सोमवार, 21 मार्च 2016

राजनीति का वर्तमान दौर



आजादी से पूर्व राजनीति को समाजसेवा का माध्यम माना जाता था। अतः राजनेता सम्मान की नजर से देखे जाते थे। गांधी जी, मोतीलाल एवं जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, सरदार पटेल, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल, मालवीय जी, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, डा. अम्बेडकर.. आदि सैकड़ों राजनेताओं के नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में लिखे हैं। इनमें से कई के विचार एक-दूसरे से एकदम अलग थे; लेकिन आज भी इनका नाम सम्मान से लिया जाता है।

1947 तक कांग्रेस एक राजनीतिक दल न होकर स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वाला एक बड़ा समूह थी। अलग-अलग राजनीतिक विचारों के लोग वहां एक साथ काम करते थे। चूंकि सबके सामने सबसे बड़ा लक्ष्य स्वाधीनता प्राप्त करना था। जब यह लक्ष्य प्राप्त हो गया, तो गांधी जी ने कांग्रेस को भंग करने की सलाह दी, जिससे लोग अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर राजनीतिक दल बनाकर जनता के बीच जाएं। फिर जनता जिसे पंसद करे, वह दल और नेता शासन करे।

पर जवाहरलाल नेहरू गांधी जी तथा कांग्रेस की पुण्याई को अकेले ही भोगना चाहते थे। इसलिए उन्होंने गांधी जी की बात नहीं मानी। देश के दुर्भाग्य और नेहरू के सौभाग्य से 30 जनवरी, 1948 को गांधी जी की हत्या हो गयी। इससे नेहरू को खुली छूट मिल गयी और उन्होंने कांग्रेस को निजी जागीर बना लिया। 

नेहरू जी स्वभाव से तानाशाह किस्म के व्यक्ति थे। उनका बचपन जिस विलासी माहौल में बीता था, वहां ऐसा होना स्वाभाविक ही था। देश-विदेश में उनके भोगविलास के किस्से बहुप्रचारित हैं। उनका यही स्वभाव राजनीति में भी परिलक्षित हुआ। इससे गांधी जी भी डरते थे। इसीलिए देश के प्रायः सभी राज्यों की कांग्रेस समितियों द्वारा सरदार पटेल के पक्ष में होने पर भी गांधी जी ने नेहरू का पक्ष लिया और वे प्रधानमंत्री बन गये।

कुछ समय तो लोग चुप रहे; पर गांधी जी की मृत्यु के बाद नेहरू जी बेलगाम हो गये। अतः कई लोगों ने उनके स्वभाव और वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रेस छोड़ दी। डा. मुखर्जी, डा. अम्बेडकर, आचार्य नरेन्द्रदेव, डा. लोहिया, आचार्य कृपलानी आदि कांग्रेस के बड़े नेता थे; पर जब इन्होंने कांग्रेस छोड़ी, तो फिर लौटकर वापस नहीं गये
 
 लेकिन इंदिरा गांधी के दौर में राजनीति व्यक्तिवादी हो गयी। 1970 के दशक में मोरारजी देसाई आदि जो लोग कांग्रेस से अलग हुए, उनके कांग्रेस से वैचारिक मतभेद नहीं थे। वे तो इंदिरा गांधी की तानाशाही से दुखी थे। मोरारजी आयु और अनुभव में बड़े होने पर भी कांग्रेस की परिवारवादी राजनीति में इंदिरा गांधी से पिछड़ गये।

इसके बाद इंदिरा गांधी अपने छोटे बेटे संजय को आगे बढ़ाने लगी। संजय का स्वभाव नीम चढ़े करेलेजैसा था। इससे पुराने और बुजुर्ग पार्टीजनों को लगा कि कांग्रेस में इंदिरा गांधी के बाद भी उनका और उनके बच्चों का कोई भविष्य नहीं है। अतः कांग्रेस टूट गयी। फिर 1977 में जनता पार्टी बनने पर मोरारजी का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हुआ। 

जनता पार्टी के दौर में सर्वोच्च स्थानों पर बैठे जगजीवनराम, चरणसिंह, चंद्रशेखर आदि नेता पूर्व कांग्रेसी ही थे। कांग्रेस के समाजवादी और साम्यवादी चिंतन से इन्हें कोई नाराजगी नहीं थी। ये तो बस सत्ता में कुछ अधिक भागीदारी चाहते थे, जो इंदिरा गांधी के रहते उन्हें नहीं मिल पा रही थी।

पर इस व्यक्तिवाद के कारण जनता सरकार और पार्टी भी टूट गयी। मोरारजी की जिद, जगजीवनराम की महत्वाकांक्षा और चरणसिंह के अहंकार ने सरकार चौपट कर दी। चंद्रशेखर, राजनारायण और मधु लिमये आदि ने सरकार और पार्टी को खंबे की तरह संभाल रहे संघ के स्वयंसेवकों पर दोहरी सदस्यता के नाम पर हमले किये और अंततः पार्टी ही तोड़ दी। हर नेता पार्टी में से अपना हिस्सा लेकर अलग हो गया और देश की राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थों के अंधे कुंए में गिर पड़ी

पर राष्ट्रीय या राज्य स्तर की पार्टी चलाना आसान नहीं है। इसलिए खुद को राष्ट्रीय समझने वाले ये नेता अपनी जाति की बहुसंख्या वाले दस-बीस जिलों तक सीमित हो गये। व्यक्ति और परिवारवादी राजनीति में जाति और क्षेत्र का विष भी घुल गया।

राजीव गांधी के समय में राजनीति में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार का प्रवेश हुआ। यद्यपि जिला स्तर के नेता तो इससे पहले भी ठेके आदि से ही अपना खर्च चलाते थे। इसका कुछ हिस्सा राज्य और केन्द्र तक पहुंच जाता था। कांग्रेस के कई केन्द्रीय मंत्रियों पर इससे पहले भी कई सौदों में दलाली के आरोप लगे; पर बोफोर्स कांड से पहली बार सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय ही रिश्वत में घिर गया। फिर तो राजनीति का एकमात्र अर्थ पैसा बनाना हो गया। कोढ़ में खाजकी तरह विचारशून्य राजनीति में भ्रष्टाचार का छौंक लग गया।

बस, वर्तमान राजनीति का यही सच है। आजादी से पूर्व के सभी नेता प्रायः बड़े वकील, व्यापारी या किसान थे। उन्होंने पहले खूब पैसा कमाया और परिपक्व अवस्था में राजनीति में उतरे। राजनीति को उन्होंने धंधा नहीं बनाया; पर अब तो राजनीति का अर्थ धंधा ही हो गया है। अपवाद तो सब जगह होते हैं; पर अब लोग राजनीति में मुख्यतः पैसा बनाने ही आते हैं। राजनीति सेवा की बजाय पेशा बन गयी है। इसलिए कोई दल और नेता किसी के लिए अछूत नहीं रह गया है। राजनीतिक हत्या और हिंसा अब आम बात हो गयी है।

60 साल तक बंगाल में लड़ने के बाद अब कांग्रेस और वामदल गले मिल रहे हैं, चूंकि ममता बनर्जी ने दोनों की नाक में नकेल डाल दी है। 15 साल तक एक-दूसरे को कोसने वाले लालू और नीतीश एक साथ हो गये। उन्हें लगा कि ऐसा न करने पर मोदी उन्हें खा जाएगा। अजीतसिंह और पासवान जैसे नेताओं को मंत्रीपद मिले, तो वे आलू की तरह हर सब्जी में खप जाते हैं। 

तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि से समझौते को दोनों बड़े दल उत्सुक हैं, जिससे उन्हें भी कुछ सीटें मिल जाएं। किसी समय देश में एक नंबर पर रही कांग्रेस अब कई राज्यों में तीसरे और चौथे स्थान पर ही राजी होकर क्षेत्रीय दलों से समझौते कर रही है, जिससे उसका खर्चा-पानी चल सके।

चंद्रबाबू नायडू पहले अटल जी की सरकार में सत्तासुख भोगते रहे। फिर मुसलमानों की नाराजगी के भय से अलग हो गये। अब अधिकांश मुस्लिम जनसंख्या तेलंगाना में चली जाने से मुस्लिम वोटों का दबाव नहीं रहा, अतः वे फिर भा.ज.पा. के साथ आ गये। फारुख और उमर अब्दुल्ला भी अटल जी की सरकार में थे; पर फिर वे कांग्रेस के साथ हो गये। पी.डी.पी. और भा.ज.पा. ने एक-दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ा; पर फिर मिलकर सरकार बना ली।

झारखंड में शिबू सोरेन सभी दलों के साथ सत्ता भोग चुके हैं। पिछली बार केजरीवाल ने कांग्रेस के विरुद्ध दिल्ली में चुनाव लड़ा था; पर फिर उसी के साथ सरकार बना ली। उत्तराखंड की वर्तमान उठापटक भी मलाई वाले पदों के लिए ही है। हेमवती नंदन बहुगुणा ने जीवन में कितने दल बदले, यह शायद ही किसी को पता हो। उसी मार्ग पर उनके पुत्र विजय बहुगुणा भी चल दिये हैं।

हरियाणा एक समय आयाराम-गयारामके लिए बदनाम हुआ था; पर अब तो पूरे कुएं में ही भांग पड़ी है। जिस नेता के पास अपनी जाति या क्षेत्रीय समूह के वोट हैं, वह चुनाव से पूर्व कई दलों से बात करता है। जहां अधिक माल मिले, बस वहीं समझौता हो जाता है। महाराष्ट्र में बालासाहब ठाकरे की विरासत के लिए उद्धव और राज ठाकरे लड़ रहे हैं। उ.प्र. में चाचा और भतीजे का टकराव मुलायम सिंह के कारण शांत है। काशीराम की विरासत पर मायावती काबिज हैं। लालू के दोनों बेटे कब भिड़ जाएं, कुछ पता नहीं। अब तो बेटी भी ताल ठोक रही है। राजनीति मानो बंदूक हो गयी, जो पिता के मरने के बाद वयस्क होने पर बच्चों को मिल जाती है।

भारतीय राजनीति की इस व्यथा-कथा का कोई अंत नहीं है। अब न संस्कार है और न विचार। अतः राजनीति का अर्थ है सत्ता का असीमित उपभोग। जनता के पास इस दुष्चक्र से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। कविवर श्याम मिश्र ने ठीक ही कहा है -

एक गूंगा था, एक अंधा था, और एक था बहरा

अन्धे ने दोनों से पूछा, भाई कैसा है ये प्रजातंत्र ?

बहरे ने सुना नहीं, गूंगा बोलने में था असमर्थ

आगे की कहानी है व्यर्थ।।