शनिवार, 21 जनवरी 2012

टीम अन्ना का संगठन शास्त्र


अन्ना इन दिनों बीमार हैं। यद्यपि उनका उत्साह कम नहीं हुआ; पर क्या करें, शरीर साथ नहीं दे रहा। उनके साथियों को भी समझ नहीं आ रहा कि इस सरदी के मौसम में अब आगे क्या रास्ता पकड़ें कि आंदोलन में फिर से गरमी आ सके।


अन्ना अपने गांव रालेगढ़ सिद्धि के शांत वातावरण में रहने के आदी हैं, तो उनके साथी दिल्ली की चकाचौंध में। अन्ना को मोबाइल, इंटरनेट, फेसबुक और ट्विटर की बात समझ नहीं आती, तो उनके साथी इसके बिना एक दिन भी नहीं रह सकते। फिर भी भ्रष्टाचार विरोध और जन लोकपाल की गोंद ने उन्हें जोड़ रखा था। यह देखकर कांग्रेस ने सरकारी लोकपाल को बाजार में उतार दिया। यह गोंद उतनी अच्छी तो नहीं थी; पर ग्राहक तो भ्रमित हो ही गये।


अन्ना की अनुपस्थिति में दिल्ली के एक वातानुकूलित भवन में उनके नये-पुराने सब साथी सिर जोड़कर बैठे। समस्या गहरी थी और ठंड भयंकर; इसलिए चाय-कॉफी और स्नैक्स के कई दौर चले। शर्मा जी की अध्यक्षता में कई घंटे के विचार-विमर्श के बाद निष्कर्ष यह निकला कि अन्ना और मौसम, दोनों के ठीक होने की प्रतीक्षा की जाए। उसके बाद ही आंदोलन के नये दौर के बारे में सोचेंगे।


- पर तब तक लोग क्या करेंगे ?


- लोगों को अपने घर के काम नहीं हैं क्या ? पांच राज्यों में चुनाव हैं। छात्रों को परीक्षाएं देनी हैं। फिर कुछ दिन बाद शादी-ब्याह का सीजन आ जाएगा। सब उसमें व्यस्त हो जाएंगे।


- पर तब तक लोगों को कुछ संदेश तो देना ही होगा। वरना लोग कहेंगे कि अन्ना के बिना टीम ठंडी पड़ गयी।


- सच तो यही है। उनके बिना तो हम बिन दूल्हे की बारात की तरह हैं; पर फिर भी कुछ तो करना ही होगा। करें भले ही नहीं; पर कुछ कहना तो होगा ही। ये तो अच्छा है कि मीडिया वाले इस समय चुनाव में व्यस्त हैं, वरना वे हमारी बखिया उधेड़ देते।


- तो मीडिया को क्या कहें, वे बाहर हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं ?


- उन्हें कहो कि अब हम देश के हर गांव और शहर के हर वार्ड में संगठन खड़ा करेंगे। अगला आंदोलन संगठन के बल पर होगा, मीडिया, मोबाइल या इंटरनेट के बल पर नहीं।


- पर संगठन तो हमने आज तक किया नहीं। इसके विशेषज्ञ तो संघ वाले हैं।


- तो हम संघ की तरह का ही संगठन बनायेंगे।


- इसके लिए हमें संघ का कोई आदमी अपने साथ जोड़ना होेगा। इससे तो दिग्विजय सिंह का आरोप सिद्ध हो जाएगा।


- फिर.. ?


- यदि हम सब कुछ दिन संघ की शाखा में जाएं, तो हो सकता है हमें उनके काम की विधि समझ में आ जाए।


- पर उनकी शाखा तो सुबह खुले मैदानों में लगती हैं। क्या हम इतनी जल्दी उठ सकेंगे ?


- मेरे बस की बात तो नहीं है। मैं तो सुबह सात बजे से पहले बिस्तर नहीं छोड़ता। उठते ही मुझे दो कप चाय और तीन अखबार चाहिए। इसके बिना मेरा पेट जाम हो जाता है।


- वहां लोग खाकी निकर पहन कर आते हैं और व्यायाम के बाद जमीन पर ही बैठकर कुछ बातचीत करते हैं।


- अच्छा ..? हमें तो कुर्सी पर बैठने की आदत है। नीचे बैठे तो कई साल हो गये।


- तो क्या करें...?


- क्यों न वर्मा जी को यह काम दे दें। वे नौकरी से अवकाश प्राप्त हैं और उन्हें सुबह टहलने की आदत भी है।


इस बात पर सब सहमत हो गये। वर्मा जी को भी कोई आपत्ति नहीं थी। बैठक के एजेंडे में कई विषय और भी थे; पर सबकी अपनी व्यस्तताएं थीं। एक को कवि सम्मेलन में जाना था, तो दूसरे को एक सम्मान कार्यक्रम में। तीसरे ने बच्चों के साथ फिल्म का कार्यक्रम बना रखा था, तो चौथे को एक दुकान का उद्घाटन करना था। अतः अगली तारीख तय कर सभा विसर्जित कर दी गयी।


अगली बार वे मिले, तो ध्यान में आया कि वर्मा जी नहीं आये हैं। उन्हें ही तो संघ वालों से संगठन की तकनीक सीखनी थी। सब सोच रहे थे कि वे कुछ नयी बात बताएंगे; पर वे तो...।


फोन मिलाया, तो पता लगा कि वे संघ की साप्ताहिक बैठक में गये हैं। दूसरी मीटिंग में भी वे नहीं आये। उन दिनों वे शीत-शिविर में व्यस्त थे। तीसरी बार सहभोज, चौथी बार वन-विहार, पांचवी बैठक के समय सेवा बस्ती में कंबल वितरण, तो छठी बार वे पड़ोस के गांव में शाखा विस्तार के लिए गये हुए थे।


अन्ना के साथी परेशान हो गये। वर्मा जी सेवाभावी व्यक्ति थे। श्रद्धा से वे अन्ना हजारे और इस आंदोलन के साथ जुड़े थे। उन्हें जो काम दिया जाता, उसे वे पूरी निष्ठा और समर्पण भाव से करते थे; पर अब तो वे संघ वाले ही होकर रह गये।


कई दिन बाद शर्मा जी को रेलवे स्टेशन पर वर्मा जी मिल गये। हाथ में लाठी, सिर पर काली टोपी। चेहरे पर खिली चमक से वे अपनी उम्र से दस साल कम के लग रहे थे। साथ में उनका बिस्तर और एक बक्से में कुछ सामान भी था।


- वर्मा जी, आप बहुत दिन से बैठक में नहीं आये।


- जी, मैं आजकल संघ की बैठकों में व्यस्त रहता हूं।


- पर आपको तो संघ वालों से संगठन की तकनीक सीखने के लिए भेजा था।


- वही सीखने के लिए बीस दिन के संघ शिक्षा वर्ग में जा रहा हूं।


- तो आपने आज तक क्या सीखा ?


- सीखा तो कुछ अधिक नहीं; पर इतना जरूर समझ गया हूं कि संगठन का कोई शॉर्टकट नहीं होता। मोबाइल, इंटरनेट या मीडिया के बल पर चलने वाले आंदोलन से कुछ दिन शोर भले ही हो जाए; पर देश की व्यवस्था नहीं बदल सकती। इसके लिए तो युवा पीढ़ी में देशभक्ति, अनुशासन, चरित्र और टीम भावना चाहिए। वह संघ की शाखा से ही मिलती है। यहां जाति, प्रांत, भाषा और काम के आधार पर ऊंच-नीच नहीं मानी जाती। मेरी मानो, तो आप भी अपने साथियों के साथ संघ की शाखा में आयें। यहां आपको अच्छे लोग मिलेंगे, जिनके बल पर फिर आंदोलन भी ठीक से चल सकेगा।


शर्मा जी ने अपना माथा पकड़ लिया।