शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

इनका दर्द भी समझें

मेरे पड़ोस में मियां फुल्लन धोबी और मियां झुल्लन भड़भूजे वर्षों से रहते हैं। लोग उन्हें फूला और झूला मियां कहते हैं। 1947 में तो वे पाकिस्तान नहीं गये; पर मंदिर विवाद ने उनके मन में भी दरार डाल दी। अब वे मिलते तो हैं; पर पहले जैसी बात नहीं रही।

अब वे दोनों काफी बूढ़े हो गये हैं। फूला मियां की बेगम भी खुदा को प्यारी हो चुकी हैं। झूला मियां और उनकी बेगम में होड़ लगी है कि पहले कौन जाएगा ? खुदा खैर करे।

30 सितम्बर को सारे देश की तरह वे दोनों भी रेडियो से कान लगाये इस विवाद के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे थे। निर्णय आते ही मुसलमानों के चेहरे पर मुर्दनी छा गयी, दूसरी ओर हिन्दू जय श्रीराम का उद्घोष करने लगे।

इस हलचल में रात बीत गयी। अगले दिन बाजार जाते समय वे दोनों मिल गये और इस निर्णय पर चर्चा करने लगे।

उन्हें सबसे अधिक कष्ट यह था कि न्यायाधीशों के अनुसार वह मस्जिद इस्लामी उसूलों के विरुद्ध बनी थी, अतः उसे मस्जिद नहीं कहा जा सकता। मियां फूला ने पूछा - क्यों भैया, तुम तो कई अखबार पढ़ते हो। ये बताओ कि जो इमारत मस्जिद थी ही नहीं, वहां पढ़ी गयी नमाज खुदा मानेगा या नहीं ?

- इस बारे में मैं क्या बताऊं चाचा; आपको किसी मौलाना से पूछना चाहिए।

- अरे खाक डालो उन मौलानाओं पर। उन्होंने तो हमारा जीना हराम कर दिया। वे सीना ठोक कर कहते थे कि बाबरी मस्जिद को दुनिया की कोई ताकत हिला नहीं सकती; पर वह तो कुछ घंटे में ही टूट गयी। फिर वे कहते थे कि हम पहले से बड़ी मस्जिद वहां बनाएंगे। इसके लिए हमने पेट काटकर चंदा भी दिया; पर अब तो न्यायालय ने उस मस्जिद को ही अवैध बता दिया।

- हां, यह ठीक है।

- कई साल पहले ईद पर न जाने कहां से कोई गीलानी-फीलानी आये थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि हमें अयोध्या-फैजाबाद में एक नया मक्का बनाना है। पूरी दुनिया के मुसलमान मक्का की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ते हैं। यदि हम पांच में से एक वक्त की नमाज फैजाबाद की तरफ मुंह करके पढ़ें, तो हमारी इबादत जरूर कबूल होगी।

- अच्छा ?

- और क्या ? बीमारी के कारण अब मैं मस्जिद तो जाता नहीं; लेकिन घर पर ही रहते हुए मैंने पांचों नमाज फैजाबाद की तरफ मुंह करके पढ़ी, जिससे नया मक्का जल्दी बने; पर लाहौल विला कूवत...। सब नमाज बेकार हो गईं। या खुदा, अब मेरा क्या होगा ? कयामत वाले दिन मुझे तो जहन्नुम में भी जगह नहीं मिलेगी। इतना कह कर वे रोने लगे।

मैंने उनको शांत करने का प्रयास किया; पर उनका दर्द मुझसे भी सहा नहीं जा रहा था।
- मुझे वो मुकदमेबाज हाशिम पंसारी मिल जाए, तो..

- पंसारी नहीं, अंसारी। मैंने उनकी भूल सुधारी।

- अंसारी हो या पंसारी। अपने जूते से उसकी वह हजामत बनाऊंगा कि अगले जन्म में भी वह गंजा पैदा होगा। और उस गीलानी-फीलानी की तो दाढ़ी मैं जरूर नोचूंगा।

- चलो जो हुआ सो हुआ। अब बची जिंदगी में ठीक से नमाज पढ़ो, जिससे पुराने पाप कट जाएं।

मैं जल्दी में था, इसलिए चलने लगा; पर अब मियां झूला लिपट गये। उन्होंने अपना हिन्दी ज्ञान बघारते हुए कहा - भैया, एक लघु शंका मेरी भी है।

- उसे फिलहाल आप अपने मुंह में रखें; कहकर मैं चल दिया।

रास्ते भर मैं सोचता रहा कि इन मजहबी नेताओं ने मस्जिद का झूठा विवाद खड़ाकर अपनी जेब और पेट मोटे कर लिये। कइयों की झोपड़ियां महल बन गयीं। कई संसद और विधानसभा में पहुंच गये; पर झूला और फूला जैसे गरीबों ने उनका क्या बिगाड़ा था, जो उन्होंने बुढ़ापे में इनका दीन ईमान खराब करा दिया ?

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

फिर दाढ़ी में हाथ

जम्मू-कश्मीर में गत 20 सितम्बर को सांसदों का जो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गया था, उसके कुछ सदस्यों ने उन्हीं भूलों को दोहराया है, जिससे यह फोड़ा नासूर बना है। इनसे मिलने अनेक दलों और वर्गों के प्रतिनिधि आये थे; पर देशद्रोही नेताओं ने वहां आना उचित नहीं समझा।

अच्छा तो यह होता कि इन्हें बिलकुल दुत्कार दिया जाता; पर कई सांसदों और उनके दलों के लिए देश से अधिक मुस्लिम वोटों का महत्व है। इसलिए माकपा नेता सीताराम येचुरी के नेतृत्व में कुछ सांसद अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी से मिलने उनके घर गये। भाकपा सांसद गुरुदास दासगुप्ता के साथ कुछ सांसद हुर्रियत नेता मीरवायज उमर फारुक से मिले और रामविलास पासवान जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता यासीन मलिक के घर गये। यह अच्छा ही हुआ कि भाजपा और कांग्रेस के सांसदों ने स्वयं को इस बेहूदी कवायद से दूर रखा।

इन तीनों देशद्रोही नेताओं ने मीडिया का पूरा लाभ उठाया। सांसदों का सम्मान करने वालों से तो वार्ता कमरे में हुई; पर उनका अपमान करने वालों से मीडिया के सामने। स्पष्ट है कि इस मामले में भारत सरकार उल्लू ही बनी है। यद्यपि 100 करोड़ रु0 की सहायता और आठ सूत्री कार्यक्रमों की घोषणा कर अब शासन अपनी पीठ थपथपा रहा है; पर यह कवायद अंततः विफल ही सिद्ध होगी।

हो सकता है कि बाजार और विद्यालयों के खुलने तथा कर्फ्यू के हटने से देशवासी समस्या को समाप्त मान लें; पर यह कुछ दिन की शांति है। पत्थरबाजों की रिहाई, सुरक्षाकर्मियों पर हमला करते हुए उनकी गोली से मरने वालों के परिजनों को पांच लाख रु0 की सहायता तथा पत्थर, डंडे और गाली खाकर भी चुप रहने वाले, इलाज करा रहे सुरक्षाकर्मियों को आठ-दस हजार रु0 का पुरस्कार यह बताता है कि सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण की उसी नीति पर चल रही है, जिसने देश की सदा हानि की है।

स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास के अनुसार देश विभाजन का अपराधी मोहम्मद अली जिन्ना पहले देशभक्त ही था। उसने 1925 में सेंट्रल असेंबली में कहा था कि मैं भारतीय हूं, पहले भी, बाद में भी और अंत में भी। वह मुसलमानों का गोखले जैसा नरमपंथी नेता बनना चाहता था। उसने खिलाफत आंदोलन को गांधी का पाखंड कहा। उसने मुसलमानों के अलग मतदान और निर्वाचन क्षेत्रों का विरोध किया। उसने राजनीति में मजहबी मिलावट के गांधी, मोहम्मद अली और आगा खान के प्रयासों का विरोध किया। उसने तिलक के अपमान पर वायसराय विलिंगटन का मुंबई में रहना दूभर कर दिया।

उसने ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशक महाशय राजपाल के हत्यारे अब्दुल कयूम की फांसी का समर्थन किया तथा लाहौर के शहीदगंज गुरुद्वारे के विवाद में सिखों की भरपूर सहायता की। 1933 में उसने लंदन के रिट्ज होटल में पाकिस्तान शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली की हंसी उड़ाकर उसके भोज का बहिष्कार किया तथा कट्टरवादी मुल्लाओं को ‘कातिल ए आजम’ और ‘काफिर ए आजम’ कहा।

1934 में उसने मुंबई के चुनाव में साफ कहा था कि मैं भारतीय पहले हूं, मुसलमान बाद में। जलियांवाला बाग कांड के बाद वह असेम्बली में गांधी और नेहरू से अधिक प्रखरता से बोला था। रोलेट एक्ट के विरोध में उसकी भूमिका से प्रभावित होकर गांधी ने उसे कायदे आजम (महान नेता) कहा और मुंबई में जिन्ना हाल बनवाया, जिसमें मुंबई कांग्रेस का मुख्यालय है; पर यही जिन्ना देशद्रोही कैसे बना, इसकी कहानी भी बड़ी रोचक है।

इसके लिए भारत के मुसलमान, गांधी जी और कांग्रेस की मानसिकता पर विचार करना होगा।

मुसलमानों ने पांचों समय के नमाजी मौलाना आजाद के बदले अलगाव की भाषा बोलने वाले मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली को सदा अपना नेता माना। कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में उद्घाटन के समय हुए वन्दे मातरम् पर अध्यक्षता कर रहे मौहम्मद अली मंच से नीचे उतर गये थे। उनकी इस बदतमीजी को गांधी और कांग्रेस ने बर्दाश्त किया। इससे जिन्ना समझ गया कि यदि मुसलमानों का नेता बनना है, तो अलगाव की भाषा ही बोलनी होगी। उसने ऐसा किया और फिर वह मुसलमानों का एकछत्र नेता बन गया।

यह भी सत्य है कि अंग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक जिन्ना को इस मार्ग पर लगाया, चूंकि वे गांधी के विरुद्ध किसी को अपने पक्ष में खड़ा करना चाहते थे। नमाज न जानने वाला, गाय और सुअर का मांस खाने तथा दारू पीने वाला जिन्ना उनका सहज मित्र बन गया। अंग्रेजों ने उसकेे माध्यम से शासन और कांग्रेस के सामने मांगों का पुलिंदा रखवाना शुरू किया। शासन को उसकी मांग मानने में तो कोई आपत्ति नहीं थी, चूंकि पर्दे के पीछे वे ही तो यह करा रहे थे; पर आश्चर्य तो तब हुआ, जब गांधी जी भी उनके आगे झुकते चले गये।

1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की विफलता और मुसलमानों के उसमें असहयोग से अधिकांश कांग्रेसियों का मोह उससे भंग हो गया; पर गांधी जी उस सांप रूपी रस्सी को थामे रहे। मई 1944 में उन्होंने जेल से मुक्त होकर जिन्ना को एक पत्र लिखा, जिसमें उसे भाई कहकर उससे भेंट की अभिलाषा व्यक्त की।

इस भेंट के लिए मुस्लिम लीग की स्वीकृति लेकर जिन्ना ने शर्त रखी कि वार्ता के लिए गांधी को मेरे घर आना होगा। वहां 9 से 27 सितम्बर तक दोनों की असफल वार्ता हुई। जिन्ना इसके द्वारा गांधी, कांग्रेस और हिन्दुओं को अपमानित करना चाहता था, और वह इसमें पूरी तरह सफल रहा।

अब क्या था; मुसलमानों ने गांधी को अपमानित करने वाले को अपना निर्विवाद नेता मान लिया। अनेक देशभक्त नेताओं ने इस वार्ता का विरोध किया था; पर गांधी जी की आंखें नहीं खुलीं। देसाई-लियाकत समझौते और वैवल योजना के रूप में दो और असफल प्रयास हुए। पत्रकार दुर्गादास के प्रश्न के उत्तर में शातिर जिन्ना ने हंसते हुए कहा - क्या मैं मूर्ख हूं, जो इसे मान लूं। मुझे तो थाल में सजा कर पाकिस्तान दिया जा रहा है। स्पष्ट है कि जिन्ना की निगाह अपने अंतिम लक्ष्य पाकिस्तान पर थी।

इतिहास कितना भी कटु हो; पर उसे नकारा नहीं जा सकता। जो भूल गांधी जी ने की, क्या वही भूल उन सांसदों ने नहीं की, जो इन देशद्रोहियों के घर जा पहुंचे ?

इसी से मिलती-जुलती, पर इसका दूसरा पक्ष दिखाने वाली घटना भी भारत के इतिहास में उपलब्ध है।

1947 में देश स्वाधीन होने के बाद जो दो-चार रजवाड़े भारत में विलय पर मुंह तिरछा कर रहे थे, उनमें से एक हैदराबाद का निजाम भी था। वह पाकिस्तान में मिलना चाहता था, यद्यपि वहां की 88 प्रतिशत प्रजा हिन्दू थी। नेहरू जी उसे समझाने के लिए गये; पर बीमारी का बहाना बनाकर वह मिलने नहीं आया।
जब यह बात सरदार पटेल को पता लगी, तो वे बौखला उठे। उन्होंने कहा कि यह नेहरू का नहीं, देश का अपमान है। अब वे स्वयं हैदराबाद गये और निजाम को बुलाया। वहां से फिर वही उत्तर आया। इस पर पटेल ने कहा कि उसे बताओ कि भारत के उपप्रधानमंत्री आये हैं। यदि वह बहुत बीमार है, तो स्टेचर पर आए। इसका परिणाम यह हुआ कि थोड़ी ही देर में धूर्त निजाम भीगी बिल्ली बना, हाथ जोड़ता हुआ वहां आ गया। फिर सरदार पटेल ने उस रियासत को भारत में कैसे मिलाया, यह भी इतिहास के पृष्ठों पर लिखा है।

यह दो घटनाएं बताती हैं कि देशद्रोहियों से कैसा व्यवहार होना चाहिए ? आज हमें गांधी या नेहरू जैसे दाढ़ी सहलाने वाले नहीं, पटेल जैसे दाढ़ी नोचने वाले हाथ चाहिए। दुर्भाग्यवश वर्तमान शासन तंत्र इसमें बिल्कुल नाकारा सिद्ध हुआ है।

सोमवार, 27 सितंबर 2010

निष्ठावान स्वयंसेवक: बंसीलाल सोनी


संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री बंसीलाल सोनी का जन्म एक मई, 1930 को वर्तमान झारखंड राज्य के सिंहभूम जिले में चाईबासा नामक स्थान पर अपने नाना जी के घर में हुआ था। इनके पिता श्री नारायण सोनी तथा माता श्रीमती मोहिनी देवी थीं।

इनके पुरखे मूलतः राजस्थान के थे, जो व्यापार करने के लिए इधर आये और फिर यहीं बस गये। बाल्यावस्था में ही उन्होंने अपने बड़े भाई श्री अनंतलाल सोनी के साथ शाखा जाना प्रारम्भ किया। आगे चलकर दोनों भाई प्रचारक बने और आजीवन संघ कार्य करते रहे।

यों तो बंसीलाल जी बालपन से ही स्वयंसेवक थे; पर कोलकाता में पढ़ते समय उनका घनिष्ठ सम्पर्क पूर्वोत्तर के क्षेत्र प्रचारक श्री एकनाथ रानाडे से हुआ। धीरे-धीरे उनका अधिकांश समय संघ कार्यालय पर बीतने लगा।

1949 में B.com की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे प्रचारक बन गये। सर्वप्रथम उन्हें हुगली जिले के श्रीरामपुर नगर में भेजा गया।एकनाथ जी के साथ उन्होंने हर परिस्थिति में संघ कार्य सफलतापूर्वक करने के गुर सीखे।

कोलकाता लम्बे समय तक भारत की राजधानी रहा है। अतः यहां अनेक भाषाओं के बोलने वाले लोग रहते हैं। बंसीलाल जी हिन्दी के साथ ही बंगला, अंग्रेजी, नेपाली, मारवाड़ी आदि अनेक भाषा-बोलियों के जानकार थे। अतः वे सब लोगों में शीघ्र ही घुलमिल जाते थे। श्रीरामपुर नगर के बाद उन्हें क्रमशः माल्दा और फिर उत्तर बंग का विभाग प्रचारक बनाया गया।

पूर्वोत्तर भारत में नदियों की प्रचुरता है। ये नदियां जहां उस क्षेत्र के लिए जीवनदायिनी हैं, वहां वर्षा के दिनों में इनके कारण संकट भी बहुत आते हैं। 1968 में जलपाईगुड़ी में भीषण बाढ़ आई। इससे सारा जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया। जो जहां था, वहीं फंस कर रह गया। हजारों नर-नारी और पशु मारे गये। ऐसी स्थिति में स्वयंसेवकों ने ‘उत्तर बंग सेवा समिति’ बनाकर बंसीलाल जी की देखरेख में जनसेवा के अनेक कार्य किये।

1971 में बंगलादेश मुक्ति संग्राम के समय लाखों शरणार्थी भारत में आ गये। उनमें से अधिकांश हिन्दू ही थे। स्वयंसेवकों ने उनके भोजन, आवास और वस्त्रों का समुचित प्रबन्ध किया। पूरे देश से उनके लिए सहायता राशि व सामग्री भेजी गयी, जिसका केन्द्र कोलकाता ही था। यह सब कार्य भी बंसीलाल जी की देखरेख में ही सम्पन्न हुआ। इतना ही नहीं, वे बड़ी संख्या में टैंट और अन्य सहायता सामग्री लेकर बंगलादेश की राजधानी ढाका तक गये।

1975 में आपातकाल के समय वे कोलकाता में ही प्रचारक थे। संघ के आह्नान पर स्वयंसेवकों के साथ उन्होंने भी सत्याग्रह कर कारावास स्वीकार किया। आपातकाल और संघ से प्रतिबन्ध की समाप्ति के बाद संघ ने अनेक सेवा कार्य प्रारम्भ किये। इनमें प्रौढ़ शिक्षा का कार्य भी था। बंसीलाल जी के नेतृत्व में 1978 में बंगाल में अनेक ‘प्रौढ़ साक्षरता केन्द्र’ चलाये गये।

1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद उसके केन्द्रीय कार्यालय के संचालन के लिए एक अनुभवी और निष्ठावान कार्यकर्ता की आवश्यकता थी। यह जिम्मेदारी लेकर बंसीलाल जी दिल्ली आ गये। इसके साथ ही उन्होंने असम, बंगाल और उड़ीसा में भाजपा का संगठन तंत्र भी खड़ा किया।

2003 में उन्हें फिर से वापस बंगाल बुलाकर पूर्वी क्षेत्र बौद्धिक प्रमुख और फिर सम्पर्क प्रमुख बनाया गया। शारीरिक शिथिलता के कारण जब प्रवास में उन्हें कठिनाई होने लगा, तो वे दक्षिण बंग की प्रान्त कार्यकारिणी के सदस्य के नाते अपने अनुभव से नयी पीढ़ी को लाभान्वित करते रहे।

20 अगस्त, 2010 को 80 वर्ष की दीर्घायु में निष्ठावान स्वयंसेवक श्री बंसीलाल सोनी का कोलकाता के विशुद्धानंद अस्पताल में देहांत हुआ।

रविवार, 26 सितंबर 2010

खेल के माध्यम से बढ़ता शब्दज्ञान

कहते हैं कि यदि व्यक्ति में सीखने की इच्छा हो, तो वह जीवन भर जिज्ञासु छात्र की तरह कुछ न कुछ सीखता ही रहता है। दिल्ली में होने जा रहे खेलों के बारे में पुलिस-प्रशासन वाले कई दिन से समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवा रहे हैं कि आप हमारे आंख और कान बनें। सो जागरूक लोगों और समाचार जगत ने अपने आंख और कान खोल लिये और हर काम में ‘कांग्रेस कल्चर’ के अनुरूप हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने लगे।

इन खेलों को प्रारम्भ से ही बहुत से लोग ‘गुलाममंडल खेल’ कह रहे थे; पर भ्रष्टाचार की अधिकता के चलते अब इन्हें ‘भ्रष्टमंडल खेल’ भी कहा जा रहा है। 21 सितम्बर को खेलगांव के निकट एक पुल गिर जाने के बाद अब कई विदेशी पत्र इन्हें ‘क१मनवैल्थ गेम’ के बदले ‘क१मनवैल्थ शेम’ लिख रहे हैं।

जहां तक अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं की बात है, अनेक बड़े खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत रूप से यहां आने से मना कर दिया है। उनका कहना है कि हमें पदक से अधिक अपनी जान प्यारी है। कई देशों ने अपने खिलाड़ियों को देर से भेजा। पिछले दिनों कुछ देशों ने तो किसी अन्य स्थान और समय पर ‘वैकल्पिक खेल’ की बात भी चला दी थी। इन खेलों को करोड़ों रु0 की रिश्वत देकर भारत में लाया गया है, यह भी कई विदेशी पत्र लिख रहे हैं। ऐसे में यदि काम करवा रहे नेता दो नंबर का अरबों रुपया कमा रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है ? आखिर उन्हें अगला चुनाव भी तो लड़ना है।

आंख और कान खुले होने के कारण इस सबसे मेरा शब्दज्ञान बहुत बढ़ रहा है। अब खेल तो होंगे ही; पर कैसे होंगे, इसका भगवान ही मालिक है। चाहे जो हो; पर सुपर प्रधानमंत्री मैडम इटली, शीला दीक्षित और सुरेश कलमाड़ी ने जैसी छीछालेदर भारत और इन खेलों की कराई है, ऐसे में इन्हें ‘विफलमंडल खेल’ भी कहा जा सकता है। इन खेलों के चक्कर में लाखों दिल्लीवासियों को उखाड़कर पूरे शहर को जैसे उजाड़ा गया है, तो इसे उखाड़मंडल या उजाड़मंडल खेल भी कह सकते हैं। कुछ मित्रों की राय इसे विनाशमंडल, सत्यानाश मंडल, सर्वनाश मंडल या बर्बाद मंडल खेल कहने के पक्ष में है।

यह तो बच्चा भी जानता है कि यदि कोई मंडल या गोले में दौड़ रहा हो, तो वह चाहे जीवन भर दौड़ता रहे, पर किसी लक्ष्य पर नहीं पहंुचेगा। यह बात इन खेलों के प्रारम्भ होने से पहले भी सत्य है और बाद में भी सत्य सिद्ध होगी।