मंगलवार, 28 मई 2013

व्यंग्य बाण : डंडा सैल

परसों शर्मा जी बहुत दिन बाद मिलने आये, तो उनकी सूजी हुई आंखों से दुख टपक रहा था। चेहरे से ऐसा लग रहा था मानो सगे पिताजी चल बसे हों। इतना परेशान तो मैंने उन्हें पिछले 25 साल में कभी नहीं देखा था। फिर आज... ?

- क्या हुआ शर्मा जी, कुछ तो बताओ। बड़ों ने कहा है कि बांटने से दुख घटता है। हो सकता है मैं आपके कुछ काम आ सकूं ?

- नहीं वर्मा, तुम नहीं समझोगे। मेरा दिल फटा जा रहा है। तुम कुछ दूर हो जाओ, वरना दो-चार टुकड़े तुम पर भी गिर पड़ेंगे। तुमने सुना ही होगा, 'इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा।' बस मेरा भी यही हाल है।

- लेकिन दिल के इस तरह फटने और टुकड़े-टुकड़े होने का कोई कारण तो होगा ?

- तुम दिन भर पत्र-पत्रिकाएं चाटते रहते हो और फिर भी कारण पूछ रहे हो ? लानत है तुम पर वर्मा।

- शर्मा जी, आप मेरे बड़े भाई हैं। इसलिए आपकी लात और लानत, दोनों मुझे स्वीकार हैं; पर असली बात तो बताओ।

मेरे इतना कहते ही शर्मा जी का गला भर आया और आंसू फिर कमीज को गीला करने लगे। मैंने अपनी जेब से रूमाल निकाल कर उन्हें पोंछ दिया।

- तुमने सुना नहीं, संजू बाबा को जेल भेज दिया गया है।

- कौन संजू बाबा; हमारे मोहल्ले का कोई लड़का है क्या ?

- तुम तो जले पर नमक छिड़क रहे हो वर्मा। संजू बाबा यानि बेचारा संजय दत्त। कितना मासूम चेहरा है उसका; पर उस निर्दयी जज ने उसे साढ़े तीन साल के लिए जेल में डाल ही दिया। 

- तो इसमें गलत क्या हुआ; उसके कारण 1993 में मुंबई में सैकड़ों लोग मारे गये थे। उस पर तो नरसंहार का मुकदमा चलना चाहिए था; पर वह खानदानी कांग्रेसी जो ठहरा। इस लिए शासन ने अवैध हथियार के मामले में छोटी सी सजा दिलवाकर मामला रफा-दफा कर दिया। 

- इतना गुस्सा मत करो वर्मा। ये तो सोचो कि खुद को सुधारते हुए अब वह दिन भर में केवल दो बोतल शराब और 25 सिगरेट पर आ गया था। तुमने वो फिल्म तो देखी होगी, जिसमें उसने कमाल की गांधीगिरि की है।

- शर्मा जी, मेरी रुचि न गांधी में है और न गांधीगिरि में। मेरे पास फिल्में देखने के लिए बेकार समय भी नहीं है।   

- लेकिन उसे जेल भेजकर सरकार ने ठीक नहीं किया।

- जी हां, उसे तो ‘भारत रत्न’ दिया जाना चाहिए था। सरकार का बस चलता, तो शायद यह भी हो जाता; पर जनता के दबाव और न्यायालय की सक्रियता से उसे जेल जाना पड़ा।

- लेकिन वर्मा, कई बड़े लोगों ने यह अपील की थी कि उसकी सजा माफ की जानी चाहिए।

- शर्मा जी, लोग चाहे बड़े हों या बहुत बड़े। आतंकवादियों के इन समर्थकों को भी जेल में डाल देना चाहिए।  

- तुम तो उस जज से भी बड़े मूर्ख हो, जिसने उसके परिवार की देशसेवा के बारे में भी कुछ नहीं सोचा।

- शर्मा जी, संजय की मां नरगिस और पिता सुनील दत्त दोनों सांसद रहे थे। उसकी बहिन प्रिया इस समय भी सांसद है। 

- मैं भी तो इसी सेवा की बात कर रहा हूं।

- तो कृपया अपनी गलतफहमी दूर कर लीजिये। लोग संसद में सेवा करने नहीं, मेवा बटोरने जाते हैं। सेवा करने वाले तो राजनीति और राजनेताओं से कोसों दूर रहते हैं। 

- पर चुनाव लड़ते समय तो सब यही कहते हैं कि हम देश और जनता की सेवा करना चाहते हैं।

- जी हां, पर चुनाव जीतते ही इन नेक विचारों को पांच साल के लिए अल्मारी में रखकर अधिकांश लोग जनसेवा की बजाय घरसेवा और देशसेवा की बजाय जेबसेवा में लग जाते हैं। राजनीति भी अब आई.पी.एल. क्रिकेट की तरह दलाली का दो नंबरी धंधा हो गयी है। इसीलिए कब्र में पैर लटकने के बावजूद लोगों का कुर्सी से मोह नहीं छूटता।

- लेकिन वर्मा, संजू बाबा की पत्नी और बच्चों का क्या होगा ? कई फिल्म निर्माताओं के भी करोड़ों रुपये बरबाद हो गये।

- शर्मा जी, वहां तो वैभव की कोई कमी नहीं है। उसके पुरखे भी बहुत कुछ छोड़ गये हैं। इसलिए उनका काम तो चल जाएगा; पर आप ये बताएं कि उन सैकड़ों घरों का क्या होगा, जहां रोटी कमाने वाला ही मारा गया। जो बच्चे अनाथ हो गये, क्या उनकी बरबादी का हाल पूछने ये बड़े लोग गये थे, जो अब छाती पीट रहे हैं।

- वर्मा, तुममें मानवता नाम की चीज नहीं है। बन्दी के भी कुछ मानवाधिकार होते हैं। तुम्हारे मन में इस बात का जरा भी दर्द नहीं है कि उस बेचारे ने तीन दिन ‘अंडा सैल’ में कैसे बिताये होंगे ? 

मेरी मेज पर एक डंडा रखा था। मैंने उसे हाथ में ले लिया।

- शर्मा जी, ऐसे मानवाधिकार आपको ही मुबारक हों। सरकार ने न जाने क्यों उसे पुणे भेज दिया ? उसे तो अंडा नहीं ‘डंडा सैल’ में भेजा जाना चाहिए था।

- ‘डंडा सैल’ में ?

- जी हां, जहां हर दिन चार-छह लोग उसकी मोटे डंडों से धुलाई करें, जिससे उसके दिमाग में घुसी आतंक की गंदगी सदा के लिए छूट जाए। वहां उसकी गांधीगिरि के असर का भी पता लग जाता। इस धुलाई का थोड़ा सा मजा उन सेक्यूलर नेता, अभिनेता और मीडिया वालों को भी चखाना चाहिए, जिन्होंने उस देशद्रोही ‘खलनायक’ को सिर पर बैठाकर फिर ‘नायक’ बना दिया।

शर्मा जी ने अब खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझी।

सोमवार, 27 मई 2013

व्यंग्य बाण : बेशर्म कथा


बात अधिक पुरानी नहीं है। शर्मा जी के मोहल्ले में एक जैसी सूरत और कद-काठी की दो जुड़वां बहनें रहती थीं। एक का नाम था शर्म और दूसरी का बेशर्म। ऐसा नाम उनके माता-पिता ने क्यों रखा, ये आप उनसे ही पूछिये। 

जुड़वां होने से उन्हें कई लाभ थे। दोनों बदल-बदल कर एक दूसरे के कपड़े पहन लेती थीं। जब वे पढ़ने गयीं, तो दोनों का प्रवेश एक ही कक्षा में हुआ। इससे एक ही बस्ते और पुस्तकों के एक ही जोड़े से दोनों का काम चल जाता था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। अतः विद्यालय वालों ने एक की फीस भी माफ कर दी।

लेकिन इस जुड़वांपन से कुछ नुकसान भी थे। नाम के अनुरूप ही दोनों का स्वभाव था। शर्म सीधी सादी थी, तो बेशर्म उच्छृंखल। इसका परिणाम यह होता कि प्रायः शरारत कर बेशर्म छिप जाती और डांट शर्म को खानी पड़ती। कभी-कभी बेशर्म खाना खाकर थोड़ी देर में फिर आ जाती और शर्म के हिस्से का खाना भी खा लेती। बेचारी शर्म को भूखा ही रहना पड़ता। 

एक बार खेलते हुए बेशर्म पेड़ से गिर गयी। इससे उसके माथे पर चोट आ गयी। कुछ दिन में चोट तो ठीक हो गयी; पर माथे पर एक स्थायी काला निशान बन गया। इससे उनकी पहचान का संकट समाप्त हो गया। अब लोग आसानी से समझने लगे कि माथे पर काले धब्बे वाली का नाम बेशर्म है और दूसरी का शर्म।

कहते हैं कि लड़कियां बहुत जल्दी बड़ी हो जाती हैं। यहां भी ऐसा ही हुआ और उचित घर-वर देखकर उनके विवाह कर दिये गये। दोनों अपनी ससुराल जाकर घर-गृहस्थी के झंझटों में व्यस्त हो गयीं।

समय बीतने के साथ ही बातें और यादें पुरानी हो जाती हैं; पर पिछले दिनों शर्मा जी के घर गया, तो वहां बेशर्म बैठी मिल गयी।  यों तो वह घर में अंदर की तरफ शर्मा मैडम से बात में व्यस्त थी; पर मुझे देखा तो बाहर आ गयी। मुझे भी बहुत अच्छा लगा। कई साल बाद मिली थी, तो सुख-दुख की बात होने लगी।

- कैसी हो तुम बिटिया...?

- ठीक हूं चाचा जी।

- और तुम्हारे बाल-बच्चे, बाकी घर वाले... ?

- वे सब भी ठीक हैं।

- एक बात पूछूं, बुरा मत मानना। इस नाम के कारण तुम्हें ससुराल में कोई परेशानी तो नहीं होती ?

- परेशानी की कोई बात नहीं है चाचा जी। आजकल शर्म को कौन पूछता है ? सब तरफ बेशर्मी का ही जमाना है। लोग अच्छे-अच्छे नाम रखकर बेशर्मी कर रहे हैं; पर हमारे माता-पिता बहुत समझदार थे। वे जानते थे कि आगे आने वाले दिन बेशर्मी के ही हैं। इसलिए इस नाम से मुझे लाभ ही हो रहा है। वैसे आप कभी मेरे पति और ससुराल वालों से मिले हैं या नहीं ?

- बस जिस दिन तुम्हारा विवाह था, तभी उन्हें देखा था। मुझे तो उनके नाम भी ध्यान नहीं है।

- देखिये अंकल, नाम में आजकल कुछ नहीं रखा। बस इतना जान लीजिये कि मेरे पति की गति तो पवन जैसी है। जब वे चलते हैं, तो लगता है जैसे ‘चंडीगढ़ एक्सप्रेस’ पटरियों पर दौड़ रही हो। बहुत ही दुबले-पतले, सज्जन व्यक्ति। स्वास्थ्य के प्रति बहुत जागरूक हैं, इसलिए मुंह से बहुत कम खाते-पीते हैं। हां, उनके भांजे-भतीजे उनके नाम पर चाहे जो खा लें। इसमें वे टोकाटाकी नहीं करते। इतनी छूट तो मामा के घर सबको रहती ही है। बच्चे अपने मामा के राज में नहीं खाएंगे, तो फिर कब खाएंगे ? आखिर उनके खेलने-खाने और स्वास्थ्य बनाने के तो यही दिन हैं। 

- पर यह सब देखकर उन्हें कुछ शर्म तो आती होगी ?

- आप भी कैसी बात करते हैं चाचा जी। शर्म की सीमा होती है, बेशर्मी की नहीं। वैसे तो वहां पुरखों के समय से खाने-पीने की यही बेशर्म परम्परा चली आ रही है; पर मैंने वहां जाकर बची-खुची सीमा भी तोड़ दी है। अब तो सब तरफ खुला खेल फरुखाबादी है। पैसा फेंको, तमाशा देखो। इस हाथ दो, उस हाथ लो। 

- सास-ससुर के अलावा घर में और कौन-कौन हैं ?

- और तो बस मेरा कानूनबाज देवर है। दिन भर कागजों पर लाल निशान लगाता रहता है। उससे भी मेरी खूब पटती है। उसकी अभी शादी नहीं हुई; पर उसका स्वभाव भी अपने भैया जैसा ही है। सो उसके लिए अपने से भी 'सुपर' बेशर्म लड़की ढूंढ रही हूं। कोई आपकी नजर में हो तो बताएं। देसी न हो, तो विदेशी भी चल जाएगी।

- हां एक-दो लड़कियां हैं तो; पर मैं तुम्हारे रिश्तेदारों से मिलूंगा कैसे ?

- इसके लिए आपको अधिक दूर नहीं जाना पड़ेगा। वे सब सत्ता के गलियारों में दलाली करते मिलते हैं। कोई भी बता देगा। दिल्ली में रायसीना रोड हो या रेसकोर्स रोड, राजपथ हो या जनपथ, सब तरफ हमारे बेशर्म खानदान का ही खोटा सिक्का चलता है।

- पर मैं उन्हें पहचानूंगा कैसे ?

- यह भी बहुत आसान है। जो शर्म की पगड़ी पहने, बेशर्मी करता मिले; बस समझ लेना, वह मेरा ही रिश्तेदार है।

अब मेरे पास न पूछने को कुछ था और न उसके पास बताने को। यदि आपकी निगाह में कोई 'सुपर' या 'सुपर डीलक्स' बेशर्म कन्या हो, तो उनसे मिल लें। पता और पहचान तो उसने बताई ही है।