शनिवार, 1 जनवरी 2011

बात का फैशन

फैशन का अर्थ लोग प्रायः कपड़े, बाल, जूते, आभूषण आदि से ही लेते हैं। छूत की इस बीमारी को फैलाने का मुख्य श्रेय फिल्मों को है। किसी समय राजेश खन्ना के कारण पैंट और कुर्ते का फैशन चला, तो अमिताभ बच्चन के कारण कान ढके बालों का। आजकल शाहरुख, आमिर, अक्षय और हृतिक रोशन इस दिशा में सक्रिय हैं। अभिनेत्रियों की बात करें, तो कपड़े पहनने के साथ ही कपड़े न पहनना भी फैशन मान लिया जाता है।

युवा पीढ़ी में यह वायरस तेजी से फैलता है। उल्टी टोपी से लेकर चीथड़ा पैंट तक फैशन है। कभी पैंट नीचे से इतनी पतली हो जाती है कि उसमें घुसने के लिए दूसरे को बुलाना पड़े; और कभी वह इतनी चौड़ी हो जाती है कि दोनों टांग एक में आने के बाद भी पड़ोसी के लिए जगह बच जाए।

फैशन के नाम पर नाक, कान, होंठ, नाभि और भौंह छिदवाकर उनमें मोती पिरोने से लेकर टैटू बनवाना तक सब चलता है। जींस ने फैशन युग में क्रान्ति कर दी है, क्योंकि इस व्यस्त समय में उसे चार-छह महीने तक धोने का झंझट ही नहीं है।
कुछ फैशन नेताओं के नाम से भी चलते हैं। नेहरू की अचकन, संजय गांधी का कुर्ता-पाजामा और राजीव का चादर ओढ़ने का तरीका फैशन बन गया था। गुजरात में आधी बांह वाला कुर्ता नरेन्द्र मोदी का ब्रांड है। कब, कौन सी चीज फैशन बन जाए और कब वह चलन से बाहर हो जाए, कहना कठिन है।
कपड़ों की तरह ही बात का भी फैशन होता है। फिल्मी डायलाग का फैशन तो सबने ही देखा है; पर कभी-कभी अन्य लोगों की बातें भी फैशन बन जाती हैं।

किसी समय देश में गांधी टोपी सम्मान का प्रतीक थी; पर 1947 के बाद यह वंशवाद और भ्रष्टाचार का पर्याय बन गयी। ऐसे में किसी ने भविष्यवाणी की थी, ‘‘इन गांधी टोपी वालों को, जनता चुन-चुनकर मारेगी।’’ इस भय से कांग्रेसियों ने उसे छिपा दिया। यद्यपि कार्यक्रमों में कुछ लोग उसे पहन लेते हैं, जिससे भ्रष्टाचार और वंशवाद का संकल्प वे भूल न जाएं।

भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी से लोगों को बड़ी आशाएं थीं। वैसे जनता तो सरदार पटेल को चाहती थी; पर गांधी जी की जिद से नेहरू जी प्रधानमंत्री बन गये। बड़े आदमी होने के कारण नेहरू जी बड़ी-बड़ी बातें करते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि स्वतन्त्र भारत में भ्रष्ट लोगों को बिजली के खम्भे पर लटका कर फांसी दी जाएगी। यह बात फैशन बन गयी। यद्यपि ढूंढने पर भी न ऐसे खम्भे मिले और न उन पर लटकते आदमी। हां, हर खम्भे पर भ्रष्ट नेहरू खानदान के चित्र जरूर लग गये।

नेहरू के बाद इंदिरा जी ने बातों के सूत्र संभाले। उन्होंने 20 सूत्री, तो उनके पुत्र संजय गांधी ने चार सूत्री कार्यक्रम दिया। 1975 से 77 तक आपातकाल के इस 24 सूत्री फैशन में कांग्रेसियों ने विरोधियों को जेल भिजवाकर खूब चांदी काटी।

इसके बाद जनता पार्टी और मोरारजी देसाई का दौर आया। उन्होंने 15 अगस्त को लालकिले पर झंडा फहराते हुए कह दिया कि यदि हम गलती करें, तो जनता हमारे कान पकड़ ले। इस पर विश्वास कर हमारे गांव के कुछ लोग दिल्ली गये; पर मोरारजी तक पहुंचने से पहले ही पुलिस ने उन्हें कान पकड़वा कर मुर्गा बना दिया। इससे यह बात फैशन बनने से रह गयी। अन्यथा न जाने मोरारजी भाई के कानों का क्या हाल होता ?

आकाश से सीधे धरती पर उतरने वाले राजीव गांधी के समय ‘हम देखेंगे’ और ‘हमने देखा है’ का फैशन चला था। यद्यपि आगे चलकर जनता ने उन्हें सिखों का नरसंहार कराते, श्रीलंका में भारतीय सैनिकों को मरवाते और फिर बोफोर्स की दलाली खाते देखकर सत्ता से ही बाहर कर दिया। चूंकि इन दिनों उनकी मैडम और बेटा जी सत्ता में हैं, सो हर काम का श्रेय राजीव जी को देने का फैशन चल रहा है।

राजीव के बाद वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर, देवेगोड़ा, गुजराल आदि भी आये; पर उनकी बातें फैशन नहीं बन सकीं। इसके बाद नरसिंहराव के भाग्य से छींका टूटा और वे प्रधानमंत्री बन गये। ‘‘कानून अपना काम करेगा’’ उनका प्रिय वाक्य था। हां, अटल जी की लाजवाब बातों को आज भी याद किया जाता है। उनके मौन में प्रायः बड़ी गहरी बात छिपी रहती थी।

मैं मनमोहन सिंह जी का बहुत आदर करता हूं। संचार घोटाले के बारे में उन्होंने कह दिया है कि उनके पास छिपाने को कुछ नहीं है। हमारे मोहल्ले में एक पागल भी प्राकृत अवस्था में घूमते हुए यही कहता है। मुझे मालूम नहीं कि दोनों में से किसका किस पर प्रभाव है; पर इस बात का फैशन भी बढ़ रहा है।

मैडम जी को राहुल बाबा पर, तो राहुल को युवाओं पर भरोसा है। वे हर जगह इसे दोहराते हैं। यद्यपि बिहार की धुलाई से इस फैशन का रंग उतर गया है। हो सकता है अगले चुनाव तक वे युवाओं की बजाय बच्चों पर भरोसा करने लगें।

एक नया फैशन इन दिनों संघ, हिन्दुओं और भगवाधारियों को आतंकवादी बताने का चला है। इसका आविष्कारक होने का श्रेय दिग्विजय सिंह, चिदम्बरम्, राहुल बाबा और मुलायम सिंह से लेकर वामपंथी तक लेना चाहते हैं।

इन दिनों हर कोई नैतिकता की माला जप रहा है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, एक-दूसरे को नैतिकता के नाम पर कुर्सी छोड़ने को कह रहे हैं। समझ नहीं आता कि यह चिड़िया किस जंगल में मिलती है ? शर्मा जी इसे चेहरे पर पोतने वाली क्रीम बताते हैं, तो वर्मा जी सिर में लगाने वाला तेल। जो भी हो; पर इस बात पर दोनों सहमत है कि यह भी फैशन की ही कोई चीज है।

सर्वव्यापी भ्रष्टाचार की तरह उसकी जांच की बात भी फैशन है। दिल्ली में संचार घोटाला, मुंबई का आदर्श सोसायटी घोटाला या कर्नाटक का भूमि घोटाला। हर कोई जांच में पिछली सरकारों को भी लपेटना चाहता है। सब दूसरे की चादर को अपनी चादर से अधिक गंदी बता रहे हैं। बात बिलकुल साफ है। चूंकि सबकी चादर मैली है, इसलिए सबको सब कुछ माफ है।

कुछ फैशन मीडिया भी फैलाता है। सत्ता के चाटुकार या कुछ बड़े अंग्रेजी अखबार जैसा बोलें, बुद्धिजीवी प्रजाति के लोग उधर ही मुंह कर हुआं-हुआं करने लगते हैं। जैसे आजकल देशद्रोही अरुन्धति राय और सैयद गीलानी के समर्थन और नक्सलवादी विनायक सेन की सजा के विरोध का फैशन चल रहा है।

किसी ने ठीक ही कहा है कि ‘‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी।’’ देखिये, यहां भी बात की बात में बिना किसी बात के बात कितनी आगे पहुंच गयी। बिना सोचे किसी भी बात की नकल करने का नाम ही तो आधुनिक फैशन है।

इन बातों से शायद आप बोर हो रहे हों; पर बात करने में किसी का क्या जाता है ? आजकल भारत देश बातों को खा-पी और ओढ़-बिछा रहा है। बड़े लोग रोटी, कपड़ा और मकान के जाल में उलझे हैं, तो युवा क्रिकेट, सिनेमा और कैरियर के जंजाल में।

पर बात का सीधा संबंध लात और उसके अभिन्न अंग जूते से भी है। एक कवि के अनुसार -

दुष्टों से व्यवहार का, यही मार्ग मशहूर
जूतों से मुंह तोड़कर, रहो मील भर दूर।।

मुझे भय है कि आम जनता इन बातों से ऊबकर कहीं लातों पर न उतर आये। यदि लातों का फैशन बातों से अधिक चल निकला, तो उसके परिणाम क्या होंगे, यह कहना कठिन है।

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

अंग्रेजी नववर्ष का भारतीयकरण


कुछ दिन बाद फिर एक जनवरी आने वाली है। हर बार की तरह समाचार माध्यमों ने वातावरण बनाना प्रारम्भ कर दिया है। अतः 31 दिसम्बर की रात और एक जनवरी को दिन भर शोर-शराबा होगा, लोग एक दूसरे को बधाई लेंगे और देंगे। सरल मोबाइल संदेशों (एस.एम.एस) के आदान-प्रदान से मोबाइल कंपनियों की चांदी कटेगी। रात में बारह बजे लोग शोर मचाएंगे। शराब, शबाब और कबाब के दौर चलेंगे। इसके अतिरिक्त और भी न जाने लोग कैसी-कैसी मूर्खताएं करेंगे ? जरा सोचिये, नये दिन और वर्ष का प्रारम्भ रात के अंधेरे में हो, इससे बड़ी मूर्खता और क्या हो सकती है ?

यह अंग्रेजी या ईसाई नववर्ष दुनिया के उन देशों में मनाया जाता है, जिन पर कभी अंग्रेजों ने राज किया था। यद्यपि हर देश अपने इतिहास और मान्यताओं के अनुसार नव वर्ष मनाता है। भारत में प्रायः सभी संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होते हैं; पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका और ब्रिटेन का वर्चस्व दुनिया में बढ़ गया। इन दोनों के ईसाई देश होने से कई अन्य देशों में भी ईसाई वेशभूषा, खानपान, भाषा और परम्पराओं की नकल होने लगी। भारत भी इसका अपवाद नहीं है।

यह बात मुझे आज तक समझ में नहीं आई कि यदि ईसा मसीह का जन्म 25 दिसम्बर को हुआ था, तो जिस वर्ष और ईस्वी को उनके जन्म से जोड़ा जाता है, उसे एक सप्ताह बाद एक जनवरी से क्यों मनाया जाता है ? वस्तुतः ईसा का जन्म 25 दिसम्बर को नहीं हुआ था। चौथी शती में पोप लाइबेरियस ने इसकी तिथि 25 दिसम्बर घोषित कर दी, तब से इसे मनाया जाने लगा। तथ्य तो यह भी हैं कि ईसा मसीह के जीवन के साथ जो प्रसंग जुड़े हैं, वे बहुत पहले से ही योरोप के अनेक देशों में प्रचलित थे। उन्हें ही ईसा के साथ जोड़कर एक कहानी गढ़ दी गयी।

इससे इस संदेह की पुष्टि होती है कि ईसा नामक कोई व्यक्ति हुआ ही नहीं। वरना यह कैसे संभव है कि जिस तथाकथित ईश्वर के बेटे के दुनिया में अरबों लोग अनुयायी हैं, उसकी ठीक जन्म-तिथि ही पता न हो। जैसे भारत में ‘जय संतोषी मां’ नामक फिल्म ने कई वर्ष के लिए एक नयी देवी को प्रतिष्ठित कर दिया था, कुछ ऐसी ही कहानी ईसा मसीह की भी है।

इसके दूसरी ओर भारत में देखें, तो लाखों साल पूर्व हुए श्रीराम और 5,000 से भी अधिक वर्ष पूर्व हुए श्रीकृष्ण ही नहीं, तो अन्य सब अवतारों, देवी-देवताओं और महामानवों के जन्म की प्रामाणिक तिथियां सब जानते हैं और उन्हें हर वर्ष धूमधाम से मनाते भी हैं।

लेकिन फिर भी नव वर्ष के रूप में एक जनवरी प्रतिष्ठित हो गयी है। लोग इसे मनाते भी हैं, इसलिए मेरा विचार है कि हमें इस अंग्रेजी पर्व का भारतीयकरण कर देना चाहिए। इसके लिए निम्न कुछ प्रयोग किये जा सकते हैं।

1. 31 दिसम्बर की रात में अपने गांव या मोहल्ले में भगवती जागरण करें, जिसकी समाप्ति एक जनवरी को प्रातः हो।

2. अपने घर, मोहल्ले या मंदिर में 31 दिसम्बर प्रातः से श्रीरामचरितमानस का अखंड पारायण प्रारम्भ कर एक जनवरी को प्रातः समाप्त करें।

3. एक जनवरी को प्रातः सामूहिक यज्ञ का आयोजन हो।

4. एक जनवरी को भजन गाते हुए प्रभातफेरी निकालें।

5. सिख, जैन, बौद्ध आदि मत और पंथों की मान्यता के अनुसार कोई धार्मिक कार्यक्रम करें।

6. एक जनवरी को प्रातः बस और रेलवे स्टेशन पर जाकर लोगों के माथे पर तिलक लगाएं।

7. एक जनवरी को निर्धनों को भोजन कराएं। बच्चों के साथ कुष्ठ आश्रम, गोशाला या मंदिर में जाकर दान-पुण्य करें।

यह कुछ सुझाव हैं। यदि इस दिशा में सोचना प्रारम्भ करेंगे, तो कुछ अन्य प्रयोग और कार्यक्रम भी ध्यान में आएंगे। हिन्दू पर्व मानव के मन में सात्विकता जगाते हैं, चाहे वे रात में हों या दिन में। जबकि अंग्रेजी पर्व नशे और विदेशी संगीत में डुबोकर चरित्रहीनता और अपराध की दिशा में ढकेलते हैं। इसलिए जिन मानसिक गुलामों को इस अंग्रेजी और ईसाई नववर्ष को मनाने की मजबूरी हो, वे इसका भारतीयकरण कर मनाएं।