रविवार, 4 सितंबर 2011

पुण्यतिथि (पांच सितम्बर) पर विशेष



अमरयोगी महाराजा भर्तृहरि


प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नूतन संवत्सर) पर हम राजा विक्रमादित्य और उनकी गौरव गाथा याद करते हैं; पर उनके बड़े भाई महाराजा भर्तृहरि की कथा भी अत्यन्त प्रेरक है। यदि भर्तृहरि वैरागी न बनते, तो न राजा विक्रमादित्य होते और न उनकी गौरव गाथाएं।


सूर्यवंशी भर्तृहरि का जन्म क्षिप्रा के तट पर स्थित ऐतिहासिक नगर अवन्तिका (उज्जैन) में हुआ था। वे रघुकुलभूषण श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण के पुत्र मालव के कुल में जन्मे थे, जिनके नाम पर यह क्षेत्र मालवा कहलाता है। उनके पिता गंधर्वसेन या चंद्रसेन की पहली पत्नी से भर्तृहरि तथा मैनावती और दूसरी से विक्रमादित्य का जन्म हुआ था। नामकरण के समय कुल पुरोहित ने कहा कि 17वें वर्ष में इसका विवाह होगा; पर 18वें वर्ष में यह उत्तर दिशा के जंगल में सफेद घोड़ी पर बैठकर काले हिरण का शिकार करेगा। इससे इसके मन में वैराग्य उत्पन्न होगा और यह योगी बन जाएगा।


राजा-रानी की चिंताओं के बीच भर्तृहरि ने गुरुकुल में शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा पाई और 16वें वर्ष में घर वापस आकर वे राजा बने। शासन व्यवस्था अति उत्तम होने के कारण उनका राज्य एक आदर्श राज्य बन गया। 17 वें वर्ष में सिंहल देश की राजकुमारी पिंगला से उनका विवाह हुआ। विवाह होते ही भर्तृहरि का मन राजकाज से उचट गया और वे दिन-रात पत्नी के साथ भोग में रम गये।


उनके भोग-विलास में लिप्त रहने से राज्य का भार छोटे भाई विक्रमादित्य पर आ गया। उन्होंने कई बार बड़े भाई को समझाया; पर भर्तृहरि काम के प्रभाव में थे। करेले पर नीम की तरह इसी बीच उनका विवाह एक अन्य राजकुमारी अनंगसेवा से भी हो गया। दोनों पत्नियों के साथ भर्तृहरि राजकाज को पूरी तरह भूल गये। इतना ही नहीं, अनंगसेवा की झूठी शिकायत पर उन्होंने विक्रमादित्य को राज्य से निकाल दिया।


ऐसा कहते हैं कि भर्तृहरि पूर्व जन्म में योगी थे। एक बार देवलोक में गोरखनाथ से उनके गुरु मच्छेन्द्रनाथ ने कहा कि भर्तृहरि इस जन्म में योग की बजाय भोग में लिप्त हो गया है। अतः उसे फिर से योगी बनाना है। गुरु की आज्ञा मानकर गोरखनाथ वेष बदलकर भर्तृहरि के राज्य में आये और उनकी अश्वशाला के प्रमुख बन गये।


एक बार एक संन्यासी ने राजा भर्तृहरि को एक अमरफल देकर कहा कि इसे खाने वाला सदा युवा बना रहेगा। राजा उन दिनों अनंगसेवा के साथ अधिक रहते थे। उन्होंने सोचा कि यदि यह फल अनंगसेवा खाएगी, तो वह चिरयुवा रहकर मुझे तृप्त करती रहेगी। अतः उन्होंने वह फल उसे दे दिया।


पर रानी अनंगसेवा राजा से पूर्ण संतुष्ट नहीं थी। वह उनके सारथी चंद्रचूड़ से प्रेम करती थी। उसने फल चंद्रचूड़ को दे दिया। चंद्रचूड़ एक वेश्या का प्रेमी था, उसने फल वेश्या को दे दिया। इधर भर्तृहरि भी यदाकदा उस वेश्या के पास जाते थे। अगले दिन जब वह वहां गये, तो वेश्या ने फल भर्तृहरि के हाथ में रख दिया।


फल देखकर भर्तृहरि के होश उड़ गये। उन्होंने तलवार निकाली तो वेश्या, चंद्रचूड़ और अनंगसेवा की पूरी कथा सामने आ गयी। इससे अनंगसेवा को इतनी आत्मग्लानि हुई कि उसने आत्मदाह कर लिया। राजा इससे उदास रहने लगे। एक बार मन बहलाने के लिए वह शिकार को गये। वहां उनके साथी ने एक हिरन को मारा; पर उसी समय वह स्वयं भी सर्पदंश से मर गया। उसकी पत्नी अपने पति के साथ चिता पर चढ़ गयी। जब राजा ने यह घटना पिंगला को बताई, तो उसने कहा कि साध्वी नारी पति की मृत्यु की बात सुनते ही प्राण छोड़ देती है। यह बात राजा के मन में बैठ गयी।


फल वाली घटना और अनंगसेवा की मृत्यु से भर्तृहरि का मन राजकाज से उचट गया। इससे राज्य की हालत बिगड़ने लगी। ऐसे में उन्हें फिर अपने भाई की याद आई। उन्होंने प्रयासपूर्वक अपने भाई को ढूंढा और उसे फिर राजकाज संभालने को कहा। इधर राजा अपना अधिकांश समय पिंगला के महल में बिताने लगे। उसके साथ रहकर राजा को अनुभव हुआ कि वह कितनी सात्विक, उदार और बड़े हृदय की नारी है। इससे वे आत्मग्लानि में डूब गये।


अंततः राजा के जीवन का 18 वां वर्ष प्रारम्भ हो गया। राजा उस दिन सुबह से ही शिकार की तैयारी कर रहे थे। रानी पिंगला को पुरोहित की भविष्यवाणी मालूम थी। अतः उसने यह प्रसंग टालना चाहा; पर विधि का विधान कौन टाल सकता है ? अश्वशाला के प्रमुख ने सफेद घोड़ी तैयार कर दी। राजा मानो किसी डोर से बंधे उत्तर दिशा में ही शिकार के लिए चल दिये।


जंगल में राजा ने देखा कि बहुत से हिरनियों के बीच एक काला नर हिरन विद्यमान है। राजा के धनुष चढ़ाते ही हिरनियों ने उनसे झुंड के एकमात्र नर को न मारने की प्रार्थना की; पर राजा ने तीर चला दिया। यह देखकर हिरनियों ने भी एक-एक कर उसके पास आकर प्राण त्याग दिये।


राजा यह देखकर भौचक रह गया। मरते हुए हिरन ने राजा से कहा कि वे उसकी खाल गोरखनाथ जी को तथा सींग किसी जोगी को दे दें, जिससे बनी सेली (सींगवाद्य) बजाकर वह सबको राजा भर्तृहरि के पाप की कहानी सुनाएं। राजा उस हिरन के वचन सुनकर तथा हिरनियों का प्रेम देखकर दंग रह गया। उसे लगा कि उसने पूर्वजन्म के किसी बड़े धर्मात्मा की हत्या कर दी है। तभी वहां योगी गोरखनाथ जी का आगमन हुआ। राजा की प्रार्थना पर उन्होंने भभूत डालकर हिरन और हिरनियों को जीवित कर दिया।


अब राजा ने भी उनसे दीक्षा लेनी चाही। गोरखनाथ ने कहा कि दीक्षा तभी मिल सकती है, जब इस जन्म के साथ ही पूर्व जन्मों की आसक्ति भी मिट जाए। इसके लिए तुम राजसी वस्त्र त्यागकर अपने महल में जाओ और रानी पिंगला को मां कहकर भिक्षा लाओ।


गोरखनाथ जी की आज्ञानुसार भर्तृहरि अपने महल में जाकर मां पिंगला से भिक्षा मांगने लगा। पिंगला ने उन्हें बहुत समझाया; पर राजा तो वैराग्य की गंगा में नहा रहा था। इस अवसर पर भर्तृहरि और पिंगला का संवाद बहुत मार्मिक है। काफी देर बाद पिंगला ने उसे भिक्षा में अपना सौभाग्य चिन्ह दे दिया। उसका विचार था कि इससे राजा के मन में जमी वासनाएं फिर से नहीं उभरेंगी।


अब गोरखनाथ जी ने उसे अपनी बहिन मैनावती के घर से भिक्षा लाने को कहा। मैनावती ने उसे साधारण जोगी समझकर दासी के हाथ से भिक्षा भेजी; पर भर्तृहरि ने रानी मैनावती के हाथ से ही भिक्षा लेने की जिद की। इस पर उसने बाहर आकर अपने भाई को भिक्षा दी। यहां उन दोनों में जगत की निःसारता पर रोचक एवं ज्ञानवर्धक संवाद हुआ। बहिन के आग्रह पर भर्तृहरि ने वचन दिया कि वह जब भी याद करेगी, वह उससे मिलने आएंगे।


अब गोरखनाथ जी ने भर्तृहरि को अरावली की गुफाओं में तप करने को कहा। भर्तृहरि को पिंगला की वह बात याद थी, जो उसने राजा के एक साथी की सर्पदंश से मृत्यु पर कही थी कि साध्वी स्त्री अपने पति की मृत्यु का समाचार सुनते ही देह त्याग देती है।


भर्तृहरि ने इसकी परीक्षा करने के लिए सेवक को खून में सने अपने राजसी वस्त्र देकर पिंगला के पास भेजा। सेवक ने रानी को बताया कि उनकी बातों पर विचार करने से भर्तृहरि का वैराग्य छूट गया। वे राजसी वस्त्र पहनकर वापस आ रहे थे कि एक शेर ने हमलाकर उन्हें मार डाला। यह सुनते ही रानी के दाहिने पैर के अंगूठे से अग्नि प्रकट हुई, जिससे कुछ ही समय में उन रक्तरंजित वस्त्रों के साथ उसकी देह भस्म हो गयी।


अब तो राजा के मन के सब बंधन कट गये। उन्होंने गोरखनाथ जी को सब बात बताई। गोरखनाथ जी ने भर्तृहरि के साथ महल में जाकर श्रद्धाभाव से रानी की भस्म माथे पर लगाई तथा नाथ संप्रदाय की दीक्षा देकर भर्तृहरि के कान में कुंडल पहना दिये। इस प्रकार गोरखनाथ ने अपने गुरु को दिया वचन पूरा कर दिया।


अब योगी भर्तृहरि ने देश भ्रमण करते हुए कई स्थानों पर तपस्या की। प्रयाग के कुंभ में उनकी भेंट अपने भानजे गोपीचंद से हुई। वह भी उस समय योगी हो चुका था। कुंभ के बाद दोनों अलवर के पास त्रिगर्तनगर (तिजारा) में लगातार बारह वर्ष तक रहे। यहां थानाभक्त नामक कुम्हार ने उनके भोजनादि की व्यवस्था की; पर इससे उसकी पत्नी बहुत रुष्ट हो गयी। अतः कुम्हार की अनुपस्थिति में वे उसे भरपूर धन देकर चले गये। तिजारा में स्थित भर्तृहरि गुम्बज उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाये है।


इसके बाद भर्तृहरि ने अरावली की पहाड़ियों में ध्यान करते हुए अपनी देह त्याग दी। उनके शरीर पर मिट्टी की परत चढ़ती गयी और क्रमशः वहां एक टीला बन गया। गुरु गोरखनाथ के प्रताप से वहां सिर झुकाने वालों की मनोकामना पूर्ण होने लगीं। आज यहां एक भव्य मंदिर बना है, जिसमें बाबा भर्तृहरि की अखंड ज्योति जलती है। उनकी पुण्य तिथि भादों शुक्ल अष्टमी (इस वर्ष पांच सितम्बर) को यहां विशाल लक्खी मेला होता है, जिसमें देश भर से हिरण का सींगवाद्य (सेली) साथ रखने वाले नाथ सम्प्रदाय के योगी अवश्य आते हैं।


कविहृदय भर्तृहरि ने अपने जीवन के सम्पूर्ण अनुभव को शतकत्रयी (शृंगार शतक, नीति शतक तथा वैराग्य शतक) में प्रस्तुत किया है। उन्होंने संस्कृत के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ ‘वाक्यपदीय’ की रचना भी की है। उनका जीवन भोग से योग तथा भुक्ति से मुक्ति की गाथा है। नाथ पंथ की मान्यता के अनुसार वे अमर हैं। उनकी अमरता की गाथा आज भी लोकगीतों और लोककथाओं में जीवित है।