शुक्रवार, 20 मई 2016

अब है असली चुनौती

पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आ गये हैं। इनसे भा.ज.पा. का उत्साह बढ़ा है। कांग्रेस के फूटे डिब्बे में दो छेद और बढ़ गये हैं। केरल की जीत पर वामपंथी भले ही खुश हों; पर उनका बंगाली गढ़ ध्वस्त हो गया है। अब वहां उनकी वापसी होना कठिन है। 

केरल में वाममार्गियों की जीत का कारण भा.ज.पा. द्वारा प्राप्त 10.5 प्रतिशत वोट हैं। यदि भा.ज.पा. चुनाव को त्रिकोणीय न बनाती, तो वहां भी वामपंथी हारते और कांग्रेस जीत जाती। यद्यपि वामपंथी उसके लिए अधिक खतरनाक हैं। उनके शासन काल में संघ और भा.ज.पा. के लोगों पर हमले बढ़ जाते हैं। कांग्रेसी शासन में कुछ शान्ति रहती है। फिर भी भा.ज.पा. इस बार पूरी ताकत से चुनाव लड़ी। वह लड़ती और हारती तो हमेशा थी; पर इस बार उसने अपनी सशक्त पहचान बनाने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।
 

असम में भा.ज.पा. की जीत बहुत सुखदायी है। जैसे कर्नाटक में जीत से दक्षिण में द्वार खुला था, ऐसे ही असम की जीत से पूरब का द्वार खुल गया है। आशा है अब भा.ज.पा. वहां भी लगातार आगे बढ़ती रहेगी। बंगाल में भा.ज.पा. ने अपने बलबूते पर 10.2 प्रतिशत वोट पाकर तीन सीट जीती हैं। वहां तो उसके सामने अभी नंबर दो पर आने का ही संघर्ष है। इसके बाद नंबर एक की लड़ाई शुरू होगी। इसलिए वहां मंजिल अभी दूर है। उसे वहां कोई ऐसा जुझारू नेता सामने लाना होगा, जो दस साल तक लगातार परिश्रम और संघर्ष करे। तब जाकर सफलता की बात सोची जा सकती है।
 

तमिलनाडु और पुडुचेरी में भा.ज.पा. को सीट तो नहीं मिली, पर जितने वोट मिले, वह भी ठीक ही है। क्योंकि वहां उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं था। इन परिणामों से निःसंदेह दिल्ली और उससे भी अधिक बिहार की हार का दुख कुछ कम हुआ होगा; पर भा.ज.पा. वालों के लिए अब आराम का समय नहीं है। चूूंकि असली लड़ाई तो अब सामने है, जिसके परिणाम से 2019 के निर्णय प्रभावित होंगे। यदि भा.ज.पा. को उत्तर प्रदेश में होने वाले इस युद्ध को जीतना है, तो उन्हें पहले ये सोचना होगा कि वे दिल्ली और बिहार में क्यों हारे ? दोनों जगह भा.ज.पा. का संगठन नीचे तक विद्यमान है। फिर ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली में वे तीन पर सिमट गये और बिहार में पिछली बार से काफी पीछे रह गये। इसका एक बड़ा कारण है मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी को घोषित न करना।
 

जब दिसम्बर 2013 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव हुए थे, तब विजय गोयल भा.ज.पा. के प्रदेश अध्यक्ष थे। वे काफी समय से दिल्ली में घूम रहे थे। पूरी दिल्ली उनके पोस्टरों और बैनरों से पटी हुई थी। लोग उन्हें ही मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी मान रहे थे; लेकिन अचानक भा.ज.पा. के बड़े लोगों को इलहाम हुआ कि उनके नेतृत्व में चुनाव नहीं जीत सकते। अतः डा. हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बना दिया। डा. हर्षवर्धन ने खूब परिश्रम किया। इससे भा.ज.पा.को 32 सीट मिलीं; पर बहुमत से चार कम होने के कारण उन्होंने सरकार नहीं बनायी। 28 सीट वाले केजरीवाल ने कांग्रेस से मिलकर सरकार बनायी, जो कुछ ही दिन बाद गिर गयी।
 

इसके बाद लोकसभा चुनाव हुए। उनमें भा.ज.पा. ने दिल्ली की सातों सीटें जीत लीं। डा. हर्षवर्धन सांसद और फिर मंत्री बन गये।  फरवरी 2015 में फिर दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुए। इस बार भी भा.ज.पा. ने किसी को मुख्यमंत्री घोषित नहीं किया। उन्हें लगा कि नरेन्द्र मोदी के नाम पर लोकसभा की तरह यहां भी जीत जाएंगे; पर चुनाव से पूर्व ही दुर्गति के लक्षण नजर आने लगे। अतः अंतिम समय में किरण बेदी को सामने लाया गया; लेकिन भा.ज.पा. तीन सीटों पर ही सिमट गयी।
 

कुछ लोग पहली बार 32 और दूसरी बार तीन सीटों का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि पहली बार कांग्रेस ने पूरा दम लगाया था; पर दूसरी बार उसका मनोबल गिर गया। भा.ज.पा. विरोधियों को लगा कि यदि मोदी को रोकना है, तो केजरीवाल को जिताना होगा। अतः कांग्रेस के सारे वोट उसे चले गये और वह जीरो हो गयी।
 

ये तर्क अपनी जगह ठीक होंगे; पर यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना आंदोलन के समय से ही केजरीवाल अपनी पार्टी का चेहरा बन गये थे, जबकि भा.ज.पा. वाले अंत तक सेनापति ही तय नहीं कर सके। अर्थात भा.ज.पा. की हार का कारण रहा - बार-बार नेता बदलना तथा उसकी घोषणा भी समय से न करना। किसी ने लिखा है -
 

मंजिल पे भला क्या पहुंचेंगे, हर गाम पे ठोकर खाएंगे
वो काफिले वाले जो अपने सरदार बदलते रहते हैं।।


अब बिहार चलें। वहां नीतीश कुमार मुख्यमंत्री तो थे ही, अपने गठबंधन के घोषित प्रत्याशी भी थे। लालू के साथ आने से जातीय गणित भी उनके पक्ष में हो गया। फिर उन्होंने प्रशांत किशोर जैसे चुनाव प्रबंधक की सेवाएं भी पर्याप्त समय पूर्व ले ली थीं। दूसरी ओर भा.ज.पा. वाले उसी भ्रम में रहे, जिससे वे दिल्ली में हारे थे। उन्हें लगा कि यहां भी नरेन्द्र मोदी का नाम उन्हें जिता देगा। अतः उन्होंने मुख्यमंत्री पद के लिए कोई प्रत्याशी घोषित नहीं किया। परिणाम सबको मालूम ही है।
 

सुशील मोदी और नंदकिशोर यादव बिहार में भा.ज.पा. के दो प्रमुख चेहरे हैं। सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। अतः उनका नाम और कद बड़ा है। उनकी योग्यता और निष्ठा निर्विवाद है; पर इस बार बिहार का समीकरण ऐसा था कि यदि नंदकिशोर यादव पर्याप्त समय पूर्व मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी घोषित हो जाते, तो लालू का वोट बैंक टूटता और परिणाम बदल जाते। लेकिन सेनापति न बनाने  वाली गलती यहां भी की गयी।
 

यद्यपि हरियाणा में यह नीति ठीक रही; पर यह न भूलें कि वहां भा.ज.पा. ने कभी अकेले चुनाव नहीं लड़ा। इसलिए वहां उनके पास कोई बड़ा नेता था ही नहीं; पर दिल्ली और बिहार में ऐसा नहीं था।
 

इसी पृष्ठभूमि में उ.प्र. के भावी संग्राम को देखना होगा। चुनाव में अब केवल छह महीने बचे हैं; पर भा.ज.पा. ने अभी तक सेनापति घोषित नहीं किया। केशव प्रसाद मौर्य पार्टी के नये राज्य अध्यक्ष बने हैं; पर उनका कद मुलायम सिंह या मायावती से टक्कर लेने लायक नहीं है। उ.प्र. बड़ा राज्य है। कहते हैं कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही जाता है। अतः यहां मुख्यमंत्री पद के लिए किसी बड़े नेता को ही आगे लाना होगा।
 

इस दृष्टि से राजनाथ सिंह और उमा भारती के नाम सामने आते हैं। राजनाथ सिंह एक बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं; पर यह भी सच है कि तब वे पिछले दरवाजे से आये थे। वे केन्द्र में कई बार मंत्री रहे हैं। अब भी वे सरकार में नंबर दो अर्थात गृहमंत्री हैं। राज्य और केन्द्र दोनों का अनुभव उनके पास है। वे बहुत संतुलित होकर बोलते हैं; लेकिन किसी क्षेत्र या जाति में उनकी कोई खास अपील नहीं है। इसीलिए उन्हें लोकसभा हो या विधानसभा, हर बार अपनी सीट बदलनी पड़ती है। फिर भी उनका नाम महत्वपूर्ण है।
 

दूसरा नाम उमा भारती का है। उन्हें भी केन्द्र और राज्य में शासन का व्यापक अनुभव है। वे कुछ बड़बोली जरूर हैं; पर पिछले कुछ वर्षों में वे काफी बदली हैं। उन्हें जनांदोलन का भी खूब अनुभव है। म.प्र. को दिग्विजय सिंह के जबड़े से छीनने का श्रेय उन्हें ही है। राम मंदिर आंदोलन से लेकर गंगा अभियान तक में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। महिला और प्रखर वक्ता होने के नाते वे मायावती को करारी टक्कर देंगी। यदि जातीय पक्ष को देखें, तो वे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी) की उस लोध बिरादरी से हैं, जिससे पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह हैं। इस मामले में वे मुलायम सिंह से भी कम नहीं हैं।
 

भा.ज.पा. में मोदी और अमित शाह से लेकर संगठन के पदाधिकारियों तक को यह समझना होगा कि बिना सेनापति के युद्ध नहीं होता।  असम की ताजा जीत में समय से घोषित किये गये सेनापति सर्वानंद सोनोवाल का भी बड़ी भूमिका है। उ.प्र. में देरी के कारण भा.ज.पा. वाले आधी लड़ाई हार चुके हैं। आज की तारीख में वहां ब.स.पा. पहले और भा.ज.पा. दूसरे नंबर पर है। फिर भी यदि नेता तय हो जाए और उसे सब कामों से मुक्त कर लगातार घूमने दें, तो बाजी पलट सकती है। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार इस समय उ.प्र. में किसी तथाकथित सवर्ण का मुख्यमंत्री बनना कठिन है। इसलिए भा.ज.पा. वालों को बहुत ध्यान से निर्णय करना होगा। असम में राम माधव तथा चुनाव प्रबंधक रजत सेठी की भूमिका भी अच्छी रही है। इन दोनों को तुरंत उ.प्र. में लगा देना चाहिए। 
 

कुछ लोग कहते हैं कि मोदी को खुद पर जरूरत से ज्यादा विश्वास है। वे सोचते हैं कि 2019 में उनके सामने प्रधानमंत्री पद के लिए केजरीवाल, नीतीश, राहुल, ममता आदि कई राज्य स्तर के नेता होंगे। इनकी आपसी लड़ाई में वे बाजी मार लेंगे। इसलिए वे हिन्दीभाषी बड़े राज्यों में कोई नया नेता उभरने देना नहीं चाहते। अंदर का सच तो मोदी या अमित शाह जानें; पर इतना जरूर है कि जिस भवन पर झंडा लगता है, वह भवन जमीन पर ही बनता है, हवा में नहीं। बिहार की जमीन खोने के बाद अब असली लड़ाई उ.प्र. में है। इसलिए वहां किसी जमीनी नेता की सेनापति के नाते घोषणा तुरन्त होनी चाहिए।