शुक्रवार, 20 जून 2014

आलेख : आपातकाल और लोकतंत्र

जून महीना आते ही आपातकाल की यादें जोर मारने लगती हैं। 39 साल पहले का घटनाक्रम मन-मस्तिष्क में सजीव हो उठता है। छह दिसम्बर, 1975 को बड़ौत (वर्तमान जिला बागपत) में किया गया सत्याग्रह और फिर मेरठ जेल में बीते चार महीने जीवन की अमूल्य निधि हैं। वह मस्ती और जुनून अब एक सपना सा लगता है।

1975 को याद करने के लिए उसकी पृष्ठभूमि में जाना होगा। 1971 में पाकिस्तान पर भारत की अभूतपूर्व विजय हुई थी। इसमें सेना के साथ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का साहस भी प्रशंसनीय था। यद्यपि ‘शिमला समझौते’ में उन्होंने बिना शर्त 93,000 बंदियों को छोड़कर अच्छा नहीं किया। इसकी आलोचना भी हुई; पर विजय के उल्लास में यह आलोचना दब गयी।

इसके बाद इंदिरा गांधी निरंकुश हो गयीं। कांग्रेस का अर्थ इंदिरा गांधी हो गया था। देवकांत बरुआ जैसे चमचे ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ का राग अलापने लगे। संगठन और शासन, दोनों के सब सूत्र इंदिरा गांधी के हाथ में थे। ऐसे माहौल में ही सत्ताधीश तानाशाह हो जाते हैं। इंदिरा गांधी के आसपास बंसीलाल, विद्याशंकर शुक्ल, संजय गांधी, सिद्धार्थशंकर रे आदि का मनमानी करने वाला समूह बन गया। उधर समाजवादी नेता राजनारायण ने इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव में गलत साधन अपनाने पर मुकदमा ठोक रखा था। इंदिरा गांधी के स्टेनो यशपाल कपूर ने सरकारी सेवा में रहते हुए उनके चुनाव मेें काम किया था। न्यायालय में उनके हारने की पूरी संभावना थी। इससे वे बहुत परेशान थीं।

इधर गुजरात के छात्रों ने चिमनभाई पटेल के भ्रष्ट शासन के विरुद्ध ‘नवनिर्माण आंदोलन’ छेड़ दिया था। गुजरात से होता हुआ यह आंदोलन बिहार पहुंच गया। वहां इंदिरा गांधी के प्रिय अब्दुल गफूर की भ्रष्ट सरकार चल रही थी। युवाओं के उत्साह को देखकर वयोवृद्ध जयप्रकाश नारायण ने इस शर्त पर नेतृत्व स्वीकार किया कि आंदोलन में हिंसा बिल्कुल नहीं होगी। पूरे देश और विशेषकर उत्तर भारत में ‘‘जयप्रकाश का बिगुल बजा तो, जाग उठी तरुणाई है; तिलक लगाने तुम्हें जवानो क्रांति द्वार पर आयी है.....।। हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा...।।  जयप्रकाश है नाम देश की चढ़ती हुई जवानी का।।’’ आदि नारों से गांव, नगर और विद्यालय गूंजने लगे।

इंदिरा गांधी ने आंदोलन को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारतीय जनसंघ के नानाजी देशमुख, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गोविन्दाचार्य और सुशील मोदी आदि भी पूरी तरह सक्रिय थे। चार नवम्बर, 1974 को हुई पटना रैली में लाठीचार्ज से जे.पी. को बचाने के लिए नानाजी उनके ऊपर लेट गये। इससे उनका हाथ तो टूट गया; पर जे.पी. बच गये। 12 जून, 1975 को प्रयाग उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्तकर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गयीं। 25 जून, 1975 को दिल्ली में हुई विराट रैली में जे.पी. ने पुलिस और सेना के जवानों से आग्रह किया कि शासकों के असंवैधानिक आदेश न मानें। अब तो इंदिरा गांधी पर जुनून सवार हो गया। उन्होंने जे.पी. को गिरफ्तार कर लिया। 

पूरे देश में इंदिरा गांधी पर त्यागपत्र देने के लिए दबाव पड़ने लगा; पर विधिमंत्री सिद्धार्थशंकर रे ने आपातकाल का प्रस्ताव बनाया और राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को रात में ही जगाकर हस्ताक्षर करा लिये। मंत्रिमंडल को भी इसका पता अगले दिन ही लगा। इस प्रकार 26 जून को देश में आपातकाल लग गया। विरोधी दल के अधिकांश नेताओं तथा संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं को बंदी बना लिया गया। तब चन्द्रशेखर, रामधन, कृष्णकांत और मोहन धारिया भी कांग्रेस में थे। ये इंदिरा जी के इस रवैये के विरोधी थे। इन्हें ‘युवा तुर्क’ कहा जाता था। इन्हें भी बंद कर दिया गया। मीडिया पर संेसर लगा दिया गया। देश एक ऐसे अंधकार-युग में प्रवेश कर गया, जहां से निकलना कठिन था।

आगे की कहानी बहुत लम्बी है। इस तानाशाही के विरोध में ‘लोक संघर्ष समिति’ बनायी गयी। इसके बैनर तले सत्याग्रह हुआ, जिसमें देश भर में डेढ़ लाख लोगों ने गिरफ्तारी दीं। इनमें 95 प्रतिशत संघ वाले थे। वस्तुतः इस आंदोलन का सूत्रधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही था। इंदिरा जी ने सबको बंदकर सोचा कि अब आंदोलन दब गया है। अतः उन्होंने लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिये; पर संघ का भूमिगत संजाल पूर्णतः सक्रिय था। जेल में बंद नेताओं से तुंरत सम्पर्क कर ‘जनता पार्टी’ के बैनर पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया गया। अधिकांश बड़े नेता तो हिम्मत हार चुके थे; पर जब उन्होंने जनता का उत्साह देखा, तो वे राजी हो गये।

इंदिरा गांधी की भारी पराजय हुई। त्यागपत्र देने से पहले उन्होंने अपनी कलम से संघ से प्रतिबंध हटा दिया। उन्होंने बाद में माना कि संघ पर प्रतिबंध लगाना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। चुनाव के बाद जनता पार्टी का शासन आया; पर उसमें अधिकांश कांग्रेसी और समाजवादी थे, अतः वे कुर्सियों के लिए लड़ने लगे। जिस संघ के त्याग, बलिदान और परिश्रम के कारण वे सत्ता में पहुंचे थे, उसे ही उन्होंने नष्ट करना चाहा। परिणामस्वरूप जनता पार्टी टूट गयी। ढाई साल बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी फिर से जीत गयीं।

जनता पार्टी ने अपने ढाई वर्ष के कार्यकाल में संविधान में ऐसे प्रावधान कर दिये, जिससे फिर आपातकाल न लग सके। यद्यपि इसके बाद देश में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा है। कांग्रेस की देखादेखी वंशवाद प्रायः सभी दलों में पहुंच गया है। ऊपर से देखने पर लोकतंत्र तो है; पर वह कुछ परिवारों के पास बंधक बन कर रह गया है। लोकतंत्र की पालकी वे दल ढो रहे हैं, जिनमें स्वयं आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। अत्यधिक खर्चीले होने के कारण सामान्य व्यक्ति चुनाव लड़ ही नहीं सकता। अंग्रेजों से उधार ली गयी चुनाव प्रणाली ने भारत को जाति और क्षेत्र के मकड़जाल में फंसा दिया है।

2011 में ‘प्रभात प्रकाशन’ ने नानाजी देशमुख द्वारा 1979 में लिखी पुस्तक ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ को फिर प्रकाशित किया है। इसकी भूमिका में वे लिखते हैं, ‘‘आज की राजनीतिक कार्यप्रणाली का 28 वर्षों तक गहन अध्ययन और अनुभव प्राप्त करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि आज जिस प्रकार की राजनीति चल रही है, उसके माध्यम से न तो ऐसे नेता जन्म ले सकते हैं, जिनका रचनात्मक दृष्टिकोण हो और न कोई सकारात्मक दृष्टिकोण सामने आ सकता है। देश को वर्तमान राजनीतिक कार्यप्रणाली के स्थान पर कोई नयी कार्यप्रणाली, जिसका दृष्टिकोण रचनात्मक हो, खोजनी होगी। मेरी इच्छा है कि अपनी अल्पक्षमता और दुर्बलताओं के रहते हुए भी मैं अपने शेष आयु इसी खोज में बिता दूंगा।’’

नानाजी ने अपने अनुभव से जो निष्कर्ष निकाले थे, वे गलत नहीं लगते। क्योंकि आपातकाल विरोधी अधिकांश नेता और दल अब कांग्रेस की ही गोद में बैठे हैं। अपवाद है, तो केवल संघ और संघ विचार की सामाजिक और राजनीतिक संस्थाएं। यद्यपि नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना इस अंधेरे में एक प्रकाश की किरण तो है; पर वे इस व्यवस्था को कितना बदल पाएंगे, कहना कठिन है। क्योंकि वे भी तो इसी में से होकर शीर्ष पर पहुंचे हैं। 

1975 जैसे काले दिन तो शायद फिर न आयें; पर सच्चा लोकतंत्र भारत में कब आएगा, यह प्रश्न उन लोगों को चिंतित जरूर करता है, जो लोकतंत्र की रक्षार्थ जेल गये थे या फिर जिन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन किया था।

मंगलवार, 17 जून 2014

आलेख : नौकरी और रोजगार

चुनाव के समय प्रायः सभी राजनेता और दल युवाओं को नौकरी के आश्वासन देकर अपने पाले में खींचने का प्रयास करते हैं। कोई विशालकाय उद्योग के लिए गांव की भूमि लेते समय शासन और उद्योगपति कहते हैं कि इससे हजारों नौकरियां निकलेंगी। सरल ग्रामीण इस चक्कर में सस्ते में जमीन दे देते हैं। बाद में उनमें से कितनों को नौकरी मिली और उद्योगपति ने उसी जमीन का विकासकर कितने में बेचा, इसका हिसाब कोई नहीं करता।

जहां तक रोजगार की बात है, तो पिछले कुछ वर्षों से लोग नौकरी को ही रोजगार मानने लगे हैं। विशेषकर शिक्षित वर्ग में इसके प्रति आकर्षण बहुत बढ़ा है। सरकारी नौकरी में अच्छे वेतन के साथ पेंशन आदि की भी सुविधा है। इसलिए इस ओर आकर्षण स्वाभाविक है। कुछ निजी संस्थान भी अब अच्छा वेतन देने लगे हैं। अतः सरकारी नौकरी के अभाव में उस ओर भी युवक जा रहे हैं। 

पर क्या रोजगार का अर्थ केवल नौकरी ही है ? जहां व्यापार या खेती की अच्छी घरेलू परम्परा है, वे लोग भी जब नौकरी ढूंढते हैं, तो अजीब लगता है। न जाने क्यों लोग खेती या व्यापार को बुरा मानते हैं। मेरे बाबा जी कहते थे कि नौकर बनने की बजाय चार लोगों को अपने पास नौकर रखना अच्छा है। जिनका परिवार तुम्हारे व्यापार या खेती के कारण पलेगा, वे जीवन भर तुम्हारे गुण गाएंगे और सुख-दुख में सदा तुम्हारे साथ खड़े होंगे; पर यह बात लोगों को समझ नहीं आती। 

बात बहुत पुरानी है। मेरा एक मित्र ने एम.ए. किया और नौकरी ढूंढने लगा। यद्यपि उसके घर में अच्छा व्यापार था; पर वह देखता था कि इसमें व्यस्तता बहुत है। वह आराम की जिंदगी जीना चाहता था, इसलिए नौकरी की तलाश में था। उसके पिताजी ने कुछ नहीं कहा; पर जब साल भर कुछ नहीं हुआ, तो उन्होंने उससे पूछा कि तुम्हें अधिकतम कितने रुपये की नौकरी मिल जाएगी ? मित्र ने पांच हजार रुपये की बात कही। इस पर पिताजी ने कहा कि तुम कल से सुबह दस से शाम पांच बजे तक दुकान पर बैठो और मुझसे छह हजार रु. लो।

तब तक मेरा मित्र भी धक्के खाकर दुखी हो चुका था। वह समझ गया कि व्यापार में परिश्रम तो अधिक है; पर उसी तुलना में पैसा और सम्मान भी बहुत अधिक है। दुनिया में जितने भी सम्पन्न लोग हैं, सब व्यापारी ही हैं। नौकरी में प्रायः अफसर की धौंस सुननी पड़ती है, जबकि व्यापार में व्यक्ति स्वयं मालिक होता है। वह अगले ही दिन से दुकान पर बैठने लगा। धीरे-धीरे उसने सारा काम संभाल लिया। कुछ ही साल में उसने व्यापार कई गुना कर लिया। आज उस पर भगवान की भरपूर कृपा है।

मेरे एक मित्र की देहरादून के पल्टन बाजार में पांच गुणा दस फुट की दुकान है। एक बार मैंने हंसी में कहा कि तुम्हारी दुकान बहुत छोटी है। वह इस पर नाराज होकर बोला - फिर कभी ऐसा न कहना। इस दुकान से हमारा मकान बना है। मेरी तीन बहिनों और बड़े भाई का विवाह हुआ है, और अगले महीने मेरा विवाह है। यह दुकान हमारी मां है, और मां कभी छोटी या बड़ी नहीं होती। 

मैंने अपनी भूल मान ली और उससे क्षमा मांगी। मैं ऐसे कितने ही लोगों को जानता हूं, जो व्यापार के बल पर खाकपति से करोड़पति बने हैं। विभाजन के समय पंजाब और सिन्ध से जो हिन्दू आये, उनके पास शरीर के कपड़ों को छोड़कर कुछ नहीं था; पर आज उनमें से 99 प्रतिशत के पास अपने मकान, दुकान और गाड़ियां हैं। उन्होंने किसी भी काम को छोटा नहीं समझा और जो व्यापार हाथ लगा, उसी में जुट गये। हां, उन्होंने परिश्रम खूब किया; और परिश्रम करने वाले का साथ ईश्वर भी देते हैं।

फिर भी नौकरी के प्रति लोगों में आकर्षण क्यों है ? मुझे लगता है नयी पीढ़ी अब परिश्रम, संघर्ष और खतरे उठाने से बचना चाहती है। सरकारी नौकरी यदि ऐसी मिल जाए, जिसमें कुछ काम न करना और पड़े और दो नंबर के पैसे की भी गुंजाइश हो, तब तो कहना ही क्या ? इसके लिए लोग साल भर का वेतन तक रिश्वत में देने को तैयार रहते हैं। एक जैसा काम करने वाले सरकारी और निजी  कर्मियों के वेतन और सुविधाओं में अंतर भी बहुत अधिक है। सरकारी कर्मचारी युवक और युवतियों के विवाह भी अच्छे हो जाते हैं। 

मेरे एक मित्र ने अपनी बहिन के लिए सजातीय, अच्छी पै्रक्टिस वाला डॉक्टर युवक देखा; पर उसके पिताजी ने कहा कि जब हमें शादी में दस लाख खर्च करने हैं, तो हम सरकारी कर्मचारी ही लेंगे; और पांच हजार रु. रोज कमाने वाले डॉक्टर की बजाय 25 हजार सरकारी वेतन वाले युवक को उन्होंने दामाद बना लिया। 

पर्वतीय क्षेत्र में काम का अर्थ ही सरकारी नौकरी है। यदि कोई युवक घर में खेती या किसी निजी संस्था में काम कर रहा है, तो वह खुद को बेरोजगार मानता है। खेती बहुत छोटी होने के कारण यह वहां की मजबूरी भी है। यद्यपि पर्वतीय मूल के बहुत से लोगों ने मैदानी नगरों में आकर अपने कारोबार शुरू किये हैं और वे खूब सफल हैं; पर स्वभाव में व्यापार न होने के कारण वे इसमें हाथ डालने से डरते हैं।

कुछ युवक पूछते हैं कि यदि हमें अपना पुश्तैनी कारोबार या खेती ही करनी है, तो फिर इतनी बड़ी डिग्री क्यों ली ? वस्तुतः शिक्षा का अर्थ डिग्री नहीं है। शिक्षा से व्यक्ति की विचार क्षमता बढ़ती है। ऐसा व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में काम करे, वहां सफलता ही मिलती है। एम.बी.ए. की डिग्री लेकर लोग जब बड़े उद्योगपतियों के व्यापार को बढ़ा सकते हैं, तो वे अपना कारोबार क्यों नहीं कर सकते ? यद्यपि बहुत से लोग अपने मां-बाप के पैसे के बल पर डिग्रियां खरीद लेते हैं, ऐसे लोग कहीं सफल नहीं होते।

यह सच है कि व्यापार में पूंजी चाहिए; पर पूंजी का अर्थ केवल नकद धन या धरती नहीं है। शिक्षा, परिश्रम, धैर्य और दिमाग भी बहुत बड़ी पूंजी है। इनके सदुपयोग से भी सफलता मिलती है। साल-दो साल कष्ट उठाने पड़ सकते हैं; पर फिर केवल अपना ही नहीं, तो भावी पीढ़ी का भविष्य भी सुरक्षित हो जाता है। 

क्या दस-बीस हजार रु. की नौकरी के लिए दर-दर ठोकर खा रहे  युवक मेरी बात को समझ सकेंगे ?