मंगलवार, 21 जून 2011

बलिदान दिवस 23 जून पर विशेष -



           डा0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बलिदान


डा0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी के पिता श्री आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्थापक उपकुलपति थे। उनके देहांत के बाद केवल 23 वर्ष की अवस्था में श्यामाप्रसाद जी को वि0वि0 की प्रबन्ध समिति में ले लिया गया। 33 वर्ष की छोटी अवस्था में ही वे कलकत्ता वि0वि0 के उपकुलपति बने।


डा0 मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए बलिदान दिया। परमिट प्रणाली का विरोध करते हुए वे बिना अनुमति वहां गये और वहीं उनका प्राणान्त हुआ।


कश्मीर सत्याग्रह क्यों ?


भारत स्वतन्त्र होते समय अंग्रेजों ने सभी देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलय अथवा स्वतन्त्र रहने की छूट दी। इस प्रक्रिया की देखभाल गृहमंत्री सरदार पटेल कर रहे थे। भारत की प्रायः सब रियासतें स्वेच्छा से भारत में मिल गयीं। शेष हैदराबाद को पुलिस कार्यवाही से तथा जूनागढ़, भोपाल और टोंक को जनदबाव से काबू कर लिया; पर जम्मू-कश्मीर के मामले में पटेल कुछ नहीं कर पाये क्यांेकि नेहरू जी ने इसे अपने हाथ में रखा।


मूलतः कश्मीर के निवासी होने के कारण नेहरू जी वहां सख्ती करना नहीं चाहते थे। उनका मित्र शेख स्वतंत्र जम्मू-कश्मीर का राजा बनना चाहता था। दूसरी ओर वह पाकिस्तान से भी बात कर रहा था। इसी बीच पाकिस्तान ने कबाइलियों के वेश में हमला कर घाटी का 2/5 भाग कब्जा लिया। यह आज भी उनके कब्जे में है और इसे वे ‘आजाद कश्मीर’ कहते हैं।


नेहरू की ऐतिहासिक भूल


जब भारतीय सेनाओं ने कबायलियों को खदेड़ना शुरू किया, तो नेहरू जी ने ऐतिहासिक भूल कर दी। वे ‘कब्जा सच्चा, दावा झूठा’ वाले सामान्य सिद्धांत को भूलकर जनमत संग्रह की बात कहते हुए मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गये। सं.रा.संघ ने सैनिक कार्यवाही रुकवा दी। नेहरू ने राजा हरिसिंह को विस्थापित होने और शेख अब्दुल्ला को अपनी सारी शक्तियां सौंपने पर भी मजबूर किया।


शेख ने शेष भारत से स्वयं को पृथक मानते हुए वहां आने वालों के लिए अनुमति पत्र लेना अनिवार्य कर दिया। इसी प्रकार अनुच्छेद 370 के माध्यम से उसने राज्य के लिए विशेष शक्तियां प्राप्त कर लीं। अतः आज भी वहां जम्मू-कश्मीर का हल वाला झंडा फहराकर कौमी तराना गाया जाता है।


जम्मू-कश्मीर के राष्ट्रवादियों ने ‘प्रजा परिषद’ के बैनर तले रियासत के भारत में पूर्ण विलय के लिए आंदोलन किया। वे कहते थे कि विदेशियों के लिए परमिट रहे; पर भारतीयों के लिए नहीं। शेख और नेहरू ने इस आंदोलन का लाठी-गोली के बल पर दमन किया; पर इसकी गरमी पूरे देश में फैलने लगी। ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान - नहीं चलेंगे’ के नारे गांव-गांव में गूंजने लगे। भारतीय जनसंघ ने इस आंदोलन को समर्थन दिया। डा0 मुखर्जी ने अध्यक्ष होने के नाते स्वयं इस आंदोलन में भाग लेकर बिना अनुमति पत्र जम्मू-कश्मीर में जाने का निश्चय किया।


जनसंघ के प्रयास


इससे पूर्व जनसंघ के छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को कश्मीर जाकर परिस्थिति का अध्ययन भी नहीं करने दिया गया। वस्तुतः शेख ने डा0 मुखर्जी सहित जनसंघ के प्रमुख नेताओं की सूची सीमावर्ती जिलाधिकारियों को पहले से दे रखी थी, जिन्हें वह किसी भी कीमत पर वहां नहीं आने देना चाहता था। यद्यपि अकाली, सोशलिस्ट तथा कांग्रेसियों को वहां जाने दिया गया। कम्युनिस्टों ने तो उन दिनों वहां अपना अधिवेशन भी किया। स्पष्ट है कि नेहरू और शेख को जनसंघ से ही खास तकलीफ थी।


कश्मीर की ओर प्रस्थान


डा0 मुखर्जी ने जाने से पूर्व रक्षामंत्री से पत्र द्वारा परमिट के औचित्य के बारे में पूछा; पर उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला। इस पर उन्होंने बिना परमिट वहां जाने की घोषणा समाचार पत्रों में छपवाई और 8.5.1953 को दिल्ली से रेल द्वारा पंजाब के लिए चल दिये। दिल्ली स्टेशन पर हजारों लोगों ने उन्हें विदा किया। रास्ते में हर स्टेशन पर स्वागत और कुछ मिनट भाषण का क्रम चला।


इस यात्रा में डा0 मुखर्जी ने पत्रकार वार्ताओं, कार्यकर्ता बैठकों तथा जनसभाओं में शेख और नेहरू की कश्मीर-नीति की जमकर बखिया उधेड़ी। अम्बाला से उन्होंने शेख को तार दिया, ‘‘ मैं बिना परमिट जम्मू आ रहा हूं। मेरा उद्देश्य वहां की परिस्थिति जानकर आंदोलन को शांत करने के उपायों पर विचार करना है।’’ इसकी एक प्रति उन्होंने नेहरू को भी भेजी। फगवाड़ा में उन्हें शेख की ओर से उत्तर मिला कि आपके आने से कोई कार्य सिद्ध नहीं होगा।


गिरफ्तारी


अब डा0 मुखर्जी ने अपने साथ गिरफ्तारी के लिए तैयार साथियों को ही रखा। 11 मई को पठानकोट में डिप्टी कमिश्नर ने बताया कि उन्हें बिना परमिट जम्मू जाने की अनुमति दे दी गयी है। वे सब जीप से सायं 4.30 पर रावी नदी के इस पार स्थित माधोपुर पोस्ट पहुंचे। उन्होंने जीप के लिए परमिट मांगा। डि0कमिश्नर ने उन्हें रावी के उस पार स्थित लखनपुर पोस्ट तक आने और वहीं जीप को परमिट देने की बात कही।


सब लोग चल दिये; पर पुल के बीच में ही पुलिस ने उन्हें बिना अनुमति आने तथा अशांति भंग होने की आशंका का आरोप लगाकर पब्लिक सेफ्टी एक्ट की धारा तीन ए के अन्तर्गत पकड़ लिया। उनके साथ वैद्य गुरुदत्त, पं0 प्रेमनाथ डोगरा तथा श्री टेकचन्द शर्मा ने गिरफ्तारी दी, शेष चार को डा0 साहब ने लौटा दिया।


डा0 मुखर्जी ने बहुत थके होने के कारण सबेरे चलने का आग्रह किया; पर पुलिस नहीं मानी। रात में दो बजे वे बटोत पहुंचे। वहां से सुबह चलकर दोपहर तीन बजे श्रीनगर केन्द्रीय कारागार में पहुंच सके। फिर उन्हें निशातबाग के पास एक घर में रखा गया। शाम को जिलाधिकारी के साथ आये डा0 अली मोहम्मद ने उनके स्वास्थ्य की जांच की। वहां समाचार पत्र, डाक, भ्रमण आदि की ठीक व्यवस्था नहीं थी।


वहां शासन-प्रशासन के अधिकारी प्रायः आते रहते थे; पर उनके सम्बन्धियों को मिलने नहीं दिया गया। डा0 साहब के पुत्र को तो कश्मीर में ही नहीं आने दिया गया। अधिकारी ने स्पष्ट कहा कि यदि आप घूमने जाना चाहते हैं, तो दो मिनट में परमिट बन सकता है; पर अपने पिताजी से मिलने के लिए परमिट नहीं बनेगा। सर्वोच्च न्यायालय के वकील उमाशंकर त्रिवेदी को ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका’ प्रस्तुत करने के लिए भी डा0 मुखर्जी से भेंट की अनुमति नहीं मिली। फिर उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप पर यह संभव हो पाया।


हत्या का षड्यन्त्र


19-20 जून की रात्रि में डा0 मुखर्जी की पीठ में दर्द एवं बुखार हुआ। दोपहर में डा0 अली मोहम्मद ने आकर उन्हें ‘स्टैªप्टोमाइसिन’ इंजैक्शन तथा कोई दवा दी। डा0 मुखर्जी ने कहा कि यह इंजैक्शन उन्हें अनुकूल नहीं है। अगले दिन वैद्य गुरुदत्त ने इंजैक्शन लगाने आये डा0 अमरनाथ रैना से दवा के बारे में पूछा, तो उसने भी स्पष्ट उत्तर नहीं दिया।


इस दवा से पहले तो लाभ हुआ; पर फिर दर्द बढ़ गया। 22 जून की प्रातः उन्हें छाती और हृदय में तेज दर्द तथा सांस रुकती प्रतीत हुआ। यह स्पष्टतः दिल के दौरे के लक्षण थे। साथियों के फोन करने पर डा0 मोहम्मद आये और उन्हें अकेले नर्सिंग होम ले गये। शाम को डा0 मुखर्जी के वकील श्री त्रिवेदी ने उनसे अस्पताल में जाकर भेंट की, तो वे काफी दुर्बलता महसूस कर रहे थे।


23 जून प्रातः 3.45 पर डा0 मुखर्जी के तीनों साथियों को तुरंत अस्पताल चलने को कहा गया। वकील श्री त्रिवेदी भी उस समय वहां थे। पांच बजे उन्हें उस कमरे में ले जाया गया, जहां डा0 मुखर्जी का शव रखा था। पूछताछ करने पर पता लगा कि रात में ग्यारह बजे तबियत बिगड़ने पर उन्हें एक इंजैक्शन दिया गया; पर कुछ अंतर नहीं पड़ा और ढाई बजे उनका देहांत हो गया।


अंतिम यात्रा


डा0 मुखर्जी के शव को वायुसेना के विमान से दिल्ली ले जाने की योजना बनी; पर दिल्ली का वातावरण गरम देखकर शासन ने उन्हें अम्बाला तक ही ले जाने की अनुमति दी। जब विमान जालन्धर के ऊपर से उड़ रहा था, तो सूचना आयी कि उसे वहीं उतार लिया जाये; पर जालन्धर के हवाई अड्डे ने उतरने नहीं दिया। दो घंटे तक विमान आकाश में चक्कर लगाता रहा। जब वह नीचे उतरा तो वहां खड़े एक अन्य विमान से शव को सीधे कलकत्ता ले जाया गया। कलकत्ता में दमदम हवाई अड्डे पर हजारों लोग उपस्थित थे। रात्रि 9.30 पर हवाई अड्डे से चलकर लगभग दस मील दूर उनके घर तक पहुंचने में सुबह के पांच बज गये। इस दौरान लाखों लोगों ने अपने प्रिय नेता के अंतिम दर्शन किये। 24 जून को दिन में ग्यारह बजे शवयात्रा शुरू हुई, जो तीन बजे शवदाह गृह तक पहुंची।


इस घटनाक्रम को एक षड्यन्त्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि डा0 मुखर्जी तथा उनके साथी शिक्षित तथा अनुभवी लोग थे; पर उन्हें दवाओं के बारे में नहीं बताया गया। मना करने पर भी ‘स्टैªप्टोमाइसिन’ का इंजैक्शन दिया गया। अस्पताल में उनके साथ किसी को रहने नहीं दिया गया। यह भी रहस्य है कि रात में ग्यारह बजे उन्हें कौन सा इंजैक्शन दिया गया ?


उनकी मृत्यु जिन संदेहास्पद स्थितियों में हुई तथा बाद में उसकी जांच न करते हुए मामले पर लीपापोती की गयी, उससे इस आशंका की पुष्टि होती है कि यह नेहरू और शेख अब्दुल्ला द्वारा करायी गयी चिकित्सकीय हत्या थी। यद्यपि इस मामले से जुड़े प्रायः सभी लोग दिवंगत हो चुके हैं, फिर भी निष्पक्ष जांच होने पर आज भी कुछ तथ्य सामने आ सकते हैं।