शुक्रवार, 11 मार्च 2011

              मीडिया, जनाकांक्षा और जनतंत्र



एक व्यक्ति से दूसरे तक या एक स्थान से दूसरे स्थान पर किसी वस्तु को पहुंचाने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। समाचारों और विचारों को फैलाने के लिए प्रयोग हो रहे माध्यम के लिए ही इन दिनों मीडिया शब्द रूढ़ हो गया है।


मीडिया को विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के साथ ही लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है। लोग विधायिका और कार्यपालिका की खुली आलोचना करते हैं। न्यायपालिका की आलोचना करते समय शब्द प्रयोग में थोड़ी सावधानी रखनी पड़ती है, चूंकि उससे मानहानि के मुकदमे का भय रहता है। इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र के जिन नेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों या उद्योगपतियों पर मुकदमे चल रहे हैं, वे सदा यही कहते हैं कि उन्हें भारत के न्यायालय पर विश्वास है। यद्यपि न्यायालय द्वारा विपरीत निर्णय आने पर उनके मन के विपरीत भाव मुखर होते देर नहीं लगती।


पर मीडिया की आलोचना से प्रायः सब बचते हैं, मानो वह कोई मजहबी किताब है, जिसकी आलोचना से तूफान आ जाएगा। अतः मीडिया का स्तर लगातार गिर रहा है; लोगों का उससे विश्वास घट रहा है और लोकतंत्र तथा जनाकांक्षा की कसौटी पर उसकी भूमिका संदेह के घेरे में है।


भारत में समाचार प्रकाशन का इतिहास छापेखाने के आविष्कार से ही प्रारम्भ होता है। अंग्रेजी काल होने के कारण पत्र-पत्रिकाओं का उद्देश्य उस समय स्वाधीनता की अलख जगाना था। इसीलिए जान और जेल का खतरा उठाकर सैकड़ों पत्रकारों ने उस समय काम किया। कुछ पत्र खुलेआम छपते थे, तो कुछ गुप्त रूप से। कई पत्र विदेशों में छपकर भारत के साथ ही अनेक देशों में वितरित होते थे। उनका रूप कई बार एक-दो पृष्ठों के पत्रक जैसा ही होता था। ये पत्र जिसके पास मिलते थे, उस पर मुकदमा और फिर उसे कई वर्ष की जेल होती ही थी। इस पर भी ये छपते और बंटते थे। लोकप्रियता के कारण लोगों को इनकी प्रतीक्षा रहती थी। यद्यपि चाटुकार तब भी थे। फिर भी स्वाधीनता से पूर्व का अधिकांश मीडिया तंत्र जनाकांक्षा की कसौटी पर खरा उतरा था।


1947 के बाद देश के वातावरण में जो क्षरण हुआ, उसका प्रभाव मीडिया पर भी पड़ा। नेहरू जी स्वभाव से अंग्रेजी और उर्दूपरस्त थे। भारतीय भाषाओं से वे घृणा करते थे। अंग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक अंग्रेजी पत्रों को राष्ट्रीय (छंजपवदंस) तथा भारतीय भाषा वाले पत्रों को भाषायी (टमतदंबनसंत) कहा। नेहरू ने भी इसी नीति का पालन किया। अतः शासकीय विज्ञापन ऐसे ही पत्रों को मिलने लगे। अतः अंग्रेजी पत्र खूब फले-फूले। दुर्भाग्य से आज भी यही स्थिति है। शासकीय विज्ञापनों का 80 प्रतिशत अंग्रेजी पत्रों को ही मिलता है।


लेकिन जहां तक जमीनी समाचारों की बात है, अंग्रेजी पत्रों में उनका प्रायः अभाव दिखता है। यह बात 1947 की तरह आज भी सत्य है। अपने गांव और जिले के समाचार के लिए लोग अपनी भाषा में निकलने वाले पत्रों पर ही निर्भर हैं। यद्यपि बुद्धिजीवी वर्ग तथा शासन-प्रशासन के क्षेत्र में पढ़े जाने के कारण अंग्रेजी पत्रों का प्रभाव अधिक है; पर प्रसार की दृष्टि से भारतीय पत्रों से वे बहुत पीछे हैं। अर्थात अंग्रेजी पत्र भारत के शिक्षित, सम्पन्न और सम्पन्न वर्ग की मानसिक भूख भले ही शांत कर देता हो; पर जनाकांक्षा की पूर्ति तो भारतीय पत्रों से ही होती है।


26 जून, 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में तानाशाही थोपकर सभी पत्र-पत्रिकाओं पर नियन्त्रण हेतु सेंसर लगा दिया गया। कई पत्रों ने अपनी-अपनी शैली में इसका विरोध किया; पर यह विरोध अधिक समय तक नहीं चल सका। शर्म की बात तो यह है कि बड़े कहे जाने वाले कई पत्रों के सम्पादकों ने जुलूस निकालकर इसका समर्थन किया। उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने गुप्त रूप से 500 से लेकर 1,000 प्रसार संख्या वाले सैकड़ों पत्र प्रकाशित किये। अंगारा, सौगन्ध, स्वाधीनता...आदि नामों से ये पत्र एक नगर या जिले तक सीमित होते थे। ये हाथ से चलने वाली साइक्लोस्टाइल मशीन पर छपते थे, जबकि कुछ साहसी प्रेस मालिक रात में इन्हें बड़ी मशीनों पर भी छाप देते थे। उस समय भी जनाकांक्षा की पूर्ति इन स्थानीय पत्रों द्वारा ही हुई, तथाकथित बड़े पत्रों द्वारा नहीं।


आपातकाल हटने के बाद पत्रों को पूर्ववत स्वाधीनता मिली। तब एक कांग्रेसी नेता ने कहा था कि हमने उन्हें सिर्फ झुकने को कहा था, पर वे लेटकर दंडवत करने लगे। बड़े पत्रों की इस रीढ़विहीनता का कारण यह था कि सभी बड़े पत्र पूंजीपतियों के थे, और पूंजीपति कभी सरकार का विरोध नहीं कर सकते। जो स्थिति कल थी, वही आज भी है। बड़े कहलाने वाले अंग्रेजी या भारतीय पत्रों के मालिक आज भी बड़े व्यापारी ही हैं। उनके मुख्य कारोबार कुछ और है। पत्र उनके कारोबार को मीडिया रूपी ढाल प्रदान करते हैं।


मीडिया पूरी तरह बाजार के चंगुल में है, इसे वर्तमान पत्रों की भाषा से समझ सकते हैं। अस्सी के दशक में जब राजीव गांधी और उनकी दून मंडली सत्ता में आई, तो देश में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ने लगा। धीरे-धीरे हिन्दी माध्यम से चलने वाले विद्यालयों ने भी अपने बोर्ड बदलकर उन पर अंग्रेजी माध्यम लिखवा दिया। आज उस बात को 25 वर्ष हो चुके हैं और एक ऐसी पीढ़ी अस्तित्व में आ गयी है, जो न ठीक से हिन्दी जानती है और न अंग्रेजी। हिन्दी अंकावली तो प्रायः पूरी तरह से ही गायब हो गयी है।


इस पीढ़ी तक पहुंचने के लिए कई हिन्दी पत्रों ने अपनी भाषा में जबरन अंग्रेजी शब्दों और रोमन लिपि की घुसपैठ करा दी है। कई पत्र तो शीर्षक ही अंग्रेजी में लगाने लगे हैं। कोई समय था, जब इन पत्रों के माध्यम से लोग अपनी भाषा सुधारते थे; पर अब वही मीडिया भाषा बिगाड़ने में लगा है। दूरदर्शन के समाचारों तथा नीचे आने वाली लिखित पट्टी में हिन्दी के साथ जैसा दुर्व्यवहार होता है, उसे देखकर सिर पीटने की इच्छा होती है। स्पष्ट है कि मीडिया का उद्देश्य इस समय केवल पैसे कमाना हो गया है।


पत्र-पत्रिकाओं से लेखक व साहित्यकारों को एक पहचान मिलती है। पहले कई पत्र प्रयासपूर्वक नये और युवा लेखकों को प्रोत्साहित करते थे; पर अब अधिकांश पत्र किसी गुट से बंधे हैं। वे उस गुट के लेखकों को ही स्थान देते हैं। विरोधी या तटस्थ लेखकों की रचनाएं अच्छी होने पर भी फेंक दी जाती हैं। यहां तक कि उनको जवाब भी नहीं दिया जाता। अंग्रेजी लेखकों की अनुवादित जूठन परोसने में भी कई पत्रों में होड़ लगी है। वे भूलते हैं कि हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में लिखने वाले कम नहीं हैं; पर जब उद्देश्य केवल पैसा हो, तो इस ओर ध्यान कैसे जा सकता है ?


अपने विचार से इतर संस्थाओं के कार्यक्रमों के बहिष्कार की प्रवृत्ति भी इसी मानसिकता के कारण बढ़ रही है। गत 27 फरवरी को दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव और अन्य समाजसेवियों को सुनने एक लाख लोग आये। सरकारी दूरदर्शन ने इसका समाचार ही नहीं दिया, तो दिल्ली के अधिकांश पत्रों ने भी दूसरे-तीसरे पृष्ठ पर इसे स्थान दिया। विज्ञापन का लालची मीडिया शासन से कितना डरता है, इसका यह एक उदाहरण है।


इस बाजारवाद ने ही ‘पेड न्यूज’ (विज्ञापन को समाचार की तरह छापने) के चलन को बढ़ाया है। चुनाव के समय यह प्रवृत्ति बहुत तीव्र हो जाती है। 100 लोगों की बैठक को विराट सभा बताना तथा विशाल सभा के समाचार को गायब कर देना, इसी कुप्रवृत्ति का अंग है। दुर्भाग्य से वे समाचार पत्र ही इस होड़ में लगे हैं, जिनके मालिकों के पास अथाह सम्पत्ति है। उनकी देखादेखी छोटे पत्र भी इसकी नकल कर रहे हैं। यद्यपि कुछ पत्रकारों और संस्थाओं ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई है, जो एक शुभ लक्षण है।


मीडिया में समाचार और विचार दो अलग धारणाएं हैं। यदि संवाददाता या संपादक किसी समाचार के पक्ष या विपक्ष में कोई विचार देना चाहे, तो उसके लिए सम्पादकीय पृष्ठ का उपयोग होता है। कुछ पत्र इस नीति का पालन करते हैं; पर अधिकांश में इसका अभाव है। संवाददाता अपने विचारों के अनुसार समाचार को तोड़-मरोड़ देता है। इससे पत्र की विश्वसनीयता कम होती है।


जब समाज में हर ओर गिरावट आती है, तो उसका प्रभाव मीडिया पर भी पड़ना स्वाभाविक है। समाचार पत्रों को शासन भरपूर विज्ञापन देता है। इस लालच में हजारों पंजीकृत पत्र केवल सौ प्रतियां छाप कर ही स्वयं को जीवित रखते हैं। जिस दल का शासन, उसकी प्रशंसा कर विज्ञापन लेना ही इनकी नीति होती है। पति सम्पादक, पत्नी प्रबंधक, बेटा मुख्य संवाददाता और बेटी विज्ञापन प्रबंधक...। ऐसे पत्र मीडिया की प्रतिष्ठा को गिराते हैं; पर कोई कठोर कानून न होने के कारण ऐसे दलाल लगातार बढ़ रहे हैं। ये पत्र लोकतंत्र और जनाकांक्षा दोनों के लिए ही हानिकारक हैं।


अंतरजाल के सहारे न्यू मीडिया की एक नई लहर भी इन दिनों जोर पकड़ रही है। बड़ी संख्या में लेखक और पत्रकार ब्ल१ग लिख रहे हैं। यह अपने विचारों को फैलाने का एक प्रबल माध्यम बन गया है। अतः सभी समाचार पत्र इन्हें स्थान देने लगे हैं; पर कोई नियन्त्रण न होने से जहां एक ओर इसकी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है, वहां भाषा की मर्यादा का उल्लंघन भी अत्यधिक हो रहा है। चूंकि अभी यह प्रारम्भिक अवस्था में है, इसलिए इसका भविष्य क्या होगा, कहना कठिन है।


अंतरजाल और मोबाइल के मेल ने ट्विटर और फेसबुक को एक सशक्त सामाजिक मंच बना दिया है, जहां लोग अपने विचारों को बांट सकते हैं। यह एक दुधारी तलवार है, जो दूसरों के साथ स्वयं पर भी वार करती है। भारत में पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर और क्रिकेट के व्यापारी ललित मोदी को ट्विटर पर की गयी टिप्पणियों के कारण ही पद छोड़ना पड़ा। इन दिनों भाजपा नेता सुषमा स्वराज का एक ट्वीट चर्चा में है।


मीडिया एक सतत प्रवाहमान संस्था है। इसने अनेक बार अपने रंग और रूप बदले हैं। कोई समय था, जब उत्तर से दक्षिण तक समाचार पहुंचने में छह महीने लग जाते थे; पर आज छह सेकेंड में पूरी दुनिया में बात फैल जाती है। इस तेजी के कारण लोकतंत्र और जनाकांक्षा के प्रति इसकी जिम्मेदारी भी बढ़ी है; पर उसकी पूर्ति सही तरह से नहीं हो पा रही है। इसका दोषी केवल मीडिया तंत्र ही नहीं, पूरा समाज और राजनीतिक वातावरण है।


चुनाव में हर बार लाखों नये मतदाता बनते हैं। नये होने के कारण इनका प्रशिक्षण आवश्यक है। युवा पीढ़ी नई सोच और नई उमंग वाली होती है। अतः मीडिया इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा सकता है। वह नये लोगों को जाति, क्षेत्र, भाषा और प्रांत की राजनीति से मुक्त करने तथा वंशवादी, भ्रष्टाचारी और अपराधी प्रत्याशियों का विरोध करने की प्रेरणा दे सकता है; पर प्रायः मीडिया इस बारे में चुप रहता है। कहीं विज्ञापन उसका मुंह बंद कर देते हैं, तो कहीं प्रत्याशी का भय। फलतः वह भी हर चुनाव क्षेत्र के जातीय और मजहबी समीकरण देकर ही अपने कर्तव्य की पूर्ति कर लेता है। इससे सर्वहित की बजाय जाति और मजहबी राजनीति को बल मिलता है। यही कारण है कि 60 वर्ष का होने के बाद भी भारतीय लोकतंत्र जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर पा रहा है।


किसी भी वस्तु के निर्माण में कच्चे माल और मशीनों की गुणवत्ता का बहुत महत्व है। यही स्थिति मीडिया की है। पत्रकार भी इसी समाज से आ रहे हैं। भौतिकता की होड़ और राजनीति की चमक-दमक से वे भी प्रभावित होते हैं। उन्हें भी अपने परिवार के लिए कार, मकान, मनोरंजन और बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा व अन्य सुविधाएं चाहिए। खाली पेट साइकिल पर घूमते हुए अब पत्रकारिता नहीं हो सकती। ऐसे में उनका क्षरण होगा ही। पिछले दिनों राडिया-राजा प्रकरण से पता लगा कि पत्रकार जगत के कई बड़े लोग कितनी गहराई तक कीचड़ में धंसे हैं।


भ्रष्टाचार जिस तरह सर्वव्यापी, सर्वस्पर्शी और समाज में स्वीकार्य हो गया है, वह आश्चर्यजनक है। राजनीति तो काली थी ही; पर अब सेना और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के किस्से भी खुल रहे हैं। ऐसे में मीडियाकर्मियों से बहुत आशा नहीं करनी चाहिए। यद्यपि न्यायपालिका और सेना के भ्रष्टाचार को भी मीडिया ने ही उजागर किया है। इसलिए उनकी जिम्मेदारी बाकी सबसे अधिक है।


पर यह नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया भी समाज का ही एक अंग है। उसे लोकतंत्र और जनाकांक्षा की कसौटी पर कसने से पहले समाज और उसके नेताओं को स्वयं को कसौटी पर कसना होगा। भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था, पैसा कमाने की मशीन बनाने वाली अनैतिक शिक्षा और अनुशासनहीन समाज में से 24 कैरेट वाले पत्रकारों की खोज व्यर्थ है।

रविवार, 6 मार्च 2011

व्यंग्य बाण: क्रिकेट के विशेषज्ञ



भारत देवी-देवताओं और अवतारों का ही नहीं, विशेषज्ञों का भी देश है। हर व्यक्ति किसी न किसी बात का विशेषज्ञ होता है। यदि कहीं दस लोग एक साथ बैठे हों, तो उनमें चिकित्सा, ज्योतिष, शिक्षा, पर्यावरण, राजनीति और फिल्म का कम से कम एक-एक विशेषज्ञ अवश्य होगा। हर गांव या बिरादरी में दो-चार रिश्ते कराने और तुड़वाने के विशेषज्ञ भी होते हैं।


कुछ विशेषज्ञ किसी विशेष मौसम में कुकुरमुत्ते की तरह उग आते हैं। आपकी रुचि न हो, तब भी वे ‘झाड़े रहो कलक्टरगंज’ की तर्ज पर जबरन विशेषज्ञता झाड़ने लगते हैं। यह देखकर कभी-कभी तो उन्हें बनाने वाले भगवान पर ही तरस आने लगता है।


खेती में सैकड़ों प्रयोग करने के बाद बर्बाद हो चुके रामलाल कृषि विशेषज्ञ हैं, तो व्यापार में सब कुछ लुटाकर चाट बेच रहे श्यामलाल उद्योगों के विशेषज्ञ। तीन पत्नियों को तलाक दे चुके जगमोहन परिवार समन्वय का बोर्ड लगाकर लोगों को सलाह दे रहे हैं, तो शादी की उम्र को 25 साल पहले पार कर चुके मनमोहन रिश्ते मिलाने की दुकान खोले हैं।


फटी चटाई पर अपने तोते के साथ जमे कालेराम धन कमाने के मंत्र बताते हैं, तो झोपड़ी में बैठे गोरेमल वास्तुशास्त्र के सिद्धांत। ऐसे लोगों के लिए ही काका हाथरसी ने कभी ‘नाम बड़े पर दर्शन छोटे’ नामक प्रसिद्ध कविता लिखी थी। आजकल विश्व कप क्रिकेट का दौर है, इसलिए उसके विशेषज्ञ रुपये में चार मिल रहे हैं।


परसों मैं किसी काम से शर्मा जी के घर गया, तो वे अपने परम मित्र वर्मा जी से गंभीर चर्चा में व्यस्त थे।


- क्यों वर्मा जी, आपका क्या विचार है, इस बार क्रिकेट का विश्व कप कौन जीतेगा ?


- इसमें भी कोई सोचने की बात है। इस समय दुनिया भर में अमरीका की तूती बोल रही है, इसलिए वही जीतेगा।


- पर अमरीका तो इस प्रतियोगिता में भाग ही नहीं ले रहा ?


- तो फिर चीन का दावा मजबूत सिद्ध होता है। अब तो अर्थजगत में उसने जापान को भी पछाड़ दिया है।


- वर्मा जी, क्रिकेट के बारे में आप बहुत कम जानते हैं। अमरीका की तरह चीन भी गुलामों वाला यह खेल नहीं खेलता।


- देखिये, आप यह आरोप न लगाएं। क्रिकेट के बारे में जितना मैं जानता हूं, उतना शहर में कोई नहीं जानता होगा। यदि अमरीका और चीन इस बार प्रतियोगिता में भाग नहीं ले रहे, तब तो सीधी सी बात है, जो टीम अधिक गोल करेगी, वही कप ले जाएगी।


- अपने दिमाग का इलाज कराओ वर्मा जी। क्रिकेट में हार-जीत रन से होती है, गोल से नहीं।


- आप चाहे जो कहें; पर यह निश्चित है कि जो देश इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं, उनमें से ही कोई कप जीतेगा।


- पर आपने भारत की संभावनाओं के बारे में कुछ नहीं बताया ?


- इस बारे में मुझे बड़ी निराशा है। टीम में ऐसे लोग रखने चाहिए, जो आवश्यकता होने पर कप छीन सकंें।


- क्या मतलब ?


- मतलब यह कि यदि महाबली खली को टीम का कप्तान बनाया जाता, तो विपक्ष के आधे खिलाड़ी बिना खेले ही मैदान छोड़ जाते।


- कैसे ?


- उसके बल्ले की मार से गेंद इतनी दूर जाती कि दूसरी टीम वालों को उसे वापस लाने में कई घंटे लग जाते। तब तक वह सैकड़ों रन बना लेता; पर कप्तान बना दिया धोनी को।


- धोनी का लोहा तो पूरी दुनिया मान रही है वर्मा जी ?


- खाक मान रही है। इससे अच्छा तो किसी धोबी को बना देते। उसके धोबीपाट दांव के आगे सब घुटने टेक देते। खली के साथ सुशील पहलवान और मुक्केबाज विजेन्द्र को भी लेना चाहिए था।


- तुमसे तो बात करना बेकार है। तुम क्रिकेट को पहलवानी समझ रहे हो। इसमें ताकत नहीं, तकनीक काम आती है।


- नाराजगी थूक दो शर्मा जी। आजकल जमाना ताकत का ही है। भले ही वह शरीर की हो या पैसे की, सत्ता की हो या गुटबाजी की। ज्ञान की हो विज्ञान की। तकनीक का ही दूसरा नाम तिकड़म है। जिसके पास तिकड़म है, वह अंदर है और बाकी बाहर। सत्ता के गलियारों से लेकर दलाल स्ट्रीट के कारोबार और क्रिकेट की टीम से लेकर गुलाममंडल खेल के भ्रष्टाचार तक यही सत्य है।


वर्मा जी की इस ‘गुगली’ से शर्मा जी ‘क्लीन बोल्ड’ हो गये। मैं भी ‘हिट विकेट’ या ‘एल.बी.डब्ल्यू’ होने की बजाय ‘नो ब१ल’ का संकेत करते हुए ‘गली’ से निकलकर ‘बाउंड्री पार’ हो गया। मेरी रुचि भी आम जनता की तरह सस्ते राशन में है, विश्व कप में नहीं।