गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

व्यंग्य बाण : राजनीति का इंजन

कुछ लोग देश की अर्थव्यवस्था के संचालन में खेती का प्रमुख योगदान मानते हैं, तो कुछ उद्योगों का। कुछ व्यापार को सर्वाधिक महत्व देते हैं, तो कुछ भ्रष्टाचार को; पर शर्मा जी विवाह को भारतीय अर्थव्यवस्था का इंजन मानते हैं। उनका मत है विवाह के बाद बच्चे होते हैं। उनकी पढ़ाई, लिखाई, दवाई और सुख-सुविधाओं में लाखों रु. खर्च होते हैं। बड़े होने पर उनके लिए घर, काम-धंधे और फिर विवाह का प्रबंध किया जाता है। इससे सैकड़ों लोगों को काम मिलता है। यदि विवाह न हों, तो हमारी अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी।

आप जानते ही हैं कि हम कई मित्र हर दिन सुबह-शाम ‘आजाद पार्क’ में मिलते हैं। आजाद पार्क उसे इसलिए कहते हैं कि वहां आजादी के समय से ही सभी राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा झंडा फहराया जाता है। वहां देश और विदेश की हर समस्या पर पूरी गंभीरता से चर्चा होती है। कभी-कभी तो वातावरण मोदी और ओबामा की वार्ता जैसा हो जाता है। आप तो अपने खासमखास हैं, इसलिए बता रहा हूं। आप किसी से कहना भी नहीं कि वहां घरेलू नीति की चर्चा बिल्कुल नहीं होती। क्योंकि वहां हममें से कोई कुछ कर भी नहीं सकता। वह मोर्चा पूरी तरह गृहमंत्रियों के अधीन है। 

यों तो हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों में भी फली नहीं फोड़ सकते; पर हां, बात करने में किसी का क्या घिसता है ? और वही हम करते हैं। इससे कुछ घंटे घर से बाहर ‘आजादी’ के माहौल में कट जाते हैं। धन्य है वह चिरदुखी आत्मा, जिसने इसे ‘आजाद पार्क’ नाम दिया। अब जो लोग घर-गृहस्थी के जंजाल में नहीं फंसे, वे इन गूढ़ बातों को क्या समझेंगे ?

आपने सुना होगा कि कुछ लोगों पर भूत-प्रेत या देवियां आती हैं। शर्मा जी पर भी कभी-कभी चाणक्य और सुकरात की आत्माएं आती हैं। तब वे बहुत ऊंची बातें करने लगते हैं। आज सुबह भी ऐसा ही हुआ। वे बोले कि देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं, तो देश की राजनीति का इंजन भी विवाह ही है। हम आश्चर्य में पड़ गये; पर उन्होंने इसकी जो व्याख्या की, उससे हमें उनकी बुद्धि का लोहा मानना पड़ा।

शर्मा जी के मन में राहुल बाबा और उनकी पूज्य मम्मी जी के लिए बहुत आदर है; पर इन दिनों बाबा जिस तरह अपने कुछ खास मित्रों के साथ अज्ञातवास पर हैं, उससे वे परेशान हैं। फिर भी वे पूरी तरह निराश नहीं हैं। उनका कहना है कि कई जगह विवाह से पहले दूल्हा कुछ देर के लिए रूठ जाता है। फिर सबके कहने पर वह विवाह के लिए मान भी जाता है। ऐसा ही यहां हो रहा है।

इससे मुझे अपने गांव की याद आ गयी। वहां तिलक के लिए कन्या पक्ष के लोगों के आने से कुछ देर पहले लड़का रूठकर पास के एक मंदिर में चला जाता है। वह ऐसा प्रदर्शित करता है मानो उसे संसार से विरक्ति हो गयी है और वह संन्यास ले रहा है। फिर परिवार और मोहल्ले की महिलाएं वहां जाकर उसे मनाती हैं। मिठाई खिलाकर नये वस्त्र आदि देती हैं। इससे वह मान जाता है और सब गीत गाते हुए उसे लेकर घर वापस आते हैं। 

शर्मा जी का कहना है कि राहुल बाबा के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। वे पार्टी में बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं; पर उन्हें वह रूठने और मनाने वाली परम्परा भी तो निभानी है। यह बात दूसरी है कि उन्हें मनाएं या नहीं, इस पर घर में भारी मतभेद हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस रूठने-मनाने के चक्कर में पार्टी चौपट हो रही है; पर अंततः चलेगी तो मम्मी जी की ही। सो वे शीघ्र ही मान जाएंगे और उनका तिलक भी हो जाएगा।

कांग्रेस जहां विवाह से पूर्व की परम्पराओं में व्यस्त है, तो आम आदमी पार्टी (आपा) विवाह के बाद की समस्याओं से ग्रस्त है। विवाह के बाद हनीमून होता है; पर यहां उससे पहले ही तलाक के कागज बन गये हैं। प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, प्रो. आनंद कुमार आदि को केजरी ‘आपा’ ने लात मारकर राजमहल से बाहर कर दिया है। उन्हें चेतावनी दी गयी है कि वे पटरानी बनने की कोशिश न करें। हां, राजाओं के यहां जैसे कई रानियां होती हैं, वैसी ही रानी या उसकी दासी बनकर रहना चाहें, तो उन्हें महल के कोने में जगह मिल सकती है। खाने-कपड़े की उन्हें कोई समस्या नहीं होगी; पर इससे अधिक की आशा वे न करें।

लेकिन प्रशांत भूषण आदि को विवाह के बाद यह चौथे दर्जे की नागरिकता स्वीकार नहीं है। कई समझदार लोगों ने पहले ही कहा था कि ये बेमेल विवाह टिकेगा नहीं; पर वे नहीं माने। दुल्हन और दहेज को केजरी ‘आपा’ ने कब्जा लिया है। फिर भी वे ‘न छोड़ेंगे न तोड़ेंगे’ के गीत गा रहे हैं। किसी ने लिखा है - इब्तिदाए इश्क है रोता है क्या, आगे आगे देखिये होता है क्या ?

ऐसे ही एक बेमेल विवाह के लिए फिर से बैंड वालों को निमन्त्रण मिला है। उन्हें कहा गया है कि ‘बूढ़े भारत में भी आयी फिर से नयी जवानी थी’ की तर्ज पर नये मंगलगान की रचना करें। कई साल से ट्रंक में रखे पुराने शाही कपड़ांे को झाड़कर धूप लगायी जा रही है।  दर्जी उनके पैबंद संवार रहा है। नकली दांत जबड़े में फिट करने की कोशिश हो रही है। बालों में मेंहदी लगाने के लिए नाई आ गया है। यद्यपि वह परेशान है कि जिनके बाल ही उड़ गये हैं, उन्हें क्या लगाये ? मोची की समझ में यह नहीं आ रहा कि जन जूतों में तला ही नहीं है, उन्हें पॉलिश करने से क्या होगा ?

आप समझ ही गये होंगे। ‘हम मिले तुम मिले, फिर लड़ने के लिए’ के अनुगामी बुढ़ापे में पुनर्विवाह की तैयारी कर रहे हैं। विवाह के लिए दोनों ओर कुछ समानता चाहिए। पंडित जी वर-कन्या की कुंडली मिलाते हैं, तो मध्यस्थ लोग दोनों परिवारों के जाति और गोत्र के साथ ही आर्थिक और सामाजिक स्थिति का ध्यान रखते हैं। विवाह में एक दूल्हा और एक दुल्हन होते हैं; पर यहां परम आदरणीय मुलायम सिंह, लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, चौटाला, देवेगौड़ा.. आदि कई दूल्हे हैं। सत्ता रूपी कन्या पाने के इच्छुक इन बुजुर्गों में समानता यह है कि ये सब मोदी के सताए और जनता के ठुकराए हुए हैं। बाहर चाहे ये जो कहें; पर अंदर से सब यही चाहते हैं कि घोड़ी पर बस वे अकेले ही बैठें और बाकी भाड़ में जाएं।

पर शर्मा जी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि इतने सारे दूल्हों को देखकर यदि घोड़ी ही इन्हें लात मार दे तो.. ?

मंगलवार, 31 मार्च 2015

व्यंग्य बाण : घमासान के बाद

आम आदमी पार्टी (आपा) में पिछले दिनों हुए घमासान से शर्मा जी बहुत दुखी थे। उन्होंने सब नेताओं से कहा कि वे मिलकर काम करें; पर जो मिलकर काम कर ले, वह समाजवादी कैसा ? फिर यहां तो समाजवादी के साथ साम्यवादी, अराजकतावादी और अवसरवादी भी थे। यानि ‘करेला और नीम चढ़ा।’ इसलिए पहले जबरदस्त फूट हुई और फिर टूट। किसी ने ठीक ही कहा है - इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा।

खैर, जब टूट हो ही गयी, तो टूटे दिल (क्षमा करें दल) वालांे ने अलग से एक बैठक की। दिल्ली की सत्ता से तो वे बाहर हो ही गये थे, सो वे अपनी मनपंसद जगह जंतर-मंतर पर आ बैठे। शर्मा जी भी अपने खटारा स्कूटर पर वहां पहुंचे। सब इससे बहुत दुखी थे कि गर्मियों में उनके कुछ मित्र तो ए.सी. कमरों का सुख उठा रहे हैं, और वे सड़क पर बैठे हैं; पर अब क्या हो सकता था ? हनीमून पीरियड में हुए तलाक के दोषी तो दोनों पक्ष ही थे। 

बैठक की अध्यक्षता के लिए प्रशांत दूषण और बचे-खुचे दल के संयोजक पद के लिए योगेन्द्र माधव के नाम तय हुए। माधव ने कहा कि बैठक की कार्यवाही कोई रिकार्ड न करे। इस पर रामलाल जी उखड़ गये, ‘‘वाह, हम पूर्ण पारदर्शिता के पक्षधर हैं। इसी मुद्दे पर तो हमारे केजरी ‘आपा’ से मतभेद हैं।’’

- वो तो ठीक है; पर हर बात सबको नहीं बतायी जाती। हम बैठक का एजेंडा और इसके निष्कर्ष कल खुद सार्वजनिक कर देंगे।

इस पर काफी बहस हुई। दो लोग बैठक छोड़कर फिर केजरी ‘आपा’ के पाले में चले गये। सबको शांत करने के लिए अध्यक्ष जी ने कार्यवाही रिकार्ड करने की जिम्मेदारी श्यामलाल जी को दे दी। फिर भी उनके ध्यान में आया कि कई लोग अपने मोबाइल से सारी बात टेप कर रहे हैं। यह देखकर वे चुप रह गये, क्योंकि उनकी पार्टी में यह बीमारी आम थी।

अगला विषय यह था कि हम ‘पूर्ण स्वराज’ के पक्षधर हैं। इसलिए राज्यों को अपने निर्णय लेने की छूट होनी चाहिए। वे चुनाव में जातिवादियों से समझौता करें या वंशवादियों से; भ्रष्टाचारियों को टिकट दें या भूमाफिया को, यह राज्य इकाई स्वयं तक करे। इस पर दूषण जी बोले कि अगर यही करना है, तो फिर पुराने दल में ही रहना चाहिए था। हम दाग-धब्बों से मुक्त राजनीति के लिए अलग हुए हैं। अतः हम अपना चुनाव चिन्ह भी ‘वाशिंग मशीन’ रखेंगे।

गुप्ता जी का मत था कि पार्टी का स्वरूप केन्द्रीय होने की बजाय राज्य स्तर का हो। सब अलग-अलग नाम रखें। जैसे दिल्ली में दिल्ली आम आदमी पार्टी (दाप) और महाराष्ट्र में ‘माप’। इस पर बिहार वाले खुश हो गये, ‘‘फिर तो हम ‘बाप’ हो जाएंगे।’’ बंगाल वाले भी पीछे क्यों रहते। बोले, ‘‘नहीं-नहीं, ‘बाप’ हम होंगे।’’

उन दोनों को लड़ते देख माधव जी ने बीच-बचाव कराया। बच्चे के जन्म से पहले ही बाप का झगड़ा ठीक नहीं था। बाप अगर दो हो गये, तो बड़ी समस्या हो जाएगी। पंजाब वालों ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया। क्योंकि इस नियम से उनकी पार्टी का नाम ‘पाप’ हो जाता। जम्मू-कश्मीर वाले बोले, ‘‘ऐसा हुआ, तो हम जीवन भर ‘जाप’ ही करते रह जाएंगे।’’

एक ने ‘समाजवादी आम आदमी पार्टी’ नाम रखने का सुझाव दिया; पर इसका संक्षिप्त नाम ‘साप’ हो रहा था। सबको डर था कि कहीं लोग इसे मजाक में ‘सांप’ न कहने लगें। दूसरे ने कहा कि नाम में से ‘आम आदमी’ को ही क्यों न हटा दें ? न रहेगा मर्ज, न रहेगा मरीज; लेकिन इस पर भी सहमति नहीं बनी। क्योंकि आम आदमी को हटाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो जाता। फिर विरोधी इसे खास आदमी पार्टी (खाप) कहने लगेंगे। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यद्यपि खापों का काफी प्रभाव है; पर कई जगह उसे पिछड़ी सोच वाले पुरुषवादियों का समूह माना जाता है।  

एक घंटे से अधिक हो गया; पर नाम तय नहीं हो सका। उधर गर्मी के चलते खुले में बैठना कठिन हो रहा था। दोनों नेता सबसे अधिक कष्ट में थे। उन्हें अब बिना ए.सी. रहने की आदत नहीं रही थी। इसलिए वे सब पास के एक बड़े होटल में जा बैठे। वहां कुर्सियों पर बैठने से मन ठीक हुआ और ठंडा पीने से दिमाग में तरावट आयी। अतः अब झगड़े की बजाय शांति से बात होने लगी। सबने नाम तय करने की जिम्मेदारी अध्यक्ष और संयोजक को सौंप दी।

पर दो लोग इसका भी विरोध करने लगे। उनका कहना था कि हम पार्टी में ‘आंतरिक लोकतंत्र’ के समर्थक हैं। नाम एक की बजाय दो सोचे जाएं। फिर अंतिम निर्णय वोट द्वारा होगा। तीन लोग इससे नाराज हो गये। वे बोले कि ऐसे तो अगले छह महीने तक हम नाम ही तय नहीं कर सकेंगे। इस विषय पर गरमागरमी होने लगी, तो अध्यक्ष जी ने चाय-नाश्ता मंगा लिया। पेट की आग कुछ ठंडी हुई, तो बाहरी माहौल भी शांत हो गया।

अगले दो-ढाई घंटे तक कई विषयों पर बात हुई; पर निर्णय एक पर भी नहीं हो सका। कुछ का मत था कि हमें हर तरह से ‘आम आदमी पार्टी’ जैसा ही दिखना चाहिए, जबकि कुछ बोले कि हमारे पास अलग चेहरे होना ही काफी है। कुछ इस बात पर जोर दे रहे थे कि पार्टी और नेता तो बनते रहेंगे; पर उन्हें अभी से अगले चुनाव के लिए प्रत्याशी घोषित कर दिया जाए।

आधे लोग तो नाश्ते के बाद ही चले गये थे। दोनों नेताओं को भी प्रेस वार्ता में जाना था। अतः बैठक समाप्त कर दी गयी। तभी होटल वाला पांच हजार रु. का बिल ले आया। उसने अध्यक्ष जी को बिल थमाया, तो वे बोले, ‘‘मैं तो पुरानी पार्टी को बहुत पैसा दे चुका हूं; पर उन्होंने अध्यक्ष बनाने की बजाय ठेंगा दिखा दिया। इसलिए अब मैं पैसे नहीं दूंगा।’’ माधव जी बोले, ‘‘मैं सोचता था कि पार्टी मुझे राज्यसभा में भेजेगी, तो कुछ काम-धंधा चलेगा; पर अब तो सब तरफ अंधेरा ही है। मुझसे बिल के भुगतान की आशा न करें।’’

बाकी लोग भी बिल की बात सुनकर खिसक गये। बच गये बेचारे शर्मा जी। होटल वाले ने उनका स्कूटर जब्त कर लिया। 

शर्मा जी अब अपना स्कूटर छुड़ाने के लिए परेशान हैं। पांच हजार रु. देने को कोई तैयार नहीं है। यदि आप उनकी कुछ सहायता कर सकें, तो बड़ी कृपा होगी।