गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

व्यंग्य बाण : चमत्कारी अंगूठी

दिल्ली के चुनाव परिणाम आने के बाद परसों मैं शर्मा जी के घर गया, तो एक बाल पत्रिका उनके हाथ में थी। वे एक कहानी पढ़ रहे थे, जिसका शीर्षक था ‘चमत्कारी अंगूठी’। मैंने प्रश्नाकुल आंखों से बुढ़ापे में बाल पत्रिका पढ़ने का कारण पूछा, तो उन्होंने चुपचाप पत्रिका मुझे थमा दी और खुद अंदर चाय लेने चले गये। आगे बढ़ने से पहले आप वह कहानी सुन लें। 

एक गांव में राजुल नामक एक किसान रहता था। जमीन तो उसके पास पर्याप्त थी; पर परिश्रम करते उसे बुखार आता था। अतः फसल अच्छी नहीं होती थी। उसके बड़े भाई उतनी ही जमीन में कई गुना अधिक उगा रहे थे। इसकी झलक उनकी जीवन शैली पर भी नजर आती थी। इससे चिढ़कर राजुल सदा इस कोशिश में लगा रहता था कि कैसे भी उसके भाई का अधिकाधिक नुकसान हो। 

गांव के लोगों ने उसे बहुत समझाया कि तुम्हारी गरीबी का कारण तुम्हारा आलस्य है। दूसरों के प्रति मन में जलन रखने से तुम्हारा भला नहीं होगा। इसके लिए तो तुम्हें बड़े भाई की तरह परिश्रम करना होगा; पर राजुल की समझ में यह सब नहीं आता था।

एक बार उस गांव में एक साधु बाबा आये। लोगों ने उनके रुकने का प्रबन्ध मंदिर में कर दिया। कई दिन रुक कर उन्होंने भगवत् कथा सुनायी। कथा में उन्होंने कई सिद्धियों और चमत्कारों की भी चर्चा की। क्रमशः गांव के एक-एक घर से उनके लिए भोजन जाने लगा। जिस दिन राजुल की बारी थी, वह भोजन के साथ दूध भी ले गया और किसी चमत्कार से अपनी गरीबी दूर करने को कहा। उसने यह भी पूछा कि क्या आपके पास कोई चमत्कारी चीज है ? यदि हां, तो वह किसी भी कीमत पर उसे प्राप्त करना चाहता है।

बाबा जी पहले तो टालते रहे; पर जब राजुल पीछे ही पड़ गया, तो उन्होंने अपने झोले से एक अंगूठी निकालकर उसे दे दी। उन्होंने बताया कि इसे दाहिने हाथ की छोटी उंगली में पहनकर अमावस्या की रात में काले कपड़े पहनकर अनुष्ठान करना होगा। उन्होंने कुछ मंत्र भी बताये, जिन्हें तालाब के पानी में खड़े होकर जपना था।

राजुल की खुशी का ठिकाना न था; पर बाबा जी ने एक बात और कही कि इस अंगूठी से तुम जो मांगोगे, वह तो तुम्हें मिलेगा ही; पर उससे दुगना तुम्हारे भाई को मिल जाएगा। यह सुनकर राजुल का चेहरा उतर गया। वह तो भाई को नीचा दिखाना चाहता था; पर यहां तो मामला ही उल्टा हो रहा था। उसने बाबा जी से यह कहना ठीक नहीं समझा और अंगूठी ले ली।

घर आकर भी हर समय वह अंगूठी के बारे में ही सोचता रहता था। बाबा जी जिस दिन गांव से गये, उससे अगले ही दिन अमावस्या थी। राजुल ने अंगूठी का परीक्षण करने के लिए निश्चित विधि से पूजा कर अपनी पत्नी के लिए एक सोने का हार मांगा। अगले दिन उसने देखा कि उसके पूजागृह में अंगूठी के पास ही सोने का हार रखा है। वह शाम को भाई से मिलने गया, तो पता लगा कि उसके पूजागृह में दो सोने के हार रखे मिले हैं। 

राजुल ने माथा पीट लिया। वह तो अपना लाभ और भाई का नुकसान देखना चाहता था; पर यहां तो कहानी ही दूसरी हो रही थी। उसने दो बार और अंगूठी से वर मांगा, तब भी ऐसा ही हुआ। गांव वाले अचानक हो रहे इन चमत्कारों से चकित थे। वे इसे बाबा जी का प्रसाद मान रहे थे; पर उन्हें हैरानी यह थी कि ये तमाशे राजुल और उसके भाई के घर में ही क्यों हो रहे हैं ? इधर राजुल ईर्ष्या की आग में जल रहा था। अंततः उसने एक षड्यन्त्र रचा।

अगली अमावस्या पर वह फिर काले कपड़े पहन कर तालाब पर गया। पूजा के बाद उसने यह वर मांगा कि उसके घर के आगे एक गहरा गढ्डा हो जाए। रातोंरात उसके घर के आगे एक और भाई के घर के आगे दो गढ्डे खुद गये। इससे अगली अमावस्या पर उसने अपनी एक आंख फूटने का वर मांगा। अंगूठी के चमत्कार से उसकी एक, पर उसके भाई की दोनों आंखें फूट गयीं। स्वाभाविक रूप से उसके भाई का जीवन कष्टमय होने लगा; पर राजुल इससे बहुत खुश हुआ।

कहानी तो आगे और भी थी; पर तब तक शर्मा जी चाय ले आये।

- क्यों वर्मा, इस कहानी को पढ़कर कुछ समझे ?

- जी नहीं।

- तुम एक लेखक हो। दुनिया में अपने डेढ़ दिमाग का ढिंढोरा पीटते हो, पर इतनी सी बात पल्ले नहीं पड़ी ?

- शर्मा जी पहेलियां छोड़कर सीधे-सीधे बताइये कि आप कहना क्या चाहते हैं ?

- प्यारेलाल, इस कहानी में राजुल की जगह राहुल गांधी को रखकर दिल्ली चुनाव के परिणाम समझने की कोशिश करो।

- राहुल गांधी को.. ?

- जी हां। दिल्ली में कांग्रेस को जीरो बटे अंडा मिला है; पर हमारे राहुल बाबा इसी से खुश हैं कि केजरी ‘आपा’ ने मोदी और भा.ज.पा. का गरूर तोड़ दिया। 

- वैसे उनका घमंड टूटा तो है।

- पर इससे हमें तो कुछ नहीं मिला। हमारी हालत तो ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ जैसी हो गयी है। भा.ज.पा. को सीट भले ही कम मिली; पर उनके वोट तो कम नहीं हुए। हमें तो न सीट मिली और न ही वोट। ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे।’’

- मैं आपके दिल की पीड़ा समझ रहा हूं शर्मा जी।

- आप तो समझ रहे हैं; पर न जाने राहुल बाबा ये कब समझेंगे कि उनका भला मोदी के हारने से नहीं, कांग्रेस के जीतने से होगा। इसके लिए उन्हें संसद से लेकर सड़क तक जनता के हित में संघर्ष करना होगा। उनकी जमीन कहीं ममता बनर्जी छीन रही हैं, तो कहीं नवीन पटनायक; कहीं चंद्रशेखर राव और कहीं केजरीवाल। यही हाल रहा, तो मां-बेटे को खड़े होकर रोने के लिए भी जमीन नहीं मिलेगी।

इतना कहते-कहते शर्मा जी हांफने लगे। उनका ऐसा रौद्र रूप मैंने पहली बार देखा था। घबराकर वह पत्रिका मैंने उन्हें वापस दे दी। वे फिर उसी कहानी को पढ़ने लगे। 

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

व्यंग्य बाण : मुसीबत और परेशानी

किसी कवि ने लिखा है -

दुनिया में आदमी को मुसीबत कहां नहीं
वो कौन सी जमीं है जहां आसमां नहीं।।

इन पंक्तियों पर अपनी अमूल्य टिप्पणी देने से पहले मैं यह कहना चाहूंगा कि मुसीबत और परेशानी के बीच एक छोटा सा अंतर है। कोई मुसीबत को भी परेशानी समझ कर टाल देता है और कोई परेशानी के बारे में सोच-सोचकर अपने लिए मुसीबत खड़ी कर लेता है। आप अपनी मुसीबत को परेशानी समझें या परेशानी को मुसीबत, यह आप जानें।

पिछले दिनों भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों से पता लगा कि भारत में बाघों की संख्या तीस प्रतिशत बढ़ गयी है। जिन्हें बाघों से वास्ता नहीं पड़ता, वे शहर वाले और देसी-विदेशी एन.जी.ओ. इससे प्रसन्न हैं; पर  जिन गांवों के आसपास बाघ रहते हैं, वे इस समाचार से परेशान हैं। चलिये खैर, बाघों से आज नहीं तो कल, हम निबट ही लेंगे; पर जापान वाले एक दूसरी परेशानी में उलझ गये हैं, जो धीरे-धीरे उनके लिए मुसीबत बनती जा रही है। 

वहां जनसंख्या के आंकड़ों और विभिन्न सर्वेक्षणों में बताया गया है कि लोगों द्वारा पाले जा रहे कुत्तों की संख्या उनके अपने बच्चों से अधिक हो गयी है। सबको लगता है कि जब शासन उन्हें बुढ़ापे में सब तरह की सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाएं दे रहा है, तो फिर बच्चे पैदा कर परेशानी में क्यों पड़ें ? इसका एक पक्ष यह भी है वहां पुरुषों की तरह महिलाएं भी काम करती हैं। यदि कोई महिला गर्भवती हो जाती है, तो उस संस्थान के मालिक मंुह बनाने लगते हैं। उन्हें लगता है कि मां बनने पर यह कई महीने छुट्टी लेगी। इससे इसकी कार्यक्षमता ही नहीं, सुंदरता भी घटेगी और काम की हानि होगी। अतः नौकरी जाने या वेतन और पदोन्नति प्रभावित होने के भय से दम्पति भी बच्चे पैदा करने में रुचि नहीं लेते।

पर काम से घर आने के बाद लोगों को स्नेह-प्रेम और मानसिक संतोष भी चाहिए। दूरदर्शन द्वारा परोसे गये मनोरंजन की भी एक सीमा है, जबकि बच्चे माता-पिता की गोद में कूदफांद कर, उनके कपड़े गन्दे कर, उनसे लड़-झगड़कर, उनकी थाली में खाकर और रात में सोते हुए लातें मारकर उन्हें यह संतोष उपलब्ध कराते हैं। जापान वाले इस कमी को पूरा करने के लिए कुत्ते पाल रहे हैं। वे काम से लौटकर कुत्तों के साथ ही खेलते, खाते और सोते हैं। जहां तक घर के अन्य कामों की बात है, उसके लिए वहां रोबोट है ही।

कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है। कुत्तों की बढ़ती संख्या को देखकर वहां हर नगर में ‘कुत्ता बाजार’ खुल गया है। अतः कुत्तों के लिए कपड़े, बिस्कुट, मिठाई, दूध, उपहार, चिकित्सा, जिम और शृंगार की दुकानें लगातार बढ़ रही हैं। कुत्तों के फैशन शो भी होते हैं, जिसमें कुत्तों के पीछे उनके मालिक और मालकिन भी शान से चलते हैं। वे यह ध्यान रखते हैं कि कुत्तों की देखरेख करने वाला नौकर चाहे जैसे रहे; पर ‘कुत्ता कक्ष’ का ए.सी. कभी बंद न हो।

अब तो लोग अपने कुत्तों के जन्मदिन भी बड़ी धूमधाम से मनाने लगे हैं। लोगों ने खुद भले ही अन्तरजातीय और अन्तरप्रांतीय विवाह किया हो; पर उनके पप्पी किसी ऐसे-वैसे गलीछाप के चक्कर में न पड़ जाएं, इसका वे बहुत ध्यान रखते हैं। मानवजाति में व्याप्त रंगभेद अब वहां भी पहुंच गया है। सुना है एक अंग्रेजीछाप नववधू ने विवाह के तीन बाद ही अपने पति से तलाक ले लिया। क्योंकि पति महोदय ने उसके साथ मायके से आये डॉगी को कुत्ता कह दिया था।

जापान में जहां बच्चों की घटती संख्या परेशानी का कारण बनी है, वहां भारत में बच्चे लगातार बढ़ रहे हैं। जापान की अधिकांश जनसंख्या वृद्ध है, तो भारत में 60 प्रतिशत लोग युवा हैं। यदि यही हाल रहा, तो 50 साल बाद जापान और भारत का क्या हाल होगा, इससे लोग चिन्तित हैं। जापान में घर होंगे; पर उसमें रहने वाले नहीं, जबकि भारत में लोगों के रहने के लिए घर ही नहीं होंगे।

कहते हैं अति हर चीज की बुरी होती है। इस नाते मेरे खुराफाती दिमाग में एक बहुत क्रांतिकारी विचार आया है। भारत में एक वर्ग ऐसा है, जिसका मुख्य काम जनसंख्या बढ़ाना ही है। ऐसे सब लोगों को यदि नौ संतानों वाले लालू दम्पति के नेतृत्व में जापान भेज दिया जाए, तो ‘एक पंथ दो काज’ की तरह भारत और जापान दोनों की समस्या हल हो जाएगी।

बात कुत्तों की चल रही थी, तो यह भी निवेदन कर दूं कि मेरे भारत महान में भी कुत्ताप्रेमी धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं। जिन्होंने आवश्यकता से अधिक पैसा कमा लिया है, या बहुत अधिक अंग्रेजी पढ़ ली है, वे भी जापान के मार्ग पर चल दिये हैं। सुबह-शाम टहलते समय ऐसे लोगों से मुलाकात होती रहती है। पहले लोग अपने घर के दरवाजे पर ‘स्वागतम्’ का बोर्ड लगवाते थे; पर अब उसके बदले ‘कुत्तों से सावधान’ लिखा मिलता है।

कुत्ते को अपनी थाली में खिलाते, बिस्तर पर अपने साथ सुलाते और उसका मुंह चूमते बच्चे प्रायः ऐसे घरों में मिल जाते हैं। कई बेरोजगार लोग इन कुत्तों को नहला-धुला और टहलाकर अपना पेट भर रहे हैं। जैसे बीमार एवं वृद्धों की देखभाल के लिए पुरुष तथा स्त्री नर्सों के भर्ती व प्रशिक्षण केन्द्र हैं, महानगरों में ऐसे ही केन्द्र अब कुत्तासेवकों के लिए भी खुल रहे हैं।

शर्मा जी को गर्व है कि उनका प्यारा डॉगी अंग्रेजी के अलावा कोई और भाषा नहीं समझता। यह बात दूसरी है कि वे उसकी भाषा, हावभाव और इशारे बहुत अच्छी तरह समझने लगे हैं। पहले लोग कुत्तों के नाम शेरू, टॉमी और जैकी आदि रखते थे; पर वैश्वीकरण के इस युग में नामों की शृंखला ओबामा से लेकर ओसामा तक और क्लिंटन से लेकर जरदारी तक जा पहुंची है। मुझे तो भय है कि जैसे एक फिल्म ‘मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.’ के कारण देश में हर तरफ ‘गांधीगीरी’ होने लगी थी, ऐसे ही कहीं ‘कुत्तागीरी’ का फैशन भी न चल निकले।

कलियुग में कुत्ताप्रेमियों की महिमा अपार है। माता-पिता वृद्धाश्रम में, बच्चे देश या विदेश के छात्रावास में और घर में मन लगाये रखने के लिए कुत्ते। माता-पिता के लिए नर्स, बच्चों के लिए वार्डन, और कुत्तों की सेवा के लिए तो वे खुद हैं ही। ऐसे में उनका भविष्य क्या होगा, ये वही जानें। काश, वे ऐसे बुजुर्गों से कुछ सीख सकें, जिनके सपूतों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है और जो अपनी सुरक्षा के लिए कुत्तों पर ही निर्भर हैं।

कुत्तों की मानव जाति से मित्रता कब से है, यह शोध का विषय है। महाभारत काल का एक प्रसंग इसमें कुछ सहयोग कर सकता है, जब धर्मराज युद्धिष्ठिर ने अपने सहयात्री कुत्ते के बिना स्वर्ग जाने से मना कर दिया था। यद्यपि अब न युद्धिष्ठिर जैसे धर्मराज रहे और न वैसे कुत्ते। सोवियत रूस वालों की कृपा से ‘लाइका’ नामक कुतिया ने मनुष्य से पहले ही अंतरिक्ष की सैर कर ली थी।

अमरीकी राष्ट्रपतियों के साथ उनकी सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित कुत्तों का दस्ता भी आता है। पिछली बार क्लिंटन के आने से पूर्व उन कुत्तों द्वारा गांधी जी की समाधि के निरीक्षण पर बड़ा विवाद हुआ था। कुत्ते तो इस बार ओबामा के साथ भी आये थे; पर गनीमत है वे गांधी समाधि पर नहीं गये। 

जहां तक वर्मा जी की बात है, वे टहलते समय कुत्तों और कुत्ते वालों से एक लाठी की दूरी बनाये रखते हैं। मैंने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बुजुर्गों की कही हुई ये पंक्तियां दोहरा दीं।  

बहिन के घर भाई कुत्ता
ससुर के घर जंवाई कुत्ता
जो कुत्ता पाले वह कुत्ता।

यदि आप इसमें से किसी श्रेणी में हों, तो सावधान हो जाएं। कहना मेरा कर्तव्य है, बाकी तो ये आपकी परेशानी और आपके पड़ोसियों की मुसीबत है। भौं-भौं।