बुधवार, 8 अप्रैल 2015

आलेख : छत

मेरे निवास के बगल में ही एक बड़ी संस्था से सम्बद्ध वृद्धाश्रम है। कई बुजुर्ग वहां रहते हैं। एक गोशाला, हनुमान मंदिर और चिकित्सालय भी है। मंदिर में यों तो हर दिन सैकड़ों लोग आते हैं; पर मंगलवार को दर्शनार्थियों की लाइन लगी रहती है। साल में दो बार, नवरात्र के दौरान कथा का आयोजन भी होता है। यज्ञ, हवन, पूजा से लेकर तेरहवीं और शोक सभाएं भी होती ही रहती हैं। इस नाते वहां हलचल बनी ही रहती है।

आश्रम के संचालन में कई लोग सेवा देते हैं। कुछ अवकाश प्राप्त हैं, तो कुछ वैतनिक। कुछ नगर से ही आते-जाते हैं, जबकि 10-12 लोग सपरिवार वहीं रहते हैं। आश्रम का वातावरण बहुत सात्विक है। सब लोग एक परिवार की तरह मिलजुल कर रहते हैं। अतः सब ओर आश्रम की बड़ी प्रतिष्ठा है। मैं भी हर दिन हनुमान जी को प्रणाम करके ही अपने काम पर निकलता हूं। 

पिछले कुछ समय से आश्रम के प्रबंधक लोग वहां जगह की कमी अनुभव कर रहे थे। बाहर से लोगों का आवागमन लगातार बढ़ रहा था। कई बार दो लोगों वाले कमरे में तीन या चार लोगों को ठहराना पड़ जाता था। पानी की टंकी भी बहुत बड़ी नहीं थी। अतः कभी-कभी पानी की कमी हो जाती थी। इससे वहां के बुजुर्गों को असुविधा हो रही थी। संख्या बढ़ने से भोजनालय पर भी दबाव बढ़ जाता था। कोई सुबह पांच बजे चाय पीना चाहता था, तो कोई सात बजे। भोजनालय इस हिसाब से बना था कि सब लोग एक साथ भोजन कर सकें; पर अब यह व्यवस्था बिगड़ रही थी। बुजुर्ग कुछ कहते तो नहीं थे, पर उनकी परेशानी से आश्रम के प्रबंधक और कर्मचारी भी दुखी थे। 

आश्रम परिसर की छत काफी खुली थी। लिफ्ट वहां तक जाती ही थी। अतः प्रबंधकों ने तीसरी मंजिल पर छह कमरे तथा भूतल पर एक बड़ा भोजनालय बनाने का निर्णय लिया। कुछ धन तो उनके खाते में था ही। कुछ लोगों ने अपने पूर्वजों के नाम पर कमरे बनाने के लिए धन देने का वचन भी दे रखा था। एक अनुभवी ठेकेदार से बात हुई। वह कई वर्ष से आश्रम में आता-जाता था। पिछली बार भी उसने ही काम किया था। उसके काम से सब संतुष्ट भी थे। उसने नापजोख कर बता दिया कि कितने पैसे और कितने दिन पूरे काम में लगेंगे। आश्रम की प्रबंध समिति ने उसके प्रस्ताव को मंजूर कर उसे कुछ धन अग्रिम दे दिया और रामनवमी पर पूजा-पाठ के साथ विधिवत काम प्रारम्भ हो गया। 

अब तो हर दिन बजरी, रेत, ईंट, सरिया आदि आने लगा। 15 मजदूर और मिस्त्री सुबह से शाम तक काम में लगे रहते थे। उनमें पुरुष भी थे और उनकी पत्नियां भी। कई के साथ छोटे बच्चे भी थे। सबके रहने का प्रबंध वहीं एक बड़े कमरे और बरामदे में कर दिया गया। पर्दे और कनात लगाकर उनकी निजता भी बना दी गयी। आश्रम में ऊंच-नीच या जाति, प्रांत आदि का भेदभाव तो था नहीं। अतः वे भी उसी भोजनालय में ही खाते-पीते थे। काम करते हुए दिन में दो-तीन बार उन्हें चाय भी दी जाती थी। शाम की आरती के समय उनके बच्चे मंदिर में आ जाते थे। पुजारी जी उन्हें खूब सारा प्रसाद दे देते थे। बाकी समय वे खेलते या सोते रहते थे। इस माहौल में सभी मिस्त्री और मजदूर भी बड़े उत्साह और श्रद्धा से काम कर रहे थे। अतः परिणाम यह हुआ कि महीने भर में दीवारें और लिंटर का ढांचा तैयार हो गया। अब बस छत पड़ने की देर थी। 

जिस दिन छत पड़ी, उस दिन सुबह छह बजे से ही तैयारी होने लगी। ठेकेदार उस दिन पानी का एक टैंकर तथा 15 मजदूर अतिरिक्त लेकर आया था। साथ में मसाले को मिलाने वाली तथा उसे तीसरी मंजिल तक पहुंचाने वाली मशीनें भी थीं। इन सबके लगातार चलते रहने के लिए एक जेनरेटर भी था। सात बजे भरपेट चाय-नाश्ते के बाद मशीनों के यंत्र-तंत्र कस दिये गये। इसके बाद ‘बजरंग बली की जय’ बोलकर सबने अपने मोर्चे संभाल लिये। 

उस दिन का काम सचमुच देखने लायक था। पूरे काम में गजब की लय और तालमेल था। रोड़ी, बजरी और सीमेंट मशीन में डालने वाले अलग-अलग लोग तय थे। वे अपना काम बहुत मुस्तैदी से कर रहे थे। एक आदमी मिक्सिंग मशीन में लगातार पानी डाल रहा था। मसाला बनने पर उसे लिफ्ट मशीन में भर दिया जाता था। ऊपर उसे निकालकर फिर छत पर समान रूप से फैलाया जा रहा था। मजदूरों के तन कृशकाय और कपड़े भले ही फटे थे, पर उनके काम में कहीं ढिलाई नहीं थे। पूछने से पता लगा कि वे सब झारखंड के रहने वाले हैं।

आश्रमवासी भी यह सब बड़ी रुचि से देख रहे थे। नीचे वाले मजदूर अपने काम में मगन थे तथा ऊपर वाले अपने। ठेकेदार सभी ओर लगातार निगाह रख रहा था। वह कभी ऊपर जाता, तो कभी नीचे। दोपहर में व्यवस्था कुछ ऐसी बनी कि पांच-पांच लोग आकर भोजन करते रहे। इससे काम रुका नहीं। अतः जो काम पांच बजे तक चलने की संभावना थी, वह चार बजे ही पूरा हो गया। सबको फिर से चाय और लड्डू दिये गये। ठेकेदार ने सबको मजदूरी दी और इस प्रकार आज का काम पूरा हुआ।

शाम को मंदिर की आरती में आश्रमवासियों के अलावा आसपास के कई लोग भी आते हैं। तब कई विषयों पर अनौपचारिक चर्चा होती है। उस दिन इसी विषय पर चर्चा छिड़ गयी कि किसी भी मकान में छत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। बिना छत के भवन को मकान नहीं कह सकते। कई बार लोग अस्थायी या अवैध भवन बना लेते हैं; पर जब तक शासन की अनुमति न हो, तब तक पक्की छत नहीं डाल सकते।

वहां कुछ लोग उत्तराखंड के भी हैं। उन्होंने बताया कि जिन स्थानों पर भूकंप का खतरा अधिक होता है, वहां घरों में दीवारों में तो कई बार ईंटें लगा दी जाती हैं; पर छत टीन, लकड़ी या स्लेट पत्थर की बनती हैं। जिससे यदि छत गिरे भी, तो अधिक चोट न लगे। 1991 में उत्तराखंड के भूकंप में सर्वाधिक हानि उत्तरकाशी जिले की गंगाघाटी में हुई थी। वहां सैकड़ों लोग मरे थे। बाद में वहां सरकार और समाजसेवी संस्थाओं ने लोगों को मकान बनाकर दिये। कई संस्थाएं तो मकान देकर चली गयीं; पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने मकान के साथ ही पूरे क्षेत्र में कई विद्यालय और छात्रावास भी खोले। स्थानीय लोगों को रोजगार मिले, इसके लिए अनेक सेवा प्रकल्प भी प्रारम्भ किये। इससे वहां के हजारों परिवार और छात्र लाभान्वित हो रहे हैं। 

भूकंपीय क्षति की जांच में ध्यान आया कि वहां भागीरथी पर बने बांध के लिए जो मोटा सरिया और सीमेंट आया था, उसका कुछ भाग भ्रष्ट कर्मचारियों ने बहुत सस्ते में गांव वालों को बेच दिया। उससे लोगों ने अपने घरों पर लिंटर डाल दिये। पहाड़ में दीवारें सामान्य अनगढ़ पत्थर की बनती हैं। उनमें नींव भी दो-चार इंच की ही होती है। भूकंप से बिना नींव की वे दीवारें बिखर गयीं और पूरा लिंटर नीचे आ गिरा। जो लोग नीचे सो रहे थे, वे सब काल के गाल में समा गये। हजारों पशु भी काल-कवलित हुए। इसके बाद की बाढ़ और भूकंपों में भी ऐसा ही हुआ; पर लोग इससे सीख न लेकर फिर भारी लिंटर वाले भवन बना रहे हैं।

एक अन्य बुजुर्ग बोले कि मकान में छत जैसी भूमिका ही घर में पिता की है। यद्यपि मां का महत्व भी उन दीवारों जैसा है, जिन पर छत टिकती है। इसलिए बिना दीवार और छत के मकान की कल्पना नहीं की जा सकती। फिर यह चर्चा छिड़ गयी कि विभिन्न स्थानों और समुदायों में पिता की मृत्यु पर क्या परम्पराएं हैं। उत्तराखंड वालों ने बताया कि मुखाग्नि देने वाले पुत्र को एक वर्ष तक कई कठोर नियमों का पालन करना होता है। इनमें भूमि या तखत पर सोना, अपने हाथ से बना भोजन करना तो है ही; पर वह एक वर्ष तक छाता भी नहीं लगा सकता। पहाड़ी क्षेत्र में वर्षा कभी भी हो सकती है। अतः लोग घर से चलते समय छाता साथ ले ही लेते हैं; पर पिता को मुखाग्नि देने वाला एक साल तक बिना छाते के ही रहता है। हो सकता है कि अन्य कुछ स्थानों और समुदायों में भी यह परम्परा हो; पर छत और छाते के बीच समानता का ऐसा उदाहरण दुर्लभ है। 

आश्रम में काम पूरा हो चुका है। ऊपरी मंजिल और नया भोजनालय भी चालू हो गया है। जब कभी मैं ऊपर जाता हूं, तो छत से जुड़ी तमाम बातें याद आने लगती हैं। ऐसे में हाथ जोड़कर मैं प्रार्थना करता हूं कि हे नीली छतरी वाले, यों तो हर आने वाले को जाना ही है। फिर भी आपके चरणों में विनम्र निवेदन है कि हमारे सिर पर बुजुर्गों की छत बनाये रखना।