शनिवार, 22 सितंबर 2012

हिन्दुद्रोही मौलाना मोहम्मद अली जौहर


गत 18 सितम्बर, 2012 को रामपुर (उ0प्र0) में मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर एक विश्वविद्यालय का उद्घाटन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया। इस अवसर पर उनके पिता श्री मुलायम सिंह तथा प्रदेश की लगभग पूरी सरकार वहां उपस्थित थी।

इस वि0वि0 के सर्वेसर्वा रामपुर से विधायक तथा प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री आजम खां हैं। उन्होंने इसे अपना स्वप्नदर्शी प्रकल्प बताते हुए मो0 अली जौहर को महान देशभक्त बताया। मुख्यमंत्री महोदय ने भी इस संस्थान को भरपूर धन देने तथा अलीगढ़ वि0वि0 की तरह विश्वविख्यात बनाने की घोषणा की।

पर ये मौलाना मोहम्मद अली जौहर कौन थे, इस बारे में जानना रोचक होगा। कांग्रेस के इतिहास में जिन अली भाइयों (मोहम्मद अली तथा शौकत अली) का नाम आता है, ये उनमें से एक थे। रोहिल्ला पठानों के यूसुफजई कबीले से सम्बद्ध जौहर का जन्म 10 दिसम्बर, 1878 को रामपुर में हुआ था। देवबंद, अलीगढ़ और फिर ऑक्सफोर्ड से उच्च शिक्षा प्राप्त कर इनकी इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवा में जाकर अंग्रेजों की चाकरी करें। इसके लिए इन्होंने कई बार आई.सी.एस की परीक्षा दी; पर सफल नहीं हो सके।

अब इन्होंने रामपुर नवाब और फिर बड़ोदरा दरबार में नौकरी की। इसके बाद इन्होंने कोलकाता से कॉमरेड, दिल्ली से हमदर्द, इंग्लैंड से मुस्लिम आउटलुक तथा पेरिस से एको डी ल इस्लाम नामक पत्रिकाएं निकालीं। फिर ये हिन्दुओं को धर्मान्तरित कर इस्लाम की सेवा करने लगे। इसके पुरस्कारस्वरूप इन्हें मौलाना की पदवी दी गयी।

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने अंग्रेजों के विरुद्ध जर्मनी का साथ दिया। इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने युद्ध जीतकर तुर्की को विभाजित कर दिया। तुर्की के शासक को मुस्लिम जगत में ‘खलीफा’ कहा जाता था। उसका साम्राज्य टूटने से मुसलमान नाराज हो गये। अली भाई तुर्की के शासक को फिर खलीफा बनवाना चाहते थे। 

इधर गांधी जी चाहते थे कि मुसलमान भारत की आजादी के आंदोलन से किसी भी तरह जुड़ जाएं। अतः उन्होंने 1921 में ‘खिलाफत आंदोलन’ की घोषणा कर दी। कांग्रेसजन गांधी जी के आदेश पर जेल भरने लगे। यद्यपि इस आंदोलन की पहली मांग खलीफा पद की पुनर्स्थापना तथा दूसरी मांग भारत की स्वतंत्रता थी। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा0 हेडगेवार इसे ‘अखिल आफत आंदोलन’ तथा हिन्दू महासभा के डा0 मुंजे ‘खिला-खिलाकर आफत बुलाना’ कहते थे; पर इन देशभक्तों की बात को गांधी जी ने नहीं सुना। कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण का जो देशघाती मार्ग उस समय अपनाया था, उसी पर आज भारत के अधिकांश राजनीतिक दल चल रहे हैं।

इस आंदोलन के दौरान ही मो0 अली जौहर ने अफगानिस्तान के शाह अमानुल्ला को तार भेजकर भारत को दारुल इस्लाम बनाने के लिए अपनी सेनाएं भेजने का अनुरोध किया। इसी बीच खलीफा सुल्तान अब्दुल माजिद अंग्रेजों की शरण में आकर माल्टा चले गये। आधुनिक विचारों के समर्थक कमाल अतातुर्क नये शासक बने। देशभक्त जनता ने भी उनका साथ दिया। इस प्रकार खिलाफत आंदोलन अपने घर में ही मर गया; पर भारत में इसके नाम पर अली भाइयों ने अपनी रोटियां अच्छी तरह सेंक लीं।

अब अली भाई एक शिष्टमंडल लेकर सऊदी अरब के शाह अब्दुल अजीज से खलीफा बनने की प्रार्थना करने गये। शाह ने उन्हें तीन दिन तक मिलने का समय ही नहीं दिया। चौथे दिन दरबार में सबके सामने उन्हें दुत्कार कर बाहर निकाल दिया। 

भारत आकर मो0 अली ने भारत को दारुल हरब (संघर्ष की भूमि) कहकर मौलाना अब्दुल बारी से हिजरत का फतवा जारी करवाया। इस पर हजारों मुसलमान अपनी सम्पत्ति बेचकर अफगानिस्तान चल दिये। इनमें उत्तर भारतीयों की संख्या सर्वाधिक थी; पर वहां उनके मजहबी भाइयों ने उन्हें खूब मारा तथा उनकी सम्पत्ति भी लूट ली। वापस लौटते हुए उन्होंने देश भर में दंगे और लूटपाट की। केरल में तो 20,000 हिन्दू धर्मांतरित कियेे गये। इसे ही ‘मोपला कांड’ कहा जाता है।

उन दिनों कांग्रेस के अधिवेशन वंदेमातरम् के गायन से प्रारम्भ होते थे। 1923 का अधिवेशन आंध्र प्रदेश में काकीनाड़ा नामक स्थान पर था। मो0 अली जौहर उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। जब प्रख्यात गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने वन्देमातरम् गीत प्रारम्भ किया, तो मो0 अली जौहर ने इसे इस्लाम विरोधी बताकर रोकना चाहा। इस पर श्री पलुस्कर ने कहा कि यह कांग्रेस का मंच है, कोई मस्जिद नहीं; और उन्होंने पूरे मनोयोग से वन्दे मातरम् गाया। इस पर जौहर विरोधस्वरूप मंच से उतर गये। 

इसी अधिवेशन के अपने अध्यक्षीय भाषण में जौहर ने 1911 के बंगभंग की समाप्ति को अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों के साथ किया गया विश्वासघात बताया। उन्होंने पूरे देश को कई क्षेत्रों में बांटकर इस्लाम के प्रसार के लिए विभिन्न गुटों को देने तथा भारत के सात करोड़ दलित हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की वकालत की।

उनकी इन देशघाती नीतियों के कारण कांग्रेस में ही उनका प्रबल विरोध होने लगा। अतः वे कांग्रेस छोड़कर अपनी पुरानी संस्था मुस्लिम लीग में चले गये। मुस्लिम लीग से उन्हें प्रेम था ही। चूंकि 1906 में ढाका में इसके स्थापना अधिवेशन में उन्होंने भाग लिया था।  1918 में वे इसके अध्यक्ष भी रहे थे। 

मो0 जौहर 1920 में दिल्ली में प्रारम्भ किये गये जामिया मिलिया इस्लामिया के भी सहसंस्थापक थे। 19 सितम्बर, 2008 को बटला हाउस मुठभेड़ में इस संस्थान की भूमिका बहुचर्चित रही है, जिसमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मोहन चंद्र शर्मा ने प्राणाहुति दी थी।

मो0 जौहर ने 1924 के मुस्लिम लीग के अधिवेशन में सिंध से पश्चिम का सारा क्षेत्र अफगानिस्तान में मिलाने की मांग की। 1930 के दांडी मार्च के समय गांधी जी की लोकप्रियता देखकर उन्होंने ही कहा था कि व्यभिचारी से व्यभिचारी मुसलमान भी गांधी से अच्छा है। 

1931 में वे मुस्लिम लीग की ओर से लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गये। वहीं चार जनवरी, 1931 को उनकी मृत्यु हो गयी। मरने से पहले उन्होंने दारुल हरब भारत की बजाय दारुल इस्लाम मक्का में दफन होने की इच्छा व्यक्त की थी; पर मक्का ने इसकी अनुमति नहीं दी, अतः उन्हें येरुशलम में दफनाया गया। 

यह भी ध्यान देने की बात है कि मो0 अली जिन्ना पहले भारत भक्त ही थे। उन्होेंने इस खिलाफत आंदोलन का प्रखर विरोध किया था; पर जब उन्होंने गांधी जी के नेतृत्व में पूरी कांग्रेस को अली भाइयों तथा मुसलमानों की अवैध मांगों के आगे झुकते देखा, तो वे भी इसी मार्ग पर चल पड़े। जौहर की मृत्यु के बाद जिन्ना मुसलमानों के एकछत्र नेता और फिर पाकिस्तान के निर्माता बन गये।

भारत और भारतीयता, हिन्दू और हिन्दुत्व के प्रबल विरोधी के नाम पर बने विश्वविद्यालय से कैसे छात्र निकलेंगे, यह समझना कठिन नहीं है।