गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

चुनाव व्यवस्था में परिवर्तन



परिवर्तन की बात करना राजनेताओं और समाजसेवियों में प्रचलित एक फैशन है। चुनाव आयुक्त श्री कुरैशी भी देश भर के विद्वानों और राजनेताओं से परामर्श कर रहे हैं कि चुनाव व्यवस्था में क्या सुधार होने चाहिए ? पिछले दिनों राहुल गांधी ने उ0प्र0 में कहा कि सारी राजनीतिक व्यवस्था सड़ गयी है, अतः इसे बदलना चाहिए। उनके आक्रोश का कारण यह है कि पिछले 20 साल से उ0प्र0 में कांग्रेस सत्ता से बाहर है। राहुल जी कांग्रेस के बड़े नेता हैं, अतः उनके बयान से मीडिया में इस विषय पर चर्चा होने लगी। यद्यपि इस व्यवस्था का विकल्प न उन्होंने बताया और न ही किसी अन्य ने।


जहां तक परिवर्तन की बात है, तो वह लोकतन्त्र की मर्यादा में होना चाहिए। यद्यपि वर्तमान चुनाव प्रणाली भी पूर्णतया लोकतान्त्रिक ही है; पर भ्रष्टाचार, जातिवाद, मजहबवाद, क्षेत्रीयता, महंगाई, अनैतिकता और कामचोरी लगातार बढ़ रही है। इसका कारण यह दूषित चुनाव प्रणाली ही है। दुनिया में कई प्रकार की चुनाव प्रणालियां प्रचलित हैं। हमने उन पर विचार किये बिना ब्रिटिश प्रणाली को अपना लिया। इसका भविष्य तो गांधी जी ने ही इसे ‘बांझ’ कहकर बता दिया था। अब तो इंग्लैंड में भी इसे बदलने और सांसदों की संख्या घटाने के लिए पांच मई को जनमत संग्रह होने जा रहा है।


यदि आप किसी सांसद या विधायक से मिलें, तो वह अपने क्षेत्र की बिजली-पानी, सड़क और नाली की व्यवस्था में उलझा मिलेगा। यदि वह ऐसा न करे, तो अगली बार लोग उसे वोट नहीं देंगे। इन दिनों एक विधानसभा क्षेत्र में प्रत्याशी एक करोड़ रु0 तक खर्च कर देता है। पार्टी तो उसे इतना देती नहीं। ऐसे में वह भ्रष्टाचार से पैसा जुटाता है, जिससे अगला चुनाव जीत सके। भारत में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार का मुख्य कारण यही है।


लोकसभा और विधानसभा का काम देश और प्रदेश के लिए नियम बनाना है; पर सांसद और विधायक यह नहीं करते। यह उनकी मजबूरी भी है। अतः इस चुनाव प्रणाली के बदले हमें भारत में ‘सूची प्रणाली’ का प्रयोग करना चाहिए।


इसमें प्रत्येक राजनीतिक दल को सदन की संख्या के अनुसार चुनाव से पहले अपने प्रत्याशियों की सूची चुनाव आयोग को देनी होगी। जैसे लोकसभा में 525 स्थान हैं, तो प्रत्येक दल 525 लोगों की सूची देगा। इसके बाद वह दल चुनाव लड़ेगा, व्यक्ति नहीं। चुनाव में व्यक्ति का कम, दल का अधिक प्रचार होगा। चुनाव रैली और अन्य माध्यमों से हर दल अपने विचार और कार्यक्रम जनता को बताएगा। इसके आधार पर जनता उस दल को वोट देगी।


चुनाव सम्पन्न होने के बाद जिस दल को जितने प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसके उतने प्रतिशत लोग सूची में से क्रमवार सांसद घोषित कर दिये जाएंगे। यदि किसी एक दल को बहुमत न मिले, तो वह मित्र दलों के साथ सरकार बना सकता है। इस प्रणाली से चुनाव का खर्च बहुत कम हो जाएगा। इसमें उपचुनाव का झंझट भी नहीं है। किसी सांसद की मृत्यु या त्यागपत्र देने पर सूची का अगला व्यक्ति शेष समय के लिए स्वयमेव सांसद बन जाएगा।


इस व्यवस्था से अच्छे, शिक्षित तथा अनुभवी लोगों को राजनीति में आने का अवसर मिलेगा। इससे जातीय समीकरण टूटेंगे। आज तो दलों को प्रायः जातीय या क्षेत्रीय समीकरण के कारण दलबदलू या अपराधी को टिकट देना पड़ता है। उपचुनाव में सहानुभूति के वोट पाने के लिए मृतक के परिजन को इसीलिए टिकट दिया जाता है। सूची प्रणाली में ऐसा कोई झंझट नहीं है।


इस प्रणाली में हर सांसद या विधायक किसी क्षेत्र विशेष का न होकर पूरे देश या प्रदेश का होगा। अतः उस पर किसी जातीय या मजहबी समीकरण के कारण सदन में किसी बात को स्वीकार करने या न करने की मजबूरी नहीं होगी। किसी भी प्रश्न पर विचार करते सबके सामने पूरे देश या प्रदेश का हित होगा, केवल एक जाति, क्षेत्र या मजहब का नहीं।


इससे राजनीति में उन्हीं दलों का अस्तित्व रहेगा, जो पूरे देश के बारे में सोचते हैं। एक जाति, क्षेत्र या मजहब की राजनीति करने वाले दलों तथा अपराधी, भ्रष्ट और खानदानी नेताओं का वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। उन्हें एक-दो सांसदों या विधायकों के कारण सरकार को बंधक बनाने का अवसर ही नहीं मिलेगा। यह प्रणाली राजनीति के शुद्धिकरण की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगी।


पर ऐसे में प्रश्न है जनता का प्रतिनिधि कौन होगा ? इसके लिए हमें जिला, नगर, ग्राम पंचायतों के चुनाव निर्दलीय आधार पर वर्तमान व्यवस्था की तरह ही कराने होंगे। इन लोगों का अपने क्षेत्र की नाली, पानी, बिजली और थाने से काम पड़ता है। इस प्रकार चुने गये जनप्रतिनिधि प्रदेश और देश के सदनों द्वारा बनाये गये कानूनों के प्रकाश में अपने क्षेत्र के विकास का काम करेंगे। ऊपर भ्रष्टाचार न होने पर नीचे की संभावनाएं भी कम हो जाएंगी।


यहां एक बात और ध्यान देने योग्य है कि लोकसभा, विधानसभा आदि में बहुत अधिक सदस्यों की आवश्यकता नहीं है। संसद में 200 सांसद; बड़े राज्यों में 50 और छोटे राज्यों में 10 विधायक पर्याप्त हैं। यद्यपि सूची प्रणाली से कुछ समय के लिए दल में सूची को अंतिम रूप देने वाले बड़े नेताओं का प्रभाव बढ़ जाएगा; पर यदि वे जमीनी, अनुभवी और काम करने वालों को सूची में नहीं रखेंगे, तो जनता उन्हें ठुकरा देगी। अतः एक-दो चुनाव में व्यवस्था स्वयं ठीक हो जाएगी।


इस प्रणाली में नये दल का निर्माण, राष्ट्रीय या राज्य स्तर के दल की अर्हता आदि पर संविधान के विशेषज्ञ तथा विद्वान लोगों में बहस होने से ठीक निष्कर्ष निकलेंगे। उन्हीं दलों को मान्यता मिले, जिनमें आंतरिक चुनाव ठीक से हों। आज तो अधिकांश दल एक परिवार के बंधक जैसे बन गये हैं। इसके लिए भी कुछ नियम बनाने होंगे।


‘‘एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए’’ की तर्ज पर कहें, तो चुनाव प्रणाली बदलकर, चुनाव को सस्ता और जाति, क्षेत्र, मजहब आदि के चंगुल से मुक्त करने से देश की अनेक समस्याएं हल हो जाएंगी। भाजपा की पूर्वावतार जनसंघ ‘सूची प्रणाली’ की समर्थक थी। अब यदि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस भी इस पर सहमत हो जाए, तो यह सड़ी और बांझ व्यवस्था बदलते देर नहीं लगेगी।


रविवार, 13 फ़रवरी 2011

व्यंग्य बाण : दर्द का हद से गुजरना है...



दुनिया में शायद ही कोई हो, जिसे कभी दर्द का अनुभव न हुआ हो। बूढ़ों में सिर, हाथ, पैर या पूरे शरीर का दर्द, बच्चों में विद्यालय न जाने के लिए पेट का दर्द और युवाओं के दिल में दर्द प्रायः देखने में आता हैं; पर लेखकों को एक विशेष प्रकार का दर्द होता है, जिसके लिए कोई नाम अब तक निर्धारित नहीं हुआ।


बात कुछ दिन पहले की है। कवि अखंड जी हांफते हुए एक हाथ में कागज और दूसरे में बुद्धिप्रकाश (मोटा डंडा) लिए कवि प्रचंड जी के पीछे दौड़ रहे थे। काफी प्रयास के बाद उन्होंने प्रचंड जी का क१लर पकड़ ही लिया।


लोगों ने पूछा, तो वे भड़क कर बोले - पिछले दो घंटे से यह मुझे अपनी कविता सुना रहा है। तीन कप चाय और चार पंराठे खा चुका है यह पापी; पर जब मेरा कविता सुनाने का नंबर आया, तो भाग खड़ा हुआ।


- पर अखंड जी, इसे दोपहर का खाना भी बनाना है। बीवी-बच्चे भूखे बैठे होंगे। - मैंने समझाने का प्रयास किया।


- जी नहीं, इसे दोपहर का ही नहीं, चाहे रात का खाना भी खिलाना पड़े; पर मैं कविता सुना कर ही रहूंगा।


तो साहब, यह है कवियों का दर्द। ‘जाके पैर न पड़ी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई.’...शायद ऐसे लोगों के लिए ही कहा गया है।


गद्य लेखकों के दर्द कुछ दूसरे हैं। कोई कहानी, व्यंग्य, लेख, निबन्ध, संस्मरण आदि लिखने के बाद यदि वह प्रकाशित न हो, तो उनका रक्तचाप बढ़ जाता है। किसी पत्र-पत्रिका को भेजने के बाद यदि महीने भर तक उसका उत्तर न आये, तो वह बौराने लगते हैं। डाकिये को देखकर कुछ आशा बंधती है; पर जब वह बिना इधर देखे निकल जाता है, तो अपना ही मुंह नोचने की इच्छा होने लगती है। रचना छपने के बाद यदि पारिश्रमिक न मिले, तो दिल के साथ जेब भी दर्द करने लगती है।


आजकल लिखने के लिए कम्प्यूटर और पत्र-पत्रिकाओं में भेजने के लिए अतंरजाल (इंटरनेट) का भी उपयोग होने लगा हैं; पर कई बार याद दिलाने पर भी जब उत्तर नहीं आता, तो लेखक की आंखें और उंगलियां दर्द करने लगती हैं; लेकिन क्या करे ? आदत से मजबूर लेखक फिर पिल जाता है और शाम तक एक नयी रचना तैयार।


कुछ लेखक कविता या कहानी की बजाय सीधे पुस्तक लिखना ही पसंद करते हैं। ऐसे लोगों के भी अपने दर्द हैं।


बात बहुत पुरानी है। एक प्रकाशन की पत्रिका में एक विवादित साक्षात्कार प्रकाशित हुआ। कई बड़े लेखकों ने उसकी आलोचना करते हुए वहां से छपी अपनी पुस्तकें वापस लेने की घोषणा कर दी। प्रकाशक कुछ दिन तो चुप रहे; पर बात बढ़ने पर उन्होंने एक लेखक को फोन किया।


- आप अपनी पुस्तक वापस लेना चाहते हैं ?


- जी हां, मैं क्या बहुत से लेखक वापस ले रहे हैं।


- ठीक है, तो कल कार्यालय में आकर हिसाब कर लें।


अगले दिन लेखक जी सीना चौड़ा कर कार्यालय पहुंच गये। हर बार तो प्रकाशक उन्हें चाय के साथ समोसा खिलाता था; पर आज उसने खाली चाय ही मेज पर रखवा दी।


- महोदय, आपकी पुस्तक के लिए हमने 20,000 रु0 अनुबंध राशि दी थी। चूंकि आप किताब वापस ले रहे हैं, तो कृपया वह राशि भी वापस कर दें।


लेखक को लगा, मानो कुर्सी के नीचे बम रखा हो। वे बोले - वह तो खर्च हो चुकी है। फिर भी धीरे-धीरे वापस कर दूंगा।


- ठीक है। पुस्तक की 1,000 प्रतियां छपी थीं। उसमें से 200 बिकी हैं। शेष आप ले जाएं। यों तो पुस्तक का मूल्य 150 रु0 है; पर आपको 100 रु0 में ही दे देंगे। कृपया 80,000 रु0 देकर उन्हें उठवा लें।


लेखक को कुर्सी में कांटें से लगने लगे। वे उठते हुए बोले - यह तो बड़ा झंझट है। मैं पुस्तकें कहां बेचता फिरूंगा ? चलिए छोड़िए, मैं अपना निर्णय वापस लेता हूं।


- पर हम अपना निर्णय वापस नहीं ले सकते। यदि एक महीने में आपने हिसाब नहीं किया, तो आपकी पुस्तकें रद्दी में बेचकर शेष राशि के लिए आप पर न्यायालय में दावा ठोक दिया जाएगा।


लेखक जी तब से घर पर ही हैं। उनके सिर से लेकर पैर तक हर अंग में दर्द है। शरीर कांपने और जीभ लड़खड़ाने लगी है। हर रात सपने में कबाड़ी नजर आता है। लिखने में भी अब मन नहीं लगता। काश, उन्हें यह पता होता कि चाकू और खरबूजे के युद्ध में कटता सदा खरबूजा ही है।


किसी ने कहा है - दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना। ऐसे दर्द के लिए हमदर्द वालों ने कोई झंडू बाम बनाया हो, तो दस-बीस डिब्बे मुझे भी भिजवाइये, क्योंकि मैं और मेरे कई मित्र इस दर्द से परेशान हैं।