शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

14 अक्तूबर पर विशेष -



डा0 अम्बेडकर का मत परिवर्तन और बौद्ध धर्म


वर्तमान भारत में जब-जब भगवान बुद्ध को स्मरण किया जाता है, तब-तब स्वाभाविक रूप से बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर का भी नाम लिया जाता है। क्योंकि स्वतंत्रता के बाद बहुत बड़ी संख्या में एक साथ डा0 अम्बेडकर के नेतृत्व में ही मत परिवर्तन हुआ था। 14 अक्तूबर, 1956 को नागपुर में यह दीक्षा सम्पन्न हुई।


दीक्षा विधि की विस्तृत योजना तैयार करने वाले उनके सहकारी वामनराव गोडबोले के अनुसार बाबा साहब ने सुबह से ही तैयारी की। उन्होंने दिल्ली से मंगाया सफेद लम्बा कोट, सफेद रेशमी कुरता और कोयम्बटूर से मंगायी सफेद धोती पहनी। पैर में बिना फीते वाला जूता पहना। इस प्रक्रिया में उनकी पत्नी डा0 सविता अम्बेडकर (माईसाहब) और रत्तू ने उनकी सहायता की। इसके बाद वे विशेष रूप से बनाये गये दीक्षा स्थान पर गये।


बाबा साहब श्याम होटल में ठहरे थे। वहां से निकलने से पहले अपने सहयोगी गोडबोले को उन्होंने कहा कि आज जो कुछ होने जा रहा है, यह मेरे पिताजी के कारण ही संभव हो पा रहा है। वे बहुत धार्मिक व्यक्ति थे। उन्होंने ही मेरा धार्मिक मानस बनाया है। इसलिए दीक्षा से पूर्व सबको उन्हें श्रद्धांजलि देनी चाहिए। गोडबोले की सूचना पर सबने दो मिनट मौन खड़े होकर स्व0 रामजी सकपाल को श्रद्धांजलि दी।


दीक्षा विधि प्रारम्भ होने पर सर्वप्रथम उन्होंने और माई साहब ने मत परिवर्तन किया। उन्होंने तत्कालीन भारत के वयोवृद्ध भन्ते चंद्रमणि से बौद्ध मत का अनुग्रह पाली भाषा में लिया। बाबासाहब हिन्दू और बौद्ध मत को एक वृक्ष की दो शाखा मानते थे। उनके मन में हिन्दू धर्म के प्रति कितना प्रेम था, यह इस बात से प्रकट होता है कि जब उन्होंने यह कहा कि आज से मैं हिन्दू धर्म का परित्याग करता हूं, तो उनके नेत्र और कंठ भर आये। यह कार्यक्रम 15 मिनट में पूरा हो गया। इसके बाद महाबोधि सोयायटी ऑफ इंडिया के सचिव श्री वली सिन्हा ने उन दोनों को भगवान बुद्ध की धर्मचक्र प्रवर्तक की मुद्रा भेंट की, जो सारनाथ की मूर्ति की प्रतिकृति थी।


इसके बाद बाबा साहब ने जनता को सम्बोधित करते हुए कहा कि अब आपमें से जो भी बौद्ध धर्म ग्रहण करना चाहें, वे हाथ जोड़कर खड़े हो जाएं। लगभग पचास-साठ हजार लोग खड़े हो गये। मंचस्थ लोग भी इसी मुद्रा में खड़े हुए। बाबा साहब ने उन्हें 22 शपथ दिलाईं, जो उन्होंने स्वयं तैयार की थीं। इस प्रकार दो घंटे में यह पूरा कार्यक्रम सम्पन्न हो गया।


बाबा साहब को आशा थी कि केवल हिन्दू ही उनके साथ मत परिवर्तन करेंगे; पर कुछ मुसलमान और ईसाइयों ने भी बौद्ध मत ग्रहण किया। जब बाबा साहब के ध्यान में यह आया, तो उन्होंने कहा कि हमें अपनी प्रतिज्ञाओं में कुछ बदल करना होगा, क्योंकि उनमें हिन्दू देवी-देवताओं और अवतारों को न मानने की ही बात कही थी। यदि मुस्लिम और ईसाई बौद्ध बनना चाहते हैं, तो उन्हें मोहम्मद और ईसा को अवतार मानने की धारणा छोड़नी होगी। यद्यपि यह काम नहीं हो पाया, क्योंकि इस समारोह के डेढ़ माह बाद छह दिसम्बर, 1956 को बाबा साहब का देहांत हो गया।


यह धर्म परिवर्तन था या मत परिवर्तन, यह बहस का विषय हो सकता है; पर डा0 अम्बेडकर ने इसे धर्म परिवर्तन ही कहा है। उन्होंने स्वीकार किया है कि सबसे पहले 13 अक्तूबर 1935 को येवला में जब उन्होंने धर्म परिवर्तन की घोषणा की, तो उनसे अनेक लोगों ने सम्पर्क किया। इनमें सिख पंथ के लोग थे, तो आगा खां व निजाम जैसे मुस्लिम व ईसाई मजहब वाले भी।


निजाम हैदराबाद ने पत्र लिखकर उन्हें प्रचुर धन सम्पदा का प्रलोभन तथा मुसलमान बनने वालों की शैक्षिक व आर्थिक आवश्यकताओं की यथासंभव पूर्ति की बात कही, तो ईसाइयों ने भी ऐसे ही आश्वासन दिये; पर डा0 अम्बेडकर का स्पष्ट विचार था कि इस्लाम और ईसाई विदेशी मजहब हैं। इनमें जाने से अस्पृश्य लोग अराष्ट्रीय हो जाएंगे। यदि वे मुसलमान होते, तो मुस्लिमों की संख्या भारत में दोगुनी हो जाती तथा देश में उनका वर्चस्व बढ़ जाता। यदि वे ईसाई बनते, तो उनकी संख्या पांच-छह करोड़ हो जाने से ब्रिटिश सत्ता की पकड़ मजबूत हो जाती। इस कारण बाबा साहब इन मजहबों में जाने के विरुद्ध थे।


दूसरी ओर वे भारत भूमि में जन्मे तथा यहां की संस्कृति में रचे बसे सिख पंथ के समर्थक थे। एक समय तो उन्होंने अपने समर्थकों सहित सिख बनने का निर्णय कर ही लिया था। अपै्रल 1936 में अमृतसर के गुरुद्वारे में एक सभा हुई, जिसमें डा0 अम्बेडकर सिख वेश में उपस्थित थे। 18 जून, 1936 को बाबासाहब की हिन्दू महासभा के एक बड़े नेता डा0 मुंजे से भेंट हुई। इसके बाद डा0 मुंजे 22 जून को मुंबई गये, जहां उन्होंने बाबासाहब के इस निर्णय को हिन्दू समाज का समर्थन दिलाने का प्रयास किया।


इससे हिन्दू सभा के नेता बैरिस्टर जयकर, सेठ जुगलकिशोर बिड़ला, विजय राघवाचारियर, राजा नरेन्द्रनाथ तथा शंकराचार्य जैसे लोग उनके समर्थन में आये; पर किसी कारण से यह योजना स्थगित हो गयी। आगे चलकर डा0 अम्बेडकर के ध्यान में आया कि सिख पंथ भी जातिभेद से पीड़ित है। अतः उन्होंने सिख बनने का विचार त्याग दिया।


अब बाबासाहब ने जातिभेद से मुक्त बौद्ध मत की ओर ध्यान दिया। 1935 से 1956 तक की उनकी यात्रा इसी ओर संकेत करती है। उन्होंने इटली के भिक्खु सालाडोर सहित अनेक बौद्ध भिक्खुओं से चर्चा की। रैशनलिस्ट एसोसिएशन, मद्रास के कार्यक्रम में उन्होंने 1944 में ‘बौद्ध धर्म और ब्राह्मण धर्म’ विषय पर भाषण दिया। 1948 में अपने प्रसिद्ध एवं बहुचर्चित ग्रंथ ‘हू वर शूद्राज’ में उन्होंने भगवान बुद्ध को भी श्ूाद्र बताया। जनवरी 1950 में उन्होेंने बुद्ध जयंती सार्वजनिक रूप से मनायी। 1950 में महाबोधि सोसायटी के मुखपत्र में उन्होंने बौद्ध धर्म के बारे में अपने विचार व्यक्त किये। 5 मई, 1950 को ‘जनता’ समाचार पत्र में उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति अपने झुकाव को अधिकृत रूप से घोषित किया।


इसी मास में श्रीलंका में आयोजित बौद्ध धर्म परिषद में वे निरीक्षक के नाते उपस्थित रहे तथा वहां के अस्पृश्यों को बौद्ध मत ग्रहण करने का आह्नान किया। जुलाई 1950 में वरली में बुद्ध मंदिर के उद्घाटन के समय उन्होंने अपना शेष जीवन भगवान बुद्ध की सेवा में समर्पित करने की घोषणा की। 1954 में विश्व बौद्ध परिषद के तृतीय अधिवेशन में में रंगून (बर्मा) गये। वहां उन्होंने श्रीलंका और बर्मा के अपने अनुभव के आधार पर बौद्ध धर्म में ऊपरी तामझाम और समारोहप्रियता की आलोचना की। उन्होंने इस पर होने वाले व्यय को धर्मप्रचार पर करने को कहा।


1955 में उन्होंने मुंबई में ‘भारतीय बौद्धजन सभा’ की स्थापना की। दीक्षा लेने के बाद इस संस्था का नाम ‘भारतीय बौद्ध महासभा’ हो गया। मार्च 1956 में अश्वघोष रचित ‘बुद्ध चरित’ पर आधारित उनका ‘दि बुद्ध एंड हिज धम्म’ नामक ग्रंथ प्रकाशित हुआ। मई 1956 में बी.बी.सी लंदन सेे उनका बौद्ध धर्म पर व्याख्यान प्रसारित हुआ। स्पष्ट है कि वे धीरे-धीरे इस ओर आकृष्ट हो रहे थे।


बाबा साहब ने बौद्ध मत को तत्कालीन प्रचलित परम्पराओं के बदले उसके संशोधित रूप में स्वीकार किया। ‘दि बुद्ध एंड हिज द्दम्म’ तथा 1951 से 1956 के उनके भाषणों से यह प्रकट होता है। भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण से पूर्व अपने शिष्य आनंद को अपनी बुद्धि और सत्य की शरण में जाने को कहा था। बाबा साहब ने भी धर्मान्तरण से काफी समय पूर्व अपने अनुयायियों को कहा था कि मैं आपसे बौद्ध धर्म में आने का आग्रह तो करता हूं; पर इससे आपस में फूट नहीं पड़नी चाहिए। जो इसमें आना चाहें, वे केवल भावना के वश होकर नहीं, अपितु विचारपूर्वक इसे ग्रहण करें।


बाबा साहब ने बौद्ध धर्म में प्रचलित चमत्कार व कथाओं को नहीं माना। 29 वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ के गृहत्याग के बारे में कहा जाता है कि एक वृद्ध, एक बीमार और एक मृतक को देखकर उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। बाबा साहब का मत था कि इस अवस्था तक यह संभव नहीं कि उन्होंने कभी वृद्ध, बीमार या मृतक को न देखा हो। इसी प्रकार उन्होंने चार आर्य सत्यों को बौद्ध धर्म की मूल मान्यताओं के विपरीत बताते हुए कहा है कि ये भगवान बुद्ध द्वारा प्रतिपादित नहीं हैं। यदि जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म सब दुख है, तो फिर मनुष्य की आशा नष्ट हो जाती है और व्यक्ति निराशावादी बनता है। इसलिए अपने ग्रंथ में उन्होंने इन चारों का उल्लेख नहीं किया।


बाबा साहब बौद्ध धर्म की वर्तमान संघ व्यवस्था के भी समर्थक नहीं थे। इसलिए उन्होंने दीक्षा के समय ‘संघ शरणं गच्छामि’ नहीं कहा। विश्व में बौद्ध मत में हीनयान और महायान नामक दो पंथ मुख्यतः प्रचलित हैं। बाबा साहब ने इन दोनों को यथारूप में स्वीकार नहीं किया। इस विषय में श्री माडखोलकर ने उनसे पूछा कि तब क्या आपके पंथ को भीमयान कहें ? बाबा साहब ने हंसते हुए कहा कि चाहे तो आप इसे नवयान कहें; पर मैं इसे भीमयान कहकर स्वयं को भगवान के बराबर खड़ा नहीं कर सकता। मैं तो एक छोटा आदमी हूं। मैंने संसार को नया विचार नहीं दिया। हां, भगवान द्वारा प्रवर्तित धर्मचक्र जो पिछले हजार साल से इस देश में रुका हुआ था, मैंने केवल उसे पुनः प्रवर्तित किया है।


बाबा साहब का मत था कि बौद्ध धर्म अंतरराष्ट्रीय होने के बाद भी हर देश में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उसमें कुछ प्रथाएं जुड़ गयी हैं। ऐसी प्रथाएं सारे विश्व में एक समान हों, यह आवश्यक नहीं। उदाहरणार्थ तिब्बत में किसी व्यक्ति के मरने पर लामा उसके शव के टुकड़े कर उन्हें मसलकर गोले बनाकर ऊपर फेंकते हैं, जिससे गिद्ध उन्हें खा जाएं; पर भारत में यह परम्परा चलाना संभव नहीं है। बाबा साहब ने बौद्ध धर्म में दीक्षा विधि प्रारम्भ की, जबकि इसका प्रतिपादन भी भगवान बुद्ध ने नहीं किया तथा यह बौद्धधर्मी अन्य देशों में प्रचलित नहीं है।


उनका मत था कि एक समय पूरा भारत बौद्धधर्मी हो गया था; पर जब शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता पुनर्स्थापित की, तो सारे बौद्ध फिर हिन्दू बन गये। बाबा साहब के अनुसार बौद्ध धर्म में कोई दीक्षा विधि न होने के कारण बौद्ध बने लोगों ने हिन्दू देवी-देवता, पर्व, त्यौहार आदि को मानना नहीं छोड़ा। हिन्दुओं ने भी बुद्ध को विष्णु का नौवां अवतार मान कर अपने धर्म में समाविष्ट कर लिया।


उनका कहना था यदि ऐसा न किया, तो हो सकता है कि हिन्दू मुझे विष्णु का 11वां अवतार कह कर हमारे लोगों को फिर हिन्दू बना देंगे। इसलिए उन्होंने दीक्षा विधि की कठोर प्रतिज्ञाओं में हिन्दू देवी-देवताओं को न मानने को प्रमुखता से समाविष्ट किया। वे बौद्ध विद्वान, प्रवचनकार और शास्त्रार्थ करने वाले तैयार करना चाहते थे; पर समयाभाव के कारण यह संभव नहीं हो पाया।


यहां यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बाबा साहब के इस कार्य से देश और हिन्दू धर्म को क्या लाभ हुआ ? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि बौद्ध मत भारत की मिट्टी से उपजा होने के कारण बौद्ध लोगों की निष्ठा कभी देश से बाहर नहीं हो सकती, जबकि मुस्लिम और ईसाई मजहब के साथ ऐसा नहीं है। इसलिए बाबा साहब का देश और हिन्दू समाज पर बहुत बड़ा उपकार है। उन्होंने समाज के निर्धन, निर्बल और वंचित वर्ग के लिए एक ‘सेफ्टी वाल्व’ बना दिया, इसके न होने पर उनमें से अनेक लोग धन, शिक्षा या नौकरी आदि के लालच में मुस्लिम या ईसाई बन सकते थे।


इस मत परिवर्तन से हिन्दू समाज के कई बड़े नेताओं ने अपने व्यवहार में परिवर्तन किया। बाबासाहब द्वारा धर्मान्तरण की घोषणा के बाद मैसूर शासन ने राजाज्ञा द्वारा अस्पृश्यों को दशहरा दरबार में आने की अनुमति दी। त्रावणकोर शासन ने भी अपने अधिकार के 30,000 मंदिरों को सबके लिए खोल दिया। इससे हिन्दू समाजोत्थान का एक नया पर्व प्रारम्भ हुआ।


बाबा साहब के इस क्रांतिकारी कदम का आगे आने वाले समय पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इसलिए उनके एक प्रमुख जीवनीकार धनंजय कीर ने कहा है कि हिन्दू समाज का पहला पुनर्जीवन उपनिषदों ने, दूसरा भगवान बुद्ध ने, तीसरा रामानुज, चक्रधर, कबीर, रामानंद, नानक, चैतन्य, ज्ञानदेव जैसे संतों ने, चौथा राजा राममोहन राय, महात्मा फुले, दयानंद सरस्वती, न्यायमूर्ति रानाडे, विवेकानंद, सावरकर, गांधी आदि ने किया। इसी कड़ी में वे पांचवे पुनर्जीवन और पुनर्गठन का श्रेय डा0 अम्बेडकर को देते हैं। उनके इस मत से असहमत नहीं हुआ जा सकता।

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

दिशा शूल


कल मैं दफ्तर से आकर बैठा ही था कि शर्मा मैडम का फोन आ गया। उनकी आवाज से लग रहा था कि वे किसी संकट में हैं। पूछने पर पता लगा कि संकट में वे नहीं, उनके पति हैं।


शर्मा जी मेेरे पुराने मित्र हैं। वे संकट में हों, तो मेरा घर में बैठे रहना उचित नहीं था; पर दिन भर फाइलों में घुसे रहने के कारण मेरे सिर में दर्द हो रहा था। मैंने जल्दी से चाय पी और उनके घर जा पहुंचा। वहां पता लगा कि शर्मा जी अस्पताल में हैं। कारण पूछने पर यह कहानी पता लगी।


शर्मा जी यों तो पढ़े-लिखे हैं; पर फिर भी न जाने क्यों वे शगुन, अपशगुन, टोने-टोटके और दिशा शूल आदि पर बहुत विश्वास करते हैं। अखबारों में छपने वाले ज्योतिष के कॉलम को वे बहुत ध्यान से पढ़ते हैं। प्रायः कागज-कलम लेकर उसमें से कुछ बातें लिख भी लेते हैं। दूरदर्शन के कई चैनलों पर आने वाले ‘आज का दिन’ और ‘कल का भविष्य’ जैसे कार्यक्रमों को भी वे बड़े गौर से देखते हैं। चौराहे पर पीपल के नीचे बैठने वाले पंडित तोताराम ज्योतिषाचार्य के पास भी उन्हें प्रायः देखा जाता है। कभी-कभी वे गूगल बाबा की शरण में भी चले जाते हैं।


वैसे इन भविष्यवाणियों का सिर-पैर मेरी समझ में नहीं आता। एक अखबार धन के लाभ की बात कहता है, तो दूसरा हानि की। एक लिखता है कि मित्रों से सुख मिलेगा, तो दूसरा उनसे सावधान रहने को कहता है। मैंने शर्मा जी को कई बार समझाया कि ज्योतिष के नाम पर दुकान खोले हुए अधकचरे लोगों ने इस विज्ञान को मजाक बना दिया है। अतः इनकी बातों में न आयें; पर शर्मा जी अपना विश्वास तोड़ने को तैयार नहीं थे। इनके अनुसार कई बार वे बने-बनाये कार्यक्रम भी बदल देते थे। इस आदत से मित्र ही नहीं, उनकी पत्नी और बच्चे भी परेशान थे।


आज दोपहर में उन्हें अपने एक मित्र की दुर्घटना के बारे में पता लगा। एक संवेदनशील प्राणी होने के नाते उन्होंने साइकिल उठाई और अस्पताल की ओर चल दिये; पर तभी उन्हें ‘आज का दिन’ वाले कागज का ध्यान आया। उसमें उन्हें दक्षिण दिशा में न जाने को कहा गया था; पर वह अस्पताल तो उनके घर के दक्षिण में ही था। इससे बचने के लिए शर्मा जी चौराहे से उत्तर वाली सड़क पर चल दिये। इस रास्ते से यद्यपि दो कि.मी फालतू चक्कर लगाना पड़ता था; पर दिशा शूल वाली सड़क को तो छोड़ना ही था।


पर उत्तर वाली सड़क पर दो कदम चलते ही एक बिल्ली रास्ता काट गयी। शर्मा जी की दृष्टि में यह बड़ा भारी अपशगुन था। वे लौटे और पश्चिम वाली सड़क पर चल दिये; पर वहां एक घड़ा टूटा हुआ पड़ा था। पास की गली से निकलना चाहा, तो किसी ने छींक दिया। शर्मा जी बड़े असमंजस में फंस गये। दक्षिण में दिशा शूल, उत्तर और पश्चिम में अपशगुन, और पूर्व में तो उनका अपना घर ही था।


शर्मा जी वापस चौराहे पर आकर आकाश की ओर देखने लगे। मानो भगवान से पूछ रहे हों कि अब क्या करूं ? सूरज की गर्मी, उच्च रक्तचाप और मन के संशय में वे ऐसे घिरे कि चक्कर खाकर साइकिल समेत नीचे गिर पड़े। कपड़े तो फटे ही, कई जगह चोट भी आ गई। यहां तक कि चश्मा भी चूर-चूर हो गया।


मोहल्ले के सब लोग उन्हें जानते ही थे। उन्हें हिलाडुला कर देखा, तो हाथ की हड्डी टूटने के स्पष्ट संकेत थे। वर्मा जी तत्काल अपनी कार ले आये। सबने मिलकर उन्हें अस्पताल के उसी वार्ड में पहुंचा दिया, जहां उनका मित्र भर्ती था।


इस प्रकार उनकी मित्र से भेंट तो हुई; पर विपरीत परिस्थितियों में। अगले दिन उनके हाथ का ऑपरेशन हो गया। ईश्वर की कृपा से सब ठीकठाक रहा। पैसे तो खर्च हुए; पर हड्डी ठीक से जुड़ गयी। कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद डॉक्टर ने घर जाने की अनुमति दे दी।


मैंने शर्मा जी से पूछा, किस रास्ते से चलें; आज दिशा शूल किस दिशा में है ?


शर्मा जी ने शर्म से आंखें झुका लीं।