शुक्रवार, 8 जून 2012

अमीरी रेखा की खोज में


बहुत सालों तक मैं गरीबी की रेखा को खोजता रहा। इस चक्कर में फिल्म अभिनेत्री रेखा की फिल्में कई-कई बार देखीं। अब तो सुना है वह सांसद हो गयी हैं। फिर किसी ने कहा कि कभी-कभी नाम में भ्रम हो जाता है, इसलिए रेखा से मिलते जुलते नाम वाली राखी गुलजार और राखी सावंत की फिल्में भी देख डालीं; पर गरीबी की रेखा नहीं मिली।

गणित के मामले में मैं उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का अनुयायी हूं।  उन्होंने स्वयं लिखा है कि गणित पहाड़ की वह चोटी है, जिस पर वे कभी नहीं चढ़ सके। उनकी ही तरह मुझे भी गणित से सदा तकलीफ ही रही है; और गणित में भी रेखागणित, तौबा-तौबा। उसमें नंबर देते समय हमारे अध्यापक ने कभी कोई रेखा खींचने का कष्ट नहीं किया। वे सदा दो शून्य से ही काम चला लेते थे। यद्यपि कापी बिल्कुल कोरी छोड़ने के कारण सफाई के दो नंबर पाने का मेरा हक बनता था।

खैर, जो भी हो; पर बात रेखा की हो रही थी। गणित की ही तरह भूगोल में भी कर्क, मकर और विषुवत रेखा का चक्कर मुझे कभी समझ नहीं आया। जब बहुत सिर मारने पर भी मुझे ग्लोब पर कर्क रेखा नहीं मिलती थी, तो हमारे भूगोल के अध्यापक मुझे मैदान के चक्कर लगाने भेज देते थे। इस चक्कर में मेरे पैर की रेखाएं तो मजबूत हो गयीं; पर हाथ की रेखा कमजोर रह गयी।

आप जानते ही हैं कि मनुष्य का भाग्य पैर की नहीं, हाथ की रेखाओं से ही बनता और बिगड़ता है। मैंने कई ज्योतिषियों को अपने पैर की रेखाएं दिखानी चाहीं; पर कोई इसके लिए तैयार नहीं हुआ। मेरी समझ में नहीं आता कि बच्चा जन्म के समय हाथ की तरह पैर भी साथ लेकर आता है। दोनों में ही चार उंगलियां और एक अंगूठा होता है। हाथ में हथेली है, तो पैर में तलुवा। हाथ की उंगलियों में अंगूठी पहनते हैं, तो पैर की उंगली में बिछुवे। संकट के समय किसी को जान बचाकर भागना हो, तो पैर ही काम आते हैं। फिर भी हाथ की रेखाओं को न जाने क्यों अधिक महत्व दिया जाता है ? यदि हस्तरेखा की तरह पदरेखा विज्ञान का भी विधिवत अध्ययन हो, तो ज्योतिषियों का कारोबार रातोंरात दुगना हो जाए।

एक बार कुछ लोग पानी के जहाज से यात्रा कर रहे थे। रास्ते में एक जगह ऐसी आयी, जहां से होकर कर्क रेखा गुजरती थी। कागज पर बने मानचित्र में यह साफ दिखाया गया था। एक मौलाना ने जहाज के कप्तान से कर्क रेखा दिखाने का आग्रह किया। कप्तान ने बहुत समझाया कि यह रेखाएं काल्पनिक होती हैं; पर उसने जिद पकड़ ली।

इस पर कप्तान ने एक सूक्ष्मदर्शी यंत्र के लैंस के नीचे एक सफेद धागा रखा और उसे कर्क रेखा बताकर मौलाना को दिखाया। उसे देखते समय मौलाना की दाढ़ी का एक बाल भी लैंस के नीचे पहुंच गया। इस पर वह खुशी से चिल्लाया - कप्तान साहब, यहां तो कर्क रेखा के साथ ही मकर रेखा भी दिखाई दे रही है।

कुछ ऐसा ही चक्कर इन दिनों गरीबी और अमीरी की रेखा को लेकर चल रहा है। योजना आयोग की कृपा से गरीबी की रेखा तो 28 और 32 रु0 के बीच में झूल रही है; पर अमीरी की रेखा का पैमाना क्या है, यह किसी को नहीं पता।

कुछ लोग कहते हैं कि इसका पैमाना मुकेश अम्बानी का 4,000 करोड़ रु0 वाला मकान है, जिसमें पांच लोग रहते हैं और जिसका बिजली का मासिक बिल केवल 70 लाख रु0 आता है। कुछ का कहना है कि इसका पैमाना पांच करोड़ रु0 वाली कार है, जिसमें यात्रा के दौरान ही सोने और सुबह-शाम के जरूरी काम करने का भी प्रबन्ध है। ऐसी कार भारत में भी कुछ लोगों ने खरीद ली है। कुछ पांच लाख रु0 की घड़ी, दो लाख रु0 का मोबाइल और एक लाख रु0 वाली कलम को इसका पैमाना मानते हैं।

पर काफी सिरखपाई के बाद पिछले दिनों मुझे इस बारे में अंतिम सत्य पता लग ही गया। वह यह है कि अमीरी की रेखा मकान, गाड़ी, घड़ी, कपड़े या कलम से नहीं, शौचालय से तय होती है। 

हमारे देश के महान योजना आयोग के कार्यालय में दो शौचालयों की मरम्मत में 35 लाख रु0 खर्च कर दिये गये। जरा सोचिये, मरम्मत में इतने खर्च हुए, तो नये बनने में कितने होते होंगे ? जब कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति की, तो योजना आयोग के मुखिया श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इसे बिल्कुल ठीक बताया।

मैं श्री अहलूवालिया की बात से सौ प्रतिशत सहमत हूं। बहुत से विचारकों का अनुभव है कि यही एकमात्र ऐसी जगह है, जहां व्यक्ति बिल्कुल एकांत में कुछ देर बैठकर, शांत भाव से मौलिक चिन्तन कर सकता है। कई लेखकों को कालजयी उपन्यासों के विचार यहीं बैठकर आये हैं। श्री अहलूवालिया और उनके परम मित्र मनमोहन सिंह की जिन योजनाओं से देश की अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है, उसके बारे में चिन्तन और मनन इतने आलीशान शौचालय में ही हो सकते हैं।

खैर, अमीरी की रेखा के बारे में मैंने तो निर्णय कर लिया है; पर कई लोग अभी इस बारे में और शोध कर रहे हैं। यदि आपके निष्कर्ष इससे कुछ अलग हों, तो मुझे जरूर बतायें। मैं आपको भारत के आम आदमी की तरह, गरीबी की रेखा पर बैठे हुए, बड़ी हसरत से अमीरी की रेखा को ताकते हुए मिलूंगा। 

मंगलवार, 5 जून 2012

भाषा और बोली


संसद का वर्तमान सत्र स्थगित होने से पूर्व गृहमंत्री महोदय ने कुछ शब्द भोजपुरी में बोलकर तालियां बटोर लीं। ऐसी ही तालियां उन्हें तेलंगाना राज्य निर्माण को समर्थन देने पर मिली थीं। इससे तेलंगाना राज्य समिति के सांसद श्री के.चंद्रशेखर राव ने अनशन तोड़ दिया और वातावरण में व्याप्त तनाव कुछ कम हो गया था; पर जैसे तेलंगाना के लिए दिया गया आश्वासन उनके और केन्द्र सरकार के गले की हड्डी बना है, ऐसे ही भोजपुरी के बारे में दिया गया आश्वासन भी बनेगा।


यह प्रश्न उठाने से पहले कि भोजपुरी भाषा है या बोली, यह समझना आवश्यक है कि भाषा और बोली में अंतर क्या है ? 


किसी भी भाषा के निर्माण के लिए व्याकरण की अत्यधिक आवश्यकता है। व्याकरण वह रीढ़ है, जिसके बिना भाषा खड़ी नहीं हो सकती; पर बोली के साथ ऐसी बाध्यता नहीं है। नाम से ही स्पष्ट है कि लोग अपने विचार व्यक्त करने के लिए जो बोल रहे हैं, वह बोली है। अर्थात बोली में भी लगभग वही व्याकरण होता है, जो भाषा में है; पर क्षेत्र विशेष के कारण उच्चारण कुछ भिन्न हो जाता है। भौगोलिक या ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के कारण कुछ नये शब्द भी उस बोली में आ जाते हैं। अतः बोली का भी विकास होता चलता है। बोली के विकास से भाषा और उसका साहित्य भी समृद्ध होता है। इस प्रकार भाषा और बोली सगी बहिनों की तरह परस्पर सहयोग से आगे बढ़ती हैं। 


उदाहरण के लिए ‘मैं जा रहा हूं’ का हिन्दी की विभिन्न बोलियों में अनुवाद करें। उच्चारण भेद को यदि छोड़ दें, तो प्रायः इसका अनुवाद असंभव है। दूसरी ओर अंग्रेजी में इसका अनुवाद ;प् ंउ हवपदहण्द्ध तुरन्त ध्यान में आता है। यही स्थिति मराठी, गुजराती, बंगला, कन्नड़ आदि की है। इसलिए अनुवाद की कसौटी पर किसी भी भाषा और बोली को आसानी से कसा जा सकता है। 


किसी भी भाषा में दर्जनों बोलियां और उपबोलियां होती हैं, जो हर दस-बीस कि.मी पर बदल जाती हैं। कहा भी गया है - चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी। मुझे उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में घूमने का अवसर मिला है। वहां हिन्दी की ही एक बोली गढ़वाली प्रचलन में है; पर टिहरी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल की बोलियों में अंतर है। टिहरी और उत्तरकाशी की बोली अलग है। उत्तरकाशी की गंगा, यमुना और टोंस घाटी की बोलियों में अंतर है; पर इसके बाद भी ये सब गढ़वाली ही मानी जाती हैं।


यही स्थिति कुमाऊंनी बोली के साथ है। गढ़वाल और कुमाऊंनी में भी अंतर है। गढ़वाल का जो क्षेत्र हिमाचल से लगता है, वहां हिमाचल की पहाड़ी बोली का प्रभाव है। कुमाऊं का जो भाग नेपाल या तिब्बत से लगता है, वहां की बोली में नेपाली और तिब्बती शब्दों की भरमार है। हिमाचल के पंजाब से लगे निचले भाग में पंजाबी खूब बोली और समझी जाती है। यह अत्यन्त स्वाभाविक है; पर इस कारण किसी बोली को भाषा मानने का दुराग्रह करना अनुचित है।


केवल हिन्दी ही क्यों, बंगला, मराठी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम अंग्रेजी आदि सब भाषाओं में अनेक बोलियां हैं। इंग्लैंड, अमरीका, आस्टेªलिया आदि की अंग्रेजी भी अलग है। कई देशों में रोमन लिपि प्रयोग की जाती है, इसलिए हम भूलवश उन्हें अंग्रेजीभाषी मान लेते हैं; पर वस्तुतः उनकी भाषा अलग है।


किसी मकान में बीस-तीस कमरे, बरामदे, विशाल कक्ष आदि होना उसके मालिक के धनवान होने का परिचायक है। फिर उसे मकान नहीं, महल या हवेली कहने लगते हैं। ऐसे ही किसी भाषा में दर्जनों बोलियों का होना उसकी समृद्धि का प्रतीक है। हिन्दी भारत और पड़ोसी देशों के इतने बड़े क्षेत्र में बोली जाती है कि उसमें सैकड़ों बोलियां और उपबोलियां होना बिल्कुल स्वाभाविक है।


पर पिछले कुछ समय से कई साहित्यकार व राजनेता कुछ बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में पहुंचाकर उसे स्वतंत्र भाषा की मान्यता दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। भोजपुरी के समर्थक इसमें सबसे आगे हैं; पर इसके साथ ही बंुदेलखंडी, बज्जिका, मगही, अंगिका, संथाली, अवधी, ब्रज, गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिमाचली, हरियाणवी, मारवाड़ी, राजस्थानी, मेवाती, मालवी, छत्तीसगढ़ी आदि के प्रेमी भी इस पंक्ति में लगे हैं। कुछ बोलियों को चूंकि भाषा की मान्यता दी जा चुकी है, इसलिए इनका भी साहस बढ़ गया है।


पर जरा सोचें, यदि इन सब बोलियों को स्वतंत्र भाषा मान लिया गया, तो कबीर, सूर, मीरा, तुलसीदास, रहीम, रसखान आदि की रचनाएं किस भाषा की मानी जाएंगी ? यदि गत हजार साल के भक्त कवियों की रचनाओं को हिन्दी से निकाल दिया गया, तो हिन्दी में बचेगा क्या; फिर हिन्दी किसे कहेंगे, यह भी सोचना होगा ?


जहां तक भोजपुरी की बात है, अंग्रेज जब पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को गिरमिटिया मजदूर बनाकर विदेशों में ले गये, तो भोजपुरी वहां भी पहुंच गयी। आज उन्हीं श्रमिकों के वंशज उन देशों में प्रभावी स्थानों पर हैं। ऐसे ही भारत के सभी राज्यों में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग काम करने के लिए गये हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में छठ महोत्सव के समय इनकी संख्या का अनुमान होता है। इन्होंने अपने परिश्रम से इन नगरों की अर्थव्यवस्था में भारी योगदान दिया है। कभी-कभी मुंबई जैसे शहरों में कुछ छोटे मन  और मस्तिष्क के लोग इसका विरोध भी करने लगते हैं। इस प्रकार भोजपुरी बोली का फलक भी अति व्यापक हो गया है।


अनेक साहित्यकार हिन्दी के साथ ही इन बोलियों में भी साहित्य रच रहे हैं। यह अच्छी बात है। इन बोलियों का साहित्य भी समृद्ध होना चाहिए और उसे साहित्य जगत में मान्यता भी मिलनी चाहिए; पर इसके लिए हिन्दी की जड़ खोदना आवश्यक नहीं है। बड़ा परिवार होने पर लड़के-बच्चे मकान, दुकान या खेती अलग कर लेते हैं; पर इसके साथ ही वे अपने मूल खानदान से भी जुड़े रहते हैं और हर सुख-दुख में कंधे मिलाकर काम करते हैं।


वस्तुतः जो साहित्यकार बोलियों को भाषा बनाने के लिए प्रयासरत हैं, उन्हें लगता है कि ऐसा होने पर इन भाषाओं के नाम पर अलग संस्थान बनेंगे। उसमें वे किसी बड़े पद पर नियुक्त हो जाएंगे। इसके बाद देश और राज्य की राजधानी में आवास, गाड़ी, भत्ते, पुरस्कार, देश और विदेश की यात्रा, मान-सम्मान, साथियों को उपकृत करने के संसाधन आदि उनके हाथ में आ जाएंगे। उनकी पुस्तकें छपने और विश्वविद्यालयों में लगने लगेंगी। इससे उनका कद बढ़ेगा और आगे चलकर कहीं राजनीति में भी स्थान मिल सकेगा; पर वे यह भूलते हैं कि आज तो उन्हें हिन्दी साहित्यकार के रूप में पूरे देश में सम्मान मिलता है। यदि वे कुछ जिलों में प्रचलित, निजी व्याकरण से रहित एक बोली (या तथाकथित भाषा) के साहित्यकार घोषित हो गये, तो उनकी मान्यता का क्षेत्र बहुत सिकुड़ जाएगा।


जो राजनेता इसके समर्थक हैं, उन्हें पता है कि भारत में राज्यों के निर्माण में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि उनकी बोली को भाषा की मान्यता मिल गयी, तो फिर इस आधार पर अलग राज्य का आंदोलन खड़ा करना सरल हो जाएगा। गठबंधन सरकारों के युग में कभी केन्द्र सरकार संकट में पड़ी, तो इसका लाभ उठाते हुए उसे नया भाषायी राज्य बनाने को मजबूर किया जा सकता है। 


बड़े राज्य में मंत्री या मुख्यमंत्री बनना कठिन है; पर छोटे राज्य में नहीं। अतः हो सकता है उनकी ही लाटरी लग जाए; और एक बार महत्वपूर्ण कुर्सी मिली, तो फिर अगली-पिछली कई पीढ़ियों का उद्धार होते देर नहीं लगती; पर उनके इस प्रयास से हानि अंततः हिन्दी की ही होगी। उसकी स्थिति उस ग्रन्थ जैसी हो जाएगी, जिसके सब पृष्ठ फाड़ लेने के बाद केवल जिल्द शेष रह जाए। 


यह परिस्थिति उत्पन्न न हो, इसके लिए आवश्यक है कि देश और हिन्दीभाषी राज्यों में सरकारी सहायता से चलने वाले हिन्दी संस्थान अपना दिल बड़ा करें। अभी तो जिस दल की सरकार होती है, उसके समर्थक साहित्यकार कुर्सी पर बैठा दिये जाते हैं। वे सब पुरस्कार अपने चहेतों में बांटकर उन्हें उपकृत कर देते हैं। 


कटु सत्य यह भी है कि अधिकांश पुरस्कार एक वर्ग और कुछ बड़े नगरों के निवासी लेखकों में बंट जाते हैं। राजधानी से दूर रहने वाले, बार-बार वहां आकर कुर्सीधारियों से न मिल सकने वाले साहित्यकार इनसे वंचित रह जाते हैं। ऐसे में विभिन्न बोलियों में साहित्य रच रहे लेखकों के मन में आक्रोश जागना स्वाभाविक है। जैसे जातीय चेतना ने अनेक नये राजनीतिक दलों को जन्म देकर सफलता दिलाई है, ऐसा ही आक्रोश साहित्य के क्षेत्र में भी है। बोलियों को भाषा बनाने का प्रयास इससे ही उपजा है।


इसलिए सरकारी और निजी हिन्दी संस्थाओं के निर्णायक मंडल और पुरस्कारों में विभिन्न बोलियों के लेखक और साहित्य को भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। इनका सम्मान हिन्दी का ही सम्मान है। इससे नये और युवा लेखक इन बोलियों में लिखने को प्रेरित होंगे और इससे हिन्दी सबल होगी। ये संस्थान राजनीति से मुक्त हों तथा इनके काम में पारदर्शिता हो, यह भी आवश्यक है।


गृहमंत्री श्री चिदम्बरम् शिक्षित व्यक्ति हैं। राजनीति में हैं, इसलिए इस उठापटक को भी समझते होंगे। तेलंगाना पर आश्वासन देकर उन्होंने हाथ जलाये ही हैं। अब उन्होंने भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में लाने की बात कहकर एक ऐसा पिटारा खोल दिया है, जिससे भविष्य में कई नये भाषायी आंदोलन जन्म लेंगे।