गुरुवार, 12 जनवरी 2012

परिवर्तन का संदेश देती मकर संक्राति



भारत एक उत्सवप्रिय देश है। शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब किसी पंथ, सम्प्रदाय या क्षेत्र में उत्सव न हो। उत्सव न हों, तो जीने की इच्छा-आकांक्षा ही समाप्त हो जाये। अपने चारों ओर बिखरे संकटों, अव्यवस्थाओं और निराशाओं के बीच उत्सव हमें हंसाकर जीवन में फुलझड़ियां छोड़ देता है। ऐसा ही एक पर्व है मकर संक्रांति, जो केवल उल्लास ही नहीं, परिवर्तन का संदेश भी देता है।


क्रांति और संक्रांति


क्रांति की चर्चा समाज में बहुत होती है। युवक से लेकर वृद्ध तक, पुरुष से लेकर महिला तक, सब क्रांति करने को तत्पर दिखायी देते हैं; पर बिना इनका सही अर्थ समझे वे भ्रांति में फंस जाते हैं। क्रांति का अर्थ है परिवर्तन। जब किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के जीवन में कोई मूलभूत परिवर्तन होता है, तो उसे क्रांति कहते हैं। अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी कहलाते थे। जयप्रकाश नारायण ने 1974-75 में राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन के लिए जो आंदोलन चलाया था, उसका उद्देश्य वे ‘समग्र क्रांति’ ही बताते थे।


पर जब यही परिवर्तन किसी सार्थक दिशा में हो, तो उसे संक्रांति कहा जाता है। किसी ने जुए या शराब की आदत पकड़ ली और इस चक्कर में अपना घर-परिवार बरबाद कर डाला, तो यह भी क्रांति ही हुई; पर यदि उसने इन्हें छोड़ दिया, तो यह संक्रांति हुई। इसीलिए भारतीय मनीषा ने क्रांति के बदले संक्रांति की कल्पना की है।


भौगोलिक मान्यताएं


यों तो भारत में अनेकों संक्रांति पर्व आते हैं। जब भी पक्ष, राशि, अयन या ऋतु आदि बदलती हैं, तब वह संक्रांति ही है; पर सूर्यदेव के मकर राशि में प्रवेश करने वाली संक्रांति का विशेष महत्व है। भारत में कालगणना मुख्यतः चन्द्रमा की गति के आधार पर होती है; पर सूर्य का महत्व भी कम नहीं है। जबकि अंग्रेजी कालगणना का आधार सूर्य ही है। मकर संक्रांति सूर्याेपासना का पर्व है। इसलिए इसकी अंग्रेजी तिथि भी प्रायः 14 जनवरी ही रहती है। वैसे प्रति 50 वर्ष में एक दिन का अंतर इसमें भी आ जाता है। 12 जनवरी, 1863 को विवेकानंद के जन्म के समय मकर संक्रांति ही थी।


इस दिन से सूर्य का प्रकाश तीव्र एवं दिन बड़े होने लगते हैं। यद्यपि शीत का प्रकोप इसके बाद भी बना रहता है। ‘धन के पन्द्रह मकर पचीस, चिल्ला जाड़ा दिन चालीस’ वाली कहावत इसी ओर संकेत करती है। मकर संक्रांति से 15 दिन पूर्व और 25 दिन बाद तक ‘चिल्ला जाड़ा’ माना जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार ईसा का जन्म भी इसी दिन हुआ था; पर जब पोप ग्रेगरी ने अंग्रेजी कैलेंडर बनाया, तो इसे बीस दिन पीछे ले जाकर 25 दिसम्बर को घोषित कर दिया और फिर उसी को ‘बड़ा दिन’ कहने लगे।


ऐतिहासिक प्रसंग


मकर संक्रांति के साथ कुछ ऐतिहासिक घटनाएं जुड़ी हैं। पहली घटना महाभारत युद्ध से संबंधित है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। वे दक्षिणायण के बदले उत्तरायण में शरीर छोड़ना चाहते थे। मकर संक्रांति पर जब सूर्य मकर राशि में आकर उत्तरायण हुआ, तब उन्होंने देहत्याग किया। इतने दिन तक वे गंगा तट पर शरशैया पर लेटे रहे, यह प्रसंग सर्वविदित ही है।


जब श्री गुरुगोविंद सिंह जी के प्रायः सभी साथियों ने हताश होकर उन्हें छोड़ दिया था, तब माईभागो नामक एक वीर महिला की प्रेरणा से उनमें से 40 ने महासिंह नामक सरदार के नेतृत्व में फिर उनके साथ चलने का संकल्प लिया। जब मुगल सेना ने अकेले गुरुजी को घेर लिया था, तब उस पर हमलाकर इन वीरों ने ही गुरुजी की प्राणरक्षा की थी। इस युद्ध में माईभागो सहित उन सबको वीरगति प्राप्त हुई। 1705 ई0 की मकर संक्रांति को ‘खिदराना के ढाब’ नामक स्थान पर हुए उस संग्राम का साक्षी वह तालाब आज भी ‘मुक्तसर’ कहलाता है। 1761 में इसी दिन पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा सेना की पराजय से भारत में हिन्दू राज्य का स्वप्न टूट गया।


भारत में अनेक पर्व क्षेत्र विशेष में मनाये जाते हैं; पर मकर संक्रांति पूरे देश में लोकप्रिय है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल आदि में इसे लोहड़ी; दक्षिण में पोंगल; कर्नाटक में सुग्गी, पूर्वोत्तर भारत में बिहू; महाराष्ट्र में तिलगुल; उड़ीसा में मकर चौला; बंगाल में पौष संक्रांति; गुजरात व उत्तराखंड में उत्तरायणी तथा बिहार, बुंदेलखंड और म0प्र0 में सकरात कहते हैं।


इस दिन खिचड़ी और तिल गुड़ से बनी सामग्री खायी जाती है। इनमें प्रयुक्त सामग्री उष्णता देने वाली होने के कारण इसका शीत ऋतु में विशेष महत्व भी है। खिचड़ी में प्रयुक्त दाल, चावल, घी तथा गजक या रेवड़ी में पड़े तिल, गुड़ आदि आपस में इतने मिल जाते हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। इस नाते ये समरसता के भी संदेशवाहक हैं। गोरखपुर के गोरक्षनाथ मंदिर में तो श्रद्धालुजन इस दिन टनों कच्ची खिचड़ी भेंट करते हैं। बाद में वहां प्रसाद रूप में भी खिचड़ी ही वितरित की जाती है।


कैसा परिवर्तन


आज मकर संक्रांति का महत्व भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से भी अधिक सामाजिक क्षेत्र में है। गत एक शताब्दी में भारतीय समाज में इतने दुर्गुण प्रविष्ट हो गये हैं कि उनसे हमारे अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगने लगा है।


हिन्दू समाज में सबसे बड़ा रोग जातिभेद है। जातिप्रथा के पक्षधर कुछ भी तर्क दें; उसे किसी समय समाज संरक्षण के लिए बनायी गयी व्यवस्था या वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप कहें; गीता के उद्धरण देकर उसे जन्म के बदले कर्म के आधार पर बनी हुई बतायें; पर जमीनी सच तो यही है कि आज भी जाति की मान्यता जन्म के आधार पर ही है। बड़ी संख्या में लोग इसी आधार पर किसी को ऊंचा या नीचा मानते हैं। कुछ मूढ़ तो जाति की व्याख्या, जो जाती नहीं, यह कहकर करते हैं। हिन्दू समाज से मुसलमान या ईसाई बनने के लिए जहां निर्धनता, अज्ञानता, अंधविश्वास और विधर्मी षड्यन्त्र दोषी हैं; वहां जन्म के कारण किया जाने वाला भेदभाव इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


अत्यधिक दिखावा


हिन्दू समाज को जिस एक अन्य दुर्गुण ने गत 15-20 साल में तेजी से घेरा है, वह है दिखावा। अपने परिवार में होने वाले विवाह, जन्मोत्सव, वर्षगांठ आदि ने संस्कारपूर्ण हिन्दू पद्धति को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। इनमें अब अंग्रेजियत, काली कमाई, बेहूदे फैशन, आभूषण और राजनीतिक शक्ति का नग्न प्रदर्शन होता है। गरीबों के हमदर्द बनने वाले राजनेताओं के यहां जब हजारों लोग दावत खाते हैं, तो उसके बजट की कल्पना करना ही भयावह लगता है। राजनीति और सामाजिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोग इन आयोजनों में जाकर इस पाखंड को महिमामंडित करते हैं। यदि वे इनका बहिष्कार करें, तो समाज में अच्छा संदेश जा सकता है।


पर्यावरण का संकट


केवल भारत में ही नहीं, तो सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण संरक्षण के प्रति बहुत चिन्ता की जा रही है। एक ओर पेड़ों का विनाश, तो दूसरी ओर वाहनों, विद्युत उपकरणों, दूरदर्शन तथा ध्वनिवर्धक का अत्यधिक प्रयोग इसके प्रमुख कारण हैं। वातावरण में बढ़ रही विषैली गैसों के कारण जहां ओजोन की परत में छिद्र होने के समाचार आ रहे हैं, वहां गरमी बढ़ने और हिमनदों के पिघलने से जल का संकट भी मुंहबाये खड़ा है। जीवन में हर स्तर पर प्रकृति से बढ़ती दूरी इस रोग को कोढ़ में खाज की तरह बढ़ा रही है। इसके कारण छोटे बच्चों को भी उच्च रक्तदाब और मधुमेह जैसे रोग होने लगे हैं।


धार्मिक लोग इसे रोक सकते हैं; पर दुर्भाग्य से धार्मिक स्थल और जुलूस ही शोर के सबसे बड़े अखाड़े बन गये हैं। यदि पर्यावरण की उपेक्षा से प्रकृति का चक्र बदल गया, तो मानव जाति को लेने के देने पड़ जाएंगे। इस संदर्भ में यह कहना भी गलत नहीं है कि जहां ग्रामीण और अल्पशिक्षित लोग पर्यावरण संरक्षण के प्रति परम्परा से ही सजग हैं, वहां नगरीय और स्वयं को शिक्षित कहने वाले इसकी सर्वाधिक उपेक्षा करते हैं। बिजली, पानी और पेट्रोल का अपव्यय कर कुछ लोग स्वयं को शेष लोगों से बड़ा मान लेते हैं; पर सच में वे केवल बड़े मूर्ख हैं, और कुछ नहीं।


इसी प्रकार नारी समाज के प्रति भी दृष्टि बदलनी होगी। किसी समय मुस्लिम आक्रमणकारियों के भय से उन्हें घर में रहने की सलाह दी गयी होगी; पर अब समय बदला है। अब उन्हें भी हर स्तर पर शिक्षित करने की आवश्यकता है। बाल विवाह, पर्दा प्रथा, परिवार नियोजन, अन्तरजातीय एवं विधवा विवाह, बलिप्रथा, मृतक भोज आदि के प्रति भी सार्थक एवं समयानुकूल दृष्टिकोण अपनाना होगा।


मानसिकता में परिवर्तन


सच तो यह है कि ऐसी सब सामाजिक बीमारियों का निदान कानून से नहीं, अपितु मानसिकता में परिवर्तन से होगा। इसके लिए समाज के प्रभावी लोगों को आगे आकर अपने आचरण से समाज के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत करना होगा। कहावत है ‘महाजनो येन गतः, स पन्था’ः। अर्थात महान लोग जिस मार्ग पर चलते हैं, शेष समाज भी उसी का अनुसरण करता है।


मकर संक्रांति का पर्व हमें अपने मानस में व्यापक परिवर्तन कर सही दिशा में जाने की प्रेेेरणा देता है। अपने मौहल्ले, गांव या बस्ती के हर घर से खिचड़ी एकत्र कर किसी मंदिर या सार्वजनिक स्थल पर बड़ा खिचड़ी भोज करें। हर जाति, वर्ग, आयु तथा हर प्रकार का कार्य करने वाले पुरुष, महिलाएं, बच्चे, बड़े वहां आयें। सब मिलकर बनायें, बांटे और खायें। सामाजिक एवं राष्ट्रीय समरसता के पर्व मकर संक्रांति का यही पावन संदेश है।







रविवार, 8 जनवरी 2012

लोकपाल विधेयक : पजामे से चड्ढी तक



पजामा एक वचन है या बहुवचन, स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग, उर्दू का शब्द है या हिन्दी का, इसका प्रचलन भारत में कब, कहां, कैसे और किसने किया; इस विषय की चर्चा फिर कभी करेंगे। आज तो शर्मा जी के पजामे की चर्चा करना ही ठीक रहेगा।


बात उस समय की है, जब शर्मा जी की नई-नई शादी हुई थी। हर आदमी की तरह उन्होंने भी शादी के समय और शादी के बाद पहनने के लिए बहुत से नये कपड़े बनवाये। रात में सोने जाते समय उन्होंने देखा कि उनका नया पजामा चार-छह इंच लम्बा दिख रहा था। खैर, तब तो काम चल गया; पर अगले दिन उन्होंने अपनी नयी नवेली पत्नी से उसे छह इंच छोटा कर देने को कहा।


पत्नी ने घूंघट में से ही मुंह बिचका कर कहा - अभी तो मेरे हाथ की मेंहदी भी नहीं छूटी है। कुछ दिन बाद कर दूंगी।


शर्मा जी को गुस्सा तो बहुत आया; पर उन्हें कुछ अनुभवी लोगों की बात ध्यान आ गयी कि पत्नी से पहले ही दिन झगड़ा करना भावी जीवन के लिए ठीक नहीं है। अतः वे अपना सा मुंह लेकर रह गये।


दोपहर में उन्होंने मां से पजामे को छह इंच छोटा करने को कहा। मां डपट कर बोलीं - देख नहीं रहे, कितना काम सिर पर पड़ा है। मेहमान वापस जा रहे हैं। विदाई में किसे क्या देना है, यह सब मुझे ही देखना है। जा, अपनी भाभी से करा ले।


बेचारे शर्मा जी पजामा लेकर भाभी के पास गये। भाभी उन्हें टरकाते हुए बोली - मैंने बहुत दिन तुम्हारी सेवा कर ली है। अब तुम्हारी अपनी दुल्हन आ गयी है। उससे करा लो।


शर्मा जी की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें ? छोटी बहिन से कहा, तो उसने भी मुंह बना दिया - सेहरे के समय मैंने 501 रु0 मांगे थे, तो तुमने 101 रु0 ही देकर मुझे चुप करा दिया था। अब मुझसे अपने किसी काम के लिए न कहना।


झक मार कर शर्मा जी मोहल्ले के दर्जी के पास गये और उसे बीस रु0 देकर पजामा ठीक करा लिया।


अब कहानी का दूसरा अध्याय शुरू होता है। कुछ दिन बाद शर्मा जी को अपने काम के सिलसिले में एक सप्ताह के लिए बाहर जाना पड़ा। तब तक बहिन का गुस्सा कम हो चुका था। उसने सोचा कि 101 रु0 दिये तो क्या हुआ, आखिर हैं तो मेरे भैया ही। सो उसने चुपचाप पजामा उठाया और छह इंच छोटा कर दिया।


इसके बाद भाभी को ध्यान आया कि देवर जी ने कुछ काम कहा था। सो उन्होंने भी सिलाई मशीन निकालकर उसे ठीक कर दिया।


दो दिन बाद मां को फुरसत हुई। उन्होंने पजामे को देखा, तो आश्चर्य हुआ कि यह तो ठीक लगता है। फिर बेटे ने उसे छोटा करने को क्यों कहा था ? लेकिन कहा तो था ही। सो मां ने भी दिमाग पर अधिक जोर दिये बिना उसे छह इंच काट दिया।


शर्मा जी की वापसी वाले दिन पत्नी ने सोचा कि पतिदेव द्वारा बताये गये पहले काम को मना कर उसने ठीक नहीं किया। अतः उसने पजामे को छोटा तो किया ही, कहीं से एक पुराना रंगीन कपड़ा लेकर नीचे पांयचे पर किनारी भी बना दी।


रात को शर्मा जी ने पजामा पहना, तो वह घुटने छू रहा था। उन्होंने अपना माथा पीट लिया। वह इतना छोटा नहीं था कि उसे चड्ढी की तरह पहना जा सके, और पजामा वह अब रहा नहीं था।


पाठक मित्रो, लोकपाल के नाम पर जो तमाशा संसद और सड़क पर हुआ, वह कुछ-कुछ ऐसा ही है। भ्रष्टाचार के कलंक से देश को मुक्त कराने के लिए अन्ना हजारे और उनके साथियों ने लोकपाल का जो प्रारूप बना कर दिया, उसमें धोखेबाज सरकार के साथ-साथ सपा, बसपा, भाजपा, जनता दल, लालू यादव और न जाने किस-किसने इतनी काट-छांट और जोड़-तोड़ कर दी है कि वह लोकपाल की बजाय सचमुच जोकपाल नजर आने लगा है।


शर्मा जी ने तो समझदारी दिखाते हुए अपने बचे-खुचे पजामे को थोड़ा और कटवा कर चड्ढी बनवा ली; पर लोकपाल के साथ हो रहे मजाक को देखकर लगता है कि जनता को केवल पजामे का नाड़ा ही मिलेगा, और कुछ नहीं।
आधार से निराधार तक



हर व्यक्ति के जीवन में छात्र जीवन का बड़ा महत्व है। इस समय एक दौर ऐसा भी आता है, जब लोग प्रायः कविहृदय हो जाते हैं। डायरी में गुलाब का फूल रखने से लेकर रोमांटिक शेर लिखना तक उन दिनों आम बात होती है।


कविता और शेरो शायरी का रोग बढ़ जाए, तो युवक और युवतियां कविता लिखने लगते हैं। भारत में जितने भी कवि हैं, वे मानते हैं कि उनके माता-पिता ने उनका नाम ठीक नहीं रखा। अतः वे सबसे पहले इस गलती को सुधार कर कोई उपनाम रख लेते हैं। फिर वे चाहते हैं कि लोग उन्हें इसी नाम से पुकारें। घायल, पागल, हुल्लड़, कुल्हड़, मनहूस, फंटूश आदि ऐसे ही उपनाम हैं।


शर्मा जी के जीवन में जब यह दौर आया, तो उन्होंने अपना नाम ‘निराधार’ रख लिया। वैसे वे अच्छे खाते-पीते घर के थे। पिताजी उनके लिए गांव में एक मकान और खेत के साथ अच्छा बैंक बैलैंस भी छोड़ गये थे; पर माता-पिता की छत्रछाया सिर पर न होने के कारण शर्मा जी खुद को ‘निराधार’ ही समझते रहे।


छात्र जीवन समाप्त हुआ तो वे नौकरी करने लगे; पर यह नौकरी अस्थायी थी। शर्मा जी की निराधरता के लिए यह तर्क पर्याप्त था। इस चक्कर में कोई लड़की वाला भी उनके दरवाजे नहीं आता था। जैसे-तैसे नौकरी पक्की हुई और कुछ समय बाद शर्मा जी के घर में शहनाई भी बज गयी। मेरे जैसे उनके फक्कड़ मित्रों को कभी-कभी शर्मानी मैडम के हाथ की गरम चाय मिलने लगी।


पर शर्मा जी ने अपना नाम नहीं बदला। वे कहते थे कि किराये के मकान का क्या भरोसा; कब मकान मालिक नोटिस दे दे। इसलिए वे अब भी ‘निराधार’ ही रहे।


नौकरी में पदोन्नति के साथ-साथ शर्मा जी के घर की जनसंख्या दो से बढ़कर पांच हो गयी। उन्होंने शहर में एक मकान बनाकर उसका नाम भी ‘निराधार’ ही रख लिया। पूरा परिवार एक साथ कहीं आ-जा सके, इसके लिए एक कार भी खरीद ली। अब हमें लग रहा था कि वे अपना नाम बदल लेंगे; पर दो साल पहले अचानक शर्मानी मैडम उन्हें सदा के लिए छोड़ गयीं। इस दुर्घटना से शर्मा जी फिर ‘निराधार’ हो गये।


फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अब तक बच्चे भी बड़े हो गये थे। उन्होंने बेटी और फिर बड़े बेटे का विवाह कर दिया। बहू ने कुछ समय तो उनकी सेवा की, फिर अचानक एक दिन बेटा और बहू एक दूसरा मकान लेकर वहां रहने चले गये।


शर्मा जी का छोटा बेटा विदेश में पढ़ता था। उसने सलाह दी कि वे मकान बेचकर किसी वृद्धाश्रम में चले जाएं, क्योंकि उसका इरादा अब विदेश में ही घर बसाने का है। शर्मा जी गहरे असमंजस में फंस गये और इसी बीच उनके अवकाश प्राप्ति की तारीख भी आ गयी।


कहते हैं कि नाम के अनुरूप गुण-अवगुण जीवन में आ ही जाते हैं। शर्मा जी को लगा कि हो न हो, यह ‘निराधार’ उपनाम उनके जी का जंजाल बना है; पर इससे पीछा छुड़ाना भी समस्या थी।


जब सरकार ने देश के सभी वैध-अवैध नागरिकों की स्थायी पहचान के लिए ‘आधार’ योजना प्रारम्भ की, तो शर्मा जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें लगा कि जीवन के इस तीसरेपन में उन्हें कम से कम एक पक्का आधार मिल जाएगा, जिसके सहारे वे शेष जीवन काट सकेंगे।


इसलिए जिस दिन उन्हें मोहल्ले में आधार कार्ड बनाने वालों के शिविर की सूचना मिली, उन्होंने सब पड़ोसियों से इसे शीघ्र बनवाने को कहा। अवकाश प्राप्ति के बाद वे शरीर सज्जा के प्रति उदासीन हो गये थे; पर आज उन्होंने ठीक से दाढ़ी खुरची। सुगंधित साबुन से नहाये। बहुत दिन बाद शर्मानी मैडम की पसंद से सिलवाया हुआ सूट पहना और सबसे पहले लाइन में जाकर खड़े हो गये।


पते और पहचान की पुष्टि के लिए उनके पास राशन कार्ड, बैंक की पासबुक, लाइसेंस, वोटर कार्ड आदि कई प्रमाण थे। 15 मिनट में फोटो से लेकर उंगली, अंगूठे और आखों के निशान जैसी सब कार्यवाही पूरी हो गयी। एक महीने बाद डाक से उन्हें एक कार्ड मिला, जिस पर उनकी ‘आधार’ संख्या लिखी थी।


पर पिछले दिनों आधार संख्या संबंधी संसदीय समिति ने नंदन नीलकेणी के नेतृत्व में बनी इस पूरी योजना को ही निरस्त करने की सिफारिश कर दी। गृहमंत्री चिदम्बरम् भी इसकी निरर्थकता पर संसद में बोल चुके थे। इससे इस योजना पर संकट के बादल छा गये।


शर्मा जी समझ नहीं पा रहे थे कि इस आधार कार्ड को ओढ़ें या बिछाएं ? जैसे-तैसे उन्होंने 15 अंक वाला यह नंबर याद किया था; पर अब सरकार इसे व्यर्थ की कवायद बता रही है। इस पर अरबों रुपया खर्च हो चुका है। जनता द्वारा अपने खून-पसीने की कमाई में से दिये गये टैक्स को मिट्टी होते देख उनका पारा चढ़ गया।


काश, कोई शर्मा जी को बताए कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे जिस व्यक्ति का ही कोई निजी आधार नहीं है। जो किसी और की कृपा से, किसी और के लिए गद्दी घेर कर बैठा है। जो विदेशियों की खुशी के लिए देश के व्यापारियों के मुंह से रोटी छीनने को तैयार है, जो हिन्दुओं को सदा के लिए दो नंबर का नागरिक बनाने के लिए कानून लाने की बात कर रहा हो, उसके हाथ से कोई अच्छा काम कैसे हो सकता है ?


शर्मा जी ने गुस्से में आकर आधार कार्ड को आग लगा दी और एक बार फिर ‘निराधार’ हो गये।
सदाखुश बाबू



शर्मा जी में यों तो कई विशेषताएं हैं; पर सबसे बड़ी विशेषता है कि वे स्वयं भी खुश रहते हैं और बाकी लोगों को भी खुश रखते हैं। अतः लोग उन्हें सदाखुश बाबू भी कहते हैं।


जिस दिन विश्व की जनसंख्या सात अरब हुई, उससे अगले दिन मिले, तो खुशी मानो गिलास से बाहर छलक रही थी। देखते ही गले से लिपट गये और मेरे बीमार दिल को इतनी जोर से दबाया कि वह राम-राम से ‘राम-नाम सत्य है’ की तैयारी करने लगा। इसलिए जैसे-तैसे अलग होकर मैंने इस प्रसन्नता का कारण पूछा।


उन्होंने मेरे सामने एक अखबार में प्रकाशित जनसंख्या विश्लेषण रख दिया। उसमें कहा गया था कि जनसंख्या वृद्धि की गति पूरे विश्व में क्रमशः घट रही है। पांच से छह अरब वह 11 साल में हुई, तो छह से सात अरब तक पहुंचने में 13 साल लग गये। अखबार के अनुसार अब सात से आठ होने में 15 साल, आठ से नौ होने में 18 साल लगेंगे और फिर इसके बाद जनसंख्या स्थिर हो जाएगी।


मैं समझ नहीं पाया कि वे कहना क्या चाहते हैं ? अब उन्होंने उस विश्लेषण का दूसरा भाग मेरे सामने रखा। उसके अनुसार 2050 ई0 के बाद जनसंख्या घटने लगेगी और बाइसवीं सदी प्रारम्भ होने तक वह फिर उसी तीन अरब के आंकड़े पर पहुंच जाएगी, जहां बीसवीं सदी के प्रारम्भ में थी।


मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेरे चेहरे पर बने प्रश्नचिõ को देखकर वे हंसे।


- ऐसे क्या मूर्खों की तरह देख रहे हो ? जनसंख्या विशेषज्ञ कहते हैं कि सम्पन्न और शिक्षित लोग कम बच्चे पैदा करते हैं, जबकि गरीब और अनपढ़ अधिक। इस हिसाब से देखें तो इस समय दुनिया में सबसे धनी देश अमरीका है। उसकी अपनी असली जनसंख्या तो स्थिर हो गयी है; पर उस कमी को दूसरे देशों से जाने वाले पूरा कर रहे हैं। वहां जाने वालों में भारतवासियों की संख्या भी खूब है।


- अच्छा फिर ?


- दुनिया की जनसंख्या वृद्धि में भारत जैसे विकासशील देश खूब योगदान कर रहे हैं। हमसे आगे अशिक्षित और अविकसित अरब और अफ्रीकी देश हैं। चीन ने भी जनसंख्या की बढ़त को काफी हद तक रोक लिया है।


- तो.. ?


- तुम भी बुद्धि से पैदल हो वर्मा। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो एक दिन अमरीका पर हमारा कब्जा होगा। मैं तो उस दिन की कल्पना ही से ही खुश हो रहा हूं। मेरी निगाह तो व्हाइट हाउस पर है। मैं उसे ही अपना निवास बनाऊंगा।


- शर्मा जी, सपने देखने में कुछ खर्च नहीं होता; पर इस बात को लिख लो कि ऐसा नहीं होने वाला है। आपके भाग्य में व्हाइट हाउस में रहना तो दूर, उसके पास जाना भी नहीं है।


- न हो; पर भारत में हो रहे जनसंख्या परिवर्तन को भी तो देखो।


- दिखाओ....।


- यहां का हाल भी सारी दुनिया जैसा ही है। अर्थात जनसंख्या वृद्धि की दर में क्रमशः घट रही है। कुछ समय बाद यहां की जनसंख्या भी कम होने लगेगी। मकान तो होंगे; पर उनमें कोई रहेगा नहीं। तब मैं राष्ट्रपति भवन में जाकर रहने लगूंगा।


- लेकिन शर्मा जी, भारत में किसकी संख्या घट रही है और किसकी नहीं, इस पर भी तो ध्यान दो। यदि यही हाल रहा, तो राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास में हम और आप नहीं, वे लोग रहेंगे, जो पाकिस्तान के मैच जीतने पर खुशी मनाते हैं।


- मैं तो ऐसा नहीं समझता।


- आप भले ही न समझें; पर अगले 60-70 साल में यही होना है।


- चलो छोड़ो, हमें इससे क्या लेना। तब तक किसने जीना है। इस बारे में सोच-सोचकर हम अपनी खुशी कम क्यों करें ?


काश, कोई सदाखुश बाबू की आंख में उंगली डालकर दिखाए कि जनसंख्या की संभावित कमी के जिन आंकड़ों से वे खुश हो रहे हैं, उसके पीछे कितने भयावह परिणाम छिपे हैं। कबूतर यदि बिल्ली को देखकर आंख बंद कर ले, तो खतरा नहीं टल जाता।


ऐसे सदाखुश बाबू हर जगह मिलते हैं। हो सकता है वे आपके मोहल्ले में भी हों। यह खुशी उनकी भावी पीढ़ियों के लिए दुख का कारण न बन जाए, इसके लिए उन्हें जगाना होगा। वे सोते न रह जाएं, यह देखना हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है।