहीं किया जाता।

इस पर श्रीकृष्ण ने कहा - कर्ण, जब पांडवों को छलपूर्वक जुए में हराया गया था, तब तुम्हारा धर्म कहां था; जब द्रोपदी को भरी सभा में निर्वसन किया जा रहा था, तब तुम्हारा धर्म कहां था; जब अभिमन्यु को कई महारथियों ने घेर कर मारा था, तब तुम्हारा धर्म कहां था ? आज जब तुम स्वयं घिर गये हो, तो धर्म की दुहाई दे रहे हो।

ऐसे ही माहौल को देखकर कभी दुष्यन्त कुमार ने लिखा था -

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
वे सलीबों के करीब आये तो हमको
कायदे-कानून समझाने लगे हैं।।

श्रीकृष्ण की खरी-खरी सुनकर कर्ण क्या कहता, उसने सिर झुका लिया; और फिर अर्जुन के अगले ही बाण से उसका सिर धड़ से अलग हो गया। महाभारत का यह प्रसंग हमें बहुत कुछ सिखाता है; पर जो अपनी गलती को सुधार ले, वह मूर्ख कैसा; और हम ठहरे जन्मजात मूर्ख।

रविवार, 29 अगस्त 2010

बड़ा लेखक बनने के गुर

छुटपन से ही मेरी इच्छा थी कि मैं बड़ा लेखक बनूं। बड़े प्रयास किये; पर रहा छोटा ही। कभी पढ़ा था कि चोटी के लेखक बड़ी गहरी कविताएं लिखते हैं। इस चक्कर में कई दिन कुएं में जाकर बैठा। लोग कुएं का मेढक तक कहने लगे। वह अपमान भी सहा; पर रहे वही ढाक के तीन पात।

लेकिन पिछले दिनों मुझे कबाड़ी बाजार में एक बड़े लेखक की डायरी हाथ लग गयी। उसमें साहित्य की दुनिया में बड़े बनने के गुर लिखे थे। कुछ नमूने देखिये।

Û कविता ऐसी लिखें, काफी मगज मारने पर भी जिसका सिर-पैर समझ न आये। कोई आपके छन्द या व्याकरण ज्ञान पर टिप्पणी करे, तो उसे साहित्य में बह रही नयी हवाओं का विरोधी कहें। स्वयं को रबड़, गोंद, च्विंगम या कोला जैसे सरल और तरल छन्द का प्रणेता बताएं। खंड काव्य की जगह बन्द काव्य लिखें, जिसे पाठक सदा बन्द रखना ही अच्छा समझें।

Û हिन्दी में अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी की भरपूर मिलावट करें, जिससे लोग अंत तक यह न समझ पाएं कि यह रचना वस्तुतः किस भाषा में है। यदि उन्हें कई भाषाओं के शब्दकोष साथ रखने पड़ें, तो सचमुच रचना बहुत भारी मानी जाएगी।

Û लेखन में सार्त्र, कामू, नेरूदा, इलियट जैसे कुछ विदेशी लेखकों के उद्धरण (चाहे स्वयं ही लिखकर) यहां-वहां सलाद की तरह सजा दें। इससे आपके गंभीर लेखक होने की छवि बनेगी।

Û परिचय में यह अवश्य लिखें कि आपकी रचनाएं देश-विदेश के प्रमुख पत्रों में छपती रहती हैं। हर मुहल्ले में बनी विश्वस्तरीय साहित्यिक संस्थाओं द्वारा प्रदत्त पुरस्कार और सम्मानों का भी उल्लेख करें। ऐसी चार-छह संस्थाओं के संस्थापक, अध्यक्ष या मंत्री बन जाएं और उन्हें भी मोटे अक्षरों में लिखें।

Û सम्मान लेते हुए चित्र बैठक कक्ष में लगाएं और आग्रहपूर्वक सबको दिखाएं; पर ध्यान रहे, चित्रों में श१ल, बैनर, स्मृति चिõ आदि अलग-अलग हों; वरना यार लोग सच ताड़ लेते हैं।

Û साल-दो साल में अपनी कविताओं से भरी पत्रिका निकालें। इससे आप अनियतकालीन राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक हो जाएंगे। उसे अपने खर्च से बड़े लेखकों को भेजें। इधर-उधर से सामग्री जुटा और चुराकर 20-30 पृष्ठों की 30-40 पुस्तकें लिख डालें। इतनी ही प्रकाशनाधीन बताएं।

Û कबीर, सूर, तुलसी, प्रेमचन्द, टैगोर आदि से लेकर ओबामा और ओसामा तक की खूब आलोचना करें। ये लोग लड़ने या जवाब देने नहीं आएंगे। यदि आप पुरुष हैं, तो लेखिकाओं की आलोचना करते हुए अपने लेखन की प्रेरणा पत्नी जी को ही बताएं। इससे बात संतुलित हो जाएगी।

Û बहुत सी टुच्ची संस्थाएं पैसे लेकर मैन, पोएट या राइटर अ१फ दि इयर जैसे पुरस्कार देती हैं। उनसे स्वयं पुरस्कार लें और फिर उनके दलाल बनकर दूसरों को दिलाएं।

Û हर कार्यक्रम में अपने झूठे विदेश प्रवास के किस्से सुनाएं।

Û समारोह में ऐसे व्यक्ति के साथ बैठें, जिससे आपका चित्र अखबार में छप सके।

Û हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान की खूब बुराई करें। इससे वाममार्गी आपको सिर पर बैठा लेंगे। उनकी जेब में सैकड़ों संस्थाएं, हजारों पुरस्कार, यात्रा भत्ते और शोधवृत्तियां रहती हैं। देर रात की दारू और मुर्गा महफिलों में सहभागी होकर उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रसन्न करें। इससे भले ही पैरों में बल्ली ठोकनी पड़े; पर वे आपका कद जरूर बढ़ा देंगे। हां, बेतुकी मुस्लिम रूढ़ियों पर कुछ न कहें। इससे आपके कद के साथ जान को भी खतरा है।

Û महिला और दलित विमर्श के नाम पर अच्छी-बुरी हर प्राचीन परम्परा को गरियाने से भी कई लेखकों का कद बढ़ा है।

उस डायरी में और भी कई सूत्र लिखे हैं; पर मैं नहीं चाहता कि आप इतने बड़े हो जाएं कि घर की चौखट और छतें बदलवानी पड़ें, सो कम लिखे को बहुत समझें।