शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

व्यंग्य बाण : वी.वी.आई.पी. खांसी

मुझे फिल्म देखने का कभी शौक नहीं रहा। हां, अच्छे गीत सुनने से मन-मस्तिष्क को आराम जरूर मिलता है। बालगीत भी बहुत अच्छे लगते हैं। ऐसे कुछ गीत और कविताएं मैंने भी लिखी हैं। कई बड़े अभिनेताओं ने बालगीत गाये हैं, यद्यपि वे स्थापित गायक नहीं है। इनमें अशोक कुमार द्वारा फिल्म ‘आशीर्वाद’ में गाया ‘रेलगाड़ी छुक-छुक, छुक-छुक, बीच वाले स्टेशन बोले रुक-रुक रुक-रुक’ और फिल्म ‘नटवरलाल’ में अमिताभ बच्चन द्वारा गाया गीत ‘मेरे पास आओ मेरे दोस्तो, एक किस्सा सुनो’ बहुत प्रसिद्ध हैं।

अमिताभ ने उस गीत में एक जंगल का किस्सा सुनाते हुए बताया कि कैसे उन्हें एक शेर ने खा लिया। इस पर एक बच्चा आश्चर्य से बोला, ‘‘खा गया..., लेकिन आप तो जिन्दा हैं ?’’ इस पर अमिताभ चौंकते हुए कहते हैं, ‘‘अरे ये जीना भी कोई जीना है लल्लू ?’’

बस, ऐसी ही कुछ बात शर्मा जी की खांसी की है। कई दिन से वे खांस रहे हैं। कई दिन से नहीं, कई महीने से। कोई गंभीरता से पूछे, तो उनकी पत्नी बताती हैं कि उन्हें यह रोग कई साल से है। मौसम बदलने पर या धूल आदि में खांसी बढ़ जाती है। कई तरह के इलाज कराये; पर स्थायी लाभ नहीं हुआ। कोई ‘होम्योपैथी’ लेने की सलाह देता है, तो कोई ‘एलौपैथी’। कुछ लोग ‘नैचुरोपैथी’ के पक्ष में भी हैं; पर मैं तो इन सबसे आगे बढ़कर ‘सिम्पैथी’ का समर्थक हूं। मेरा मत है कि यदि डॉक्टर की मरीज के प्रति ‘सिम्पैथी’ नहीं है, तो मरीज का ठीक होना कठिन है।

ऐसी ही ‘सिम्पैथी’ के दर्शन पिछले दिनों तब हुए, जब 'दिल्ली पुलिस दिवस' पर आयोजित समारोह में नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, किरण बेदी जैसे बड़े-बड़े लोग मिले। मिले ही नहीं, तो पास-पास बैठे भी। दिल्ली चुनाव में किरण बेदी को लगे घाव अभी ताजे ही हैं। इसलिए वे तो चुप रहीं; पर मोदी और राजनाथ सिंह ने ऐसी हार-जीत का स्वाद कई बार लिया है। इसलिए हल्की-फुल्की बात होने लगी।

बातचीत के बीच में ही केजरीवाल खांसने लगे। राजनाथ सिंह ने उनसे इस रोग के बारे में पूछा, तो नरेन्द्र मोदी ने ‘सिम्पैथी’ दिखाते हुए बंगलुरु के एक चिकित्सक डा. नागेन्द्र से सलाह लेने को कहा, जो पुरानी खांसी के विशेषज्ञ हैं। वे दवा के साथ ही योग, आसन, प्राणायाम और प्रार्थना आदि का भी सहारा लेते हैं। केजरीवाल ने कहा कि मैं उनसे जरूर मिलूंगा।

शर्मा जी मेरे पुराने मित्र हैं। उनकी खांसी से मुझे भी सहानुभूति है; पर आज मैं सोचता हूं कि खांसी हो तो केजरीवाल जैसी। जिस पर राजनाथ सिंह ‘सिम्पैथी’ दिखाएं और प्रधानमंत्री खुद सलाह दें, उसे खांसी नहीं, वी.वी.आई.पी. खांसी कहना अधिक उचित है। 

मेरे एक मित्र राजनीति में बड़े ऊंचे स्थान पर हैं। अतः काफी व्यस्त रहते हैं। किसी जमाने में उनसे जब चाहे तब मिल लेते थे; पर अब तो पांच मिनट मिलने के लिए भी कई दिन पहले समय लेना पड़ता है। ऐसे बड़े आदमी को हर दिन किसी ने किसी कार्यक्रम में भी जाना पड़ता है। वहां खाने-पीने के लिए तेज मिर्च-मसाले वाली चटपटी बाजारी चीजें अधिक मिलती हैं। न खाएं, तो मेजबान नाराज; और खाएं तो शरीर दुखी। यानि ‘आगे कुआं और पीछे खाई’। बीमार होने पर अगले कार्यक्रमों में व्यवधान आ जाता है। इसलिए वे बहुत संभल कर रहते हैं। 

लेकिन इतनी सावधानी के बावजूद एक बार उनका पेट खराब हो गया।  बस फिर क्या था। ‘सिम्पैथी’ दिखाने वालों की चांदी हो गयी। कोई भी इस स्वर्णिम अवसर को खोना नहीं चाहता था। नेता जी आराम के मूड में थे; पर मित्र लोग इस अवसर पर ‘सिम्पैथी’ प्रकट करने से बाज नहीं आ रहे थे। जिसे पता लगा, वही दौड़ पड़ा। घर के आगे मिलने वालों की लाइन लग गयी। राजनीति में रहना है, तो लोगों को नाराज भी नहीं किया जा सकता था। इसलिए उन्होंने कुछ लोगों से मिलना उचित समझा। उनके सहायक एक-एक कर लोगों को अंदर भेजने लगे।

एक सज्जन बड़े सी हंडिया में मट्ठा लाये थे। बोले, ‘‘हमारे घर में तीन पीढ़ियों से देसी गाय पल रही हैं। उसके दूध से मट्ठा भी प्राचीन विधि से तैयार करते हैं। आज तो मेरी मां ने खास तौर पर इसे आपके लिए ही बनाया है। आप इसका सेवन करें। क्या मजाल जो पेट ठीक न हो। एक गिलास तो आप अभी पी लें। इससे मुझे ही नहीं, मेरी मां को भी बहुत संतुष्टि होगी।’’

नेता जी ने मट्ठा रख लिया और जैसे-तैसे उन्हें टाला। तब तक दूसरे सज्जन आ गये। वे एक ‘चमत्कारी दवा’ लाये थे। उन्होंने बताया कि उनके दादा जी को किसी संत ने यह दवा बतायी थी; पर इसके साथ शर्त यह भी थी कि वे इसका फार्मूला किसी को नहीं बताएंगे और इसके लिए किसी से एक पैसा नहीं लेंगे। अन्यथा इस दवा का चमत्कार समाप्त हो जाएगा। उन्होंने भी यही कहा कि एक खुराक आप अभी ले लें और एक कल सुबह। फिर इसका कमाल देखिये। अगले कई साल तक पेट खराब नहीं होगा।

वे टले, तो तीसरे सज्जन ‘च्यवनप्राश’ लेकर प्रकट हो गये। उन्होंने कहा कि हम अपने प्रयोग के लिए शास्त्रीय विधि से हर साल एक क्विंटल देसी आंवले से च्यवनप्राश बनाते हैं। उसमें सोने और चांदी की शुद्ध भस्म भी डाली जाती है। बस, वही मैं आपके लिए लाया हूं। आप रात को सोते समय गुनगुने दूध से इसे लें। पेट तो ठीक होगा ही, दिल और दिमाग को भी काफी ताकत मिलेगी।

घंटे भर की इस भेंट में किसी ने असली हरड़ की गोली दी, तो किसी ने देसी अमरूद। एक सज्जन तो ‘एनीमा’ के यंत्र-तंत्र ही साथ लाये थे और उसे लगवाने की जिद पकड़ ली। उन्हें टालने में सबसे अधिक कठिनाई हुई। लोग तो और भी कई मिलना चाहते थे; पर तब तक नेता जी का पेट फिर गुड़गुड़ाने लगा। उन्होंने सबसे क्षमा मांगी और शौचालय में घुस गये। 

कल जब मैं शर्मा जी के घर गया, तो वे फिर खांस रहे थे। मैंने अमिताभ बच्चन की तर्ज पर कहा, ‘‘ये खांसी भी कोई खांसी है शर्मा जी ? खांसी हो तो केजरीवाल जैसी। जिसे वी.आई.पी. सिम्पैथी और वी.वी.आई.पी. सलाह मिल सके।’’

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

आलेख : ओबामा की बेचैनी

पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति श्री बराक हुसेन ओबामा हमारे गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि बनकर यहां आये थे। उनके प्रवास के दौरान खूब गहमागहमी रही। समाचार पत्र उनके साथ हुई चर्चा और समझौतों से भरे रहे। रेडियो और टी.वी. भी उनके दर्शन करने और कराने में व्यस्त रहे। प्रवास के अंतिम दिन दिल्ली के ‘श्रीफोर्ट सभागार’ में हुए एक कार्यक्रम में उनकी कुछ टिप्पणियों से नरेन्द्र मोदी विरोधियों की बांछें खिल गयीं। वे ओबामा के इन वाक्यों को लेकर मोदी को घेरने लगे। 

ओबामा ने एक ओर तो भारत की धर्मनिरपेक्षता की प्रशंसा करते हुए कहा कि हिन्दू बहुल देश होने पर भी यहां मिल्खा सिंह, शाहरुख खान और मैरी कॉम..आदि को भरपूर प्यार मिलता है; पर साथ ही यह भी कह दिया कि भारत तेजी से तभी उन्नति कर सकता है, जब यहां धर्म के आधार पर लोगों के बीच भेद न किया जाए। 

ओबामा ने यह क्यों कहा, इस पर लोगों के अलग-अलग मत हैं। पिछले दिनों भारत में हिन्दू संस्थाओं द्वारा कराये जा रहे ‘घर वापसी’ कार्यक्रमों का खूब हल्ला हुआ। आगरा के एक कार्यक्रम पर तो हिन्दू विरोधियों ने खूब छाती पीटी। इसी प्रकार दिल्ली के कुछ चर्चों में चोरी और तोड़फोड़ भी हुई। ये समाचार नमक-मिर्च के साथ अमरीका भी पहुंचे होंगे। ओबामा को इसी से बेचैनी हुई। 

आज तक तो दुनिया में ईसाई और मुसलमान ही धर्मान्तरण कराते थे। इसके लिए छल और बल का प्रयोग होता ही रहा है। दूसरों के धर्मस्थलों को तोड़ने पर भी मानो उनका ही एकाधिकार था; पर भारत में यह उल्टी गंगा कैसे बहने लगी ? ईसाई और मुसलमान अपना मजहब कैसे छोड़ने लगे ? वे बिना किसी हिंसा, लालच या दबाव के अपने पूर्वजों के पवित्र हिन्दू धर्म में क्यों लौटने लगे ? चर्च के आसपास रहने वालों का कहना है कि जिन गरीबों को पादरियों ने शादी, नौकरी या अन्य कोई लालच देकर ईसाई बनाया था, अपनी आकांक्षा पूरी न होने पर उन्होंने ही चर्च में तोड़फोड़ की है। यह भी संभव है कि मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए पादरियों ने स्वयं ही यह षड्यन्त्र किया हो। अपने मजहब के हित के लिए किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी को वहां खराब नहीं माना जाता।

ईसाई संस्थाओं को विदेशी पैसा तो भरपूर आता ही है। इनके द्वारा चलने वाले सेवा केन्द्र ही धर्मान्तरण का आधार तैयार करते हैं। भारत में परार्वतन और घर वापसी जैसे कार्यक्रमों की चर्चा सुनकर धन देने वाले दानदाता इन संस्थाओं को डांटते हैं कि इतना पैसा झोंकने के बावजूद पर्याप्त धर्मान्तरण तो हुआ नहीं, उल्टे ‘घर वापसी’ होने लगी। इससे बचने और पहले से अधिक पैसा वसूलने के लिए ही पादरी और इन संस्थाओं के प्रबन्धक ऐसे षड्यन्त्र रचते हैं।

एक दूसरा तथ्य यह भी है कि मिशनरी लोग झुग्गियों आदि में प्रचार करते समय किसी घर के एक कमरे में ईसा का चित्र टांग देते हैं। हिन्दू घरों में दो-चार देवी-देवताओं के चित्र होते ही हैं। अतः वे एक और चित्र को भी स्थान दे देते हैं। उस कमरे का प्रयोग वह परिवार ही करता है; पर सप्ताह या महीने में एक बार वहां ईसाई प्रचारक आकर प्रवचन करते हैं। इस कमरे के लिए वे या तो कुछ किराया देते हैं या उसके मालिक को अन्य किसी तरह आर्थिक लाभ पहुंचाने लगते हैं। उस प्रवचन में वहां के और आसपास की बस्तियों के निर्धन लोग आते हैं। धीरे-धीरे वहां धर्मान्तरण की चर्चा होने लगती है। इससे नाराज होकर बस्ती वाले स्वयं ही वहां तोड़फोड़ कर देते हैं। बस, उसी को पादरी और मीडिया वाले चर्च पर हुआ हमला कह देते हैं। 

जहां तक धर्म या मजहब के आधार पर होने वाले भेदभाव की बात है, तो भारत दुनिया का एकमात्र देश है, जहां बहुसंख्यक हिन्दुओं को दो नंबर का नागरिक माना जाता है। अल्पसंख्यक आयोग बनाकर यहां मुसलमान और ईसाइयों को अनेक सुविधाएं दी गयी हैं, जबकि वे सब भारत के ही मूल नागरिक हैं। इस लालच में सिख, बौद्ध और अब जैन भी अल्पसंख्यक बन गये हैं। 

दूसरी ओर अमरीका में शासन-प्रशासन के शीर्ष पदों पर कोई गैर ईसाई नहीं बैठ सकता। ओबामा का पूरा नाम ‘बराक हुसेन ओबामा’ उनके मुस्लिम मूल को बताता है। यद्यपि वे अब ईसाई हैं। इसी से उन्हें अमरीकी राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर मिला। अमरीका में अगले साल राष्ट्रपति का चुनाव है। रिपब्लिकन पार्टी की ओर से जो लोग इसके दावेदार हैं, उनमें लुइजियाना प्रांत के गवर्नर बॉबी जिन्दल भी हैं। उनका मूल नाम पीयूष जिन्दल है। उनके माता-पिता मूलतः पंजाबी हैं, जो अमरीका में जा बसे। पीयूष का जन्म अमरीका में ही हुआ। आगे बढ़ने की आकांक्षा के चलते वे भी ईसाई हो गये और नाम ‘बॉबी’ रख लिया। अब वे नये मुल्ला की तरह ज्यादा प्याज खा रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय मूल का अमरीकी न कहें। वे अमरीकी मूल के ही अमरीकी हैं। भारत में अमरीका के राजदूत रिचर्ड वर्मा की भी यही कहानी है।

ऐसे देश के राष्ट्रपति श्री ओबामा किस मुंह से हमें धर्मनिरपेक्षता सिखा रहे हैं ? सच तो यह है कि अमरीका हो या इंग्लैंड, कोई भी ईसाई देश चर्च के विचारों से आगे नहीं जा सकता; और चर्च की एकमात्र योजना विश्व का ईसाइकरण है। यदि ओबामा में साहस है, तो सबसे पहले वे दुनिया भर में मिशनरियों द्वारा किये गये नरसंहारों की माफी मांगे। इसके बाद वे पोप को धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ायें; और फिर दुनिया के उन मुस्लिम देशों में जाएं, जहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं और ईसाइयों पर बर्बर अत्याचार हो रहे हैं।

भारत प्रवास से लौटने के कुछ दिन बाद ‘नेशनल प्रेयर ब्रेकफास्ट कार्यक्रम’ में ओबामा ने फिर कुछ ऐसी ही टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक असहिष्णुता इतनी बढ़ी है कि यदि आज गांधी जी होते, तो उन्हें भी इससे धक्का लगता। अब इस पर भी मोदी और संघ विरोधी हल्ला कर रहे हैं। गांधी जी को आज की परिस्थिति में कैसा लगता, ये तो कल्पना ही की जा सकती है; पर गांधी जी ने अपने जीवनकाल में ईसाइयों को क्या-क्या कहा है, ये छिपा नहीं है। गांधी जी का पूरा लेखन व भाषण आदि प्रकाशित हुए हैं, जिसे कोई भी देख सकता है।

गांधी जी ने लगभग 20 वर्ष विदेश में बिताये थे। स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने के बाद भी वे विदेश जाते रहे। ईसाई मिशनरियों ने उनसे सम्पर्क कर उन्हें भी ईसाई बनाने का प्रयास किया; पर वे विफल रहे। गांधी जी हर धर्म में अच्छा देखने और ग्रहण करने का प्रयास करते थे। इसलिए वे ‘पर्वत प्रवचन’ के समर्थक थे। उन्हें इससे बहुत कष्ट होता था कि मिशन वाले हिन्दुओं के देवी-देवताओं और उनके निजी विश्वासों पर गंदी टिप्पणी करते थे। गांधी जी ने उनके बारे में जो कहा है, उसके कुछ नमूने प्रस्तुत हैं, जो ‘गांधी जी और ईसाइयत’ (लेखक रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’ और कुसुमलता केडिया, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली) से लिये गये हैं।

Û ईसा कोई अवतार या प्रभु के एकमात्र पुत्र नहीं, बल्कि एक अच्छे शिक्षक थे। ईसाई प्रचारक भी आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं, बल्कि कुशल वक्ता होते हैं। 

Û यह सोच अनुचित है कि ईसा सबके बुरे कर्मों की सजा पाकर सूली चढ़ गये। इससे तो ईसाई को आजीवन दुष्कर्म करने की छूट मिल जाती है।

Û ओल्ड टेस्टामेंट में कुछ गूढ़ सत्य हैं; पर न्यू टेस्टामेंट के शब्द स्वयं प्रभु के हैं, यह मैं नहीं मानता। मैं उनके तीन प्रमुख पदों फादर, सन और होली घोस्ट को उस अर्थ में नहीं मानता, जैसा पादरी बताते हैं।

Û यह विचार ठीक नहीं है कि काम भावना पाप का मूल है तथा इस प्रक्रिया में से पैदा होने के कारण मानव जन्मजात पापी है। स्त्रियांे को आत्माहीन तथा पुरुषों के मुकाबले द्वितीय श्रेणी का प्राणी मानना भी गलत है।  

Û ईसाइयत के इतिहास में युद्धों की प्रधानता रही है। उन्होंने विश्व के सर्वाधिक सभ्य तथा सुसंस्कृत लोगों को कंगाल बनाया है। हिन्दुओं में अस्पृश्यता की तरह ईसाइयों में युद्धप्रियता भी कलंक है। 

Û भारत में ईसाइयत अराष्ट्रीयता और यूरोपीकरण का पर्याय है। मिशनरी ब्रिटिश साम्राज्य के सेवक और विस्तारित एजेंट हैं। इसलिए स्वतंत्र भारत में उनका कोई स्थान नहीं होगा।

Û धर्मान्तरण मानवता के लिए भयंकर विष है। यदि सत्ता मेरे हाथ में हो, तो मैं धर्मान्तरण का यह सारा धन्धा ही बंद करा दूं। धर्मान्तरित करते समय गोमांस और शराब का सेवन कराना घृणित है।

Û शिक्षा में उनकी रुचि पवित्र उद्देश्य से नहीं, वरन ईसाइयत के पापपूर्ण प्रचार और विस्तार के लिए है।

Û मिशनरियों द्वारा बांटा जा रहा पैसा धनपिशाच का फैलाव है।

ऐसे सैकड़ों उद्धरण दिये जा सकते हैं। इस बारे में स्व. श्री रामस्वरूप जी ने भी बहुत कुछ लिखा है। श्री ओबामा भारत और हिन्दू धर्म की महान परम्पराओं पर कुछ कहने से पहले यदि अपने गिरेबान में झांक लें, तो अच्छा रहेगा।