शनिवार, 2 अप्रैल 2011

संख्या बल बढ़ाने का पर्व: वासंतिक नवरात्र



नवरात्र का पर्व वर्ष में दो बार आता है। आश्विन शुक्ल 1 से प्रारम्भ होने वाले शारदीय नवरात्र की समाप्ति आ0शु0 9 पर होती है। इसका अगला दिन विजयादशमी भगवान राम का रावण पर विजय का पर्व है। इसी प्रकार वासंतिक नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल 1 को होकर श्रीराम के जन्म दिवस (नवमी) को समापन होता है। दोनों का संबंध एक ओर श्रीराम से तो दूसरी ओर मां दुर्गा से है। इसके साथ-साथ शारदीय नवरात्र जहां हमें शस्त्र-शक्ति के संचय के लिए, तो वासंतिक नवरात्र हमें संख्या बल बढ़ाने को प्रेरित करता है।


नवरात्र के पीछे की धार्मिक कहानी चाहे कुछ भी हो; पर आज उसे दूसरे संदर्भों में समझने की आवश्यकता है। चैत्र शुक्ल 1 से भारतीय परम्परा के अधिकांश नववर्षों का प्रारम्भ होता है। यद्यपि भारत इतनी विविधताओं वाला देश है कि यहां उत्तर-दक्षिण या पूर्व-पश्चिम में पर्वों की तिथियों में भेद हो जाना स्वाभाविक है। इसके बावजूद दोनों नवरात्रों में मां दुर्गा की विशेष पूजा सभी हिन्दू करते हैं। इस समय मौसम भी बदलता है। अतः व्रत या उपवास द्वारा पेट को कुछ विश्राम देना स्वास्थ्य के लिए भी ठीक रहता है। इसलिए अपनी आयु एवं स्वास्थ्य के अनुसार प्रायः सभी लोग उपवास करते ही हैं। हां, व्रत के नाम पर जो लोग दिन भर पेट में गरिष्ठ पदार्थ डालते रहते हैं, उनके पाखंड की बात दूसरी है।


पर केवल व्यक्तिगत रूप से कुछ नियम या व्रतों का पालन कर लेने से ही नवरात्रों की भावना पूरी नहीं हो जाती। वासंतिक नवरात्र को मनाते समय हमें भगवान राम के जीवन के दो प्रसंगों का स्मरण करना होगा। पहली घटना है अहल्या के उद्धार की। अहल्या प्रकरण में दोषी इन्द्र ही था; पर तत्कालीन पुरुष प्रधान समाज और उनके पति ऋषि गौतम ने उन्हें निर्वासन का दंड दिया। अहल्या घने जंगल में कुटिया बनाकर, कंदमूल फल खाकर, पशु-पक्षियों के बीच रहने लगी। उससे न कोई मिलने आता था और न ही वह कहीं जाती थी। अहल्या के पत्थर होने का यही अर्थ है।


पर मुनि विश्वामित्र के साथ उनके यज्ञ की रक्षा के लिए जाते समय श्रीराम को जब इस घटना का पता लगा, तो वे अहल्या के आश्रम में गये और उन्हें वहां से लाकर समाज में उनका सम्मानजनक स्थान फिर से दिलाया। मानो पत्थर बनी नारी को फिर उसके मूल रूप में जीवित कर दिया। श्रीराम चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के बड़े पुत्र थे, अतः उनके द्वारा दी गयी व्यवस्था को सबने मान लिया। ऋषि गौतम को भी अपनी भूल अनुभव हो गयी थी। वे स्वयं भी पत्नी-वियोग से पीड़ित थे; पर सामाजिक कुरीतियों से टकराने का साहस उनमें नहीं था; पर जब श्रीराम ने अहल्या का उद्धार कर दिया, तो उन्होंने भी उसे स्वीकार कर लिया।


श्रीराम के जीवन की दूसरी घटना सीता की खोज के समय की है। उस दौरान वे जब दंडकारण्य में स्थित शबरी के आश्रम में पहुंचे, तो वह इतनी भावविभोर हो गयी, कि चख-चखकर मीठे बेर उन्हें देने लगी। श्रीराम भी अपने भक्त के प्रेम में डूबकर बेर खाने लगे। फिर शबरी ने ही उन्हें सुग्रीव से मित्रता करने को कहा। इसी से आगे चलकर सीता की खोज और फिर रावण का वध संभव हुआ।


ये दोनों प्रसंग हमें बताते हैं कि श्रीराम का दृष्टिकोण दुर्बल, असहाय, निर्धन और अन्याय से पीड़ितों के प्रति क्या था ? स्पष्टतः वे इनके प्रति उदारता और सहृदयता रखते थे। उन्होंने जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र..आदि का विचार किये बिना सबको गले लगाया। ये प्रसंग हमें आज भी कुछ संकेत देते हैं। भारत में आज करोड़ों लोग हिन्दू समाज से दूर खड़े दिखायी देते हैं। उनमें से बड़ी संख्या उनकी है, जिनके पूर्वजों ने मुस्लिम आक्रमण के समय प्राणरक्षा के लिए धर्म बदल लिया था। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो छुआछूत और ऊंचनीच जैसी कुरीति से नाराज होकर उधर चले गये। अंग्रेजों के अत्याचार और उनके द्वारा दिये गये धन, शिक्षा या चिकित्सा के बदले लाखों लोग ईसाई भी बने हैं। आज इन विदेशी मजहबों को मानने वालों की संख्या इतनी बढ़ गयी है कि देश पर फिर से विभाजन के बादल मंडराने लगे हैं।


इस समस्या का समाधान यही है कि हिन्दू समाज से अब कोई व्यक्ति दूसरी ओर न जाये। साथ ही जो लोग चले गये हैं, उन्हें वापस लायें। पानी की टंकी को खाली होने से रोकने के लिए उसके रिसाव को रोकने के साथ-साथ उसमें ताजा जल आता रहे, यह प्रबंध भी करना होता है। इसलिए वासंतिक नवरात्रों में हमें अपने आसपास के सभी निर्धन, निर्बल, हरिजन, दलित, वंचित आदि वर्ग के लोगों को सपरिवार अपने घर पर भोजन पर आमंत्रित करना चाहिए। उन्हें साथ बैठाकर भोजन कराने और घर के बुजुर्ग द्वारा उन्हें वस्त्रादि भेंट देने से सबको ऐसा लगेगा कि जाति, पंथ और आर्थिक स्थिति भिन्न होने के बाद भी सब एक विशाल हिन्दू परिवार के अंग हैं।


दूसरी ओर जो लोग विधर्मी बन गये हैं, उनसे सम्पर्क कर बड़े स्तर पर परावर्तन के समारोह आयोजित किये जायें। जैन समाज में प्रचलित क्षमावाणी पर्व इस दृष्टि से बहुत अनुकरणीय है। हिन्दुओं के बड़े धर्माचार्यों तथा समाज के प्रमुखों को ऐसे लोगों से अपनी या अपने पूर्वजों की भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए उन्हें हिन्दू धर्म में लौट आने का आग्रह करना चाहिए। उन्हें यह आश्वासन भी देना होगा कि उन्हें उसी जाति, वंश तथा गोत्र में सम्मानजनक स्थान दिया जाएगा, जिसमें वे पहले थे। उनके साथ पहले जैसे रोटी-बेटी के संबंध भी स्थापित किये जाएंगे। यदि गांव-गांव में इस प्रकार के क्षमावाणी पर्व और घर वापसी समारोह आयोजित किये जायंे, तो आगामी कुछ वर्षों में भारत का चित्र बदल सकता है।


वर्ष 2006 में गुजरात के डांग क्षेत्र में आयोजित शबरी कुंभ से यह कार्य प्रारम्भ हो चुका है। उस वनवासी क्षेत्र में ईसाईयों का प्रभाव बहुत अधिक है। स्वामी सत्यमित्रानंद जी ने वहां करबद्ध होकर सभी लोगों से कहा कि यदि मेरे पूर्वजों ने कोई भूल की है, तो मैं उसके लिए क्षमायाचना करता हूं। मोरारी बापू ने तो ‘‘आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं....’’ वाला फिल्मी गीत गाकर परावर्तन की मार्मिक अपील की। फरवरी, 2011 का नर्मदा कुंभ भी इस अभियान की अगली कड़ी के रूप में सम्पन्न हो चुका है। अब जबकि साधु, संत तथा कथावाचकों ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है, तो फिर सभी स्तर पर परावर्तन समारोह आयोजित होने ही चाहिए। यह काम सरल नहीं है। आज यदि प्रयास शुरू करेंगे, तो पांच-सात साल में जाकर परिणाम निकलेगा।


कौन नहीं जानता कि भारत में बढ़ रहे आतंकवाद तथा अशांति का मुख्य कारण भारत में इन विदेशी मजहबों के अनुयायियों की संख्या बढ़ना ही है। इससे निबटने के लिए जहां एक ओर हिन्दुओं को संगठित होना होगा, वहीं दूसरी ओर इन्हें समझाकर, गले लगाकर फिर से वापस हिन्दू धर्म में लाया जाये। होली के अवसर पर सब परस्पर गले मिलते ही हैं। इसी की पूर्णाहुति वासंतिक नवरात्रों के परावर्तन समारोहों में दिखायी देनी चाहिए।


श्रीराम द्वारा अहल्या के उद्धार एवं शबरी के झूठे बेर खाने के प्रसंग का स्मरण रखते हुए गांव के मंदिरों में बड़े-बड़े सहभोज कार्यक्रम हों। महिला हो या पुरुष; बच्चा हो या बूढ़ा, सब उसमें आयें। समाज के निर्धन, निर्बल और दलित वर्ग के लोगों को आग्रहपूर्वक बुलाया जाये। अच्छा हो, वे ही भोजन बनायें और सबको वितरण करें। इससे समरसता की जो गंगा बहेगी, वह सब कलुष बहा देगी। तब ही हम श्रीराम के सच्चे अनुयायी कहलाएंगे।


यह कौन नहीं जानता कि भारत के मंदिर और तीर्थ ही नहीं, तो भारतीय संविधान और लोकतंत्र भी तब तक ही सुरक्षित है, जब तक यहां हिन्दू बहुमत में हैं। 14-15 प्रतिशत विधर्मियों के कारण ही देश का वातावरण कितना विषाक्त हो गया है ? इसलिए वासंतिक नवरात्र में परावर्तन समारोहों का आयोजन कर भारत को सुरक्षित रखने का प्रयास बड़े स्तर पर होना आवश्यक है।

सोमवार, 28 मार्च 2011

युवा और राजनीति



राजनीति में युवाओं की भूमिका कैसी हो, इस पर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है। पिछले दिनों राहुल गांधी ने विभिन्न माध्यमों से युवा पीढ़ी से सम्पर्क किया। विश्वविद्यालयों में जाकर उन्होंने युवाओं से राजनीति को अपनी आजीविका (कैरियर) बनाने को कहा; पर उनका यह विचार कितना समीचीन है, इस पर विचार आवष्यक है।


यह तो सच ही है कि भारत एक युवा देश है। पिछले लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी बनाम राहुल गांधी की लड़ाई में युवा होने के कारण राहुल भारी पड़े। यद्यपि पर्दे के आगे मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं; पर सरकार में सबसे अधिक सोनिया और राहुल की ही चलती है। राहुल की इस सफलता से सब दलों को अपनी सोच बदलनी पड़ी। सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा ने तो अपना अध्यक्ष ही 52 वर्षीय नितिन गडकरी को चुन लिया। अब सब ओर युवाओं को आगे बढ़ाने की बात चल रही है। भावी राजनीति के एजेंडे पर निःसंदेह अब युवा आ गये हैं।


लेकिन युवाओं का राजनीति से जुड़ना और उसे आजीविका बनाना दोनों अलग-अलग बातें हैं; पर राहुल गांधी दोनों को एक साथ मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं।


सबसे पहली बात तो यह है कि राजनीति नौकरी, व्यवसाय या खेती की तरह आजीविका नहीं है। नौकरी शैक्षिक या अनुभवजन्य योग्यता से मिलती है, जबकि खेती और व्यापार प्रायः पुश्तैनी होते हैं। यद्यपि कांग्रेस और उसकी देखादेखी अधिकांश दलों ने राजनीति को भी पुश्तैनी बना लिया है; पर यह सैद्धान्तिक रूप से गलत है। प्रत्याशी भी चुनाव में हाथ जोड़कर वोट मांगते समय यही कहते हैं कि इस बार हमें सेवा का अवसर दें। जनता किसे यह अवसर देती है, यह बात दूसरी है; पर इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति आजीविका न होकर समाज सेवा का क्षेत्र है।


भारतीय लोकतंत्र एवं संविधान लगभग ब्रिटिश व्यवस्था की नकल है। उसी के अनुरूप यहां जन प्रतिनिधियों को वेतन तथा अन्य भत्ते दिये जाते हैं। जन प्रतिनिधि लगातार अपने क्षेत्र में घूमते हैं। सैकड़ों लोग उनसे मिलने हर दिन आते हैं, जिनके चाय-पानी में बड़ी राशि व्यय होती है। यह राशि सरकार दे, इसमें आपत्ति नहीं है; पर राजनीति किसी के घर चलाने का एकमात्र साधन बन जाए, यह नितांत अनुचित है।


राजनीति में उतार-चढ़ाव आते ही हैं। लोग चुनाव हारते और जीतते रहते हैं। यदि राजनीति ही आजीविका का एकमात्र साधन होगी, तो चुनाव हारने पर व्यक्ति अपना घर कैसे चलाएगा ? यह बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे किसी की नौकरी छूट जाए, या उसे व्यापार में घाटा हो जाए या खेती धोखा दे जाए। ऐसे में व्यक्ति अपने मित्रों, परिजनों या बैंक के कर्ज आदि से फिर काम को जमा लेता है; पर राजनीति में तो ऐसा सहयोग नहीं मिलता। फिर उसके परिवार का क्या होगा ? या तो वह चोरी-डकैती करेगा या आत्महत्या। और यह दोनों ही अतिवादी मार्ग अनुचित हैं।


एक दूसरे दृष्टिकोण से इसे देखें। यदि सब जन प्रतिनिधि युवा ही बन जाएं, तो भी कुल मिलाकर कितने युवा आजीविका पा सकेंगे। लोकसभा, राज्यसभा, देश भर की विधानसभा और विधान परिषद को मिला कर संभवतः 10,000 स्थान बनते होंगे। यदि इसमें जिला और नगर पंचायतों के प्रतिनिधि मिला लें, तो संख्या 25,000 होगी। यदि इसमें देश की पांच लाख ग्राम पंचायतें और जोड़ लें, तो यह संख्या सवा पांच लाख हो जाएगी। यदि हर युवा राजनीति को ही आजीविका बनाने की सोच ले, तो शेष 40-45 करोड़ युवा क्या करेंगे ?


कौन नहीं जानता कि राजनीति और चुनाव का चस्का एक बार लगने पर आसानी से छूटता नहीं है। व्यक्ति चाहे हारे या जीते; पर वह इस क्षेत्र में ही बना रहना चाहता है। आजकल राजनीति पूर्णकालिक काम हो गयी है। इसमें अत्यधिक पैसा खर्च होता है, जिसकी प्राप्ति के लिए व्यक्ति भ्रष्ट साधन अपनाता है। इसीलिए स्थानीय नेता प्रायः ठेकेदारी करते मिलते हैं। इस दो नंबरी धंधे से वे एक झटके में लाखों-करोड़ों रु0 पीट लेते हैं। कई नेता एन.जी.ओ बनाकर सेवा के नाम पर घर भरते हैं। क्या राहुल गांधी ऐसे ही भ्रष्ट युवाओं की फौज देश में तैयार करना चाहते हैं ?


यदि किसी को भ्रम हो कि युवा लोग भ्रष्ट नहीं होते, तो राजीव गांधी को देख लें। प्रधानमंत्री बनते ही देश ने उन्हें ‘मिस्टर क्लीन’ की उपाधि दी थी। उन्होंने कांग्रेस को सत्ता के दलालों से दूर करने का आह्नान किया था। सबको लगा था कि राजनीतिक उठापटक से दूर रहा यह व्यक्ति सचमुच कुछ अच्छा करेगा। इसीलिए सहानुभूति लहर के बीच जनता ने उसे संसद में तीन चौथाई बहुमत दिया; पर कुछ ही समय में पता लग गया कि वह भी उसी भ्रष्ट कांग्रेसी परम्परा के वाहक हैं, जिस पर उनके नाना, मां और आम कांग्रेसी चलते रहे हैं। मिस्टर क्लीन बोफोर्स दलाली खाकर अंततः ‘मिस्टर डर्टी’ सिद्ध हुए।


अपनी अनुभवहीनता और देश की मिट्टी से कटे होने के कारण राजीव गांधी के अधिकांश निर्णय नासूर सिद्ध हुए। उन्होंने ही अंग्रेजीकरण को अत्यधिक बढ़ावा दिया, जिससे ग्राम्य प्रतिभाओं के उभरने का मार्ग सदा को बंद हो गया। पहले गरीब व्यक्ति अपने बच्चों को पाठशाला में भेजकर संतुष्ट रहता था; पर आज अंग्रेजी बोलने वाले ही नौकरी पा सकते हैं। इसलिए अपना पेट काटकर भी लोग बच्चों को महंगे अंग्रेजी विद्यालय में भेजने को मजबूर हैं। अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण भारत में स्थानीय भाषा और बोलियों का मरना जारी है। यह सब राजीव गांधी की ही देन हैं।


विदेश नीति के मामले में भी राजीव गांधी अनाड़ी सिद्ध हुए। उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेसी प्रभाव बढ़ाने के लिए श्रीलंका में लिट्टे को बढ़ावा दिया; पर जब लिट्टे सिर पर सवार हो गया, तो उन्होंने वहां शांति सैनिकों को भेज दिया। इससे भारत के सैकड़ों सैनिक मारे गये और विश्व भर में हमारी थू-थू हुई। श्रीलंका जैसे मित्र देश की एक बड़ी जनसंख्या के मन में भारत के प्रति स्थायी शत्रुता का भाव पैदा हो गया। राजीव की हत्या भी इसीलिए हुई। स्पष्ट है कि राजनीति में यौवन की अपेक्षा देश-विदेश के मामलों का अनुभव अधिक महत्वपूर्ण है।


लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि युवा पीढ़ी राजनीति से अलिप्त हो जाए; उसे देश के वर्तमान और भविष्य से कुछ मतलब ही न हो ? यदि ऐसा हुआ, तो यह बहुत ही खतरनाक होगा। इसलिए उन्हंे भी राजनीति में सक्रिय होना चाहिए; पर उनकी सक्रियता का अर्थ सतत जागरूकता है। ऐसा हर विषय, जो उनके आज और कल को प्रभावित करता है, उस पर वे अहिंसक आंदोलन कर देश, प्रदेश और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को अपनी नीति और नीयत बदलने पर मजबूर कर दें। ऐसा होने पर हर दल और नेता दस बार सोचकर ही कोई निर्णय लेगा।


स्वाधीनता के आंदोलन में हजारों युवा पढ़ाई छोड़कर कूदे थे। क्या भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू, आजाद आदि राजनीतिक रूप से निष्क्रिय थे, चूंकि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा ? 1948 में गांधी हत्या के झूठे आरोप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगे प्रतिबंध के विरुद्ध लगभग 70,000 स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह किया। उनमें से अधिकांश युवा थे। सत्तर के दशक में असम में घुसपैठ विरोधी आंदोलन हुआ। 1974-75 में इंदिरा गांधी के भ्रष्ट प्रशासन, आपातकाल और फिर संघ पर प्रतिबंध के विरुद्ध भी एक लाख लोग जेल गये। श्रीराम मंदिर आंदोलन में लाखों हिन्दुओं ने कारावास स्वीकार किया। यद्यपि इनमें से दस-बीस लोग सांसद और विधायक भी बने; पर क्या शेष लोग राजनीतिक रूप से निष्क्रिय माने जाएंगे, चूंकि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा ?


स्पष्ट है कि राजनीतिक सक्रियता का अर्थ चुनाव लड़ना नहीं, सामयिक विषयों पर जागरूक व आंदोलनरत रहना है। बहुत से लोगों के मतानुसार वोट देने की अवस्था भले ही 18 वर्ष कर दी गयी हो; पर चुनाव लड़ने की अवस्था 50 वर्ष होनी चाहिए। जिसे नौकरी, खेती, कारोबार और अपना घर चलाने का ही अनुभव न हो; जिसने जीवन के उतार-चढ़ाव न देखें हों, वह अपने गांव, नगर, जिले, राज्य या देश को कैसे चला सकेगा ?


भारतीय जीवन प्रणाली भी इसका समर्थन करती है। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के बाद 25 वर्ष का वानप्रस्थ आश्रम समाज सेवा को ही समर्पित है। इस समय तक व्यक्ति अपने अधिकांश घरेलू उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाता है। उसे दुनिया के हर तरह के अनुभव भी हो जाते हैं। काम-धंधे में नयी पीढ़ी आगे आ जाती है। यही वह समय है, जब व्यक्ति को समाज सेवा के लिए अपनी रुचि का क्षेत्र चुन लेना चाहिए, जिसमें से राजनीति भी एक है। हां, यह ध्यान रहे कि उसे 75 वर्ष का होने पर यहां भी नये लोगों के लिए स्थान खाली कर देना चाहिए।


यदि युवा पीढ़ी तीन सी (बपदमउंए बतपबामज - बंतममत . सिनेमा, क्रिकेट एवं कैरियर) से ऊपर उठकर देखे, तो सैकड़ों मुद्दे उनके हृदय में कांटे की तरह चुभ सकते हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार, कामचोरी, राजनीति में वंशवाद, महंगी शिक्षा और चिकित्सा, खाली होते गांव, घटता भूजल, मुस्लिम आतंकवाद, माओवादी और नक्सली हिंसा, बंगलादेशियों की घुसपैठ, हाथ से निकलता कश्मीर, जनसंख्या के बदलते समीकरण, किसानों द्वारा आत्महत्या, गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई आदि तो राष्ट्रीय मुद्दे हैं। इनसे कहीं अधिक स्थानीय मुद्दे होंगे, जिन्हें आंख और कान खुले रखने पर पहचान सकते हैं।


आवश्यकता यह है युवा चुनावी राजनीति की बजाय इस ओर सक्रिय हों। उनकी ऊर्जा, योग्यता, संवेदनशीलता और देशप्रेम की आहुति पाकर देश का राजनीतिक परिदृश्य निश्चित ही बदलेगा।