रविवार, 28 अप्रैल 2013

व्यंग्य बाण : गुस्से की बात


कभी-कभी बहुत गुस्सा आता है। कोई बात हो या न हो, पर आता है। शायद आपको भी आता होगा। गुस्सा आये और किसी तरह से भी न निकले, तो फिर बड़ी परेशानी हो जाती है। इसलिए गुस्से का निकलना बहुत जरूरी है।

शर्मा जी को एक बार उनके अधिकारी ने दफ्तर में बुरी तरह डांट दिया। गलती यद्यपि छोटी सी थी, पर डांट की डोज कुछ ज्यादा ही हो गयी। शर्मा जी को गुस्सा तो बहुत आया; पर वे ठहरे एक सामान्य क्लर्क। इसलिए कुछ नहीं कर सकते थे, सो चुपचाप वापस अपनी सीट पर आकर बैठ गये। 

लेकिन गुस्सा था कि शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। इसलिए उन्होंने फाइलें समेटी और झोला उठाकर समय से दो घंटे पहले ही घर जा पहुंचे। घर पर श्रीमती जी आराम कर रही थीं। बस फिर क्या था, शर्मा जी भड़क गये और सुबह का सारा गुस्सा ब्याज सहित उन पर उतार दिया।

मैडम बेचारी क्या करतीं, चुपचाच गुस्सा पी लिया। थोड़ी देर बाद बेटा स्कूल से वापस आया और हर दिन की तरह जूते फेंककर खाना मांगने लगा। बस फिर क्या था, मैडम ने उसे दो चांटे लगा दिये; लेकिन बात यहां पर समाप्त नहीं हुई। बेटे ने अंदर जाकर छोटी बहिन को पीट दिया। बहिन ने गुस्से में आकर अपनी गुडि़या को फर्श पर पटक दिया। इस तरह दफ्तर में अधिकारी के गुस्से से शुरू हुई कहानी गुडि़या के टूटने पर जाकर समाप्त हुई।

एक बार मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था। मैंने शर्मा जी के अनुभव का लाभ उठाते हुए घर जाकर मैडम को हड़काना चाहा; पर वे मुझसे भी अधिक गुस्से में थी। क्योंकि कुछ देर पहले ही उनकी तू-तू, मैं-मैं अपनी खूंखार पड़ोसन से हो चुकी थी। इसलिए मुझसे पहले वे चालू हो गयीं और अपना गुस्से वाला मटका मुझ पर पलट दिया। 

मैं बेचारा किस्मत का मारा, उल्टे पांव वापस हो गया। बाजार में जाकर चाय पी और तीन-चार घंटे पार्क में बिताकर देर रात घर लौटा। आगे की बात जानकर आप क्या करेंगे ? बस इतना ही समझ लें कि रात में भूखे पेट सोना पड़ा।

लेकिन आज मुझे फिर गुस्सा आ रहा था। मैंने बहुत सिर मारा; पर समझ नहीं पाया कि गुस्सा कहां और किस पर उतारूं ? इसलिए मैंने एक बार फिर शर्मा जी की ही शरण ली।

- वर्मा जी, यह समस्या आज की नहीं, बहुत पुरानी है। 1947 से पहले हम लोग हर बात के लिए अंग्रेजों को दोषी ठहरा देते थे।  फिर यह गुस्सा व्यापारी और उद्योगपतियों से होता हुआ नक्सलियों और माओवादियों की ओर मुड़ गया; पर अब यह फैशन भी पुराना हो गया। इसलिए तुम अपना गुस्सा नेता जी पर उतार दो।

- नेता जी पर.. ?

- हां। भारत में यही एक ऐसा प्राणी है, जिस पर सब नाराज हो सकते हैं। तुम किसी भी कवि सम्मेलन में जाओ, वहां हर कवि नेताओं की मजाक बनाता मिलेगा। व्यंग्यकारों के लिए भी उन पर टिप्पणी करना बहुत सरल है। पुलिस वाले भी अपनी ज्यादतियों का दोष नेताओं को देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। कई बार तो लोग मंच पर बैठे नेता जी के सामने ही ऐसा-वैसा कह देते हैं, और वे चुपचाप खून का घंूट पीकर रह जाते हैं।

- लेकिन शर्मा जी, वे ऐसा क्यों करते हैं ?

- क्योंकि वोट देने के बाद अगले पांच साल तक जनता के पास हाथ झटकने और पैर पटकने के अलावा कोई अधिकार नहीं रहता। इसलिए वे अपना गुस्सा निकाल कर यदि मन हल्का कर लेते हैं, तो अरबों-खरबों में खेलने वाले नेता जी के लिए यह कोई घाटे का सौदा नहीं है। 

- लेकिन शर्मा जी, मेरे मोहल्ले में तो कोई नेता नहीं है।

- तो तुम पुलिस वालों पर गुस्सा झाड़ दो। वे भी भ्रष्टाचारियों और माफियाओं से मिले रहते हैं। तुम अखबार में देखते ही होगे कि हर नेता पुलिस वालों को गाली देता रहता है। कहते हैं कि हर थाने में रात के समय शराब और कबाब की महफिल सजती है। ऐसे में यदि कोई अभागी अपनी शिकायत लेकर पहुंच जाए, तो महफिल में शबाब का तड़का भी लग जाता है; लेकिन उन पर गुस्सा उतारते समय यह ध्यान रखना कि कहीं वे गुस्से में न आ जाएं। क्योंकि हमारी-तुम्हारी तरह उनका गुस्सा शाकाहारी नहीं होता।

- आप कैसी बात कह रहे हैं शर्मा जी। मैं तो बहुत ही कमजोर दिल का आदमी हूं। मैं तो उस सड़क को ही छोड़ देता हूं, जिस पर पुलिस वाले खड़े हों। आप गुस्सा निकालने का कोई और रास्ता बताओ।

- तो फिर तुम गरीबों पर गुस्सा निकाल लो। 

- गरीबों पर.. ?

- हां। तुमने सुना ही होगा, गरीब की जोरू, सबकी भौजाई। उस पर चाहे हंसो, चाहे उसका मजाक बनाओ, उसे मारो या अपमानित करो; पर वह बेचारा चुप रहता है। 

- हां, यह बात तो है शर्मा जी। हमारे मोहल्ले में एक धनुआ मोची है। उसे बच्चे से लेकर बड़े तक सब छेड़ते रहते हैं; पर वह बेचारा खिसिया कर ही रह जाता है।

- इसीलिए हमारे सत्ताधीश भी बार-बार मजाक कर उनके घावों पर नमक छिड़कते रहते हैं। एक बार इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर चुनाव जीता था। तब से उनकी पार्टी और परिवार वाले अपनी गरीबी हटा रहे हैं। दलाली देश से मिले या विदेश से, उन्हें सब हजम हो जाती है। दिल्ली की वर्तमान मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के अनुसार यहां अपराध बढ़ने का कारण यह है कि पूरे देश से गरीब मुंह उठाकर सीधे दिल्ली चले आ रहे हैं। योजना आयोग के बस का और कुछ नहीं है, तो वे गरीबी रेखा को ही आगे-पीछे खिसकाकर आंकड़ों की जुगाली करते रहते हैं। 

- शर्मा जी कुछ दिन पहले रिजर्व बैंक के गवर्नर सुब्बाराव ने भी तो गरीबों के बारे में कुछ कहा था ?

- हां, उन्होंने कहा था कि जेब में पैसा आने से गरीब लोग अधिक खाने लगे हैं, इसलिए गरीबी बढ़ रही है।

- ये तो बहुत ही गंदा मजाक है शर्मा जी..। 

- ये तुम्हारे लिए गंदा हो सकता है; पर इन अमरीका पलट लोगों के लिए नहीं। पता नहीं इन्होंने विश्व बैंक की ताजी रिपोर्ट पढ़ी या नहीं, जिसमें कहा है कि दुनिया के एक तिहाई गरीब भारत में हैं।

- पर शर्मा जी, ऐसी बातें सुनकर गरीबों को गुस्सा नहीं आता ?

- गुस्सा आता तो फिर बात ही क्या थी वर्मा। उनकी किस्मत में गुस्सा नहीं, भूख और अपमान लिखा है। इसीलिए तो मैं तुमसे कह रहा हूं कि तुम भी अपना गुस्सा उन्हीं पर निकाल लो।

- लेकिन शर्मा जी, आपकी बात सुनकर तो मुझे उन लोगों पर गुस्सा आ रहा है, जो इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं

- यदि ऐसा है, तो इसे संभालकर रखो। इसे अभी व्यर्थ न निकल जाने दो। क्योंकि चोट वही असर करती है, जो सही समय और सही स्थान पर पूरी ताकत से की जाए। उस चोट का समय भी आ रहा है; पर यह ध्यान रखना कि तब इधर-उधर की बातों में फंसकर इस गुस्से को भूल न जाना।

मैं शर्मा जी का मुंह देखता रह गया।