मंगलवार, 22 जुलाई 2014

व्यंग्य बाण : वामपंथियों की शोकसभा

लोकसभा के चुनाव हुए काफी समय हो गया; पर उसके बाद के कार्यक्रम अभी जारी हैं। कहीं स्वागत समारोह और जीत का विश्लेषण हो रहा है, तो कहीं हार का पोस्टमार्टम। कहीं एक राज्य स्तर की स्वघोषित राष्ट्रीय पार्टी के 95 प्रतिशत प्रत्याशियों की जमानत जब्त होने का ठीकरा सर्वोच्च नेताजी के सिर पर फोड़ा जा रहा है, तो कहीं जीत का श्रेय एक ही व्यक्ति के माथे पर रख दिया गया है। 

कुछ लोग भगवान को धन्यवाद दे रहे हैं कि उन्हें न जाने कैसे उस पार्टी ने टिकट दे दिया, जिसकी लहर के चलते वे भी संसद में पहुंच गये। एक नेता जी ने तो भंडारा कराया, क्योंकि वे उस पार्टी का टिकट पाने से बाल-बाल बच गये, जिसे जनता ने दीवालिया बना दिया है। मुलायम सिंह और उनके गुलचिराग अखिलेश यादव अपनी हार के लिए पुलिस और प्रशासन को जिम्मेदार कह रहे हैं, तो बहिन मायावती जी अमित शाह को। नीतीश बाबू और शरद यादव इस करारी हार के लिए एक-दूसरे को दोष दे रहे हैं और अब गम गलत करने के लिए लालू जी के घर चारे की दावत में जाने लगे हैं। 

लेकिन इस सबके बीच किसी को उन दीन-हीन वामपंथियों का ध्यान नहीं आया, जिनके नक्कारे कभी बंगाल में गंूजते थे। उनकी कुछ इज्जत केरल और त्रिपुरा में भी थी; पर अब त्रिपुरा में ही थोड़ी सी जमीन बची है। वहां खड़े होकर चाहे नारे लगा लें या एक-दूसरे के आंसू पोंछ लें। वह भी कितने दिन बचेगी, कहना कठिन है, क्योंकि देश ने अब उन्हें भूखा और सूखा रखने का निर्णय ले लिया है।

वैसे तो भारत में कितने वामपंथी दल हैं, यह गूगल बाबा भी नहीं बता सकते। फ्रांस के प्रख्यात ज्योतिषी नास्त्रेडोमस ने लिखा है कि एक समय ऐसा आयेगा, जब हर वामपंथी का अलग खोमचा होगा। ईश्वर ने इन्हें ऐसे अशुभ मुहूर्त में बनाया है कि ये लड़ने के लिए ही मिलते हैं और टूटने के लिए ही बनते हैं। 

वाममार्गियों की दुनिया अजीब है। कुछ पर्दे के आगे रहकर काम करते हैं, तो कुछ पीछे। कुछ वामपंथी हैं, तो कुछ अति वामपंथी। कुछ कलम को हथियार कहते हैं, तो कुछ हथियार रूपी कलम में निर्दोषों का खून भरकर क्रांतिकारी गीत लिखते हैं। वह खून बच्चे का हो या बूढ़े का; महिला का हो या पुरुष का; गरीब का हो या अमीर का, इससे उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता। किसी का खुदा मार्क्स है, तो किसी का लेनिन, स्टालिन, चे ग्वारा, माओ या कोई और; पर इतना निश्चित है कि उनके खुदा हैं भारत से बाहर ही। 

पिछले दिनों ज्योति बसु का जन्मशती दिवस था। इस बहाने वामपंथियों ने चुनाव समीक्षा बैठक ही कर ली। जीते हुए सांसदों ने एक-दूसरे के गले में माला डाली। यह देखकर हारे हुओं ने भी उन्हें हार पहनाये। कमरे में ए.सी. लगा था। एक जमानत जब्त नेता गुस्से में बोला कि हम सब ए.सी. में रहकर ठंडे हो गये हैं। आगे बढ़ने के लिए हमें तन और मन में गरमी लानी होगी। उसके सुझाव पर सब लोग छत पर धूप में जा बैठे; पर पांच मिनट में ही चर्बी पिघलने लगी, तो सब नीचे आ गये। ए.सी. फिर चालू कर दिया गया।

जैसे-तैसे बैठक की कार्यवाही शुरू हुई; पर काफी प्रयास के बाद भी वह इतने धीमे स्वर में हो रही थी, मानो कोई शोकसभा हो रही हो। कोई किसी की बात सुनने के मूड में ही नहीं था। आखिर सब पिटे हुए मोहरे जो ठहरे। एक ने कहा कि अब लोकसभा में तो हमारी आवाज गूंजेगी नहीं, तो क्यों न इस शोकसभा को ही लोकसभा समझ लें। यह सुझाव सबको अच्छा लगा। उन्होंने एक ऐसे नेता को अध्यक्ष बनाया, जो आज तक कोई चुनाव ही नहीं लड़ा था। जो उपाध्यक्ष बने, वे चुनाव लड़े तो कई बार थे; पर जीते कभी नहीं। 

अध्यक्ष ने सबको दो भागों में दायें और बायें बैठने को कहा; पर यहां फिर झगड़ा होने लगा। कोई दायीं ओर बैठने को तैयार नहीं था। उनका कहना था कि जब हम जन्म और कर्म दोनों से ही वाममार्गी हैं, तो दायीं ओर क्यों बैठें ? अध्यक्ष जी ने कहा कि सदन में सत्तापक्ष दायीं ओर तथा विपक्ष बायीं ओर बैठता है। सदन में दोनों का होना जरूरी है। यह सुनते ही सब उठकर दायीं ओर जा बैठे। अध्यक्ष के कहने पर भी अब कोई बायीं ओर आने को तैयार नहीं था। सत्ता न सही; पर उसकी कल्पना में जीना भी क्या बुरा है ?

इस झगड़े में समय निकल रहा था। इस बीच चाय वाला सबको काली चाय दे गया। उसने साफ कह दिया कि जब तक पिछले पैसे नहीं मिलेंगे, वह बिना दूध और चीनी वाली चाय ही देगा। 

चाय पीते ही एक नयी महाभारत छिड़ गयी। बायीं ओर वाले अपने सामने वालों को ‘दक्षिणपंथी’ कहकर चिढ़ाने लगे। इससे वे भड़क गये। उन्होंने बायीं ओर वालों को नकली वामपंथी कह दिया। बस फिर क्या था; दोनों पक्ष अध्यक्ष के आसन के सामने आकर लड़ने लगे। सभापति ने बीच-बचाव का प्रयास किया; पर जो लड़ना छोड़ दे, वह वामपंथी कैसा ? जब मारपीट ने काफी जोर पकड़ लिया, तो सभापति महोदय से भी नहीं रुका गया। आखिर थे तो वे भी मुहरबंद वामपंथी ही। कहा भी है ‘चोर चोरी से जाए, हेराफेरी से न जाए।’ उन्होंने कुर्सी का एक हत्था उखाड़ा और पिल पड़े। लोकसभा न हुई, मानो ‘ठोकसभा’ हो गयी, जिसमें पक्ष-विपक्ष का भेद भूलकर, एकात्म भाव से सब एक-दूसरे को ठोक रहे थे। 

जब यह यादवी संग्राम शांत हुआ, तो कई के सिर फूट चुके थे और कई के हाथ या पैर। साबुत तो कोई बचा ही नहीं था। कई कुर्सियां और मेज भी खेत रहीं। अब तक तो उन्होंने दूसरों का खून बहाया था; पर आज जब अपना खून बहा, तो वे सोचने लगे कि आखिर हम इस तरह लड़े क्यों ? काफी विचार के बाद निष्कर्ष यह निकला कि इस हंगामे का दोषी वह व्यक्ति है, जिसने लोकसभा बनाने को कहा था। उसे ढंूढा, तो पता लगा कि वह तो मारपीट शुरू होते ही खिसक गया था। एक बोला, ‘‘जरूर वह मोदी का आदमी होगा, जिसने हमारे घर में ही हमें बांट दिया।’’ सबने इस पर सहमति व्यक्त करते हुए उसके विरोध में प्रस्ताव पारित कर दिया।

इस प्रकार वह काल्पनिक लोकसभा क्रमशः ठोकसभा से होती हुई फिर असली ‘शोकसभा’ में बदल गयी। ऐसा लगता है कि इसे स्थायी ‘रोकसभा’ बनाने से अब भगवान भी नहीं बचा सकते।