शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

कीमत और मूल्य

सामान्य रूप से देखें, तो ये दोनों शब्द पर्यायवाची से लगते हैं। कीमत में कुछ उर्दू या अरबी का पुट है, तो मूल्य में हिन्दी और संस्कृत का; पर थोड़ा गहरे में जाएं, तो ध्यान आता है कि जब कोई व्यक्ति, गांव, समाज या देश लम्बे समय तक कोई कीमत चुकाता है, तो दुनिया में कुछ मूल्य स्थापित होते हैं। फिर उन्हीं का अनुसरण कर लोग आगे बढ़ते हैं। समय चाहे जो भी रहा हो, पर ऐसे उदाहरण समय-समय पर दिखायी देते हैं। सच तो यह है कि इनके आधार पर ही यह धरती टिकी हुई है, अन्यथा ये कब की रसातल में समा गयी होती।

बात सतयुग की करें, तो राजा हरिश्चंद्र ने सपने में दिये गये वचन का पालन करते हुए मुनि विश्वामित्र को अपना राजपाट सौंप दिया। पत्नी तारा और पुत्र रोहित के साथ वन-वन भटके। काशी में शमशान घाट पर नौकरी की। उनकी रानी को दासियों वाले काम करने पड़े। सर्पदंश से मृत पुत्र को लेकर जब उनकी पत्नी शमशान आयी, तो हरिश्चंद्र ने बिना कर लिये उसका अंतिम संस्कार नहीं होने दिया। इस प्रकार राजा हरिश्चंद्र ने अपने वचन की कीमत चुकायी, तो संसार में एक मूल्य की स्थापना हुई कि -

चंद्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार
पै दृढ़वत श्री हरिश्चंद्र कौ, टरै न सत्य विचार।

त्रेतायुग में भी दशरथ जी ने कैकेयी को दिये गये वचन को निभाया। यद्यपि उनके प्राण चले गये। प्राणों से भी प्रिय राम को वन में जाना पड़ा; लेकिन दशरथ जी पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने प्राणों की कीमत चुकायी; पर समाज में एक मूल्य स्थापित हो गया कि - ‘‘रघुकुल रीति सदा चली आई,  प्राण जाहुं बरु बचन न जाई।’’

कीमत तो श्रीराम ने भी कम नहीं चुकायी। जिसका अगली सुबह राज्याभिषेक होने जा रहा हो, उसे 14 वर्ष के लिए वन में भेज दिया जाए। ऐसे व्यक्ति की मनस्थिति की कल्पना की जा सकती है; पर श्रीराम ने निर्णय लेने में एक क्षण भी नहीं लगाया और वल्कल पहन पर वन को निकल पड़े। सारी दुनिया में एक मूल्य स्थापित हुआ कि आज्ञाकारी पुत्र हो तो राम जैसा।

यहां हमें जनकनंदिनी सीता को भी याद करना होगा। वनवास तो राम को हुआ था। सीता जी ससुराल या मायके में आराम से रह सकती थीं; पर उन्होंने भी वन जाने का निर्णय लिया। जहां पति, वहां पत्नी। जहां राम, वहां सीता। सीता ने जो कीमत चुकायी, उससे समाज में एक मूल्य स्थापित हुआ कि पत्नी हो तो सीता जैसी।

इसी प्रसंग में लक्ष्मण और भरत जी को भी नहीं भूल सकते।लक्ष्मण ने भी श्रीराम के साथ स्वैच्छिक वनवास स्वीकार किया। तभी तो लोग आज भी बन्धु-प्रेम के लिए लक्ष्मण का नाम लेते हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता के लिए लोगों ने अपने सगे सम्बन्धियों को तड़पा-तड़पा कर मारा; लेकिन भरत सिंहासन को ठुकरा कर एक तपस्वी की तरह नंदीग्राम में रहे और रामजी के आते ही राज्य उन्हें सौंप दिया। समाज में एक मूल्य स्थापित हुआ कि त्यागी हो, तो भरत जैसा।

आज भले ही सती शब्द बदनाम कर दिया गया हो; पर इसका अर्थ पति के साथ चिता पर जलना नहीं; वरन मन, वचन और कर्म से पतिव्रत निभाना है। सावित्री को कौन नहीं जानता ? सत्यवान को मन से वरण करने के बाद, जब उसकी अल्पायु का पता लगा, तब भी सावित्री ने निर्णय नहीं बदला और अपने सतीत्व के बल पर यमराज के जबड़ों से पति को वापस ले आयी। इसीलिए कहा जाता है कि सती हो, तो सावित्री जैसी।

श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप की गोसवा सर्वविदित है। उन्होंने नंदिनी गाय की प्राणरक्षा के लिए स्वयं को सिंहराज के सामने प्रस्तुत कर दिया। यद्यपि वह सिंहराज स्वयं भोलेनाथ थे, जो उनकी परीक्षा लेने आये थे। 1872 में पंजाब के मलेरकोटला में सद्गुरू रामसिंह कूका के 68 गोभक्त शिष्यों ने तोप के सामने खड़े होकर मौत को गले लगाया। 1918 में कटारपुर (हरिद्वार) में भी इदुलजुहा पर गोमाता की रक्षा के लिए हुए संघर्ष में अनेक हिन्दुओं ने प्राणाहुति दी। इस कांड में चार लोगों को फांसी और 135 को कालेपानी की सजा हुई। समाज में यह मूल्य स्थापित हुआ कि गोरक्षक हों तो ऐसे।

चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री चाणक्य दिन में राजकाज के लिए महल में रहते थे; पर फिर अपनी कुटिया में आ जाते थे। एक बार उनसे मिलने जब कोई वहां आया, तो चाणक्य ने राज्य से प्राप्त तेल का दीपक बुझाकर निजी तेल का दीपक जला लिया। क्योंकि वह आगन्तुक किसी निजी विषय पर बात करने आया था। एक बार उनकी कुटिया में घुसे चोर यह देखकर हैरान हो गये कि राज्य की ओर से निर्धनों को बंटने वाले कम्बलों का ढेर वहां होने पर भी चाणक्य अपनी साधारण चादर ओढ़कर सो रहे हैं। राज्य के संसाधनों के संयमित उपयोग के कारण ही लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री हो, तो चाणक्य जैसा।

श्रीकृष्ण ने अपने मामा कंस को सार्वजनिक रूप से प्राणदंड देकर यह मूल्य स्थापित किया कि अत्याचारी पर जरा भी दया नहीं दिखानी चाहिए, चाहे वह अपना सगा-सम्बन्धी ही क्यों न हो।

कुछ लोग सत्याग्रह का श्रेय गांधी जी को देते हैं; पर यह परम्परा बहुत पुरानी है। गुरु अर्जुनदेव जी, गुरु तेगबहादुर जी, भाई मतिदास, भाई सतिदास, भाई दयाला; हकीकतराय, बन्दा बैरागी, जोरावर सिंह और फतेहसिंह आदि ने बलिदान क्यों दिया; गोवा में क्रूर मिशनरी जेवियर ने हजारों लोगों को क्यों मारा ? उत्तर एक ही है कि उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। यदि वे मुसलमान या ईसाई बन जाते, तो बच जाते; पर वे इस सत्य पर डटे रहे कि पूजा के तरीके अलग-अलग होने के बावजूद ईश्वर एक है। इन महामानवों ने अपना बलिदान देकर जो कीमत चुकायी, उससे दुनिया भर में यह मूल्य स्थापित हुआ कि सत्याग्रही हों, तो ऐसे।

देश में भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे हजारों क्रांतिवीरों की विशाल मालिका है, जिन्होंने आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना और हंसते हुए बलिपथ पर चल दिये। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त चाहते, तो संसद में बम फेंककर निकल सकते थे। फिर भी उन्होंने समर्पण किया, जिससे दुनिया उनका पवित्र उद्देश्य जान सके। वीर सावरकर ने दो आजन्म कारावास की सजा स्वीकार की, पर झुके नहीं। इन्होंने अपनी जीवनाहुति देकर समाज में यह मूल्य स्थापित किया कि देशभक्त हों, तो ऐसे।

डा. केशव बलीराम हेडगेवार की चर्चा भी यहां समीचीन होगी। दुनिया में हजारों संगठन रोज बनते हैं। कुछ दस साल जीवित रहते हैं, तो कुछ बीस साल। कुछ संस्थाएं इससे आगे भी चल जाती हैं; पर फिर वे कुर्सी और सम्पत्ति के विवाद में अपने उद्देश्य से भटक जाती हैं। कई बार तो वे घरेलू जागीर बनकर रह जाती हैं। 90 प्रतिशत संस्थाएं तो फाइलों से बाहर ही नहीं निकल पातीं।

पर डा. हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नामक जिस संगठन की नींव रखी, जहां एक ओर वह भारत के हर विकास खंड तक पहुंच चुका है, वहां दुनिया में जिस देश में हिन्दू हैं, वहां भी वह विद्यमान है। हर आयु वर्ग और काम करने वालों में स्वयंसेवक विभिन्न संगठन और संस्थाएं बनाकर काम कर रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता हों या राजनीतिक जन्तु, पर संघ के प्रभाव से कोई अछूता नहीं है। समर्थकों की बात तो छोड़िये, पर दिन में एक बार संघ को गाली दिये बिना विरोधियों का खाना भी हजम नहीं होता।

संघ आज जिस स्थिति में है, उसके लिए डा. हेडगेवार ने अपना तन, मन और धन ही नहीं, तो जीवन का क्षण-क्षण देकर जो कीमत चुकाई, उससे समाज के यह मूल्य स्थापित हुआ कि संगठनकर्ता हो, तो डा. हेडगेवार जैसा।

दुनिया में सैकड़ों ऐसे देश हैं, जिन्होंने विदेशी और विधर्मी हमलावरों के सामने घुटने टेक दिये। भौगोलिक रूप से वे भले ही धरती पर हों, लेकिन अब न उनकी भाषा शेष है और न संस्कृति। इकबाल ने भी ‘‘यूनान मिस्र रोमां सब मिट गये जहां से’’ की बात कही है; पर दुनिया में इसराइल जैसा देश और यहूदी जैसी कौम भी है। दो हजार साल तक दुनिया भर में धक्के खाने के बाद भी यहूदी अपने देश और संस्कृति को नहीं भूले। और 1948 में जैसे ही उन्हें मौका मिला, वे फिर से एकत्र हो गये। सचमुच देशभक्त और जिंदादिल कौम हो, तो यहूदियों जैसी।


ऐसे उदाहरण सैकड़ों नहीं हजारों हैं। हर नगर और गांव में ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपने त्याग और परिश्रम से कुछ मूल्य स्थापित किये हैं। भले ही उन्हें और उनके परिवार को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी हो। ऐसे लोगों को ढूंढना और उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना ही सच्ची पूजा है।