गुरुवार, 31 मई 2012

कच्ची धरती पर खड़े लोग


संघप्रेरित विचार मंच (Think tank) भारत नीति प्रतिष्ठान’ (India policy foundation) का मुख्यालय दिल्ली में है तथा इसका संचालन दिल्ली वि0वि0 में प्राध्यापक प्रो0 राकेश सिन्हा करते हैं। यह संस्था विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श के लिए प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों को बुलाती रहती है।

गत 14 अपै्रल, 2012 को समान्तर सिनेमा पर आयोजित एक गोष्ठी की अध्यक्षता वामपंथी लेखक मंगलेश डबराल ने की। इससे वामपंथी खेमे में हड़कंप मच गया। वे लोग मंगलेश जी पर चढ़ बैठे। डर कर उन्हें लिखित में क्षमा मांगनी पड़ी। जनसत्ता के सम्पादक श्री ओम थानवी ने 29.4.12 को अपने स्तम्भ अनन्तरमें एक-दूसरे की संस्थाओं में जाने का समर्थन करते हुए इस पर बहस आमन्त्रित की। दुर्भाग्यवश यह बहस मूल विषय से हटकर वामपंथी लेखकों द्वारा परस्पर छीछालेदर करने का मंच बन गयी।

वस्तुतः वामपंथी बुद्धिजीवियों के संघ विचार की किसी संस्था में जाने पर हंगामा स्वाभाविक है। क्योंकि ये लोग जहां खड़े हैं, वहां न विचार है और न विश्वास। यदि कुछ है, तो वह है प्रसिद्धि, नौकरी, पुरस्कार या विदेश यात्रा आदि का लालच। दूसरी ओर धरातल पक्का होने के कारण संघ वाले निःसंकोच अपने विरोधियों के कार्यक्रमों में जाते और उन्हें अपने मंचों पर बुलाते हैं। इससे उनकी विश्वसनीयता संघ में कम नहीं होती। यद्यपि उन विरोधी महोदय पर उनके ही साथी थू-थू करने लगते हैं। कुछ उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जाएगी।

चार-पांच वर्ष पूर्व डा0 प्रवीण तोगड़िया दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में एक मुस्लिम संस्था के आमन्त्रण पर उनकी सभा में गये थे। वहां वे उसी शैली में बोले, जिसके लिए वे प्रसिद्ध हैं। नवम्बर 2011 में निवर्तमान सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी अपने लखनऊ प्रवास के दौरान शिया नेता कल्बे सादिक के घर गये थे। इससे श्री सादिक पर शक की उंगलियां उठीं, सुदर्शन जी पर नहीं।

संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री इन्द्रेश कुमार जी मुस्लिम राष्ट्रीय मंचके संस्थापक व मार्गदर्शक हैं। वे प्रायः मुसलमानों के घरों में जाते, खाते और रहते भी हैं। इन्द्रेश जी को तो नहीं; पर इस संस्था से जुड़े मुसलमानों को उनके समाज में धिक्कारा जाता है। मुंबई के प्रसिद्ध लेखक व पत्रकार पद्मश्रीमुज्जफर हुसेन निष्ठावान मुसलमान हैं; पर संघ के कार्यक्रमों में जाने के कारण मुस्लिम संस्थाएं उन्हें अपने यहां नहीं बुलातीं।

जनता शासन (1977-78) में दिल्ली की जामा मस्जिद के तत्कालीन इमाम बुखारी श्री बालासाहब देवरस से मिलने दिल्ली के झंडेवाला कार्यालय में गये थे। नमाज का समय होने पर उन्होंने जाना चाहा, तो बालासाहब ने उनसे वहीं नमाज पढ़ने को कहा, जिससे कुछ और वार्ता हो सके। श्री बुखारी ने वहां नमाज पढ़ी। किसी संघ वाले ने इसके लिए बालासाहब को बुरा-भला नहीं कहा। इन्हीं दिनों जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री चंद्रशेखर की नागपुर में बालासाहब से लम्बी वार्ता हुई थी। इससे चंद्रशेखर को आलोचना सहनी पड़ी, बालासाहब को नहीं।

1978 में दिल्ली में विद्या भारती द्वारा आयोजित 25,000 बच्चों के शिविर बाल संगमके समापन समारोह में मंच पर बालासाहब के साथ उपप्रधानमंत्री जगजीवन राम भी उपस्थित हुए थे। शिविर का उद्घाटन राष्ट्रपति श्री नीलम संजीव रेड्डी ने किया था। प्रख्यात अर्थशास्त्री और किसी समय के कार्डधारी कम्युनिस्ट श्री बोकारे संघ की एक सभा में नागपुर आये थे, जिसके मंच पर श्री रज्जू भैया, सुदर्शन जी, दत्तोपंत ठेंगड़ी आदि उपस्थित थे। यह दृश्य इन आंखों ने भी देखा है। 1983 में पुणे में सेमिनरीनामक ईसाई संस्था द्वारा  भारत में ईसाइयों का स्थानविषय पर आयोजित गोष्ठी में संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्रीपति शास्त्री भी आमन्त्रित थे। उन्होंने वहां मिशनरियों द्वारा किये जा रहे धर्मान्तरण की प्रखर आलोचना की। उस भाषण को संघ वालों ने प्रकाशित भी किया।

आपातकाल में जेल में संघ वालों के साथ सब तरह के लोग थे। मेरठ जेल में हमारे साथ रह रहे मुसलमान और नक्सली कहते थे कि हम तो संघ वालों को राक्षस समझते थे; पर सबके दुख-सुख में सबसे अधिक तो आप ही शामिल होते हैं। इसीलिए आपातकाल के बाद संघ के सार्वजनिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में मुसलमान आते थे; पर बाद में राजनीतिक कारणों से यह बंद हो गया।

भाऊराव देवरस सेवा न्यास, लखनऊ के मंच पर श्री नारायण दत्त तिवारी और शिवराज पाटिल सादर बुलाये गये हैं। अन्ना हजारे को इस न्यास ने तथा बड़ा बाजार कुमार सभा, कोलकाता ने सम्मानित भी किया है। जिस भारत नीति प्रतिष्ठान के कारण यह बहस चली है, वहां अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी भी गये हैं।

सरस्वती शिशु मंदिरों में हजारों मुसलमान बच्चे पढ़ते हैं। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र आदि के वनक्षेत्रों में संघ, विश्व हिन्दू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम आदि के हजारों विद्यालय चल रहे हैं। इनके अध्यापकों का नक्सली भी सम्मान करते हैं।

संघ वाले अपने विरोधियों को भी आदर देते हैं; पर त्रिलोचन, गिरिलाल जैन, निर्मल वर्मा आदि का वामपंथियों ने क्या हाल किया ? तरुण विजय ने जनसत्ता में ही लिखा था कि वे हर 25 दिसम्बर को चर्च जाते हैं। तरुण विजय आज भी संघ में प्रतिष्ठित हैं; पर क्या कोई ईसाई, मुसलमान या वामपंथी नेता मंदिर जाने की बात कहकर अपनी लाज बचा सकता है ? पांचजन्य ने ही एक बार हज यात्रा का चित्र मुखपृष्ठ पर छापकर उस बारे में भरपूर सामग्री दी थी। क्या कोई वामपंथी पत्र अमरनाथ यात्रा पर सामग्री दे सकता है ?

प्रयाग वि0वि0 में पढ़ाते समय प्रो0 राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) लाल बहादुर शास्त्री, पुरुषोत्तम दास टंडन, हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे कांग्रेसियों से प्रायः मिलते थे; लेकिन उन पर किसी ने संदेह नहीं किया। आगे चलकर वे सरसंघचालक बने। दूसरी ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा 5.5.12 को दिल्ली में हुई मुख्यमंत्री बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से हाथ मिलाने मात्र से नीतीश की उनके दल में ही आलोचना होने लगी है।

श्री मोहन भागवत ने सरसंघचालक बनने के तुरंत बाद नागपुर में दीक्षा भूमि जाकर भारत रत्नडा0 भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा पर पुष्पार्पण किये। संघ वाले प्रायः वहां जाते रहते हैं; पर कोई कांग्रेसी या वामपंथी डा0 हेडगेवार स्मृति भवन गया हो, यह याद नहीं आता, जबकि संघ स्थापना से पूर्व डा0 हेडगेवार कांग्रेस में ही सक्रिय थे। कांग्रेस के शताब्दी वर्ष में प्रकाशित साहित्य में उनका आदर सहित वर्णन है।

संघ वालों के बड़े दिल का क्या कहना ? जनसत्ता के कार्टूनकार इरफान की प्रदर्शनी का उद्घाटन दिल्ली में श्री आडवानी ने किया, जबकि वे मोदी, आडवानी और संघ वालों को प्रायः राक्षस जैसा दिखाते हैं। प्रभाष जोशी ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने पर भैरोंसिंह शेखावत की आलोचना की थी; पर वही श्री शेखावत कुछ दिन बाद प्रभाष जी की पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में आये। वर्ष 2006-07 में सहारा समयद्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण भी उपराष्ट्रपति श्री शेखावत ने किया था, जबकि अधिकांश पुरस्कृत कहानियों का स्वर हिन्दुत्व एवं अयोध्या आंदोलन विरोधी था। क्या ऐसा बड़ा दिल किसी वामपंथी के पास है ?

विश्व हिन्दू परिषद के दिल्ली स्थित केन्द्रीय कार्यालय के पीछे चर्च है। वहां होने वाले कार्यक्रमों से वि.हि.प को कभी परेशानी नहीं हुई; पर क्या किसी मस्जिद या चर्च के पास शाखा लगाना संभव है ? जे.एन.यू में तो संघ के कार्यक्रम से ही वामपंथियों के पेट में मरोड़ उठने लगते हैं। वामपंथी पत्र अपने विचार से इतर लेखकों को छापना तो दूर, तथ्यहीन लेखों का खंडन करने वाली सप्रमाण टिप्पणियों को भी रद्दी में डाल देते हैं। जबकि संघ विचार के पत्रों में विरोधियों के लेख व टिप्पणियों को सहर्ष स्थान दिया जाता है।

भारत में वामपंथियों की वर्णसंकर प्रजाति कुछ विशेष ही है। इसलिए अपने विरोधी की बात तो छोड़िये, वे दूसरी तरह के वामपंथी को भी सहन नहीं कर पाते। भारत में वामपंथी कितने खेमों और दलों में बंटे हैं, इसे गूगल बाबा भी नहीं बता सकते।

बंगाल और केरल में पिटने के बाद माकपा की केरल कांग्रेस में शायद पहली बार भाकपा से ए.बी.वर्धन साहब को बुलाया गया; पर भाजपा ने 20 साल पहले मुंबई अधिवेशन में जार्ज फर्नांडीज को सहर्ष बुलाया था। संघ, जनसंघ या भाजपा छोड़ने वालों से कभी दुर्व्यवहार नहीं हुआ। वसंतराव ओक और पीताम्बर दास जी आदि तो चले गये; पर बलराज मधोक, कल्याण सिंह या शंकर सिंह वाघेला आज भी इसके प्रमाण हैं। दूसरी ओर वामपंथ छोड़ने वाले हजारों लोगों की केरल और बंगाल में निर्मम हत्याएं की गयी हैं। अब तो इसे केरल के एक कम्युनिस्ट नेता एम.एम मणि ही स्वीकार कर चुके हैं।

आपातकाल के दौरान मेरठ जेल में नक्सलियों ने दीवार पर लिखा था, ‘‘अत्यधिक घृणा हमारे काम का आधार है।’’ (Extreme hatred is the basis of our work) स्वयंसेवकों ने उसके नीचे लिखा, ‘‘शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है।’’ ये दो पंक्तियां संघ और वामपंथियों के पूरे दर्शन को स्पष्ट कर देती हैं।

संघ की शाखा और संघ विचार के संगठनों में सब तरह के लोग आये हैं। गांधी जी, क.मा.मुनशी, वी.वी.गिरी, इंदिरा गांधी, डा. कलाम, करुणानिद्दि, ज्योति बसु, हरेकृष्ण कोनार, मोरारजी भाई, वेंकटरामन, जयप्रकाश जी, दिग्विजय सिंह, रामनरेश यादव, देवेगोड़ा, खुशवंत सिंह, बलराम जाखड़ आदि में से अधिकांश की तारीखें उपलब्ध हैं।

ऐसे उदाहरण सैकड़ों नहीं हजारों हैं; पर संघ वाले इसे गाते नहीं हैं। क्योंकि संघ का उद्देश्य राजनीति करना नहीं, अपितु हर पंथ, वर्ग, जाति, क्षेत्र तथा विचार के व्यक्ति को अपने साथ जोड़ना है। इसलिए संघ वाले कहीं भी जाने तथा किसी को भी बुलाने से नहीं डरते। जबकि वामपंथी छोटे दिल, संकुचित दिमाग और कच्ची जमीन पर खड़े रीढ़विहीन लोग हैं, जो हल्की फूंक से ही कांपने लगते हैं। इसमें दोष उनका नहीं, खोखले और कालबाह्य हो चुके विचार का है।

मंगलवार, 29 मई 2012

चलो, कुछ समाजसेवा ही हो जाए


हर दिन मिलने वाले शर्मा जी पिछले एक सप्ताह से नहीं मिले, तो मैंने फोन मिलाया। पता लगा कि वे हैं तो नगर में ही; पर जरा व्यस्त हैं। खैर, दो दिन बाद उनके दर्शन हो ही गये।
- क्या बात है शर्मा जी, इतनी व्यस्तता ठीक नहीं है कि मित्रों को ही भूल जाओ ?
- बात तो तुम्हारी ठीक है वर्मा; बस कुछ दिन की बात है। जरा अखाड़ा जम जाए और काम चालू हो जाए, तो फिर फुरसत हो जाएगी।
- पर शर्मा जी, कैसा अखाड़ा, कैसा काम; कोई दंगल कराने का विचार है क्या ?
- अरे नहीं, वो अपने बचपन का साथी है न आर.पी ?
- कौन आर.पी.. ?
- आर.पी यानि रघुवीर प्रसाद, जिसे हम लोग रग्घू कहते थे। 
- हां, हां; सेठ मनोहर प्रसाद के लड़के को भला कैसे भूल सकते हैं; सुना है इन दिनों वह बड़ा आदमी हो गया है ?
- हां, उसकी फैक्ट्री अच्छी चल रही है। रियल प्रापर्टी में भी उसकी किस्मत अच्छी रही, और अब तो वह एक बहुमंजिला कालोनी बना रहा है। लखपति तो वह पहले से ही था; पर शादी के बाद करोड़पति और अब अरबपति हो चुका है। उंगलियांे सहित पूरा हाथ घी में हैं और सिर कड़ाही में।
- पर उसका तुम्हारी व्यस्तता से क्या मतलब है ?
- हुआ यह कि पिछले दिनों वह एक कार्यक्रम में मिल गया। बोला कि पैसा तो भगवान और सरकारी अफसरों की कृपा से खूब कमा लिया है। अब इच्छा कुछ समाजसेवा करने की है।
- अच्छा फिर.. ?
- इसके लिए हम लोगों ने एक एन.जी.ओ बनाया है। इसके माध्यम से अब समाजसेवा करेंगे। 
- तो शर्मा जी, आप भी उसमें हैं ?
- हां, मैं तो हूं ही। असल में आर.पी ने कहा कि पैसा तो मैं लगा दूंगा; पर कोई समय देने वाला व्यक्ति चाहिए।
- तो अंधे और लंगड़े की तरह उसके पास पैसा था और आपके पास समय। इसलिए बात बन गयी ?
- बिल्कुल ठीक समझे तुम वर्मा। आर.पी उस संस्था का अध्यक्ष है और मैं सचिव। कुछ अवकाश प्राप्त बुद्धिजीवी, शोध छात्र और पत्रकार जैसे लोग भी जोड़ लिये हैं। उसी के पंजीकरण के लिए भागदौड़ कर रहा था।
- तो ये समाजसेवा का अखाड़ा है या खोमचा ?
- तुम कुछ भी कहो; पर आर.पी का पेट पैसे से लगभग भर ही गया है। इसलिए अब उसकी प्रसिद्धि की भूख जाग गयी है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन के बाद मीडिया वाले भी इन आंदोलनों को काफी महत्व देने लगे हैं। असल में यह भी एक नया फैशन जैसा ही है। इसलिए...
- तो तुम भी इसमें लगे हो ?
- हां, उसने मुझे चालक सहित एक कार, लैपटॉप और मोबाइल दे दिया है। उसके कहे अनुसार मैं करता रहता हूं। संस्था का पंजीकरण होते ही हम एक गोष्ठी करेंगे। इस तरह काम चालू हो जाएगा।
- पर शर्मा जी, विचार गोष्ठियों या सेमिनारों में आयेगा कौन ?
- देखो वर्मा, ये दिल्ली है। यहां न वक्ताओं की कमी है, न श्रोताओं की। ऐसे कार्यक्रमों के समाचार छापने और दूरदर्शन पर दिखाने के लिए पत्रकार भी सब तरफ घूमते फिरते हैं। आपकी जेब में तो पैसा होना चाहिए। कार्यक्रम सड़क पर करना हो या वातानुकूलित सभागार में, उसे सफल बनाने का पूरा प्रबंध दिल्ली में हो जाता है। यहां तक कि यदि शासन के विरोध में प्रदर्शन करना हो, तो नारे लगाने से लेकर डंडे खाने वाले तक मिल जाते हैं।
- अच्छा.. ?
- जी हां। कुछ वर्तमान और कुछ पूर्व अधिकारियों से बात हो गयी है। एक-दो मंत्री भी संपर्क में हैं। ये आएंगे, तो मीडिया आयेगा ही। इसलिए हमारे कार्यक्रम तो सफल होने ही हैं। जब सफल होंगे, तो समाचार पत्रों और दूरदर्शन पर हमारे चेहरे भी दिखाई देंगे। 
- यानि कुछ भला समाज का, और बाकी तुम्हारा ?
- तुम कुछ भी कहो; पर समाजसेवा का अर्थ जान देना थोड़े ही है। हम अन्ना हजारे या रामदेव बाबा की तरह नहीं हैं, जो अनशन पर बैठ जाएं। हम तो पांच दिन अपना काम करेंगे और शनिवार-रविवार  की छुट्टी में समाजसेवा। 
- यानि आप ‘वीकेंड समाजसेवी’ हैं ?
- पहली बार तुम बात को बिल्कुल ठीक समझे हो वर्मा। हम न खुद कष्ट उठाएंगे और न किसी को कष्ट देंगे। हमारा काम तो थिंक टैंक जैसा है। जब मौका मिलेगा, थोड़ा सा थिंक लेंगे।
- तो आपकी अगली गोष्ठी किस विषय पर है ?
- विषय तो कोई भी रख लेंगे। सूचना का अधिकार, जल का व्यापार, चुनाव में सुधार, शिक्षा का प्रसार, आतंक का विस्तार, युवाओं का बदलता व्यवहार, सरकार में भ्रष्टाचार..जैसे सैकड़ों विषय हैं। पिछले 50 साल से बुद्धिजीवी इन पर सिर मार रहे हैं और अगले 50 साल तक मारते रहेंगे।
- तो शर्मा जी, यह मानसिक व्यायाम आप भी करेंगे ?
- और क्या ? थोड़ा बोलेंगे, थोड़ा सुनेंगे, खूब सारी ताली बजाएंगे। बढ़िया खाना-पीना करेंगे और धूल झाड़कर घर आ जाएंगे। महीने-दो महीने बाद फिर एक गोष्ठी या सेमिनार।
- शर्मा जी, आपकी ये ‘कोस्मैटिक समाजसेवा’ मेरी समझ से परे है। सेवा करनी है तो उनकी करो, जो रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ठंडे सभागारों में मानसिक जुगाली करने से किसी का भला नहीं होगा।
- वर्मा जी, हम तो ऐसे ही करेंगे। मेरी मानो, तो तुम भी हमारे साथ आ जाओ। दाम और नाम दोनों ही मिलेंगे। 
मेरे क्रोध का ठिकाना न था। मैं शर्मा जी को खरी-खरी सुनाना ही चाहता था कि तभी उनका मोबाइल बजा। उन्हें संस्था के अध्यक्ष आर.पी सर ने याद किया था। इसलिए वे चल दिये। मुझे अकबर इलाहबादी की पंक्तियां याद आईं। 


कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ।।