शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

खुजली के पुराने मरीज


खुजली एक जाना-पहचाना चर्म रोग है। कहते हैं कि यह किसी को हो जाए, तो आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। छोड़ भी दे, तो फिर कब उभर आयेगा, यह निश्चित नहीं है।


शारीरिक खुजली की तरह ही कुछ वैचारिक और मानसिक खुजली भी होती है। वन्दे मातरम्, भगवा ध्वज, अखंड भारत, हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्थान आदि कुछ ऐसे ही विषय हैं, जिनकी चर्चा होते ही कुछ लोगों की पुरानी खुजली फिर उभर आती है। हमारे गांव में इस रोग से पीड़ित एक बुजुर्ग हाथ-पैर खुजाते हुए एक गीत गाते थे -

पाकिस्तान से चली खुजली, हिन्दुस्तान में आई
न खाने में मजा, न खिलाने में मजा
जितना इस खुजली को खुजाने में मजा।।


कुछ ऐसा ही मजा आजकल दिल्ली के एक इमाम को आ रहा है। उन्हें अन्ना के आंदोलन से इसलिए परेशानी है कि उसमें भारत माता की जय और वन्दे मातरम् के नारे लग रहे हैं। उन्हें परेशानी भ्रष्टाचार से नहीं है; पर इन नारों से है। जैसे लाल कपड़े को देखकर सांड भड़कता है, वही हाल उनका है। उन्होंने मुसलमानों से इस आंदोलन से अलग रहने को कहा है। यह बात दूसरी है कि मुसलमान उन्हें घास न डालते हुए रामलीला मैदान में लगातार आ रहे हैं।


वन्दे मातरम् गीत के महत्व को एक घटना से समझ सकते हैं। अंग्रेजों ने 1905 में बंगाल का विभाजन किया था। वे स्वाधीनता के लिए मिलकर संघर्ष कर रहे हिन्दू और मुसलमानों को बांटना चाहते थे। इसके साथ ही वे यह भी देखना चाहते थे कि देश के विभाजन की लोगों पर क्या प्रतिक्रिया होगी ? जैसे किसी बड़े काम को करने से पहले उसे छोटे रूप में प्रयोग करके देखा जाता है, बिल्कुल वही विचार अंग्रेजों का था।


बंगाल का विभाजन करते समय उन्होंने मुस्लिम बहुत पूर्वी बंगाल को असम के साथ मिलाकर एक नया राज्य बना दिया। 16 अक्तूबर, 1905 से यह राज्य अस्तित्व में आना था; पर इस आदेश की न केवल बंगाल अपितु पूरे देश में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। बंगाल में तो आम आदमी से लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे नोबेल विजेता तक सड़कों पर उतर आये।


उन दिनों बंगाल क्रान्तिकारियों का गढ़ था। उन्होंने विभाजन को किसी कीमत पर लागू न होने देने की चेतावनी दे दी। समाचार पत्रों ने इस बारे में विशेष लेख छापे। राष्ट्रीय नेताओं ने लोगों से विदेशी वस्त्रों एवं वस्तुओं के बहिष्कार की अपील की। जनसभाओं में एक वर्ष तक सभी सार्वजनिक पर्वों पर होने वाले उत्सव स्थगित कर राष्ट्रीय शोक मनाने की अपील की जाने लगीं।


इन अपीलों का व्यापक असर हुआ। पंडितों ने विदेशी वस्त्र पहनने वाले वर-वधुओं के विवाह कराने से हाथ पीछे खींच लिया। नाइयों ने विदेशी वस्तुओं के प्रेमियों के बाल काटने और धोबियों ने उनके कपड़े धोने से मना कर दिया। इससे विदेशी सामान की बिक्री बहुत घट गयी। उसे प्रयोग करने वालों को हीन दृष्टि से देखा जाने लगा। ‘मारवाड़ी चैम्बर आफ कामर्स’ ने ‘मेनचेस्टर चैम्बर आफ कामर्स’ को तार भेजा कि शासन पर दबाव डालकर इस निर्णय को वापस कराइये, अन्यथा यहां आपका माल नहीं बिक सकेगा।


योजना के क्रियान्वयन का दिन 16 अक्तूबर, 1905 पूरे बंगाल में शोक पर्व के रूप में मनाया गया। रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा अन्य प्रबुद्ध लोगों ने आग्रह किया कि इस दिन सब नागरिक गंगा या निकट की किसी भी नदी में स्नान कर एक दूसरे के हाथ में राखी बांधें। इसके साथ वे संकल्प लें कि जब तक यह काला आदेश वापस नहीं लिया जाता, वे चैन से नहीं बैठेंगे।


16 अक्तूबर को बंगाल के सभी लोग सुबह जल्दी ही सड़कों पर आ गये। वे प्रभात फेरी निकालते और कीर्तन करते हुए नदी तटों पर गये। स्नान कर सबने एक दूसरे को पीले सूत की राखी बांधी और आन्दोलन का मन्त्र गीत वन्दे मातरम् गाया। स्त्रियों ने बंगलक्ष्मी व्रत रखा। छह साल तक आन्दोलन चलता रहा। हजारों लोग जेल गये; पर कदम पीछे नहीं हटाये। लाल, बाल, पाल की जोड़ी ने इस आग को पूरे देश में सुलगा दिया।


इससे लन्दन में बैठे अंग्रेज शासक घबरा गये। ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम ने 11 दिसम्बर, 1912 को दिल्ली में दरबार कर यह आदेश वापस ले लिया। इतना ही नहीं उन्होंने वायसराय लार्ड कर्जन को वापस बुलाकर उसके बदले लार्ड हार्डिंग को भारत भेज दिया। इस प्रकार राखी के धागों और वन्दे मातरम् से उत्पन्न एकता ने इस आन्दोलन को सफल बनाया।


यहां यह प्रश्न मन में उठता है कि जिस देश ने केवल एक प्रांत के विभाजन को अस्वीकार कर दिया, वही देश 1947 में पूरे देश के विभाजन पर उद्वेलित क्यों नहीं हुआ ?


उत्तर बिल्कुल स्पष्ट है कि 1947 में न वन्दे मातरम् था, न भगवा झंडा, न राखी जैसा एकता का प्रतीक और न ही लाल-बाल-बाल जैसे प्रखर देशभक्त नेता। हां, अब थे मुस्लिम तुष्टीकरण के अवतार गांधी और सत्तालोभी नेहरू। ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ जैसा सेक्यूलर कौमी तराना और तिरंगा झंडा।


वन्दे मातरम् महिमा अपरम्पार है। उसके शब्द आज भी देशभक्तों के सांसों की धड़कन बढ़ा देते हैं, जबकि देशद्रोहियों के दिल पर वे हथौड़े की तरह बजते हैं। इसलिए यह अन्ना के आंदोलन में भारत माता की जय के साथ ही जन-जन का प्रिय नारा बना है।


जिन लोगों को वन्दे मातरम् से खुजली है या जिनके दिल इसके गगनभेदी निनाद से कांप रहे हैं, उन्हें चाहिए कि वे अपने पूर्वजों के देश ‘बुखारा’ चले जाएं। उन्हें इस पवित्र देश के जल, वायु और मिट्टी को गंदा करने का कोई अधिकार नहीं है।

बुधवार, 24 अगस्त 2011

आवाज दो, हम एक हैं


यों तो भारत की राजधानी दिल्ली में नार्थ और साउथ ब्ल१क मानी जाती हैं; पर अन्ना हजारे के आंदोलन के कारण पिछले कुछ दिनों से वह रामलीला मैदान में पहुंच गयी है। नार्थ और साउथ ब्ल१क में बड़े अधिकारी और मंत्री बैठते हैं। आम आदमी का प्रवेश वहां वर्जित है; पर रामलीला मैदान में सब ओर आम आदमी ही दिखाई देते हैं। अधिकारी और मंत्रियों में वहां आने की हिम्मत ही नहीं है।


अखबार और दूरदर्शन में रामलीला मैदान छाया देख शर्मा जी की भी वहां जाने की इच्छा हुई। तीन दिन लगातार छुट्टी थी। सोचा थोड़ा मन-मूड हल्का हो जाएगा। मैं ठहरा उनका पुराना मित्र, सो मुझे भी उन्होंने साथ ले लिया।


रामलीला मैदान का दृश्य सचमुच अनुपम था। चारों ओर अन्ना के समर्थन में नारे लग रहे थे। जैसे लोग, वैसे नारे। कहीं कोई पोस्टर बना रहा था, तो कहीं चेहरा रंगने वाले रंग और कूची लिये बैठे थे। गांधी और शिवाजी का वेश धरे कुछ लोग भी वहां घूम रहे थे। जिधर टी.वी का कैमरा घूमता, उधर लोगों की सक्रियता देखते ही बनती थी। कुछ देर हमने भी गला साफ किया, फिर थोड़ा सुस्ताने के लिए पीछे की ओर जा बैठे।


पीछे की ओर कई लोग अलग-अलग समूह बनाकर बैठे थे। उनके पास से निकलने पर पता लगा कि वहां दिन भर के काम की समीक्षा हो रही थी। एक सम्मानजनक दूरी रखकर हम भी वहां बैठ गये; पर हमारे कान उधर ही लगे थे।


पहले समूह में झंडे, बिल्ले, अन्ना टोपी, माथे और कलाई की तिरंगी पट्टियों आदि की बात हो रही थी।


- आज तो दादा, बहुत अच्छी बिक्री हुई।


- हां, आज इतवार की छुट्टी जो थी। मैंने तुमसे बड़ा झंडा सौ रु0 में बेचने को कहा था; पर मुन्ना बता रहा था कि तुमने 120 रु0 तक में बेचा है ?


- और मुन्ना खुद उसे 125 में बेच रहा था। उसने तो अन्ना टोपी भी पांच की बजाय दस में बेची हैं।


- चलो बहस छोड़ो। सौ रु0 अपनी मेहनत के रखकर बाकी पैसे मुझे दो। और कल जरा जल्दी आना। कल भी छुट्टी है, इसलिए और अधिक ग्राहक आएंगे।


दूसरे समूह में कुछ समाजसेवी लोग चर्चारत थे।


- भाई जी, आज तो कोई 5,000 लोगों ने लंगर में खाना खाया।


- हां बेटा, ऐसे सेवा के मौके भाग्य से ही आते हैं।


- पर भाई जी, कल पूड़ी-सब्जी की बजाय कुछ और बनाओ।


- ठीक है, कल कढ़ी-चावल बनवा देते हैं। इसके लिए पत्तलों की भी जरूरत होगी। हलवाई को अभी फोन से बता दो।


तीसरा समूह युवाओं का था।


- आज तो बहुत मजा आया यार। बहुत दिनों बाद हैलमेट के बिना कई तरह से बाइक चलाई। अन्ना टोपी देखकर पुलिस वाले चुप हो जाते थे। वैशाली और मीनाक्षी भी होती, तो मजा दुगना हो जाता।


- हां, मैंने कहा ही था कि यहां पिकनिक और अन्ना का समर्थन एक साथ हो जाएगा।


- तुमने तो बहुत नारे लगाये ?


- हां यार, मेरा तो गला ही बैठ गया। कुछ गला तर करने को है क्या ?


- नहीं, वो तो अब नहीं बची। अच्छा कल का क्या प्रोग्राम है ?


- कल आएंगे तो; पर शाम की फिल्म नहीं छूटनी चाहिए। वरना फिर एक हफ्ते तक मौका नहीं मिलेगा।


चौथे समूह में अधिकांश महिलाएं थीं।


- कहो बहन जी, कैसी रही ?


- बहुत अच्छा लगा। टी.वी पर इतने दिन से अनशन का प्रोग्राम आ रहा था। मन तो मेरा बहुत था कि अन्ना जी को देखें। अच्छा हुआ, जो आपने बता दिया कि कालोनी से कई औरतें चल रही हैं। फिर बच्चों की छुट्टी भी थी। इसलिए और अच्छा हो गया।


- मैंने तो सुबह ही परांठे बनाकर रख दिये थे। जिसका जब मन हो, तब गरम करके खा लेगा। यहां के लंगर की पूड़ी-सब्जी कितनी अच्छी थी ?


- अच्छा अब वापसी की सोचो। घर जाकर खाना भी बनाना है।


पांचवा समूह भी किसी हिसाब-किताब में व्यस्त था; पर उनके स्वर अपेक्षाकृत धीमे थे।


- क्यों छुट्टन, आज कितनी कमाई हुई ?


- आज तो उस्ताद बड़ी मौज रही। तीन मोबाइल और चार पर्स हाथ लगे हैं। अगर गुड्डू साथ रहता, तो एक ब्लैकबेरी भी मिल जाता। - क्यों बे गुड्डू, तू इसके साथ क्यों नहीं रहा ?


- मेरे साथ तो बहुत बुरी बीती उस्ताद। एक की जेब काटते हुए पकड़ा गया। लोगों ने बहुत मारा। ये तो गनीमत हुई कि आपके जान-पहचान वाले दरोगा जी आ गये। उन्होंने छुड़वा दिया, वरना न जाने क्या हो जाता ?


- चलो कोई बात नहीं। अपने धन्धे में ऐसा होता ही है। अच्छा जाओ, अन्ना टोपी लगाकर लंगर में खाना खा लो और कल जल्दी आना।


वापसी पर हम जिस रिक्शा पर बैठे, वह बहुत प्रसन्न था। पूछने पर बोला - जितनी कमाई इन दिनों हो रही है, उतनी कभी नहीं हुई। भगवान करे अन्ना का अनशन दो-चार महीने ऐसे ही चलता रहे। सुबह से 40 चक्कर लगा चुका हूं। एक मिनट की फुर्सत नहीं है। मैंने तो अपने भाई को भी बुलाकर एक रिक्शा दिलवा दी है।


मैंने सोचा, सचमुच मेरा भारत देश महान है। इतने लोग, इतने विचार। सबके अलग-अलग लक्ष्य, फिर भी सब अन्ना के साथ।


मंच से नारे लग रहे थे -


अन्ना हजारे जिन्दाबाद - आवाज दो, हम एक हैं।