शुक्रवार, 10 जून 2011

हर मर्ज में अमलतास, मर्ज की जड़ कांग्रेस घास



दिल्ली में गरमी बढ़ने के साथ ही कांग्रेस वालों को भी पागलपन के दौरे पड़ने लगे हैं। मैडम इटली और राहुल बाबा हर बार की तरह चुप हैं; पर उनके भोंपू दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल और चिदम्बरम् लगातार बोल रहे हैं। उन्हें अपनी आदत के अनुसार अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन के पीछे संघ नजर आ रहा है।


यह बात सौ प्रतिशत सत्य है कि देश में जहां कोई अच्छा काम हो रहा होगा, संघ उसे समर्थन देगा। स्वयंसेवक अनाम रहकर ऐसे कामों में लगे रहते हैं। इसका कारण है संघ की शाखा में मिले हुए संस्कार। जैसे मां के दूध और लोरी के साथ बच्चा अच्छी बातें सीखता है। ऐसे ही नियमित शाखा से अनुशासन, देशभक्ति, समूह भावना आदि गुण स्वयंसेवक के जीवन में आ जाते हैं।


दूसरी ओर कांग्रेस एक अंग्रेज बाप की संतान है। लाल-बाल-पाल की टोली ने इसे कुछ समय तक सही दिशा दी; पर गांधी जी के आगमन से मुस्लिम तुष्टीकरण की जो राह इसने पकड़ी, वह आज तक नहीं छूट सकी है। नेहरू ने इसमें वंशवाद और भ्रष्टाचार के दो अध्याय और जोड़ दिये। इन्हीं चार पैरों पर कांग्रेस का यह जर्जर ढांचा खड़ा है। जैसे कोई नशेड़ी बिना नशे के बेचैन हो जाता है, ऐसे ही कांग्रेस को सत्ता का नशा है। यदि किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में उसे संदेह हो कि यह उसे सत्ता से हटा देंगे, तो वह उसे किसी भी कीमत पर नष्ट करने का प्रयास करने लगती है।


संघ ने यद्यपि कभी प्रत्यक्ष राजनीति में भाग नहीं लिया; पर 1948 के प्रतिबंध के कटु अनुभव के बाद उसके शीर्ष नेतृत्व को यह बात ध्यान में आयी कि संसद में अपनी बात कहने वाले कुछ लोग होने चाहिए। इसीलिए डा0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में बने भारतीय जनसंघ में कुछ कार्यकर्ता भेजे गये। यह दल कुछ ही समय में कांग्रेस की निरंकुशता पर लगाम लगाने में सफल हुआ।


1947 में सत्ता के लालच में कांग्रेस ने देश का विभाजन स्वीकार कर लिया। दूसरी ओर उस दौरान पंजाब में हिन्दुओं के नरसंहार को रोकने और उन्हें बचाकर भारत लाने में संघ का बहुत बड़ा योगदान था। इस कारण जहां एक ओर गांधी और नेहरू के व्यवहार पर लोग थू-थू कर रहे थे, वहां संघ के प्रति जन समर्थन बढ़ रहा था। इससे नेहरू जी भयभीत हो गये। उन्हें लगा कि यदि संघ वाले राजनीति में आ गये, तो उन्हें कुर्सी से हटा देंगे।


दूसरी ओर सरदार पटेल संघ के सेवा भाव से प्रसन्न थे। नेहरू को यह भी लगा कि पटेल संघ वालों के साथ मिलकर उनकी सत्ता छीन सकते हैं। इससे वे पटेल से भी सावधान रहने लगे। इसी बीच देश के दुर्भाग्य और नेहरू के सौभाग्य से गांधी जी की हत्या हो गयी। इसे सुअवसर समझकर नेहरू ने संघ पर प्रतिबंध लगाकर हजारों स्वयंसेवकों को जेल में बंद कर दिया। यद्यपि गांधी जी की हत्या का आरोप सिद्ध न होने पर उन्हें प्रतिबंध हटाना पड़ा।


यही माहौल 1974-75 में एक बार फिर बना। 1971 में पाकिस्तान को पराजित कर तानाशाह और जिद्दी मानसिकता वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हवा पर सवार हो गयीं। अपने माता-पिता की एकमात्र संतान होने के कारण उन्हें बचपन से ही ‘ना’ सुनने की आदत नहीं थी। गुजरात और बिहार के भ्रष्ट मुख्यमंत्रियों को हटाने के लिए छात्रों द्वारा किया जा रहा आंदोलन उन्हें फूटी आंखों नहीं भाता था।


जो स्थिति इस समय अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की है, वही उन दिनों जयप्रकाश नारायण की थी। भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रारम्भ हुआ वह आंदोलन उनके समर्थन से आंधी में बदल गया। संघ वाले अपने स्वभाव के अनुकूल जयप्रकाश जी के साथ थे ही। नानाजी देशमुख तो उनके दाएं हाथ थे। पटना की रैली में जब पुलिस ने जे.पी की हत्या के इरादे से लाठियां बरसाईं, तो नानाजी देशमुख ने ही उन्हंे बचाया। इस चक्कर में उनका एक हाथ टूट गया। दिनकर की पंक्ति ‘‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’’ उस आंदोलन का मंत्र बन गया था।


जब इंदिरा गांधी ने देखा कि इस आंदोलन के कारण उसकी सत्ता जाने को है, तो अपनी चांडाल चौकड़ी की सलाह पर उसने 25 जून, 1975 की रात में देश में आपातकाल थोप दिया। समाचार माध्यमों पर सेंसरशिप लगा दी। उसका सबसे बड़ा शत्रु तो संघ ही था। इसलिए संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। संघ कार्यालयों से प्राप्त लकड़ी की छुरिका और टीन की तलवारें दूरदर्शन पर दिखाकर यह प्रदर्शित किया कि संघ देश में सशस्त्र विद्रोह करना चाहता है। हजारों स्वयंसेवकों को रात में ही जेल में बंद कर दिया। अटल जी, अडवानी जी और चरणसिंह जैसे विरोधी दलों के नेता भी रातों रात सीखचों के पीछे पहुंचा दिये गये। देश एक अंधे कूप में जा गिरा।


इसके विरोध में संघ द्वारा किये गये सत्याग्रह में एक लाख लोग जेल गये। 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी और उनके कुख्यात पुत्र संजय गांधी चारों खाने चित हो गये। देश में जनता पार्टी की सरकार बनी। यद्यपि उसमें भी अधिकांश कांग्रेसी ही थे, अतः उनके अहंकार के कारण वह अधिक नहीं चल सकी; पर संघ के बलिदान और प्रयासों से लोकतंत्र की पुनप्रर्तिष्ठा हो सकी।


अस्सी के दशक में श्रीराम मंदिर के मुद्दे ने देश के हिन्दुओं को आंदोलित किया। इसने भी केन्द्र और अनेक राज्यों की सरकारों को हिला दिया। अतः 1992 में बाबरी ढांचे के ध्वंस के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर संघ पर प्रतिबंध लगाया। यद्यपि शासन को न्यायालय में मुंह की खानी पड़ी। संघ फिर से अपने काम में लग गया।


दूसरी ओर कांग्रेस का चरित्र देखें, तो देश की हर समस्या के पीछे नेहरूवादी सोच मिलेगी। मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण, बेरोजगारी, गांव-किसान और छोटे उद्योगों की दुर्दशा, भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता, वंशवाद आदि सब रोगों की जड़ यह कांग्रेस घास ही है। अब तो विदेशी कलम लगने से यह और भी घातक हो गयी है


सच तो यह है कि संघ और कांग्रेस की कोई तुलना नहीं है। संघ का मूल काम शाखा के माध्यम से देशभक्त लोगों की फसल तैयार करना है। उसका काम स्वयंसेवकों के बल पर चलता है, इसलिए वह सरकारी सहायता का मोहताज नहीं है। चूंकि उसे चुनाव नहीं लड़ना, इसलिए वह छद्म धर्मनिरपेक्षता के लबादे को नहीं ओढ़ता। वह मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण का विरोधी है; पर मुसलमानों और ईसाइयों का नहीं। वह छल-बल से कराये जाने वाले धर्मान्तरण का विरोधी है; पर इस्लाम और ईसाई धर्म का नहीं।


मैडम इटली के भोंपू चाहे जो कहें; पर संघ को जानने वालों को पता है कि मार्च से जून तक पूरे देश में संघ के लगभग 100 प्रशिक्षण वर्ग लगते हैं। प्रत्येक में औसत 500 स्वयंसेवक भाग लेते हैं। जिले से लेकर अखिल भारतीय तक के सब कार्यकर्ता इनमें व्यस्त होते हैं। ऐसे में यह कहना कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन को संघ चला रहा है, केवल बुद्धिहीनता का ही लक्षण है।


संघ अब एक संगठन नहीं, जीवनशैली बन चुका है। इसलिए जहां भी कोई अच्छा काम होगा, संघ वहां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अवश्य मिलेगा। इसलिए यदि कोई कहता है कि बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन को संघ का समर्थन है, तो वह गलत नहीं कहता। दूसरी ओर कांग्रेस भी एक जीवनशैली है। जहां कहीं भी भ्रष्ट और तानाशाह लोग होंगे, वहां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस जरूर होगी। ‘‘हर मर्ज में अमलतास, मर्ज की जड़ कांग्रेस घास’’ की कहावत किसी ने सोच-समझकर ही बनाई है।


लेकिन अन्ना और बाबा यदि अपने आंदोलन को किसी निष्कर्ष तक पहुंचाना चाहते हैं, तो इन्हें कुछ सावधानी रखनी होगी। अग्निवेश के नक्सलियों से संबंध जगजाहिर हैं। नक्सलियों का पोषण चर्च करता है। सोनिया गांधी भारत में चर्च की महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं। भ्रष्टाचार के मामले में उनका खानदानी रिकार्ड संदेहास्पद है। ऐसे में अग्निवेश कभी सोनिया से नहीं लड़ सकते। अतः अन्ना हजारे इस नकली स्वामी को अपनी टीम से निकाल दें तथा अन्य साथियों के बारे में भी पूरी पड़ताल कर लें।


बाबा रामदेव को भी समझना होगा कि अनशन किसी समस्या का समाधान नहीं है। यदि वे हरिद्वार में अनशन करते हुए मर गये, तो सबसे अधिक प्रसन्नता कांग्रेसियों को ही होगी। इसलिए अनशन छोड़कर पूरे देश में भ्रष्टाचार की जननी कांग्रेस के विरुद्ध अलख जगाएं। उन्होंने जिस ‘सशस्त्र वाहिनी’ की बात कही है, वह भी अनुचित है। लोकतंत्र में हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है। सरकारी पुलिस और सेना के आगे उनकी सशस्त्र वाहिनी नहीं टिक सकेगी। कांग्रेस को वोट की ताकत से ही हराया जा सकता है। वे इस रामबाण शस्त्र को ही अधिकाधिक धारदार बनाएं।


इतिहास इस बात का साक्षी है कि दुष्ट दिन-रात भयभीत रहते हैं। जब हनुमान जी ने लंका को जला दिया, तो रावण ही नहीं, लंका के राक्षस और राक्षसियों को हर वानर में हनुमान जी ही दिखाई देते थे। कंस को भी सोते-जागते चारों ओर कृष्ण ही नजर आते थे। इतिहास यह भी बताता है कि अपनी सुरक्षा के भरपूर प्रबंध कर लेने के बाद भी श्रीराम के हाथों रावण का और श्रीकृष्ण के हाथों कंस का वध हुआ। इसी प्रकार अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर, निर्जीव खंबे में से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध किया।


इसलिए कांग्रेस को हर जगह संघ दिखाई देता है, तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं हैं। वे संघ को चाहे जितनी गाली दें; पर उनकी नियति भी रावण, कंस और हिरण्यकशिपु से कुछ अलग नहीं है।



मंगलवार, 7 जून 2011

थोड़े-थोड़े सब दुखी...


पिछले दिनों बहुत वर्षों बाद एक मित्र से मिलना हुआ। मैं उनके मोटापे पर आश्चर्यचकित हुआ, तो वे मेरे हल्केपन पर। उन्हें लगा कि मैं किसी बात से दुखी हूं। मैंने उन्हें बताया कि इसका कारण कोई रोग या शोक नहीं है। मैं तो अपने प्यारे भारत के भविष्य की चिंता में दुबला हो रहा हूं।


भारत के वर्तमान और भविष्य की चिंता लोग अपने-अपने ढंग से करते हैं। अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर पांच दिन अनशन कर भ्रष्टाचार की ओर ध्यान आकर्षित किया। मीडिया ने उनका खूब साथ दिया, सो सरकार हिल गयी। उमा भारती ने भी पिछले दिनों हरिद्वार में गंगा की रक्षा के लिए अनशन किया। मीडिया की उपेक्षा से उनका अनशन चर्चित नहीं हो सका। वैसे कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें गंगा की बजाय अपने राजनीतिक अस्तित्व की अधिक चिन्ता है।


बाबा रामदेव का प्रकरण तो ताजा ही है। अनशन प्रारम्भ होने से पूर्व शासन और अनशन उजाड़ दिये जाने के बाद बाबा जी दुखी नजर आये; पर अब सारे देश में इस रावणलीला के लिए शासन की जो थू-थू हो रही है, उससे कई मोटी चमड़ी वाले कांग्रेसी भी दुखी हैं। रही-सही कसर सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे मामले पर स्वतः संज्ञान लेकर पूरी कर डाली। अब तो इस बारे में मैडम इटली, मनमोहन सिंह और राहुल बाबा की प्रतिक्रिया की ही प्रतीक्षा है।


चिदम्बरम् महोदय देश के बड़े आकार के साथ ही पाकिस्तान को दी गयी भगोड़ों की सूची के कारण हो रही फजीहत से दुखी हैं। दिग्विजय सिंह का हाल न पूछें, वे माननीय श्री ओसामा बिन लादेन जी के शव के अनादर से अंदर ही अंदर घुले जा रहे हैं। काश, उन्हें भी उस समय बुला लिया जाता, तो उनका जन्म सफल हो जाता। अग्निवेश अमरनाथ यात्रा की बढ़ती लोकप्रियता तथा नक्सलियों और देशद्रोहियों के अधिकारों में हो रही कटौती से दुखी हैं।


मैडम इटली और मनमोहन सिंह के कई प्रिय मित्र तिहाड़ पहुंच चुके हैं; पर बदनामी के भय से वे उनसे मिल भी नहीं सकते। राहुल बाबा का गुब्बारा फूलने से पहले ही फुस्स हो गया है। इसलिए कांग्रेसजन प्रियंका दीदी को राजनीति में आने के लिए मना रहे हैं, जिससे उन्हें भविष्य में भी सत्ता की मलाई मिलती रहे।


वामपंथियों का तो कहना ही क्या; उनके धतकर्मों के चलते बंगाल और केरल की जनता ने उन्हें समुद्र में ढकेल दिया। अब एक त्रिपुरा बचा है, समझ नहीं आता उसे ओढ़ें या बिछाएं ? लालू, मुलायम, मायावती और करुणानिधि के दुख की कोई सीमा नहीं है।


दुख भाजपा वालों को भी है। बिहार की जीत से जितना वजन बढ़ा था, इन पांच राज्यों के चुनाव ने सब छीन लिया। असम का घाव कुछ अधिक ही गहरा है, जहां चौबे जी छब्बे बनने के चक्कर में दुब्बे ही रह गये। अधिक क्या कहूं; सबके अपने-अपने दुख हैं। गुरु नानकदेव ने ठीक ही कहा है - नानक दुखिया सब संसार।


पर मुझे तो भावी भारत की चिंता है। जब मैं गलियों में विकेट की जगह कुर्सी या पत्थर रखकर बल्ला घुमाते वर्तमान और भावी युवाओं को देखता हूं, तो मुझे क्रिकेट के भविष्य की चिंता होने लगती है। हर दो-चार मिनट बाद गेंद सड़क पर चली जाती है। फिर प्रतीक्षा होती है वहां से निकलने वाले किन्हीं अंकल जी की, जो उनकी गेंद उठा दें। समझ नहीं आता कि सचिन और धोनी के रिटायर होने के बाद क्या होगा ?


यही हाल घर के दरवाजे पर बैडमिंटन और टेनिस खेलती लड़कियों का है। साइना नेहवाल और सानिया मिर्जा कितने ही पुरस्कार जीत लें; पर यहां भी भविष्य अंधकारमय ही है। फुटबाल, हाकी, व१लीब१ल और कुश्ती आदि की तो बात ही न पूछें।


मुझे चिन्ता केवल इन्सान की ही नहीं, भगवान की भी है। कथा, कीर्तन और जागरण में जितना शोर होता है, उसकी चर्चा व्यर्थ है। शादी-विवाह में फूहड़ फिल्मी गानों पर नाचने और नचाने वाले कलाकार ही नवरात्र में भजन गायक बन जाते हैं। पता नहीं भगवान तक उनकी आवाज पहुंचती है या नहीं; पर मोहल्ले वालों की नींद जरूर हराम हो जाती है।


मस्जिद और दरगाहों के शोर से खुदा भी दुखी होता है; पर क्या करे, उस बेचारे की बात सुनता कौन है ? अच्छा है कि वह बहुत दूर हैं, वरना हर दिन के इस शोर से उनका तो जीना कठिन हो जाता। कबीरदास जी के प्रश्न ‘‘क्या साहिब तेरा बहरा है..’’ का उत्तर आज तक किसी ने नहीं दिया।


दुख तो मेरे और भी हैं; पर उन्हें सुनाकर मैं आपको दुखी करना नहीं चाहता। चलते-चलते फिर ये पंक्तियां याद आती हैं।


कोई तन दुखी, कोई मन दुखी, कोई धन बिन रहत उदास
थोड़े-थोड़े सब दुखी, सुखी राम के दास।।