शुक्रवार, 12 जून 2015

व्यंग्य बाण : मिलावट के लिए खेद है

गरमी में इन्सान तो क्या, पेड़-पौधे और पशु-पक्षियों का भी बुरा हाल हो जाता है। शर्मा जी भी इसके अपवाद नहीं हैं। कल सुबह पार्क में आये, तो हाथ के अखबार को हिलाते हुए जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, ‘‘देखो...देखो...। क्या जमाना आ गया है ?’’

इतना कहकर वे जोर-जोर से हांफने लगे। पार्क में एक सज्जन रक्तचाप नापने का यंत्र लेकर आते हैं। उन्होंने देखा, तो शर्मा जी का रक्तचाप राहुल बाबा के गुस्से की तरह काफी ‘हाई’ था। दिल नरेन्द्र मोदी की योजनाओं की तरह ‘सुपर फास्ट’ गति से धड़क रहा था। उन्होंने शर्मा जी को पानी पिलाकर बेंच पर लिटा दिया।

इस बीच हमने अखबार को देखा। उसमें छपा था कि एक आदमी ने घर में होने वाले रोज-रोज के झगड़े से दुखी होकर आत्महत्या करनी चाही। इसके लिए वह बाजार से सल्फास जहर ले आया। यों तो सल्फास की एक गोली ही जान लेने को काफी है; पर काम हर तरह से पक्का करने के लिए उसने रात को सोते समय एक की बजाय दो गोली खा लीं; पर सुबह हर दिन की तरह उसकी आंख अपनी पत्नी की डांट से ही खुली। 

गुस्से में आकर उसने जांच करायी, तो पता लगा कि वह मिलावटी सल्फास था। अखबार के अनुसार पुलिस ने आत्महत्या के प्रयास के लिए पति पर, और पति ने सल्फास वाली कम्पनी पर मुकदमा ठोक दिया है। पत्नी अभी चुप है। लोगों का कहना है कि उसकी घरेलू अदालत में तो उस गरीब पति पर रोज ही मुकदमा चलता है।  

शर्मा जी को उस आदमी से बड़ी सहानुभूति थी। बेचारा जिन्दगी तो अपनी इच्छानुसार जी नहीं सका, मरने में भी मिलावट ने बाधा डाल दी।

गुप्ता जी की इतिहास में बड़ी रुचि है। लड़ाई हो या प्रेम प्रसंग, वे हर जगह इतिहास घुसेड़ देते हैं। उन्होंने मिलावट को महाभारत काल से जोड़ दिया। उन्होंने बताया कि कौरवों के सेनापति द्रोणाचार्य एक समय बहुत गरीब थे। जब आसपास के बच्चे दूध पीते थे, तो उनका बेटा अश्वत्थामा भी जिद करता था। इस पर उनकी पत्नी पानी में आटा घोलकर उसे पिला देती थी। गरीबी से दुखी होकर वे पैसा लेकर राजपरिवार के बच्चों को शस्त्रविद्या देने लगे। इससे पहले ये काम निःशुल्क होता था। अर्थात ट्यूशन का धंधा सबसे पहले द्रोणाचार्य ने ही शुरू किया।

इस पर सिन्हा साहब ने आपत्ति की। वे बोले कि ये उदाहरण मिलावट का नहीं, नकली माल का है। पानी में आटे के घोल को मिलावटी नहीं, नकली दूध कहा जाएगा। उन्होंने बताया कि एक ग्वाले पर दूध में पानी मिलाने का आरोप था। अदालत में उसने कहा कि वह दूध में पानी नहीं, पानी में दूध मिलाता है। इसलिए मुकदमे का आधार ही गलत है। अदालत ने उसकी बात मानकर मुकदमा करने वालों पर ही जुर्माना ठोक दिया। 

यादव जी स्वास्थ्य विभाग में कई साल काम कर चुके थे। उन्होंने नकली दूध बनाने की पूरी विधि ही बता दी। यूरिया, वाशिंग पाउडर, चर्बी, सफेदा आदि का प्रतिशत उन्हें मुंहजबानी याद था। सिंह साहब बोले, ‘‘आजकल लोग इतने आरामतलब हो गये हैं कि शुद्ध दूध और घी पचाना ही मुश्किल है। पिछले दिनों मैं मसूरी गया, तो रात में घूमते हुए दूध पीने का मन हुआ। हलवाई ने जो चीज मुझे दी, वह न शुद्ध दूध था और न शुद्ध पानी। दोनों इतने एकरूप हो रहे थे मानो हीर और रांझा मरने के बाद जन्नत में मिल गये हों।  

मैंने हलवाई से शिकायत की, तो वह बोला, ‘‘श्रीमान जी, ये देवभूमि का अमृत ‘मसूरी मिल्क’ है। यहां शुद्ध दूध पिएंगे, तो वापस घर लौटना मुश्किल हो जाएगा। मैदान में जो मिनरल वॉटर आप पन्द्रह रु. में खरीदते हैं, वह पहाड़ी झरनों से मुफ्त सप्लाई होता है। यहां इन्सान ही नहीं, जानवर भी वही पीते हैं। दूध में भी वही मिला है। इसलिए चुपचाप इसे पियो और होटल में जाकर सो जाओ। कल का दिन ‘बिल्कुल सुबह से ही’ बहुत अच्छा बीतेगा।’’

धीरे-धीरे इस चर्चा में कई और लोग सहभागी हो गये। अतः बात मिर्च-मसालों की मिलावट से बढ़ते हुए राजनीतिक मिलावट तक पहुंच गयी। बिहारी बाबू बोले, ‘‘हमारे यहां तो बुरा हाल है। कल तक जो लोग एक दूसरे को काट खाने को दौड़ते थे, वे आज गले मिल रहे हैं। लालू जी पुरानी बातें भूलकर नीतीश के ‘सुशासन’ की प्रशंसा कर रहे हैं, तो नीतीश जी लालू के ‘जंगल राज’ को ‘मंगल राज’ बता रहे हैं। पता नहीं किसके विचारों में किसकी मिलावट है ?’’

वर्मा जी बहुत देर से चुप बैठे थे। बोले, ‘‘ये मिलावट नहीं गिरावट है। दोनों के सामने सुपर स्टार मोदी जो खड़ा है। वे मिलकर उससे टकराने की सोच रहे हैं; पर वे सफल नहीं होंगे। उनके एक हाथ में फूलों की माला है, तो दूसरे में तेज भाला।’’

इस पर मुखर्जी साहब भड़क गये, ‘‘दुनिया बहुत बदल गयी है बाबू मोशाय। जब मोदी की पार्टी विपक्ष में थी, तो उसने बंगलादेश से भूमि अदला-बदली का विरोध किया था; पर जब मोदी उसी समझौते पर हस्ताक्षर कर आये हैं, तो वे ताली पीट रहे हैं। भूमि अधिग्रहण कांग्रेस सरकार भी करना चाहती थी; पर कर नहीं सकी। अब मोदी उसे लागू करना चाहते हैं, तो उसने टांग अड़ा दी है। भा.ज.पा. वालों ने कांग्रेस का कुर्ता पहन लिया है, तो कांग्रेस वालों ने भा.ज.पा. की धोती। सत्ता के खेत में न जाने कैसी खाद पड़ी है कि गाजर और मूली को अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो गया है।’’

रावत जी ने मैगी में मिलावट की बात कही, तो कविवर ‘प्रशांत’ जी ने ताजा लिखा यह छंद सुना दिया।

मैगी को हैं खा रहे, घर की सेवीं छोड़
उसमें है सीसा भरा, अब रोओ सिर जोड़।
अब रोओ सिर जोड़, देख करके विज्ञापन
बिन सोचे भर लाये थैला आनन-फानन।
कह प्रशांत’ घर की ही चीजें हैं गुणकारी
इसे नहीं समझा तो होगी आफत भारी।।

धूप चढ़ रही थी। अतः प्रशांत जी के छंद पर ताली बजाते हुए सभा विसर्जित हो गयी। पार्क के बाहर कई दिन से सड़क पर कुछ काम हो रहा था। वहां एक बोर्ड लगा था रुकावट के लिए खेद है। किसी दिलजले ने उसे संशोधित कर दिया मिलावट के लिए खेद है। 

पास के कूड़ेदान में मैगी के कई पैकेट पड़े थे।

मंगलवार, 9 जून 2015

आलेख : दीनदयाल उपाध्याय : जन्मशती के संकल्प

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक तथा भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष श्री दीनदयाल उपाध्याय का जन्मशती वर्ष 25 सितम्बर, 2015 से प्रारम्भ हो रहा है। उनका जन्म 25 सितम्बर, 1916 को राजस्थान में जयपुर-अजमेर मार्ग पर स्थित धनकिया गांव में हुआ था। जयपुर जिले में स्थित धनकिया रेलवे स्टेशन पर उनके नाना चुन्नीलाल जी स्टेशन मास्टर थे। दीनदयाल जी का पैतृक गांव नगला चंद्रभान उ.प्र. में मथुरा जिले के फरह विकास खंड में है। 

गत 25 मई को अपनी सरकार की पहली वर्षगांठ पर नरेन्द्र मोदी ने नगला में एक विशाल रैली की। इसमें उन्होंने सरकार की एक वर्ष की उपलब्धियां बतायीं। रैली से पहले कुछ समाचार माध्यमों ने यह विषय उठाया कि नगला दीनदयाल जी का जन्मस्थान नहीं है; फिर मोदी ने रैली के लिए इसे क्यों चुना ? यद्यपि यह विषय दब गया और मोदी का भाषण ही सब तरफ छाया रहा। 

पिछले 40-45 साल से नगला में दीनदयाल जी की जन्मतिथि (आश्विन कृष्ण 13) पर उनकी स्मृति में एक विशाल मेला होता है। इसका इतिहास भी बड़ा रोचक है। दीनदयाल जी के निधन के समय मथुरा में श्री शरद मेहरोत्रा संघ के जिला प्रचारक थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अनेक दायित्वों पर रहते हुए वे 1981 में मध्यभारत भेजे गये। 1985 में वे वहां प्रांत प्रचारक बने। दुर्भाग्यवश वे कैंसर से ग्रस्त हो गये और इसी के चलते 1993 में उनका निधन हुआ।

शरद जी बहुत कल्पनाशील व्यक्ति थे। उनके मन में यह विचार आया कि दीनदयाल जी की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए नगला में कुछ काम किया जाए। इसकी शुरुआत एक दिवसीय मेले से हुई। प्रारम्भ में मथुरा के लोग ही वहां जाते थे। जब शरद जी आगरा चले गये, तो उन्होंने आगरा वालों को भी इसमें जोड़ लिया। इससे मेले का स्वरूप बढ़ने लगा और अब तो वह एक सप्ताह तक फैल गया है। 

मेले में खानपान, नाटक, तमाशा, दैनिक जरूरत की चीजों की बिक्री आदि के साथ ही कुश्ती और रसिया के दंगल, पशु प्रदर्शिनी, स्वस्थ बच्चों की प्रतियोगिता, कवि सम्मेलन तथा किसानों के लिए उपयोगी प्रदर्शिनियां आदि लगती हैं। बड़ी संख्या में राजनेता और मंत्री आदि वहां जाते हैं। अब तो मेले का संचालन मुख्यतः शासन की देखरेख में ही होता है; पर प्रारम्भ में पूरी व्यवस्था ‘दीनदयाल उपाध्याय जन्मभूमि स्मारक समिति’ के लोग ही करते थे। 

समिति ने क्रमशः दीनदयाल जी की पैतृक झोपड़ी तथा आसपास की भूमि खरीदकर उसे एक स्मारक का रूप दे दिया; पर वह स्थान सड़क से काफी अंदर और छोटा है। अतः मथुरा-आगरा मार्ग पर भूमि खरीद कर वहां विद्यालय, चिकित्सालय तथा ग्राम्य विकास के अनेक प्रकल्प खोले गये। उसकी संचालन समिति में कई बड़े लोगों को  जोड़ा गया। अटल बिहारी वाजपेयी भी कई वर्ष तक उस समिति के अध्यक्ष रहे हैं। शताब्दी वर्ष में इस योजना में अनेक नये आयाम जुड़ेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। 

मैंने कई प्रमुख लोगों से यह सुना है कि जब ये सब काम प्रारम्भ हुए, तो लोगों ने शरद जी से कहा कि दीनदयाल जी का जन्मस्थान तो धनकिया है ? इस पर शरद जी कहते थे कि तुम तो काम किये जाओे। धीरे-धीरे नगला का इतना प्रचार हो जाएगा कि लोग इसे ही उनका जन्मस्थान मान लेंगे। और सचमुच ऐसा ही हुआ। सुना है कि अब यह मथुरा जिले के सरकारी गजट में भी लिखा गया है। अब प्रधानमंत्री मोदी के आने से इस पर मुहर भी लग गयी है।

कहते हैं कि अधिकांश महान लोगों की महानता का पता उनके जाने के बहुत बाद लगता है। ऐसे लोगों के जन्म और मृत्यु के स्थान तथा तिथियों पर प्रायः कुछ मतभेद बने रहते हैं। सूरदास, तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु आदि के बारे में कई बातें प्रचलित हैं। दीनदयाल जी का प्रसंग तो बहुत ताजा है। उनकी मृत्यु 11 फरवरी, 1968 को मुगलसराय में हुई, इसमें कुछ संदेह नहीं है; पर उनका जन्मस्थान धनकिया है या नगला, इस असमंजस को जन्मशती वर्ष में दूर कर दिया जाना चाहिए। दीनदयाल जी के साथ रहे कई लोग अभी जीवित और सक्रिय हैं। वे भी इस बारे में बता सकते हैं। दीनदयाल जी की प्रारम्भिक शिक्षा राजस्थान में और फिर आगरा तथा कानपुर में हुई है। सभी स्थानों पर वे प्रथम श्रेणी में भी प्रथम आते थे। वहां के विद्यालयों से प्रमाण पत्र निकलवाये जा सकते हैं; पर जो भी हो, सही बात सामने आनी ही चाहिए। 

उ.प्र. के प्रांत प्रचारक श्री भाऊराव देवरस की प्रेरणा से 31 अगस्त, 1947 (रक्षाबंधन) को लखनऊ में ‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका की स्थापना हुई थी। उसके पहले सम्पादक अटल जी थे। उसमें दीनदयाल जी के लेख प्रायः छपते थे। वह मासिक पत्रिका आज भी प्रकाशित हो रही है। वहां से दीनदयाल जी के सामने ही उनकी दो पुस्तकें ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ तथा ‘जगद्गुरु श्री शंकराचार्य’ छपी थीं। अब वहां पुस्तक प्रकाशन का केन्द्र ‘लोकहित प्रकाशन’ भी है। उसने दीनदयाल जी के विचारों पर केन्द्रित कई पुस्तकें छापी हैं। उनमें से कई का सम्पादन भानुप्रताप शुक्ल तथा रामशंकर अग्निहोत्री ने किया है। ये दोनों मासिक ‘राष्ट्रधर्म’ तथा साप्ताहिक ‘पांचजन्य’ के सम्पादक रह चुके हैं। उन सबमें तथा राष्ट्रधर्म के पूर्व सम्पादक वीरेश्वर द्विवेदी द्वारा लिखित पुस्तक ‘संघ नींव में विसर्जित’ में भी दीनदयाल जी का जन्मस्थान धनकिया ही लिखा है।  

एक बात और भी विचारणीय है। क्या धनकिया जन्मस्थान सिद्ध होने से दीनदयाल जी की महत्ता कुछ कम हो जाएगी; या इससे मथुरा और उत्तर प्रदेश का सम्मान कुछ घट जाएगा ? लगता तो ऐसा है कि यदि दीनदयाल जी के निधन के समय शरद जी जैसा कोई योजनाकार जयपुर में होता, तो धनकिया में भी कुछ गतिविधि शुरू हो जाती। पर अभी बहुत देर नहीं हुई है। जन्मशती वर्ष में राजस्थान में संघ और भा.ज.पा. के लोग मिलकर यदि विचार करें, तो धनकिया में भी कई काम प्रारम्भ हो सकते हैं। वहां रेलवे स्टेशन के परिसर में वह मकान विद्यमान है। पिछले दिनों राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे वहां गयी भी थीं। 

कुछ समय पूर्व नगला प्रकल्प से जुड़े कुछ लोगों से मेरी भेंट हुई। मैंने कहा कि अब तो राजस्थान में तथा केन्द्र में भी भा.ज.पा. की सरकार है। अतः धनकिया में भी कुछ काम शुरू होने चाहिए। इस पर एक पदाधिकारी ने कहा कि बड़ी मुश्किल से लोगों के दिमाग में यह बात बैठी है कि दीनदयाल जी का जन्मस्थान नगला है। ऐसे में धनकिया की बात करना ठीक नहीं होगा। कुछ लोगों का मत है कि शायद मोदी सरकार दीनदयाल स्मारक के लिए अच्छा पैसा खर्च करना चाहती है। नगला वालों को भय है कि यदि धनकिया की बात चली, तो कुछ धन कहीं उधर न खिसक जाए। इसलिए वे धनकिया की बात करना नहीं चाहते।  

गांधी जी और नेहरू परिवार के नाम पर देश भर में सरकारी धन से हजारों स्मारक, सड़क, अस्पताल आदि बने हैं। दीनदयाल जी के नाम पर भी ऐसे कई संस्थान लोगों ने शासकीय और जन सहयोग से बनाये हैं। जन्मशती वर्ष में इनकी संख्या और भी बढ़ेगी; पर क्या हम नगला, धनकिया और मुगलसराय में तीन अच्छे विश्वविद्यालय नहीं बना सकते ? वामपंथियों की फसल तैयार करने में जवाहर लाल नेहरू वि.वि. का प्रमुख योगदान है। अलीगढ़, देवबंद, जामिया मिलिया आदि से मुस्लिम अलगाववाद को खादपानी मिल रहा है। ऐसे में दीनदयाल वि.वि. देशप्रेमी युवाओं की निर्माणस्थली बन सकते हैं। इस बारे में संसद में प्रस्ताव लाने से भविष्य में कोई सरकार इनके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ भी नहीं कर सकेगी। 

जहां तक नगला की बात है, वहां के लोग स्वाभाविक रूप से चाहेंगे कि दीनदयाल जी के साथ मुख्यतः वहीं का नाम लिया जाए; पर संघ दायित्वों के चलते इस प्रकल्प में समय-समय पर सक्रिय रहे कई लोग अब अनेक संस्थाओं और संगठनों में शीर्ष स्थानों पर हैं। उन्हें अपना दिल बड़ा करना होगा। दीनदयाल जी का जन्म कहीं भी हुआ हो; पर उनके विचार और कार्य किसी एक जिले या राज्य की नहीं, पूरे देश और विश्व की विरासत है। जन्मशती वर्ष में इस संकल्प को ही समग्रता से समझना आवश्यक है।