गुरुवार, 19 जनवरी 2017

खादी को खुला बाजार दें

इस वर्ष खादी विकास एवं ग्रामोद्योग आयोग ने अपने वार्षिक कैलेंडर एवं डायरी पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चरखा चलाते हुए चित्र छापा है। इस पर कई लोग जल-भुन गये। कुछ कांग्रेसी, गांधीवादियों तथा भाजपाइयों ने अपने टेढ़े बयानों से इस विवाद की आग में घी डाल दिया। इन दिनों मीडिया वाले पांच राज्यों के आगामी चुनावों की तैयारी में व्यस्त हैं। उ.प्र. के समाजवादी कुनबे में हुई नूरा कुश्ती, पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू की कांग्रेसी पिच पर की जा रही उल्टी बैटिंग तथा भा.ज.पा. में थोक के भाव आ रहे कांग्रेसियों की भी खूब चर्चा है। इसलिए यह आग अधिक नहीं भड़क पायी।

कई लोगों का कहना है कि खादी के कैलेंडर से पहले भी कई बार गांधी जी अनुपस्थित रहे हैं। अतः वहां नरेन्द्र मोदी का चित्र लगाना गलत नहीं है। वे देश के प्रधानमंत्री हैं और आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि उनके प्रयास से मृतप्रायः खादी की बिक्री में फिर से जान आ गयी है; लेकिन यदि मोदी के साथ गांधी जी का चित्र भी इस कैलेंडर और डायरी में होता, तो सोने में सुहागे जैसी बात हो जाती।

गांधी जी के विचारों से कोई सहमत या असहमत हो सकता है; पर इसमें तो कोई संदेह नहीं कि उनके प्रयास से एक समय चरखा आजादी के आंदोलन का एक प्रमुख हथियार तथा खादी स्वाधीनता सेनानियों की पहचान बन गयी थी। इसीलिए खादी वस्त्र नहीं विचार हैजैसा घोषवाक्य प्रचलित हुआ। प्रख्यात कवि श्री सोहनलाल द्विवेदी ने प्रभात फेरियों के लिए एक गीत भी लिखा। खादी को लोकप्रिय करने में इसका भी भारी योगदान है।

खादी के धागे धागे में अपनेपन का अभिमान भरा
माता का इसमें मान भरा, अन्यायी का अपमान भरा। 

लेकिन आज के बाजारवादी युग में खादी की बात करना और उसके संरक्षण के लिए सरकारी धन खर्च करना कितना उचित है, यह विचार भी जरूरी है ? वस्तुतः हस्तचालित चरखे से काता गया सूत और फिर उससे हथकरघे पर बुना गया सूती, रेशमी और ऊनी कपड़ा ही खादी है। एक समय जब अंग्रेजों ने विदेशी कपड़ों से भारत के बाजार भर दिये थे, तो गांधी जी के नेतृत्व में भारतवासियों ने स्वदेशी आंदोलन चलाकर उनका बहिष्कार किया था। इससे खादी तथा अन्य स्वदेशी वस्त्रों की बिक्री बढ़ गयी। 12 दिसम्बर, 1930 को मुंबई में एक मिल मजदूर बाबू गेनू ने विदेशी कपड़ों से भरे ट्रक के सामने लेटकर प्राणाहुति दी और स्वदेशी के लिए प्रथम बलिदानी होने का गौरव प्राप्त किया। धीरे-धीरे स्वदेशी और खादी का नाम देश के कोने-कोने में फैल गया।

1947 में आजादी मिलने के बाद जब तक स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने वाले नेताओं की पीढ़ी जीवित और सक्रिय रही, तब तक खादी के वस्त्र भी दिखायी देते रहे; पर फिर फैशन की मार और बाजार की जरूरत ने खादी को पीछे धकेल दिया। तब से आज तक खादी सरकारी सहायता पर जीवित है। सरकारी सहायता अर्थात जनता का धन। खादी समर्थकों का कहना है कि इससे लाखों लोगों को रोजगार तथा लघु व कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन मिलता है। उनकी बात सच हो सकती है, पर आज का युग बाजारवादी है। अटल जी की सरकार में घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों को बेचने के लिए एक विनिवेश मंत्रालयबनाया गया था। नरेन्द्र मोदी ने भी कई बार कहा है कि सरकार का काम व्यापार को आसान बनाना है, व्यापार करना नहीं। फिर भी खादी के नाम पर जनता का अरबों-खरबों रु. प्रतिवर्ष लुट रहा है। 

जो कारोबारी संस्थान सरकार चलाती है, अपवादों को यदि छोड़ दें, तो अधिकांश भारी घाटे में चलते हैं। इसका कारण बहुत साफ है। कोई भी व्यापारी अपने कारोबार को चलाने और बढ़ाने के लिए पूंजी लगाता है। वह खतरे उठाता है और जीतोड़ परिश्रम भी करता है। केवल वही नहीं, तो खाली समय में उसकी पत्नी और बच्चे भी दुकान पर बैठ जाते हैं। इससे उसका कारोबार तेजी से बढ़ता है; लेकिन सरकारी संस्थानों में ऐसा नहीं है। वहां व्यक्ति नौकरी के लिए काम करता है। कारोबार बढ़े या घटे, उसकी बला से।

आप किसी खादी भंडार में जाएं, तो हंस कर स्वागत करना तो दूर, वहां के कर्मचारी बड़ी उदासीनता से आपको माल दिखाएंगे। आम दुकानदार ग्राहक के आने पर भोजन छोड़कर उससे बात करता है; पर खादी भंडार वाले ऐसे में ग्राहक को टका सा जवाब देकर टाल देते हैं। खादी भंडार के कपड़ों की सिलाई और बटन भी कुछ दिन में ही जवाब दे देते हैं। इसके बाद भी यदि कोई व्यक्ति दूसरी और तीसरी बार वहां जाए, तो उसकी हिम्मत की दाद ही देनी होगी।

बाजारवादी युग में बहुत सी ऐसे चीजें चलती हैं, जो खादी भंडार में संभव नहीं है। कपड़े की किसी अच्छी दुकान पर दुकानदार ग्राहक का स्वागत ठंडे या गरम पेय से करता है। खादी भंडार में इसके लिए कोई बजट नहीं होता। बड़ी दुकानों पर हजारों रु. मासिक वेतन पर ऐसे कर्मचारी रखे जाते हैं, जो अपनी बातचीत से ग्राहक को प्रभावित कर माल खरीदने पर मजबूर कर दें; पर खादी भंडार में सरकारी कर्मचारी होते हैं। नौकरी पक्की होने के कारण वे कुछ नया सीखना भी नहीं चाहते। फिर उनके स्थानांतरण भी होते हैं। इसका भी ग्राहकी पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

खादी के पतन का दूसरा प्रमुख कारण है उसका महंगा होना। आज स्वचालित मशीनों के कारण हर तरह के कपड़ों के उत्पादन में बहुत विविधता और तेजी आ गयी है। इस कारण वे बहुत सस्ते पड़ते हैं। खादी के कपड़े साधारणतया तीन गुने तक महंगे होते हैं। फिर कम्प्यूटर पर बने डिजायनों ने तो फैशन की दुनिया में क्रांति कर दी है। जबकि खादी के डिजाइन हाथ से बने होने के कारण पुराने और कम सुंदर होते हैं। युवा वर्ग और महिलाएं तो नये फैशन के पीछे ही भागते हैं। ऐसे में उन्हें कोई क्यों खरीदे ?

अब तो खादी भंडारों पर कपड़े के साथ ही शहद, चटनी, अचार और साबुन, अगरबत्ती जैसी चीजें भी बिकती हैं। इसके बावजूद खादी विभाग घाटे में रहता है। हर नगर में खादी भंडार मुख्य बाजारों में हैं। यदि यही दुकान किसी व्यापारी के पास हो, तो वह साल भर में कारोबार दोगुना कर ले; पर खादी वाले हैं कि हर साल लगातार पीछे ही खिसक रहे हैं। रही-सही कसर रैडिमेड कपड़ों ने पूरी कर दी है। अधिकांश लोग अब उन्हें ही लेना पसंद करते हैं। दरजी को नाप देना और फिर बार-बार उसके चक्कर लगाने का झंझट ही समाप्त। बाजार गये, कपड़ा पहन कर देखा, पैसे दिये और छुट्टी। इस कारण खादी वाले भी अब कुछ रैडिमेड वस्त्र बेचने लगे हैं; पर बाजार की प्रतिस्पर्धा में वे कहीं नहीं ठहरते।

आजादी से पूर्व खादी की लोकप्रियता के पीछे स्वदेशी भावनाका बड़ा हाथ था। आज कपड़ा बनाने वाले सभी उद्योग भारतीय उद्योगपतियों के ही हैं। अर्थात वे भी उतने ही स्वदेशी हैं, जितनी खादी। यद्यपि गांधी जी के चिंतन में स्वदेशी के साथ ही स्थानीयता का भी महत्व था; पर आज संचार के साधनों की वृद्धि से दुनिया एक छोटे गांव में बदल गयी है। अब तो ऑनलाइन खरीदारी का युग है। ऐसे में कालबाह्य हो चुके विचारों के साथ घिसटने की बजाय उसे छोड़ देना ही उचित है ?

खादी विभाग संसद के खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम 1956’ के अंतर्गत एक वैधानिक निकाय है। अतः इसे संसद के कानून से ही बंद करना होगा। इससे पहले भी संसद ने सैकड़ों बार संविधान में संशोधन किया है। खादी विभाग को बंद कर उन दुकानों को नीलाम करने से ही सरकार को अरबों रु. प्राप्त होगा। फिर हर साल का घाटा बचेगा सो अलग। वहां के कर्मचारी अधिकांश वृद्ध हैं। उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दी जा सकती है। इस प्रकार खादी के नाम पर जनता से प्राप्त कर का दुरुपयोग बंद हो जाएगा, जिससे जनहित के और कई काम हो सकेंगे।

कोई कह सकता है कि इससे लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे। सच तो यह है कि इससे बुनकरों में प्रतिस्पर्धा होगी, जिससे वे अपना काम और अधिक अच्छे ढंग से करेंगे। इससे ग्राहक को भी लाभ होगा। खादी विभाग बुनकरों को सस्ता ऋण देता है और उनका माल भी खरीदता है। इसके लिए सरकार में कई विभाग हैं। बुनकरों को भी वहीं से जोड़ देना चाहिए।

बाजार का नियम है कि वहां जरूरत के अनुसार हर साल सैकड़ों कारोबार बंद होते और खुलते हैं। अब समय आ गया है कि सरकारी बैसाखी हटाकर खादी को भी खुले बाजार में विचरने के लिए छोड़ दिया जाए।