गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

व्यंग्य बाण : बंदर जी के तीन गांधी

शर्मा जी ऊपर से चाहे जो कहें; पर सच यह है कि दिल्ली में रहने के बावजूद गांधी जी की समाधि पर जाने में उनकी कोई रुचि नहीं है। वे साफ कहते हैं कि जब मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हूं, तो फिर दिखावा क्यों करूं ? पर इस दो अक्तूबर को बाहर से आये एक मित्र के साथ उन्हें राजघाट जाना ही पड़ा।

राजघाट में गांधी जी का साहित्य बड़ी मात्रा में बिक रहा था। उनके मित्र ने भी कुछ पुस्तकें खरीदीं। बाहर आये, तो वहां खिलौने वाले गांधी जी और उनके तीन बंदरों की मूर्तियां बेच रहे थे। वैसे तो इनके संदेश ‘बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो’ को अब कोई नहीं मानता, फिर भी शर्मा जी ने इन्हें घर में सजाने के लिए खरीद लिया। कुछ चाट-पकौड़ी खाकर वे वापस आ गये। रात की गाड़ी से मित्र महोदय भी वापस चले गये।

मूर्तियां शर्मा जी ने अपने शयनकक्ष में मेज पर रख दीं। रात में एक जरूरी काम से जब उनकी आंख खुली, तो वे हैरान रह गये। गांधी जी की मूर्ति की जगह एक बंदर बैठा था और बंदरों के स्थान पर गांधी जी का मुखौटा लगाये तीन हस्तियां विराजमान थीं। वे तीनों बार-बार गुस्से में बंदर को डांट-फटकार रहे थे और बेचारे बंदर जी चुपचाप उसे सुनकर आंसू बहा रहे थे।

गांधी नंबर एक - ऐ मिस्टर बंदर सिंह !

- जी मैडम जी।

- हमने कितनी बार कहा है साम्प्रदायिक हिंसा के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराने वाला विधेयक हर हाल में पारित होना चाहिए। फिर उसमें देरी क्यों हो रही है ?

- मैडम जी, कोशिश तो कर रहे हैं; पर दल और सरकार के अंदर उस पर बहुत विरोध है। यदि हमने दबाव डाला, तो सरकार टूट जाएगी। वैसे तो अब थोड़े ही दिन बचे हैं, फिर भी.....।

- बंदर सिंह, तुम ये क्यों नहीं समझते कि अब हिन्दू तो हमें वोट देंगे नहीं; पर यदि यह विधेयक पारित हो गया, तो कम से कम मुसलमान और ईसाई वोट तो पक्के हो जाएंगे। 

- हां, ये बात तो है।

- फिर..? और इस मुद्दे पर यदि सरकार गिरेगी, तो उसका भी बहुत अच्छा संदेश जाएगा। इसलिए बाकी सब काम छोड़कर इसे पारित कराओ। मेरी तबियत ठीक नहीं रहती। पता नहीं कब...। मैं अपनी आंखों के सामने अपने पप्पू को तुम्हारी कुर्सी पर बैठे देखना चाहती हूं। इसलिए चाहे जैसे भी हो, इस विधेयक को पारित कराओ।

- अच्छा मैडम जी, जो हुक्म।

गांधी नंबर दो - क्यों बंदर जी, अपराधियों को राजनीति में बनाये रखने वाले विधेयक के विरोध का मेरा नाटक कैसा रहा ?

- बहुत अच्छा रहा। सब आपकी प्रशंसा कर रहे हैं। अखबारों ने भी कई महीने बाद आपका चित्र पहले पृष्ठ पर छापा। आपने भी तो देखा होगा ?

- नहीं बंदर जी। हिन्दी पढ़नी तो मुझे आती नहीं। अंग्रेजी अखबारों में भी हर दिन नरेन्द्र मोदी को देखकर सुबह-सुबह मेरा मूड खराब हो जाता है। इसलिए मैंने अखबार पढ़ना ही बंद कर दिया है।

- आप ठीक कह रहे हैं हुजूर। पढ़ना तो मैं भी नहीं चाहता; पर क्या करूं, इसके बिना काम भी तो नहीं चलता ? 

- चुनाव सिर पर आ गया है बंदर जी। कुछ ऐसे ठोस उपाय बताओ, जिससे इस कठिन दौर में नैया पार हो सके।

- आप भी कैसी बात कर रहे हैं सर जी। ये उपाय मुझे पता होते, तो मैं ही चुनाव न जीत जाता। फिर भी एक बात बताता हूं।

- हां, हां, बताइये।

- आप अगले चुनाव तक पाउडर लगाना बंद कर दें। इससे आपका चेहरा दीन-हीन, उदास और गरीबों का हमदर्द सा लगेगा। अंदर चाहे जो हों; पर बाहर के कपड़े स्वदेशी और कुछ पुराने या मैले से पहनें। विदेशी जूते की जगह गांधी आश्रम की चप्पल अच्छी रहेगी। इससे गांधी जी भले ही सिर पर न हों, पैरों में तो रहेंगे ही।

गांधी नंबर तीन - बंदर अंकल, राबर्ट के कारोबार के बारे में आपका एक अधिकारी बहुत शोर कर रहा है, उसका कुछ किया ?

- जी हां, कई बार उसका स्थानांतरण कर चुके हैं, फिर भी उसका दिमाग ठीक नहीं हुआ। इसलिए इस बार उसे आरोप पत्र थमा दिया है। मेरी पूरी कोशिश है कि उसे जेल भिजवा दूं। जिससे उसका ही नहीं, बाकी सबका दिमाग भी ठीक हो जाए। 

- जरा जल्दी करो बंदर अंकल। अब कुछ महीने ही तो बाकी हैं। इसमें जितना माल बना लें, उतना अच्छा है। पता नहीं, जीवन में फिर कभी ऐसा मौका मिले न मिले ?

शर्मा जी काफी देर तक उनकी बात सुनते रहे। फिर उन्हें नींद आ गयी। सुबह उठे, तो मूर्तियां वैसी ही थीं, जैसी राजघाट से खरीद कर लाये थे। वे बहुत देर तक सोचते रहे; पर माजरा समझ नहीं आया। अगली रात में भी ऐसा ही हुआ। आज सुबह जब वे पार्क में मिले, तो उन्होंने पूरी कहानी सुनाकर पूछा - क्यों वर्मा जी, दिन में तो गांधी जी और बंदर अपनी जगह रहते हैं; पर रात में वे स्थान बदल लेते हैं। ये क्या तमाशा है ?

- शर्मा जी, ये भारत की वर्तमान राजनीति का सच है। जो सरकार चला रहे हैं, वे दिखाई नहीं देते; और जो दिखाई दे रहे हैं, उनके हाथ में कुछ करने की ताकत नहीं है। इसलिए जो परदे के आगे हैं, उन पर थू-थू हो रही है और जो परदे के पीछे हैं, वे हर तरह से मजे में हैं। 

- अच्छा जी.. ?

- जी हां। और जो परदे के पीछे हैं, उनके भी पीछे कौन है, यह बहुत कम लोगों को पता है। राष्ट्रीय राजनीति और अतंरराष्ट्रीय कूटनीति के इस अंतर को समझना आसान नहीं है।

- लेकिन राजनीति और कूटनीति के चक्कर में देश का शासन और प्रशासन तो चैपट हो जाएगा ?

- वाह रे मेरे प्यारे शर्मालाल। यदि तुम्हें अब भी शासन चैपट नहीं लगता, तो अपनी आंखों का इलाज वहां कराओ, जहां हर दीवाली पर लक्ष्मी जी अपने वाहन की सर्विस कराती हैं। इससे तुम्हें दिन के अंधेरे और रात के उजाले का अंतर साफ दिखने लगेगा। 

बात काफी गहरी थी, इसलिए शर्मा जी के पल्ले नहीं पड़ी। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और आंखें पोंछते हुए प्रस्थान कर गये।

सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

आलेख : विचारों का ढूला और अभिव्यक्ति का जन्तर मन्तर

प्रवक्ता.com की पांचवी वर्षगांठ पर -

आपातकाल में कांग्रेसी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लोकतंत्र की हत्या और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे देशभक्त संगठन पर लगाये गये प्रतिबंध के विरुद्ध अपने साथियों सहित सत्याग्रह कर मैं पौने चार महीने डी.आई.आर. के अन्तर्गत मेरठ जेल में रहा। 

वहां सबसे अधिक तो संघ और जनसंघ वाले ही थे।  चौधरी चरणसिंह का गृह जिला होने के कारण उसके बाद सर्वाधिक संख्या उनके लोगों की थी। उन दिनों वे किस दल में थे, ध्यान नहीं। क्योंकि दल बनाने और बदलने में यह परिवार कुख्यात है। ऐसा कोई दल नहीं है, सत्ता के लिए जिससे इन्होंने मित्रता कर फिर धोखा न दिया हो। इनके साथ ही कुछ नक्सली, सर्वोदयी, आनंदमार्गी और जमात-ए-इस्लामी वाले भी थे। उनमें से कई आगे चलकर विधायक और सांसद बने। इन दिनों भी संसद और उ.प्र. की कैबिनेट में मेरठ जेल के कुछ साथी हैं।

हमारी बैरक में सबको सोने के लिए तीन फुट चौड़ा और छह फुट लम्बा एक पक्का चबूतरा (ढूला) मिला हुआ था। चाहे कोई सुने या नहीं; पर कई लोग शाम को उस ढूले पर खड़े होकर भाषण देते थे। ऐसे एक वक्ता का कहना था कि राजनेता को भाषण देना जरूर आना चाहिए। इसीलिए मैं इसका अभ्यास कर रहा हूं।

प्रवक्ता भी विचारों का ऐसा ही एक ढूला है, जहां हर व्यक्ति अपनी बात कह सकता है। जो लोग लेखन या पत्रकारिता में आगे बढ़ना चाहते हैं। उनके अभ्यास के लिए यह अच्छा स्थान है।

एक और तरह से सोचें, तो सभी राज्यों की राजधानी में विधानसभा के आसपास कुछ स्थान निर्धारित होते हैं, जहां लोग धरने, प्रदर्शन, अनशन आदि कर सकते हैं। विधानसभा चलते समय यहां खूब रौनक रहती है। स्थान निश्चित होने से प्रदर्शनकारी और पत्रकार, दोनों को सुविधा रहती है। लखनऊ में इसके लिए गांधी जी और सरदार पटेल की मूर्तियां हैं, तो दिल्ली में जंतर-मंतर है। आप किसी के समर्थन में हैं या विरोध में, यहां आपका स्वागत है। यदि प्रदर्शन किसी बड़ी संस्था या राजनीतिक दल द्वारा आयोजित हो, तो वहां भारी भीड़ और जिन्दाबाद-मुर्दाबाद का शोर होता है। प्रदर्शन शासन के विरोध में हो, तो फिर धक्कामुक्की, लाठी या पानी की बौछार भी सहनी पड़ती है; लेकिन यदि आपके साथ कोई बड़ी संस्था नहीं है, तो भी ये स्थान आपको निराश नहीं करते।   

प्रवक्ता भी अभिव्यक्ति का ऐसा ही जंतर-मंतर है। अतंरजाल (इंटरनेट) के कई ठिकानों पर वैचारिक लेख का विरोध करते हुए कई लोग अपने दिल और दिमाग की गंदगी के साथ अपने घरेलू या संस्थागत कुसंस्कार भी उलीच देते हैं; लेकिन प्रवक्ता का मंच इस दृष्टि से अच्छा है कि यहां लोग शिष्ट विरोध करते हैं।

बहुत से पत्र, पत्रिकाएं तथा अतंरजालीय ठिकाने वैचारिक स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटते हुए भी अपने खोल से बाहर नहीं निकलते। कुछ पत्रिकाएं तो नये लेखकों को यह समझाती हैं कि वे कुछ ऐसा लिखें, जिससे पत्रिका का इच्छित निष्कर्ष निकल सके। वैचारिक प्रतिबद्धता वाले पत्रों का होना गलत नहीं है; पर फिर उन्हें यह पाखंड नहीं करना चाहिए। यह वैचारिक भ्रष्टाचार है।

प्रवक्ता स्वयं को ‘अभिव्यक्ति का अपना मंच’ कहता है। अपने लिए यह विशेषण उसने ठीक ही चुना है। मंच का कोई निजी विचार नहीं होता। हां, उस पर आकर लोग निजी विचार प्रकट कर सकते हैं; लेकिन प्रवक्ता के संचालकों की विचारधारा स्पष्ट होते हुए भी वे मंच की भूमिका निभाते हुए सबको लिखने और टिप्पणी करने का अवसर दे रहे हैं। मैं समझता हूं कि उदारता के यह संस्कार उन्हें उस संगठन से मिले हैं, जिसमें उनकी जड़ें हैं। 

लेकिन इस मंच के संचालक स्वयं को सम्पादक कहते हैं। अतः उनसे कुछ विस्तृत भूमिका की अपेक्षा की जाती है। जैसे खान से निकले अनगढ़ हीरे को कुशल कारीगर कांट-छांट और चमका कर लाखों रु. का बना देता है। ऐसे ही सम्पादक भी रचना की भाषायी और तथ्यात्मक अशुद्धियों को दूर करने, उसमें दिये उद्धरण, दोहे, सुभाषित, शेर आदि को जांच कर ठीक करने, शीर्षक व उपशीर्षक लगाने, कविता के छंद, गति और लय आदि को सुधारने का काम करता है; पर इसके लिए अत्यधिक अध्ययनशीलता, लगन, छंदानुशासन की जानकारी और संदर्भ ग्रन्थों की आवश्यकता होती है। 

जो तपस्वी सम्पादक निष्ठापूर्वक ऐसा करते हैं, उनकी आंखों पर मोटा चश्मा चढ़ जाता है। उनके कंधे झुक जाते हैं और वे पायल्स के रोगी हो जाते हैं; पर वे ही लेखकों की नयी फसल भी तैयार कर पाते हैं। मैं भाग्यवान हूं कि मुझे लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ के सम्पादक श्री आनंद मिश्र ‘अभय’ के साथ नौ वर्ष रहने का अवसर मिला। वे ऐसी ही एक विभूति हैं।

लेकिन प्रवक्ता का यह पक्ष कुछ दुर्बल है। सब्जी बेचने वाला भी मंडी से सब्जी लाकर उसे धो और पोंछकर सुंदरता से रखता है; पर प्रवक्ता के सम्पादक हर रचना को ‘यथावत’ प्रस्तुत कर देते हैं। या तो इसके पीछे समय का अभाव है या कुछ और; पर यदि यह उनकी नीति है, तो वे स्वयं को संचालक या संयोजक कहें, सम्पादक नहीं। वैसे भी मंच पर वक्ता, प्रवक्ता, अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, संयोजक या संचालक आदि ही होते हैं, सम्पादक नहीं।

एक बात और। किसी ने कहा है, ‘पसंद अपनी-अपनी, खयाल अपना-अपना’। कम से कम मुझे तो प्रवक्ता पर वैचारिक लेख और सार्थक व्यंग्य या कहानी ही अच्छे लगते हैं। बैंगन की चटनी और करेले का मुरब्बा नहीं। इसके लिए और भी कई स्थान हैं। कला, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान की हजारों विधाएं हैं। आप किस-किस को अपने मंच पर स्थान देंगे ? अनाज मंडी में लोग अनाज लेने ही जाते हैं, मिठाई नहीं। इसलिए प्रवक्ता को विचारों की अभिव्यक्ति का मंच ही बना रहने दें; चटनी या अचार की दुकान नहीं।

संस्कृत में एक सुभाषित है - 

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहिता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति।।

(निम्न श्रेणी के लोग विघ्न के डर से काम प्रारम्भ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी वाले विघ्न आने पर बीच में ही छोड़ देते हैं; पर उत्तम श्रेणी के लोग बार-बार विघ्न आने पर भी उसे नहीं छोड़ते।)

वैचारिक संभ्रम और संघर्ष के इस कठिन समय में प्रवक्ता के संचालक गत पांच वर्ष से लगातार अपने निर्धारित मार्ग पर चल रहे हैं, इसके लिए उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं।