शनिवार, 18 जून 2011

राजनीतिक सफलता के सूत्र



जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के अलग-अलग सूत्र हैं। राजनीतिक क्षेत्र में सफलता का अर्थ चुनावी जीत है।


चुनाव में सर्वाधिक महत्व मुद्दों का है। हर चुनाव में कोई एक मुद्दा जनता के मन में बैठ जाता है। इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर 1971 का चुनाव जीता था; पर आपातकाल के विरोध और जबरन नसबन्दी के मुद्दे पर वे 1977 का चुनाव हार गयीं। राजीव गांधी ने 1984 का चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति लहर में जीता, तो विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स दलाली के आरोप पर। श्रीराम मंदिर आंदोलन के कारण भाजपा को अपने मित्रदलों के साथ पहली बार केन्द्र में सत्तासीन होने का अवसर मिला।


राज्यों में देखें, तो 1991 में उ0प्र0 में श्रीराम मंदिर के नाम पर भाजपा ने बहुमत पाया था। 2008 में मायावती ने मुलायम सिंह के गुंडाराज को अपने अभियान का केन्द्र बिन्दु बनाकर सत्ता पायी। पिछले दिनों बंगाल में वामपंथियों के कुःशासन के विरुद्ध जनता उठ खड़ी हुई। तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता ने जयललिता को गद्दी सौंप दी।


मुद्दे की गूंज से हवा बनती है। हर दल के कुछ प्रतिबद्ध मतदाता होते हैं; पर अधिकांश लोग हवा का रुख देखकर वोट देते हैं। प्रायः ऐसे लोग चुप रहते हैं; पर कई बार खुलकर सामने भी आ जाते हैं। इससे ही जनता के मूड का अनुमान होता है।


दूसरा महत्वपूर्ण विषय है नेतृत्व। जनता यह देखती है कि जिस दल को हम वोट दे रहे हैं, उसका नेतृत्व कैसा है ?


1977 के चुनाव में लोग इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन से बहुत परेशान थे। ऐसे में जयप्रकाश नारायण जैसे अराजनीतिक व्यक्तित्व के नेतृत्व में सब विरोधी दल एकत्र हुए और सरकार बदल दी। यद्यपि जयप्रकाश जी ने जिन लोगों को सत्ता दिलाई, उनमें से अधिकांश कांग्रेसी होने के कारण आपस में लड़ने लगे। परिणाम यह हुआ कि ढाई साल में ही वह सरकार ढह गयी।


ताजे प्रकरण को यदि देखें, तो बंगाल में जनता पिछले कई साल से वामपंथियों की गुंडागर्दी से त्रस्त थी; पर विपक्ष में कोई ऐसा नेता नहीं था, जो जनता में विश्वास उत्पन्न कर सके। ममता बनर्जी ने पिछली बार भी पूरी ताकत से चुनाव लड़ा था; पर तब कोई प्रभावी मुद्दा नहीं था। इस बार सिंगूर और नंदीग्राम के कारण नाराज जनता को ममता के नेतृत्व ने सही दिशा दे दी और पासा पलट गया।


इसी तर्ज पर उ0प्र0 में 1991 में राममंदिर का मुद्दा और कल्याण सिंह का नेतृत्व; बिहार में लालू का कुशासन और नीतीश व मोदी का संयुक्त नेतृत्व; गुजरात, म0प्र0 और छत्तीसगढ़ में क्रमशः नरेन्द्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान तथा डा0 रमन सिंह का सुशासन और सबल नेतृत्व....आदि को हम परख सकते हैं। भाजपा के पास कुछ दिनों पूर्व तक अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में एक प्रभावी नेता थे। अतः उनके नेतृत्व में राजग सरकार बनी; पर पिछले चुनाव में ऐसा न होने से जनता ने मजबूरी में मनमोहन सिंह जैसे नाकारा प्रधानमंत्री को ही चुन लिया।


चुनाव में सफलता के लिए तीसरा महत्वपूर्ण कारक है कार्यकर्ता। वह ही लोगों तक दल का संदेश पहुंचाकर उन्हें बूथ तक लाते हैं। कार्यकर्ता की भूमिका उस पम्प की तरह है, जो हवा को पहिये में भरता है। यदि पम्प न हो, तो चारों ओर हवा होने पर भी पहिये में नहीं भरी जा सकती। भाजपा और वामपंथी दल कार्यकर्ता आधारित माने जाते हैं। किसी समय वे स्वप्रेरणा से काम करते थे; पर अब तो सब ओर पैसे से ही काम कराने का चलन है। कभी-कभी माहौल इतना गरम हो जाता है कि आम जन ही कार्यकर्ता बन जाते हैं। 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता झंडा-डंडा लेकर नेताओं से आगे चलती थी। यही स्थिति इस बार बंगाल में थी। ऐसे में जनता सब बंधन तोड़ देती है और वोट प्रतिशत बहुत बढ़ जाता है।


चुनाव में रणनीति का भी महत्वपूर्ण स्थान है। पर्दे के आगे और पीछे चली जाने वाली चालें; चुनाव से पहले और बाद के गठबंधन; स्थानीय मुद्दे, आर्थिक प्रबंध, जाति समीकरण, विपक्षी दल एवं प्रत्याशी की कमजोरी का लाभ उठाना, शासन-प्रशासन से तालमेल, चुनाव से एक-दो दिन पहले की तैयारी, बूथ प्रबंधन.. आदि के बारे में चुनाव लड़ने और लड़ाने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं।


रणनीति बनाते समय ऐसा कोई नारा भी गढ़ा जाता है, जो जनता के दिल में उतर जाए। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे ने इंदिरा गांधी को, ‘जय श्रीराम’ के नारे ने भाजपा को तथा ‘परिवर्तन’ के नारे ने ममता बनर्जी को सत्ता दिलाई है। ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, मोहर लगा दो हाथी पर’ का नारा उ0प्र0 में मायावती के बहुमत का कारण बना। जबकि भाजपा द्वारा 2004 के लोकसभा चुनाव में दिया गया ‘इंडिया शाइनिंग’ और ‘भारत उदय’ का नारा नहीं चल सका।


मेज के चार पैरों की तरह यह चार सूत्र हैं। इनमें से यदि कोई तीन सूत्र अनुकूल हों, तो सफलता निश्चित है।


इस दृष्टि से देखें, तो अगले वर्ष कई विधानसभाओं के चुनाव हैं, जिसमें उ0प्र0 सबसे महत्वपूर्ण है। वहां लड़ाई भी एकदम साफ है। बसपा और सपा में क्रमशः मायावती और मुलायम सिंह निर्विवाद नेता हैं। कांग्रेस नेतृत्वविहीन है, तो भाजपा में स्वयं को मुख्यमंत्री पद के योग्य समझने वाले जनाधारहीन नेताआंे की भरमार है।


मैंने नवम्बर 2009 के एक लेख में उमा भारती को उ0प्र0 भाजपा की कमान सौंपने का सुझाव दिया था। देर से ही सही, पर अब ऐसा हो सका है। उनके आने से भाजपा नंबर दो की लड़ाई में पहुंच गयी है। यदि वे अपनी वाणी और व्यवहार पर नियन्त्रण रखें, तो वे भाजपा को नंबर एक की लड़ाई में ला सकती हैं।


लोकसभा के चुनाव यद्यपि अभी दूर हैं; पर समय बदलते देर नहीं लगती। इस दिनों केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है। मनमोहन सिंह नाकारा और मजबूर प्रधानमंत्री सिद्ध हुए हैं। उनके और सोनिया के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार और काले धन के प्रति आक्रोश को एक संगठित दिशा दी है। ऐसे में लोकसभा चुनाव चाहे जब हों, कांग्रेस मनमोहन सिंह को भावी प्रधानमंत्री के रूप में नहीं उतारेगी। दोहरी नागरिकता के कारण सोनिया प्रधानमंत्री नहीं बन सकतीं। राहुल बाबा खाली डिब्बा साबित हो चुके हैं। अपने परिवार से अलग सत्ता का कोई और केन्द्र बने, सोनिया यह कभी नहीं सहेंगी। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि प्रियंका वडेरा के रूप में एक नये और युवा चेहरे को सामने रखकर कांग्रेस चुनाव में उतरे।


भाजपा ने पिछली बार लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया था। इस बार भी यदि वह ऐसा करती है, तो यह उसकी दूसरी भूल होगी। देश में 50 प्रतिशत से अधिक मतदाता युवा हैं, वे किसी अपेक्षाकृत युवा व्यक्ति को ही प्रधानमंत्री बनाना चाहेंगे। भाजपा के पास अनेक योग्य लोग हैं। सुषमा स्वराज, अरुण जेतली, राजनाथ सिंह आदि ने कई बार अपनी संगठन और प्रशासकीय क्षमता सिद्ध की है; पर इनमें से किसी का कोई जनाधार नहीं है। ये अपने दम पर अपनी लोकसभा सीट भी नहीं जीत सकते।


अतः भाजपा को अपने मुख्यमंत्रियों में किसी को आगे करना होगा। उसके सब मुख्यमंत्री योग्य प्रशासक, कुशल वक्ता, अनुभवी और व्यापक जनाधार वाले हैं; पर भाजपा अपने बल पर बहुमत पा सके, इसमें संदेह है। अतः उसे गठबंधन करना ही होगा। इस समय नीतीश कुमार, प्रकाश सिंह बादल और बाल ठाकरे उसके साथ हैं। चुनाव घोषित होने पर कुछ अन्य दल भी साथ आ जाएंगे।


वामपंथ के पिटने तथा केन्द्रीय राजनीति में उसकी भूमिका गौण हो जाने से उनके समर्थक बुद्धिजीवी भाजपा के पुनरोदय से भयभीत हैं। वे अभी से वातावरण बना रहे हैं कि यदि अगली बार राजग को सत्ता मिलती है, तो उन्हें परम सेक्यूलर नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बनाना चाहिए। ऐसे षड्यन्त्रों से भाजपा को सावधान रहना होगा।


भाजपा के कार्यकर्ताओं से पूछें, तो वे एक स्वर से नरेन्द्र मोदी का नाम लेंगे। उन्होंने दुनिया भर में गुजरात की जो छवि बनाई है, उस नाते वह प्रधानमंत्री पद के श्रेष्ठ प्रत्याशी हैं। उनके नाम पर कार्यकर्ता मर मिटेंगे। इसी प्रकार शिवराज सिंह के नेतृत्व में म0प्र0 ने नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। उ0प्र0 के बाद लोकसभा में सर्वाधिक सांसद वहीं से आते हैं। अतः यह नाम भी विचारणीय है।


यदि भाजपा को उ0प्र0 और केन्द्र में अगला चुनाव जीतना है, तो अभी से इन चार सूत्रों पर ध्यान देना होगा। देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध माहौल बना है। लोग यह जान गये हैं कि भ्रष्टाचार का कारण कांग्रेस, सोनिया और मनमोहन सिंह ही हैं। कांग्रेस के विरुद्ध बन रही इस हवा को योग्य नेतृत्व की घोषणा, कार्यकताओं की लगन और कुशल रणनीति से वोट में बदला जा सकता है।


गुरुवार, 16 जून 2011

संतों के सामाजिक सरोकार



बाबा रामदेव के अनशन से जिनके स्वार्थों पर आंच आ रही थी, ऐसे अनेक नेताओं ने यह टिप्पणी की, कि बाबा यदि संत हैं, तो उन्हें अपना समय ध्यान, भजन और पूजा में लगाना चाहिए। यदि वे योग और आयुर्वेद के आचार्य हैं, तो स्वयं को योग सिखाने और लोगों के इलाज तक सीमित रखेें। उन्हें सामाजिक सरोकारों से कोई मतलब नहीं है। यदि वे सड़कों पर आकर आंदोलन करते हैं, तो यह भगवा वेश की मर्यादा का उल्लंघन और राजनीति है।


सबसे पहले तो यह स्पष्ट करना जरूरी है कि संत की पहचान कपड़ों से नहीं होती। आप उस भगवावेशधारी को क्या कहेंगे, जो देशद्रोही नक्सलियों का दलाल है। चर्च के पैसे से जिसके एन.जी.ओ चलते हैं। जो एक ओर अन्ना के पक्ष में दिखाई देता है, तो दूसरी ओर मनमोहन सिंह से मिलकर बाबा रामदेव के अभियान में पलीता लगाता है। अर्थात बाहरी वेशभूषा से संत की पहचान नहीं हो सकती। ऐसे ही काले, हरे या सफेद चोगे पहने लोगों को भी संत या इस जैसा कोई और अच्छा नाम नहीं दिया जा सकता।


संत वस्तुतः एक स्वभाव और मनोवृत्ति का नाम है। इस बारे में ‘संत हृदय नवनीत समाना’ या ‘संतों के मन रहत है, सबके हित की बात’ जैसे उद्धरण प्रसिद्ध हैं। संत के लिए ब्रह्मचारी, गृहस्थ या वानप्रस्थी होना अनिवार्य नहीं है। जो निजी या पारिवारिक हितों से ऊपर उठ चुका है; जिसने अपना तन, मन और धन समाजहित में अर्पित कर दिया है; वह संत और महात्मा है। भले ही उसकी अवस्था, शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।


भारत में संन्यास की परम्परा बहुत पुरानी है। चार आश्रमों में सबसे अंतिम संन्यास आश्रम है। इसका अर्थ है कि अब व्यक्ति अपने सब घरेलू और सामाजिक दायित्वों से मुक्त होकर पूरी तरह ईश्वर की आराधना करे तथा अपने अगले जन्म के लिए मानसिक रूप से स्वयं को तैयार करे। 75 वर्ष के बाद इस आश्रम में जाने की व्यवस्था हमारे मनीषियों ने की है। इस समय तक व्यक्ति का शरीर भी ऐसा नहीं रहता कि वह कोई जिम्मेदारी लेकर काम कर सके। अतः घरेलू काम बच्चों को तथा सामाजिक काम नई पीढ़ी को सौंपकर प्रभुआश्रित हो जाना ही संन्यास आश्रम है।


इससे पूर्व का वानप्रस्थ आश्रम पूरी तरह समाज को समर्पित है। 50 वर्ष या उसके कुछ समय बाद व्यक्ति इसे स्वीकार करता है। यहां तक आते हुए उसके बच्चे गृहस्थ होकर सब काम संभाल लेते हैं। 50 वर्ष में व्यक्ति जीवन के सब भोगों से प्रायः तृप्त हो जाता है। उसे घर-परिवार से लेकर समाज जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव हो जाते हैं। इस प्रकार एक परिपक्व व्यक्ति समाज कार्य में जब उतरता है, तो उससे समाज को लाभ ही होता है।


भारत में जब तक यह व्यवस्था चलती रही, तब तक समाज सेवा के लिए किसी एन.जी.ओ या देशी-विदेशी सहायता की आवश्यकता नहीं थी। ऐसे वानप्रस्थी लोग अपने निजी खर्च से समाज की सेवा करते थे। इसीलिए भारत में हर व्यक्ति शिक्षित, स्वस्थ और संतोषी था। कोई व्यक्ति भूखा नहीं सोता था और ‘अतिथि देवो भव’ की परम्परा हर ओर विद्यमान थी।


भारत में बौद्ध मत के प्रसार तथा विदेशी हमलावरों के आगमन से से इस व्यवस्था में एक निर्णायक मोड़ आया। लोगों ने लाखों साल से चली आ रही सनातन मान्यताओं को छोड़ दिया। इनकी रक्षा एवं पुनप्रर्तिष्ठा के लिए आदि गुरु शंकराचार्य ने दशनाम संन्यासियों की परम्परा प्रारम्भ की। ये संन्यासी ब्रह्मचारी रहकर पूरे देश में घूमते थे। इस प्रकार देश और धर्म की रक्षा का महत्वपूर्ण कार्य इन्होंने किया। इनके योगक्षेम की व्यवस्था समाज करता था। इनमें कुछ संन्यासी शस्त्रधारी नागा भी होते थे, जो विदेशी या विधर्मी आक्रमणों के सामने डट जाते थे। ऐसे संन्यासी विद्रोह की चर्चा बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास ‘आनंद मठ’ में की है।


संन्यासी, वानप्रस्थी, आचार्य या गुरुओं द्वारा देश और धर्म की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाने के हजारों उदाहरण हैं। श्रीराम को किशोरावस्था में वन में ले जाकर गुरु विश्वामित्र ने ही भावी जीवन के लिए तैयार किया था। उन्होंने ही श्रीराम को अहल्या के उद्धार के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ही राक्षसों द्वारा मारे गये सज्जनों की अस्थियों का ढेर दिखाया था, जिससे प्रेरित होकर श्रीराम ने ‘निशिचर हीन करऊं मही’...का संकल्प लिया था। वन भेजने में दशरथ के संकोच को देखकर कुलगुरु वशिष्ठ जी ने उन्हें यह समझाया था कि विश्वामित्र जी के साथ जाने से इनका हित ही होगा।


सैल्यूकस को हराने वाले सम्राट चंद्रगुप्त को प्रेरणा और फिर राजकाज में सहयोग देने वाले आचार्य चाणक्य का नाम लेना यहां उचित होगा। छत्रपति शिवाजी के प्रेरणाòोत समर्थ स्वामी रामदास ने देश भर में 1,100 मठ स्थापित किये थे, जिनके महंत शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा देकर नवयुवकों को मुगल आक्रमणकारियों के विरुद्ध तैयार करते रहते थे। आगरा से निकलकर शिवाजी इनके सहयोग से ही अपने राज्य तक पहुंच सके थे।


गुरु नानक से लेकर दशम गुरु गोविंद सिंह जी तक सिख गुरुओं की पूरी परम्परा ही देश और धर्म की रक्षा में समर्पित हुई है। गोरक्षा के लिए अपना और अपने शिष्यों का जीवन भेंट चढ़ा देने वाले गुरु रामसिंह कूका को क्या भुलाया जा सकता है ? स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा संचालित किसान आंदोलन क्या ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनजागरण का एक अभूतपूर्व प्रयास नहीं था ?


1857 के स्वाधीनता संग्राम में रानी झांसी के साथ युद्धस्थल पर बाबा गंगादास उपस्थित थे। रानी की इच्छा थी कि उनके शरीर को अंग्रेज हाथ न लगाएं। अतः उनके वीरगति प्राप्त करते ही बाबा ने एक झोपड़ी में उनका शरीर रखकर उसे आग लगा दी। स्वामी विवेकानंद ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध देशी शासकों को एकत्र करने का प्रयास किया था। महर्षि अरविंद तो कई वर्ष सीखचों के पीछे रहे। गायत्री के आराधक आचार्य श्रीराम शर्मा कई बार जेल गये। स्वामी श्रद्धानंद ने अंग्रेज पुलिस की गोलियों के आगे सीना खोल दिया था। क्या इनके प्रयासों को इसलिए ठुकरा दिया जाना चाहिए कि ये योगी, संन्यासी, धर्माचार्य या विरक्त थे ?


कांग्रेस वाले जिन गांधी बाबा को स्वाधीनता प्राप्ति का श्रेय देते हैं, वे भी तो एक संन्यासी जैसे ही थे। उन्हें स्वामी श्रद्धानंद ने ही महात्मा की उपाधि दी थी। हर दो अक्तूबर और 30 जनवरी को ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ के गीत कौन गाता है ? 1947 के बाद गांधी जी के शिष्य विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन चलाया था, क्या इसका कोई सामाजिक सरोकार नहीं था ? गोरक्षा के लिए भी उन्होंने लम्बा उपवास किया, यद्यपि मुसलमान एवं वामपंथियों से डरकर इंदिरा गांधी कानून नहीं बना सकीं। गोरक्षा के लिए संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, महात्मा रामचंद्र वीर, आचार्य धर्मेन्द्र आदि ने समय-समय पर अनशन किये हैं।


जयप्रकाश नारायण गृहस्थ होते हुए भी एक बैरागी ही थे। उन्होंने चम्बल के बीहड़ों में जाकर सैकड़ों दुर्दान्त डाकुओं को समर्पण के लिए प्रेरित किया। 1974-75 में इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरुद्ध हुए आंदोलन का नेतृत्व जब उन्होंने स्वीकार किया, तभी वह आंदोलन अपनी फलश्रुति की ओर तेजी से बढ़ा।


ऐसे एक नहीं, सैकड़ों उदाहरण हैं। संन्यासी का असली काम ही समाज जागरण है। वह सेवा, साधना, आंदोलन या अन्य कोई भी मार्ग अपनाए, सब प्रशंसनीय हैं। कुछ लोगों ने स्वामी रामदेव की सक्रियता की आलोचना की है; पर सच तो यह है कि भारत की दुर्दशा का कारण वानप्रस्थ व्यवस्था में व्यवधान तथा संन्यासियों द्वारा मठ-मंदिर, भजन-पूजा और प्रवचन तक स्वयं को सीमित कर लेना है। इस संदर्भ में एक उदाहरण देना समीचीन होगा।


मुंबई से प्रकाशित होने वाले मासिक ‘हिन्दू व१यस’ के सम्पादक ने गत लोकसभा चुनाव के बाद देश के 100 प्रमुख संतों तथा समाजसेवियों से पूछा कि क्या उन्होंने मतदान किया ? उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि केवल बाबा रामदेव ने इसका उत्तर हां में दिया। इस पर उन्होंने अपने सम्पादकीय में लिखा कि जो लोग लोकतंत्र के प्रति इतने उदासीन हैं; उन्हें अपने धर्म, आश्रम और मठ-मंदिरों की रक्षा के लिए चिल्लाने या शासन से अपील का कोई अधिकार नहीं है। शासन तो उन्हीं मुल्ला-मौलवियों की चिन्ता करेगा, जिनके वोट से सरकार बनती या बिगड़ती है।


इस दृष्टि से देखें, तो बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का आंदोलन भारतीय इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा। इससे पूर्व गोरक्षा के लिए 1966-67 में तथा फिर श्रीराम मंदिर के लिए साधु-संत सड़कों पर उतरे थे। इन दोनों अभियानों में संघ और विश्व हिन्दू परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। दो वर्ष पूर्व बाबा रामदेव के नेतृत्व में अनेक संन्यासियों ने ‘गंगा रक्षा मंच’ बनाकर अभियान चलाया था। प्रधानमंत्री ने इसमें हस्तक्षेप कर कुछ बातें मानी भी थीं। गत 13 जून को हरिद्वार में संत निगमानंद की अनशन के दौरान हुई मृत्यु ने इस आंदोलन का और ऊर्जा प्रदान की है।


भारत में लाखों साधु और संन्यासी हैं। कुछ का प्रभाव क्षेत्र दो-चार गांवों तक है, तो कुछ की पहचान पूरी दुनिया में है। यदि ये सब देश, धर्म और समाज की रक्षार्थ उठ खड़े हों, तो धूर्त और भ्रष्ट राजनेता कुछ ही दिन में भाग खड़े होंगे। इसलिए आवश्यकता संन्यासियों की निष्क्रियता की नहीं, अत्यधिक सक्रियता की है।