शनिवार, 22 नवंबर 2014

आलेख : आदर्श ग्राम योजना

एक बार फिर भारत सरकार ने ‘आदर्श ग्राम योजना’ प्रारम्भ की है। प्रधानमंत्री का इस पर विशेष जोर है। उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव का विकास करने की घोषणा की है। अनेक सांसद भी अपने क्षेत्र के एक-एक गांव को गोद ले चुके हैं। बाकी पर भी शीघ्र ही ऐसा करने का दबाव है। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि सब विधायक भी एक-एक गांव गोद लें। इससे अगले दो साल में आठ से दस हजार गांव विकसित हो जाएंगे। इसे देखकर बाकी गांवों को भी प्रेरणा मिलेगी और विकास की धारा सर्वत्र बहने लगेगी।

पर यह योजना कितनी सफल होगी, इस पर संदेह है, चूंकि केन्द्र तथा राज्य में जिस दल का शासन रहा, उसने अपने किसी नेता के नाम पर पहले भी ऐसी योजना लागू की हैं। कांग्रेस शासन में गांधी ग्राम, स.पा. द्वारा उ.प्र. में घोषित लोहिया ग्राम और मायावती के शासन में अम्बेडकर ग्राम, भा.ज.पा. द्वारा उत्तराखंड में चयनित अटल ग्राम, म.प्र. में गोकुल ग्राम और निर्मल ग्राम, हरियाणा में कांग्रेस के आदर्श ग्राम.. आदि इसके उदाहरण हैं; पर सरकार बदलते ही आधी-अधूरी पुरानी योजना को किनारे कर नयी योजना थोप दी जाती है। ऐसा बार-बार होता है और ये आदर्श ग्राम अपनी दुर्दशा पर रोते रहते हैं। 

जहां तक आदर्श ग्राम की बात है, तो अच्छे विद्यालय, हर घर में आधुनिक शौचालय, उत्तम सिंचाई, सड़क, चिकित्सालय, बिजली, मनोरंजन के साधन, आपसी सद्भाव, समुचित कानून व्यवस्था.. आदि इसके मानदंड हैं। गांधी जी ने ‘सर्वोदय’, तो दीनदयाल उपाध्याय ने उसकी प्रक्रिया के रूप में ‘अन्त्योदय’ की बात कही थी। भरपूर सरकारी पैसे के बावजूद इन आदर्श ग्रामों में जाकर यदि देखें, तो प्रायः निराशा ही हाथ लगती है। 

वस्तुतः सरकारी योजनाएं ग्राम प्रधान या ब्लॉक प्रमुख आदि के माध्यम से पूरी होती हैं, जिनके निर्वाचन का आधार मुख्यतः जाति या क्षेत्रवाद होता है। इनके चुनाव क्षेत्र प्रायः इतने छोटे होते हैं कि वहां दल की विचारधारा की बजाय प्रत्याशी का चेहरा, जाति और उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ही वोट दिलाती है। ऐसे में विकास की योजना के लिए गांव या मोहल्ले के चयन का आधार भी यही होता है। इसलिए कई जगह बारात घर, विद्यालय, बाजार, सामुदायिक शौचालय, पानी की टंकी, सड़क.. आदि बेकार पड़े मिलते हैं; चूंकि उन्हें वहां बना दिया गया, जहां उसकी आवश्यकता ही नहीं थी। इन योजनाओं में आये धन की नेता, ठेकेदार, पुलिस, प्रशासन.. आदि में बंदरबांट भी खूब होती है। इसलिए निर्माण का स्तर प्रायः घटिया होता है, जो दो-चार साल में बैठ जाता है। इस पर शोर होने से पहले ही नये चुनाव आ जाते हैं। चुनाव के बाद नये प्रतिनिधि और नयी योजना की फिर वही प्रक्रिया चल पड़ती है। 

आजकल सभी सांसदों और विधायकों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए करोड़ों रु. सांसद या विधायक निधि के रूप में मिलते हैं। यद्यपि यह काम प्रशासन के द्वारा ही होता है। इस योजना का उद्देश्य बहुत अच्छा था; पर फिर यहां भी भ्रष्टाचार घुस गया। कई नेता इस पैसे को अपने बाप-दादा की धरोहर मान बैठे। वे इसे विद्यालय, छात्रावास आदि में खर्च करने का आग्रह करने वाले उन सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी आंखें दिखाने लगे, जिनकी कृपा और परिश्रम से वे सांसद या विधायक बने थे।

कई वर्ष पूर्व एक मीडिया संस्थान ने स्टिंग अभियान द्वारा इन कामों में कमीशन मांगने वाले सांसदों का भंडाफोड़ किया था। इस कारण उन्हें सांसदी छोड़नी पड़ी थी। यद्यपि पार्टी में प्रभाव या किसी बड़े नेता की कृपा से उनमें से कुछ फिर सांसद बन गये। इस निधि के सदुपयोग की बजाय दुरुपयोग की ही चर्चा अधिक होती है। इसलिए जहां राजनेता इसे बढ़वाना चाहते हैं, तो दूसरी ओर सामाजिक संस्थाएं इसे समाप्त करने की मांग कर रही हैं। 

इस बार नरेन्द्र मोदी ने सांसदों के लिए ‘आदर्श ग्राम योजना’ में यह बंधन लगाया है कि चयनित गांव जन प्रतिनिधि का अपना या उसकी ससुराल का नहीं होना चाहिए। यह भी तथ्य है कि बड़ी संख्या में सांसद अपने लिए आदर्श ग्राम नहीं चुन सके हैं। इससे इस कार्य के प्रति उनकी गंभीरता पता लगती है। यद्यपि काम तो फिर भी होगा ही, क्योंकि केन्द्र का आदेश है कि जो सांसद ऐसा नहीं करेंगे, वहां के जिलाधीश उनके क्षेत्र के किसी गांव को चुन लेंगे। कई सांसदों का कहना है कि एक गांव के चयन से बाकी लोग नाराज हो जाएंगे। इसलिए कई जगह वे पर्ची निकालकर गांव चुन रहे हैं। 

कई सामाजिक संस्थाएं भी ग्राम विकास में रुचि लेती हैं। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी है। संघ ने देश के प्रायः हर विकास खंड में एक गांव गोद लिया है। लगभग 30 वर्ष पूर्व संघ ने देहरादून जिले के एक जनजातीय ग्राम को चुना। समाजसेवियों के सहयोग से वहां विद्यालय और चिकित्सालय खोले गये। इससे प्रशासन भी सक्रिय हुआ और कुछ सरकारी योजनाएं वहां लागू होने लगीं। इससे वहां के लोग तो प्रसन्न हुए; पर आसपास के गांव वाले नाराज हो गये। उनका कहना था कि सारा धन एक ही जगह लगाने की बजाय कुछ धन हमारे यहां भी खर्च होना चाहिए। ऐसी समस्याओं का समाधान भी प्रेम और धैर्य से करना पड़ता है। 

इस काम में लगे कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि केवल सरकार या बाहरी सहयोग से ही विकास नहीं होता। इसके लिए स्थानीय लोगों को भी जागरूक और सक्रिय होना होगा। संघ इसी आधार पर काम करता है। प्रधानमंत्री ने यह योजना जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन 11 अक्तूबर पर प्रारम्भ की है। उनके जीवन के एक प्रसंग से भी यह बात स्पष्ट होती है।

एक बार जयप्रकाश जी और उनके युवा मित्रों ने एक गांव में लोगों को सफाई का महत्व बताया और सफाई भी की। इसके दो-तीन माह बाद वे फिर वहां गये, तो गांव पूर्ववत गंदा दिखायी दिया। उन्होंने पूछा, तो ग्रामीणों ने इसके लिए उन्हें ही दोषी ठहराया। उनका कहना था कि वे लोग एक बार ही आकर रह गये, जबकि उन्हें बार-बार आना चाहिए। अर्थात गांव वालों ने सफाई की जिम्मेदारी उन युवाओं पर ही डाल दी और स्वयं इससे पल्ला झाड़ लिया।

भारत के लगभग हर गांव में सरकारी योजनाओं के नामपट लगे मिलते हैं; पर वहां का हाल अच्छा नहीं है। दूसरी ओर अनेक गांव ऐसे हैं, जिन्हें देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। इन दोनों परिदृश्यों को देखें, तो पता लगता है कि जहां किसी व्यक्ति ने निःस्वार्थ भाव से स्वयं को उस विकास का केन्द्रबिन्दु बना लिया, वहां तो विकास होता है; पर जहां केवल शासकीय योजनाएं चलती हैं, वहां उद्घाटन के बाद अधूरे काम और उसमें भी भ्रष्टाचार के समाचार ही सुनने और पढ़ने में आते हैं। 

अन्ना हजारे का नाम सबने सुना है। यद्यपि अरविंद केजरीवाल के धोखे में फंसकर उन्होंने अपनी चमक खो दी; पर उससे पूर्व महाराष्ट्र में उनके गांव ‘रालेगढ़ सिन्दी’ के विकास की सर्वत्र चर्चा होती थी। किसी समय वहां भी शराब, चोरी, जुआ, गंदगी.. आदि का साम्राज्य था। ऐसे में अन्ना फौज से सेवानिवृत्त होकर आये। अविवाहित अन्ना ने घर की बजाय गांव के मंदिर में डेरा डाला और फिर निःस्वार्थ भाव से गांव की सेवा में समर्पित हो गये। इससे कुछ ही वर्ष में गांव का चित्र बदल गया।

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में 1991 में भारी भूकम्प आया था। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव गंगा घाटी में हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत कार्यवाह और देहरादून के डी.बी.एस. कॉलिज में भूगोल के विभागाध्यक्ष डा. नित्यानंद जी दो वर्ष पूर्व ही सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने मनेरी गांव को केन्द्र बनाकर अपनी पूरी शक्ति गंगा घाटी के पुनर्निर्माण और विकास में लगा दी। उनके परिश्रम से न केवल गंगा घाटी, अपितु यमुना और टोंस घाटी में हुए परिवर्तन साफ दिखते हैं। उन्होंने जो छात्रावास और विद्यालय बनवाये, उनमें पढ़े हजारों छात्र उन्हें देवतातुल्य मानते हैं। 60 वर्ष पूरे होने पर नानाजी देशमुख भी राजनीति छोड़कर चित्रकूट के विकास में लग गये थे। आज वह पूरा क्षेत्र अपने विकास की गाथा स्वयं कहता है।

ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। कुछ लोगों ने गांव के विकास के लिए सरकारी धन लिया है और कुछ ने नहीं; पर यहां सरकारी धन की बजाय उस निःस्वार्थ व्यक्ति की भूमिका का महत्व अधिक है, जिसने स्वयं को वहां खपा दिया। वह विवाहित हो या अविवाहित; पर यदि वह पूरे गांव को अपना परिवार मान ले, तभी विकास होता है। अर्थात राज्य की भूमिका छोटे भाई और सहयोगी की होनी चाहिए; पर सरकारी योजनाओं में शासन-प्रशासन महत्वपूर्ण और स्थानीय व्यक्ति गौण हो जाते हैं। ऐसे सेवाभावी लोगों को भी परेशान किया जाता है, जिससे वे भाग जाएं और भ्रष्टाचार के नाले में डूब कर विकास की खानापूरी की जा सके।

इसलिए ‘आदर्श ग्राम योजना’ का क्या होगा, कहना कठिन है। क्योंकि इसमें अधिकांश जिम्मेदारी सांसदों पर डाली गयी है। कई सांसद निवासी कहीं के हैं, और चुनाव कहीं और से जीते हैं। वे बेचारे अपने क्षेत्र के राजनीतिक और जातिगत समीकरण साधें या विकास करें ? ऐसे में कई लोग आशंकित हैं कि ‘स्वच्छता अभियान’ की तरह यह योजना भी एक तमाशा बनकर न रह जाए।