मंगलवार, 24 जनवरी 2017

आरक्षण का भूत

जैसे पतझड़ आते ही पत्ते झड़ने लगते हैं। वसंत आते ही फूल खिलने लगते हैं। सरदी आते ही स्वेटर और कोट निकल आते हैं। बाजार में पंखे और कूलर दिखने लगें, तो ये गरमी आने का साफ लक्षण है। नेता जी बिना किसी बात के बार-बार हालचाल पूछने लगें और आरक्षण का भूत अपनी बोतल से निकल आये, तो समझ लो कि चुनाव आ गये हैं।

आपको याद होगा कि बिहार चुनाव से पहले असहिष्णुता और संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के आरक्षण सम्बन्धी एक बयान को लेकर कितना बवंडर खड़ा किया गया था; पर जैसे ही चुनाव समाप्त हुए, दोनों भूत फिर बोतल में घुस गये। ठीक भी तो है, जिस काम के लिए उन्हें याद किया गया था, वह पूरा होने के बाद यदि उन्हें फिर से बंद न किया जाता, तो वे अपने मालिकों को ही खा जाते।

आरक्षण के उस भूत को कुछ दिन पहले फिर बोतल का ढक्कन खोलकर निकाला गया है। अवसर था जयपुर में हुए साहित्य महोत्सव का। अगले महीने पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। उसमें उ.प्र. का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण है। कहते हैैं कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही जाता है। पिछले लोकसभा चुनाव में भा.ज.पा. ने उ.प्र. में जो करामात दिखायी थी, उससे ही दिल्ली में सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ था। ऐसे में उ.प्र. के चुनाव न केवल भा.ज.पा. और नरेन्द्र मोदी, बल्कि मुलायम सिंह, अखिलेश यादव, मायावती और राहुल बाबा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। बस इसीलिए आरक्षण के भूत की बोतल का ढक्कन खोला गया है।

लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि संघ के इतने वरिष्ठ और अनुभवी लोग तिल का ताड़ बनाने में माहिर लोगों के वाग्जाल में क्यों फंस जाते हैं ? उन पत्रकारों, लेखकों या तथाकथित बुद्धिजीवियों को आरक्षण से कुछ लेना-देना नहीं है। वे सब भरपेट खाते-पीते और शान से जीते हैं; पर उन्हें यह बात अब तक हजम नहीं हुई कि उनके भरपूर प्रयत्नों के बावजूद नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री कैसे बन गये ? जब सीधी चाल विफल हो गयी, तो अब दो नंबर के हथकंडे आजमाये जा रहे हैं। आरक्षण के नाम पर विवाद खड़ा करना ऐसा ही एक सुपरिचित हथकंडा और षड्यंत्र है।

जहां तक आरक्षण के बारे में संघ का दृष्टिकोण है, तो इस बारे में तो संघ के किसी अधिकृत व्यक्ति की बात ही माननी होगी। संघ के सहसरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होस्बले का बयान इस बारे में आया भी है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब तक जाति, जन्म और क्षेत्रगत असमानताएं हैं, तब तक आरक्षण जरूरी है; लेकिन इस बयान के बावजूद वे विघ्नसंतोषी लोग शांत नहीं हुए हैं, चूंकि उनका उद्देश्य समानता लाना नहीं, बल्कि चुनाव में भा.ज.पा. को हराना है।

जहां तक आरक्षण की समीक्षा की बात है, तो यह काम समय-समय पर होना ही चाहिए। कोई भी व्यक्ति, संस्था, व्यापारी या शासन-प्रशासन के लोग अपने काम की समीक्षा करते ही हैं। यदि समीक्षा नहीं करेंगे, तो पता कैसे लगेगा कि वे ठीक मार्ग पर हैं नहीं ? पर समीक्षा की बात सुनते ही उन लोगों के पेट में दर्द होने लगता है, जो जोड़तोड़ से ऊंची कुरसी पर पहुंच गये हैं, और अब चाहते हैं कि यह कुरसी उनके बच्चों को भी आसानी से मिल जाए; भले ही उनकी जाति, बिरादरी या क्षेत्र के बाकी लोग भाड़ ही क्यों न झोंकते रहें।

यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि लोग सरकारी नौकरी ही क्यों चाहते हैं ? क्या इसलिए कि वहां काम कम है और छुट्टियां अधिक। नौकरी की सुरक्षा के बावजूद जिम्मेदारी कम है और पैसा अधिक ? यद्यपि अब निजी नौकरियों में भी पैसा बहुत मिलने लगा है; पर वहां काम भी रगड़ कर लिया जाता है। वहां परिणाम न दिया, तो बाहर का रास्ता दिखाते भी देर नहीं लगती। लेकिन कम्प्यूटर के कारण नौकरियां लगातार कम हो रही हैं। भविष्य में यह और भी कम होंगी। दुर्भाग्यवश लोगों ने रोजगार का अर्थ नौकरी ही मान लिया है। इसीलिए आरक्षण के नाम पर बार-बार वाद और विवाद खड़े किये जाते हैं। 

लेकिन इससे जुड़ा हुआ दूसरा पहलू यह है कि वास्तविक योग्यता को कैसे पहचानें ? इसका तरीका बड़ा सरल है। जैसे दौड़ प्रतियोगिता में सब खिलाड़ी एक ही रेखा पर खड़े होते हैं, ऐसे ही छात्र जीवन में बच्चों को समान शिक्षा और सुविधाएं मिलें, तब पता लगेगा कि असली योग्यता किसमें है ? इसके लिए अनेक विद्वानों और समाजशास्त्रियों ने समय-समय पर कुछ उपाय बताये हैं। यदि इनका पालन हो, तो फिर आरक्षण की समस्या सदा के लिए समाप्त हो सकती है।

अनिवार्य शिक्षा - पांच से लेकर 16 वर्ष तक हर बच्चे के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध हो। भले ही वह सेठ का बच्चा हो या उसकी कोठी में काम करने वाले माली का; पर सब बच्चे पढ़ें, इसके लिए कुछ ठोस उपाय करने होंगे।

समान शिक्षा - अनिवार्य के साथ ही दूसरा पहलू है समान शिक्षा। किसी समय डा. राममनोहर लोहिया एक नारा लगाते थे -
टाटा-बिड़ला का हो छौना, गांधी-नेहरू की संतान
या हो चपरासी का बच्चा, सबकी शिक्षा एक समान।।
यदि सब बच्चों की शिक्षा एक सी हो, तो उनमें ऊंच-नीच और छुआछूत की भावना पैदा ही नहीं होगी। इसके लिए प्राचीन गुरुकुल और आधुनिक छात्रावासों का कोई समन्वित प्रारूप बनाकर उसे देश भर में अनिवार्य रूप से लागू करना होगा।

मातृभाषा में शिक्षा - बच्चे जो भाषा-बोली घर में बोलते और सुनते हैं, प्रारम्भिक शिक्षा उसी में होनी चाहिए। विनोबा भावे ने कहा है कि अंग्रेजी सीखने में बच्चे जितना श्रम करते हैं, उतने में वे भारत की कई भाषाएं सीख सकते हैं; पर हम उसे दूध की बोतल के साथ ही अंग्रेजी की किताब भी पकड़ा देते हैं। गरीब और अशिक्षित परिवारों के बच्चे इसीलिए आगे नहीं बढ़ पाते, चूंकि वे अंग्रेजी में असहज अनुभव करते हैं। अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण देश की 80 प्रतिशत योग्यता बचपन में ही मर जाती है। यदि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो, तो गांव और झोपड़ों में से सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं निकलेंगी। यह हैरानी की बात है कि गांव के विद्यालय में पढ़े हुए नरेन्द्र मोदी भी अंग्रेजी के ही पक्षधर बने हुए हैं।

निकट शिक्षा - डा. लोहिया कहते थे कि घर से एक कि.मी. दूरी तक के विद्यालय में पढ़ना हर बच्चे का हक है; पर आज तो बच्चे सुबह छह बजे ही बस पकड़ने के लिए सड़क पर आ जाते हैं। न शौच, न स्नान और न ही ठीक से नाश्ता। आने-जाने में अधिकांश बच्चों के तीन से चार घंटे खर्च हो जाते हैं। ऐसे में वे कब खेलेंगे और कब पढ़ेंगे ? आजकल प्रायः स्कूल बसों की दुर्घटना के समाचार मिलते हैं। यदि निकट शिक्षा होने लगे, तो छोटे बच्चे अपने बड़े भाई-बहिन या पड़ोस के बच्चों के साथ आराम से स्कूल जा सकते हैं। माता-पिता भी उन्हें छोड़ने या लेने जा सकते हैं।


इन सूत्रों के आधार पर यदि शिक्षा का तंत्र खड़ा करें, तो हर बच्चे की योग्यता पूरी तरह प्रकट होगी। एक बार यह फार्मूला लागू हो जाए, तो फिर आरक्षण हटाने में कोई परेशानी नहीं होगी। आरक्षण के समर्थक और विरोधी, दोनों को चाहिए कि समता और समानता लाने वाले इन उपायों को लागू करने में अपनी ताकत लगाएं। इससे प्रेमपूर्वक दोनों पक्षों की समस्या हल हो जाएगी।