शनिवार, 15 मार्च 2014

व्यंग्य बाण : घुटन का मौसम

मौसम विज्ञानियों की बात यदि मानें, तो दुनिया भर में मुख्यतः तीन मौसम होते हैं। सर्दी, गर्मी और वर्षा। जहां तक भारत की बात है, तो यहां षड्ऋतु में वसंत, शिशिर और हेमंत भी शामिल हैं। हमारे कुछ मित्रों का कहना है कि दक्षिण भारत में गर्मी और बहुत अधिक गर्मी तथा पहाड़ों पर सर्दी और बहुत अधिक सर्दी नामक बस दो ही मौसम होते हैं।

लेकिन शर्मा जी के अनुसार इन सबसे अलग एक ‘घुटन का मौसम’ भी होता है। मजे की बात है कि ये मौसम किसी भी मौसम में और अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर आ सकता है। हां, चुनाव के दिनों में इसकी धुंध सर्वत्र छायी रहती  है। 

कल शर्मा जी ने जब अपनी यह व्याख्या बतायी, तो मुझे विश्वास नहीं हुआ; लेकिन वे बिना तथ्यों के कोई बात नहीं कहते। उन्होंने मुझे साथ चलकर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण देखने का निमन्त्रण दिया। मैंने उनकी बात मान ली। 

सबसे पहले हम बिहार के परम सेक्यूलर नेता रामविलास पासवान के पास गये। शर्मा जी ने बात चालू की - सर, आप इतने समय से लालू जी के साथ थे; पर अब अचानक... ?

- आपने ठीक कहा, मैं वहां घुटन महसूस कर रहा था। इसलिए जब मोदी जी ने मुझे अपने पास बुलाया, तो मैं इधर आ गया।

- पर आपने मोदी के नाम पर ही रा.ज.ग. को छोड़ा था..?

- हां। तब वहां घुटन थी, अब यहां। फिर वह बात भी पुरानी हो गयी।

- पर आप लालू जी के सहयोग से ही राज्यसभा में हैं..?

- राज्यसभा में कोई घुटन नहीं है। वहां हर समय ए.सी. चलते रहते हैं। दिल्ली में मेरा निवास भी सोनिया जी के घर के पास ही है। वह भी काफी खुला है। घुटन तो बस लालू जी के घर में है।  

शर्मा जी वहां से उठकर रामकृपाल यादव के घर जा पहुंचे। वे अपनी लालटेन को घूरे पर फेंककर लौटे ही थे। उन्होंने भी यही कहा कि वे लालू जी के दल में घुटन महसूस कर रहे थे। 

- पर आप तो शुरू से ही लालू जी के साथ थे..?

- हां, आप ठीक कहते हैं। लालू और राबड़ी भौजी के साथ तो कोई दिक्कत नहीं थी; पर अब मीसा भतीजी हमें घर से ही निकालना चाहती है, तो घुटन तो होगी ही।

हम नीतीश कुमार से मिले, तो उनका कहना था कि बिहार में हमारा और सुशील मोदी का साथ कई साल से एक कमरे में अच्छा निभ रहा था; पर उसमें एक और मोदी घुस आये, तो घुटन होनी ही थी। इसलिए हम उनसे अलग हो गये।

- पर कई लोग घुटन की शिकायत करते हुए आपका दल छोड़कर नरेन्द्र मोदी के साथ जा रहे हैं।

- वे सब अवसरवादी हैं।

- पर वे तो स्वयं को समाजवादी बताते हैं ?

- समाजवाद का ही दूसरा नाम अवसरवाद है। समझे... ?

समाजवाद की यह असलियत जानकर हम कुछ कांग्रेसियों के पास गये। मनमोहन सिंह से पूछा, तो वे बहुत देर मौन रहे। फिर भारी मन से बोले, ‘‘मैं तो दस साल से घुट रहा हूं; लेकिन जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां ? पर अब तो बस दो ही महीने की तो बात है। फिर चंडीगढ़ की खुली हवा होगी और मैं।’’

हम दोनों सोनिया मैडम के घर गये, तो वहां बड़े-बड़े अक्षरों में ‘कुत्तों से सावधान’ का बोर्ड लगा था। इसलिए हमने चैकीदार से ही यह प्रश्न पूछ लिया। वह बोला कि मैडम तो जब से भारत आयी हैं, तब से ही घुटन में हैं; पर पहले पति का बंधन था और अब पुत्र का, जो उन्हें खुली हवा में नहीं जाने देता। फिर भी वे साल में कई बार विदेश हो आती हैं। इटली में उनका पक्का ठिकाना है ही। हो सकता है चुनाव के बाद सदा के लिए वहीं चली जाएं।

राहुल बाबा प्रश्न सुनते ही गुस्से में आ गये। ऐसा लगा मानो टेप का बटन दब गया हो, ‘‘हां, घुटन है। बहुत घुटन है; पर इसके लिए सिस्टम बदलना होगा। महिलाओं को शक्ति और युवाओं को तरक्की देनी होगी। अल्पसंख्यकों का विकास करना होगा। हम इसके लिए मनरेगा लाये। सूचना का अधिकार लाये। पहले हम भूख, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी लाये और अब इसके विरुद्ध कानून भी लाएंगे...।’’

उनके मन की घुटन देखकर हमने वहां से खिसकना ही उचित समझा। हम लोग मुलायम सिंह, मायावती, ममता, जयललिता, नवीन पटनायक आदि कई लोगों से मिले। सब इस बात से दुखी थे कि जब तक माल मिलता रहा, तब तक तो चुप रहे; पर अब उनके कई साथी घुटन की शिकायत कर रहे हैं।

केजरी ‘आपा’ के बारे में पता लगा कि वे प्रवास पर हैं; लेकिन कुछ दिन पहले ही उनके नौटंकी दल में जुड़ने वाले कई लोग अब घुटन अनुभव कर रहे हैं। अन्ना हजारे तो पहले ही उन्हें छोड़ चुके हैं; पर मीडिया से मिलीभगत वाला साक्षात्कार जारी होने के बाद तो इसकी गति बहुत तेज हो गयी है। ममता और अन्ना की दिल्ली में हुई ‘फ्लाप रैली’ के बाद लोग समझ नहीं पा रहे कि कौन किसके साथ घुटन अनुभव कर रहा है।

मैंने शर्मा जी को कहा कि घुटन के कारण अपने पुराने घर छोड़कर लोग जहां जा रहे हैं, जरा वहां का हाल भी तो देख लें। इस पर शर्मा जी ने अपनी खटारा भा.ज.पा. कार्यालय की ओर मोड़ दी।

वहां का हाल तो और भी गजब था। जितने लोग अंदर थे, उससे अधिक अंदर आने के लिए लाइन लगाये थे। यद्यपि कमरा काफी बड़ा था; पर सबके आने से वहां भी घुटन हो जाने का खतरा था। मैंने एक नेता जी से यह पूछा, तो वे बोले, ‘‘सत्ता की शीतल बयार हर घुटन को समाप्त कर देती है। जिधर गुड़ होगा, चींटी उधर ही तो जाएंगी।’’

- लेकिन यदि सत्ता न आयी तो.. ?

- तो ये घुटनबाज यहां भी घुटने लगेंगे।

- और आ गयी तो..?

- तब दूसरे दलों में घुटन महसूस करने वाले बहुत बढ़ जाएंगे। हो सकता है वहां भगदड़ ही मच जाए।

कपड़ों की तरह दल और दिल बदलने वाले अवसरवादियों को देखकर शर्मा जी वर्तमान राजनीति में ही घुटन अनुभव करने लगे। अतः मिलना स्थगित कर उन्होंने अपनी गाड़ी घर की ओर मोड़ दी।

मंगलवार, 11 मार्च 2014

व्यंग्य बाण : होली और तीसरा मोर्चा

पुराने गिले-शिकवे भुलाने और नवीन मेल-मिलाप करने के लिए होली से अच्छा कोई पर्व नहीं है। इसलिए भा.ज.पा. को रोकने और कांग्रेस को ठोकने के लिए चुनावी माहौल में हर दिन रिश्ते बन और बिगड़ रहे हैं। ज्वार-भाटे की तरह इसकी लहरें भी बार-बार आती हैं और किनारे की गंदगी लेकर चली जाती हैं।

लेकिन शर्मा जी अपनी आशा को कभी मरने नहीं देते। वे मोदी को रोकना तो चाहते हैं; पर राहुल बाबा को ठोकना नहीं। उन्हें लगता है कि यदि किसी तरह तीसरा मोर्चा बन गया, तो चुनाव के बाद वह झक मारकर कांग्रेस के साथ ही आएगा। इसलिए उन्होंने होली पर इस दिशा में नये सिरे से प्रयास करने का निश्चय किया।

पिछले दिनों वे वे पार्क में मिले, तो कहने लगे - वर्मा, मेरे दिमाग में तीसरे मोर्चे के बारे में एक बड़ा धांसू आइडिया है।

- यदि सचमुच ये आपके दिमाग की उपज है, तो धांसू होगा ही।

- तुमने कभी सोचा है कि तीसरा मोर्चा बनाने के लिए कई बार नेता साथ आते हैं; पर वह बनते ही बिखरने लगता है ?

- जी नहीं, मैं इन बेकार बातों में समय खराब नहीं करता। 

- कोई बात नहीं। दिमागी काम वही कर सकता है, जिसके पास दिमाग हो।

- तो डेढ़ दिमाग वाले शर्मा साहब, आप ही बताइये।

- जरा समझो। नाम तो है तीसरा मोर्चा; पर कभी इसमें दस लोग आते हैं तो कभी बारह। फिर उनमें ऐसी कोई समानता भी नहीं है, जिससे वे मिलकर साथ चल सकें।

- हां, ये तो है।

- इसलिए मैंने सोचा है कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर केवल तीन महिलाओं (जयललिता, ममता और मायावती) को बुलाया जाए। तीन महिलाओं के तीसरे मोर्चे का आइडिया हिट हो सकता है। फिर इनमें कई समानताएं भी हैं।

- जैसे.. ?

- पहली बात तीनों बुजुर्ग नारी हैं। इनका विवाह हुआ नहीं या इन्होंने किया नहीं, यह वही जानें; पर यह सत्य है कि तीनों घोषित कुमारी हैं। नारी होते हुए भी ये अपने क्षेत्र में मर्दों पर भारी हैं। यहां तक कि जयललिता जी तो डबल भारी हैं। फिर इन तीनों के मन में क्या चल रहा है, इसका पता भगवान भी नहीं लगा सकते।

- पर शर्मा जी, किसी कवि ने लिखा है, ‘‘बूढ़ी नारी, वो भी कुमारी, समझो है तलवार दुधारी।’’ 

- तुम चाहे जो कहो; पर तीन कुमारी मिलकर उस एक कुमार को तो रोक ही लेंगी, जिसकी आंधी देश भर में चल रही है; और हो सकता है कि इस झगड़े में हमारे वाले कुमार जी का दांव लग जाए।

मुझे होली के लिए सामान खरीदना था, इसलिए मैंने अधिक सिर मारना उचित नहीं समझा; पर शर्मा जी अपने प्रयास में लगे रहे और उन्होंने इन तीन महान नारियों की बैठक बुला ली। तीनों समय से आ भी गयीं; पर जयललिता ने आते ही अपनी कुर्सी की दिशा पलट दी। इससे शर्मा जी अचकचा गये - ये क्या मैडम.. ?

- मेरे ज्योतिषी ने कहा है कि अपना मुंह सदा तमिलनाडु की ओर रखना। ममता भी तो ऐसा ही करती है। इसलिए..। 

- पर बाकी सब की तरफ पीठ करके बात कैसे होगी ?

काफी देर तक इस पर विवाद होता रहा। फिर वे ठीक से बैठने पर सहमत हो गयीं। शर्मा जी ने माहौल को हल्का रखने के लिए खानपान के साथ अबीर-गुलाल का प्रबन्ध भी किया था; पर गुलाल देखते ही ममता जी भड़क गयीं, ‘‘हमें लाल रंग बिल्कुल पसंद नहीं है। हमने इतने संघर्ष और बलिदान के बाद लाल को बंगाल की खाड़ी में फेंका है। हमारी बंगभूमि में गुलाल नहीं सिंदूर चलता है। आप चाहें तो हमें सिंदूर लगा सकते हैं।’’

शर्मा जी यह सुनकर शरमा गये। 40 साल पहले उन्होंने एक नारी को सिंदूर लगाया था। उसकी सजा अब तक भुगत रहे हैं; और अब ममता जी...। यह सोचकर उनकी आत्मा कांप उठी। न बाबा न। मायावती भी यह सुनकर हंसने लगीं। उन्होंने ममता जी के कान में बताया कि सिंदूर लगाने का अर्थ क्या होता है। इस पर ममता जी ने जीवन में पहली बार अपनी बात वापस ले ली।

शर्मा जी ने गुझिया और पापड़ खाने का आग्रह किया; पर गुझिया के लिए सबने मना कर दिया। उनका कहना था कि अब चुनाव तक तो कड़वा ही बोलना है। अतः मीठा खाना बेकार है। हां, पापड़ सबने खूब खाये, चूंकि राजनीति में पापड़ की तरह सख्ती, रूखापन और कड़कड़ाहट बहुत जरूरी है। ठंडाई की तरफ तो तीनों ने देखा तक नहीं। चुनाव की गरमी में ठंडाई पीना खतरे से खाली नहीं था। 

अब शर्मा जी ने अपना एजेंडा बताया कि यदि वे तीनों मिल जाएं, तो बहुत बड़ी ताकत बन सकती हैं। जयललिता विंध्याचल से नीचे और ममता जी पूरे पूर्वाेत्तर भारत में लड़ें। शेष भारत में मायावती जी का हाथी घूमता रहे।

सुझाव तो ठीक था; लेकिन प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इस पर तीनों लड़ने लगीं। कोई किसी से कम तो थी नहीं, इसलिए दबने या पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। कुछ ही देर में स्वर होली की लपटों की तरह आकाश छूने लगे। गनीमत यह हुई कि यहां महिलाओं वाले परम्परागत हथियार नहीं थे। वरना न जाने क्या हो जाता ? शर्मा जी ने संभालने का बहुत प्रयास किया; पर तीनों का एक ही सवाल था कि पहले प्रधानमंत्री तय होना चाहिए, तभी बात आगे बढ़ेगी। 

शर्मा जी ने झिझकते हुए कहा कि यदि आप तीनों किसी नाम पर सहमत नहीं हैं, तो फिर राहुल बाबा हैं न..।

यह सुनते ही तीनों देवियां रणचंडी बन गयीं। आपस की तीन-तेरह  छोड़कर उन्होंने एकमत से अपनी-अपनी कुर्सी शर्मा जी के सिर पर दे मारी। जयललिता तो गुस्से में धम्म से शर्मा जी के ऊपर ही बैठ गयी। बेचारे शर्मा जी का कचूमर निकल गया। उनके कपड़े गीले-पीले हो गये।

शर्मा जी काफी देर तक बेहोश पड़े रहे। जब उन्हें कुछ होश आया, तो वे बचा हुआ सामान समेटकर घर आ गये। वे समझ गये कि तीसरा मोर्चा हो या तीसरा खोमचा, इस चुनाव में तो उसके बनने की कोई संभावना नहीं है।