शनिवार, 18 अगस्त 2012

व्यंग्य बाण : बातों और वायदों का ओलम्पिक


शर्मा जी बचपन से ही खेलकूद में रुचि रखते हैं। यद्यपि उन्होंने आज तक किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया। इसलिए पुरस्कार  जीतने का कोई मतलब ही नहीं; पर कबाड़ी बाजार से खरीदे कप, ट्रॉफी और शील्डों से उनका कमरा भरा है, जिसे वे हर आने-जाने वाले को विभिन्न राज्य और राष्ट्र स्तर की प्रतियोगिताओं में जीता हुआ बताकर बड़े गर्व से दिखाते हैं। 

हर बार की तरह इस बार भी ओलम्पिक के लिए शर्मा जी के मन में बड़ी उत्सुकता थी। उनकी लंदन जाकर भारतीय खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करने की बहुत इच्छा थी; पर हवाई जहाज से वहां तक जाने लायक पैसे जेब में नहीं थे, और साइकिल से कोई साथ जाने वाला नहीं मिला। मजबूरी में दूरदर्शन के सामने बैठकर खेलों का दूर से दर्शन करते रहे; पर बुरा हो सुशील कुमार शिंदे का, उन्होंने दो दिन बत्ती गुलकर दूर से देखने का आनंद भी नहीं लेने दिया।

भारतीय खिलाड़ियों ने इस बार पहले से दुगने पदक जीते, इससे शर्मा जी बहुत खुश हैं। उनकी इच्छा है कि वे भी खिलाड़ियों को सम्मानित करें। इसके लिए उन्होंने कई बार सम्पर्क का प्रयास किया; पर विजेता खिलाड़ी इन दिनों करोड़ों में खेल रहे हैं। उन्हें बड़े नेताओं और उद्योगपतियों से सम्मानित होने से ही फुर्सत नहीं है, इसलिए शर्मा जी के घर कौन आता ?

शर्मा जी को इस बात की बहुत पीड़ा है कि सवा अरब जनसंख्या वाले भारत देश का नाम पदक तालिका में बहुत नीचे है। खिलाड़ी और उनके रिश्तेदार, प्रशिक्षक, मालिश करने वाले, रसोइये, चिकित्सक, सरकारी मेहमान और ऐरे-गैरे मिलाकर सैकड़ों लोग वहां गये थे; पर लाये क्या ? केवल छह पदक। इससे तो लाख-दो लाख जनसंख्या वाले वे देश अच्छे हैं, जो स्वर्ण पदक ले गये। 

अधिकांश देशवासियों का मानना है कि खेलों में राजनीति होती है, इसलिए यह गड़बड़ है। यहां खिलाड़ियों को प्रशिक्षण की वैसी सुविधाएं और उपकरण उपलब्ध नहीं होते, जैसे दुनिया के अन्य देशों में हैं। जीतने के बाद उन्हें भरपूर पुरस्कार भी नहीं मिलते। यदि ऐसी व्यवस्था भारत में हो, तो हम भी सैकड़ों पदक जीत सकते हैं।

पर मौलिक चिन्तन के धनी शर्मा जी इससे सहमत नहीं हैं। वे पदक तालिका में भारत के फिसड्डी रहने को अन्तरराष्ट्रीय षड्यन्त्र बताते हैं। उनका कहना है कि ओलम्पिक संघ ने जानबूझ कर उन खेलों को प्रतियोगिताओं से बाहर रखा है, जिसमें हम पुरस्कार जीत सकते हैं। 

उदाहरण के लिए यदि ओलम्पिक में बातों और वायदों की प्रतियोगिता हो, तो इसके सारे पदक भारत के हिस्से में ही आएंगे। विश्वास न हो, तो पहले स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दिया भाषण देखें या 15 अगस्त, 2012 को लाल किले से दिया गया मनमोहन सिंह का भाषण। तब भी रोटी, कपड़ा और मकान के वायदे किये गये थे। अनुशासन और कड़ी मेहनत की बात कही गयी थी, और आज भी उन्हें ही दोहराया जा रहा है। 

इंदिरा गांधी ने चालीस साल पहले ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाकर चुनाव जीता था। उसके बाद आम आदमी की तो नहीं; पर राजनेताओं की कई पुश्तों की गरीबी जरूर हट गयी। इसलिए नेता अरबों-खरबों में खेलते हैं, जबकि आम आदमी आज भी भूखे पेट सो रहा है।

इन दिनों असम में हुए दंगे चर्चा में हैं। 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने असम के युवा आंदोलनकारियों से एक समझौता किया था। उसके अनुसार 1971 के बाद असम में घुसे बंगलादेशियों को वापस भेजने की बात कही गयी थी; पर उन्हें भेजना तो दूर, अभी तक उनकी पहचान ही नहीं हुई है। 

असम में रहने वाला हर व्यक्ति जानता है कि कौन यहां का मूल निवासी है और कौन घुसपैठिया; पर हमारे महान शासकों को यह दिखाई नहीं देता। उस समझौते को 25 साल बीत गये। इस दौरान घुसपैठियों की संख्या एक करोड़ से बढ़कर पांच करोड़ हो गयी। पहले वे मुख्यतः असम में ही थे; पर अब वे पूरे देश में महामारी की तरह फैल गये हैं। असम शासन ने केन्द्र को बता दिया है कि उन्हें निकालना अब संभव नहीं है। मजे की बात यह है कि दोनों ही जगह कांग्रेस की सरकार है।

वायदे कई और भी थे। हर युवा को रोजगार देने का वायदा था, हर किसान को खाद और पानी देने की बात थी। ये वायदे सरकारी फाइलों में भले ही पूरे हो गये हों; पर शायद ही कोई दिन जाता हो, जब अखबार में किसी नौजवान या किसान की आत्महत्या की खबर न छपती हो। वायदा तो महिलाओं को सुरक्षा देने का भी था; पर गुवाहाटी में हुई छेड़छाड़ से लेकर गीतिका शर्मा तक के किस्से आम हो रहे हैं। आम आदमी की सुरक्षा के लिए बने पुलिस थाने ही उनके लिए सबसे अधिक अरक्षित हो गये हैं।

भ्रष्टाचार की बात करें, तो इस क्षेत्र में भारत का स्थान सर्वोपरि है। ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तरह जीप घोटाले से लेकर बोफोर्स तक और फिर टू जी स्पैक्ट्रम से लेकर कोयले की दलाली तक वर्तमान सत्ताधीशों ने अपने हाथ और मुंह इतने अधिक काले कर लिये हैं कि उन्हें पहचानना कठिन हो गया है। किसी ने ठीक ही कहा है कि शर्म की सीमा होती है, बेशर्मी की नहीं।

बड़े घोटालों को यदि बड़े लोगों के लिए जानें दें, तो अपनी रोटी के लिए संघर्ष करते हुए परिवार को पालने वाला शायद ही कोई व्यक्ति हो, जिसका पाला रिश्वत से न पड़ा हो। यदि कोई हो, तो मेरा राष्ट्रपति महोदय से अनुरोध है कि वे उसे अगली 26 जनवरी को पद्म पुरस्कार से सम्मानित करें। यदि पुराने पुरस्कार की परिधि में वह न आ सके, तो कोई नया पुरस्कार ही घोषित कर दें।

ऐसे खेलों की सूची तो बहुत लम्बी हो सकती है; पर फिलहाल ओलम्पिक वाले इन्हें ही शामिल कर लें। अगला ओलम्पिक 2016 में है। शर्मा जी को पूरा विश्वास है इन खेलों के स्वर्ण से लेकर कांस्य तक, सब पदक भारत ही जीतेगा। फिर हम भी पदक तालिका में अपना नाम नीचे नहीं, बल्कि ऊपर की ओर देखेंगे और शर्म से सिर झुका लेंगे।       

बुधवार, 15 अगस्त 2012

व्यवस्था परिवर्तन और वर्तमान आंदोलन


अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध किया जा रहा अपना आंदोलन समाप्त कर दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी मंडली भी भंग कर दी है। कहना कठिन है कि वे हताश और निराश हैं या कोई और बात है ? यह निराशा किससे है ? स्वयं से या अपनी मंडली से; जनता से या राजनीतिक दलों और शासन से; या फिर सबसे ?

हां, अपनी मंडली को भंग कर अन्ना ने साहस जरूर दिखाया है। अब उनके तथाकथित साथियों में से कोई उनके नाम पर तमाशा नहीं कर सकेगा। 1947 के बाद गांधी जी भी चाहते थे कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाए, क्योंकि उसमें अलग-अलग विचारों के लोग एक तात्कालिक उद्देश्य के लिए एकत्र हुए थे। गांधी जी की इच्छा थी कि अब स्वाधीनता मिलने के बाद लोग अपनी-अपनी विचारधारा और कार्यप्रणाली के अनुसार राजनीतिक दल बनायें और चुनाव लड़ें। ऐसे में जनता जिसे चाहेगी, वह जीत कर शासन करेगा।

पर सत्ता की मलाई खाने को आतुर नेहरू और उनके चेलों ने गांधी जी की बात को ठुकरा दिया। गांधी जी मन मार कर इसे देखते रहे। गांधी जी की ऐसी क्या मजबूरी थी, जिसके कारण वे नेहरू के सामने कुछ बोल नहीं पाते थे; क्या नेहरू के पास गांधी जी के कुछ रहस्य सुरक्षित थे ? दक्षिण अफ्रीका से लौटने, और कांग्रेस में शामिल होने से पहले, गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उनकी ब्रिटिश सत्ताधीशों से जो भेंट एवं वार्ता कराई थी, क्या उसकी जानकारी नेहरू को भी थी ? ऐसे अनेक रहस्य आज भी पर्याप्त शोध की मांग करते हैं।

तो जो काम गांधी जी नहीं कर सके, वह अन्ना ने कर दिया। यद्यपि दोनों की तुलना अनुचित है। अन्ना का नैतिक कद गांधी जी के सामने बहुत छोटा है। 1947 में कांग्रेस के पास जेलयात्रा से तपे हुए लोगों का देशव्यापी संजाल था, जबकि अन्ना मंडली का आधार अंतरजाल और फेसबुक के माध्यम से जुड़े वे युवा हैं, जिनके लिए कैरियर सबसे महत्वपूर्ण चीज है। मनोरंजन के लिए वे कुछ दिन आंदोलन में शामिल भले ही हो गये हों; पर इससे आगे वे नहीं जा सकते। शायद इसी भय से अन्ना ने जेल भरो आंदोलन का आह्नान नहीं किया, अन्यथा दो दिन में ही उनके साथियों द्वारा फुलाए गुब्बारे की हवा निकल जाती।  

सभी तरह के समाचार माध्यमों ने अन्ना के पहले दौर के आंदोलन को बहुत प्रमुखता दी; पर दूसरी बार नहीं। अन्ना मंडली इससे भी बहुत नाराज थी। उनका कहना है कि सरकार ने मीडिया को डराया है। यह बात ठीक हो सकती है, क्योंकि समाचार पत्र और दूरदर्शन के चैनल मालिक भी आखिर व्यापारी ही हैं, और व्यापारी को शासन ने डर कर चलना पड़ता है; पर अन्ना का जादू इस बार पहले जैसा नहीं चला, यह बात सौ प्रतिशत सत्य है।

जहां तक बाबा रामदेव के आंदोलन की बात है, पिछली बार की चोट उन्हें याद थी। फिर इस बार उनके दाहिने हाथ आचार्य बालकृष्ण भी जेल में हैं। ऐसे में बाबा ने भी उग्रता नहीं दिखाई और छह दिन बाद अपना सामान समेट लिया। यद्यपि उन्होंने भी आंदोलन जारी रखने की बात कही है; पर इस बार उनके आंदोलन में भी पहले जैसी गरमी नहीं दिखी। 

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को यह समझना होगा कि किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए देशव्यापी तंत्र तथा जनता के मानस की तैयारी आवश्यक है। गांधी जी अपने हर बड़े आंदोलन के बीच में लगभग दस वर्ष का समय रखते थे। (खिलाफत 1920-21, सविनय अवज्ञा 1930, भारत छोड़ो 1942) इस दौरान वे देश भर में घूमकर जनता के मानस को समझते थे और अपनी बात जनता को समझाते थे। इस प्रवास से उनके देशव्यापी संजाल में वृद्धि होती थी, जिसका वे अगले आंदोलन में उपयोग करते थे।

पर यहां अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की कमजोरी प्रकट होती है। अन्ना के पास कम्प्यूटर और मोबाइल से सम्पर्क बनाने वालों का समूह था, जो पहली बार सड़कों पर उतरा; लेकिन दूसरी बार नहीं। बाबा रामदेव भगवा वस्त्र पहनते हैं, जिसके प्रति आम आदमी के मन में श्रद्धा रहती है। उनके पास देश भर में योगाचार्यों, दवा  विक्रेताओं  और उससे होने वाले लाभार्थियों का समूह है, जो उन्होंने पिछले 15 साल में बनाया है। पहली बार उस समूह के साथ जनता भी सक्रिय हुई; पर चार जून, 2011 को रामलीला मैदान से पलायन का प्रभाव जनमानस पर बहुत खराब पड़ा। इसलिए इस बार आंदोलन का पटाक्षेप उन्होंने बहुत सावधानी से किया। इससे आम जनता और उनके समर्थकों में उत्साह है।

अन्ना के आंदोलन से राजनेता दूर रहे; पर बाबा के मंच पर अंतिम दिन विपक्ष के नेता आये। बाबा ने भी खुलकर कांग्रेस का विरोध किया। इसका परिणाम क्या होगा, बाबा की जुगलबंदी इनके साथ कितने दिन चलेगी और उसका आगामी चुनाव पर क्या प्रभाव होगा, कहना कठिन है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जो विषय उठा रहे हैं, वे बिल्कुल ठीक हैं; पर कोई भी सरकार अपने हाथ से अपने ही गले में फंदा नहीं डाल सकती। इसलिए 2014 में यदि केन्द्र में किसी और दल या गठबंधन की सरकार आ जाए, तब भी इन दोनों की सभी मांगें पूरी नहीं की जा सकेंगी। 

अन्ना और बाबा बार-बार ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की बात कहते हैं। यह बात 1974-75 में जयप्रकाश नारायण और 1988-89 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी कही थी; पर वे दोनों असफल हुए। जयप्रकाश जी चुनाव नहीं लड़े, जबकि वि.प्र.सिंह प्रधानमंत्री बन गये। इन दोनों की असफलता का कारण यह था कि इनके पास व्यवस्था परिवर्तन का कोई स्पष्ट प्रारूप नहीं था। जयप्रकाश जी की ‘समग्र क्रांति’ केवल नारा मात्र थी, जबकि वि.प्र.सिंह के नारों में धोखे के अलावा और कुछ नहीं था।

इसलिए अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को यदि व्यवस्था परिवर्तन करना है, तो इसका कोई प्रारूप जनता के सामने रखना होगा। फिर उस पर देश भर में बुद्धिजीवियों और संविधान विशेषज्ञों से लेकर गांवों में रहने वाले आम जन तक बहस चलानी होगी। जनता का मानस इसके लिए तैयार करना होगा। यदि जनता इसके लिए तैयार हुई, तो पहले सत्ता बदलेगी और फिर व्यवस्था।

देश में भ्रष्टाचार की जड़ ब्रिटेन से उधार ली गयी इस चुनाव प्रणाली में है। गांधी जी ने भी ‘बांझ’ कहकर इसकी आलोचना की थी। उनकी बात पूर्णतः सत्य सिद्ध हुई है। यह प्रणाली जनता को भाषा, जाति, मजहब, क्षेत्र और निजी स्वार्थों के आधार पर बांटती है। इसके द्वारा विधायक या सांसद बनने वाले नेता चुनाव जीतते ही अगले चुनाव का जुगाड़ करने लगते हैं। 

इसीलिए मनमोहन सिंह जैसे शिक्षित और अनुभवी लोग लोकसभा में नहीं पहुंच पाते, जबकि पूर्व डकैत फूलनदेवी लोकसभा की सांसद और अपने पैरों पर खड़े न हो सकने वाले करुणानिधि मुख्यमंत्री बन जाते हैं। अन्ना और बाबा यदि चुनाव लड़ना चाहें, तो उन्हें भी अपने क्षेत्र और जातिगत समीकरण वाली सीट पर करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे। इस पर भी वे जीत जाएंगे, यह निश्चित नहीं है।

काले धन के बल पर चुनाव जीते नेता, उन्हें लगातार धन पहुंचाने वाली पुलिस, प्रशासन, गुंडों और ठेकेदारों को हर तरह से सहायता देते हैं। इस दुष्चक्र का टूटना इस चुनाव प्रणाली में असंभव है। इसके चलते जाति, भाषा, क्षेत्र और मजहबवाद लगातार बढ़ेगा। यदि इन समस्याओं से निबटना है, तो संविधान, लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था की मर्यादा में ही ‘सूची प्रणाली’ को अपनाना होगा।

इसमें लोकसभा और विधानसभा का चुनाव व्यक्ति नहीं, अपितु राजनीतिक दल लड़ेंगे। केन्द्र और राज्य के चुनाव में क्रमशः राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरीय दलों को चुनाव से पहले अपनी पूरी सूची चुनाव आयोग को देनी होगी। फिर जिस दल को जितने प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसके उतने सूचीबद्ध प्रत्याशी निर्वाचित मान लिये जाएंगे। इससे चुनाव का खर्च बहुत घट जाएगा। त्यागपत्र या मृत्यु की स्थिति में सूची का अगला व्यक्ति स्वतः सदस्य हो जाएगा। इससे कभी उपचुनाव नहीं होगा। योग्य, शिक्षित, अनुभवी तथा चरित्रवान लोग सांसद और विधायक बनेंगे। हर सांसद पूरे देश का प्रतिनिधि होगा तथा हर विधायक पूरे राज्य का।

इस प्रणाली से जाति, भाषा, मजहब और क्षेत्र की राजनीति करने वाले दल बहुत सीमित रह जाएंगे। अतः सब दलों और नेताओं को पूरे देश या राज्य की बात करनी होगी। एक-दो बार के चुनाव से लोग इसके अभ्यस्त हो जाएंगे और व्यापक सोच वाले दलों को पूरा बहुमत मिलने लगेगा। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि ग्राम, नगर और जिला पंचायत के चुनाव आज की व्यवस्था के अनुसार ही होने चाहिए, जिससे लोग अपने जन प्रतिनिधि को चुन सकें।

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के प्रति पूरे देश में आदर व श्रद्धा है; पर इस चुनाव प्रणाली के चलते भ्रष्टाचार नहीं घट सकता। जयप्रकाश जी और वि.प्र.सिंह के समय में जितना भ्रष्टाचार था, आज उससे कई गुना अधिक है। अतः जब तक सांप की मां को नहीं मारेंगे, तब तक सांप जन्म लेते रहेंगे। इसलिए भ्रष्ट बनाने वाली इस चुनाव प्रणाली की जड़ में ही जहर डालना होगा।

इस दूषित व्यवस्था को बदलने की जिम्मेदारी केवल अन्ना हजारे  या बाबा रामदेव की ही नहीं है। यह काम उन सब संस्थाओं तथा संगठनों की प्राथमिकता सूची में भी आना चाहिए, जिनके लिए देश सर्वोपरि है। इन संस्थाओं के पास हजारों पत्र-पत्रिकाएं तथा विचार मंच आदि हैं, जिनके योजनाबद्ध प्रयास से पूरे देश में इस विषय पर जन जागरण किया जा सकता है।