गुरुवार, 2 मार्च 2017

राजनीति और महिलाएं

राजनीति में महिलाओं की भूमिका की चर्चा सदा से होती रही है। प्रायः यह चुनाव में 33 से 50 प्रतिशत तक आरक्षण पर आकर टिक जाती है। कई राज्यों की पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। इससे क्या सुधार हुआ, यह तो समय ही बताएगा। राजनीति में महिलाओं की भूमिका कभी परदे के पीछे होती है, तो कभी आगे। कभी महिलाएं राजसत्ता का उपयोग कर लेती हैं, तो कभी महिलाओं को वस्तु की तरह उपयोग कर राजनीति को प्रभावित किया जाता है।

रामायण काल में दशरथ की सबसे छोटी रानी कैकेयी ने अपने पुत्र भरत को राजगद्दी दिलाने के लिए युवराज पद पर बैठने जा रहे राम को 14 वर्ष का वनवास दिलवा दिया, जिससे इस दौरान भरत और उसकी संतानों की पूरी पकड़ राज्यतंत्र पर हो जाए। दूसरी ओर शूर्पणखा ने रावण को सीता हरण के लिए बाध्य किया। इन दोनों की भूमिका के आसपास ही पूरी रामकथा घूमती रहती है। यह राजनीति नहीं तो और क्या है ?

महाभारत काल में राजा शांतनु ने जब निषाद-कन्या सत्यवती से विवाह करना चाहा, तो वह इस शर्त पर राजी हुई कि उसकी संतानें ही राजा बनेंगी। इसी कारण भीष्म को आजीवन ब्रह्मचारी रहना पड़ा। गांधारी को सदा यह दर्द रहा कि बड़े भाई धृतराष्ट्र की पत्नी होने पर भी गद्दी का उत्तराधिकारी उसका पुत्र दुर्योधन नहीं, बल्कि उसके देवर पांडु का पुत्र युद्धिष्ठिर होगा। इस महत्वाकांक्षा ने ही उसके पति और बेटों के दिमाग भ्रष्ट कर दिये। आज भी अपने विरोधी को हराने के लिए उनकी महिलाओं का अपमान किया जाता है। द्रौपदी के साथ भी यही हुआ। यह बात उसके दिमाग में बहुत गहरी बैठ गयी। अतः वनवास काल में उसने युद्धिष्ठिर को कई बार ये समझौता तोड़ने को कहा।

न समय परिरक्षणं क्षमं ते, विकृतिपरेषु परेषु भूरिधाम्नः
अरिषु हि विजयार्थिनः क्षितीशा, विदधति सोपधि सन्धिदूषणानि।।      
                               - भारवि रचित किरातार्जुनीय महाकाव्य से

(द्रौपदी कहती है कि जब शत्रु अपकार कर रहे हों, तो सन्धि की समयावधि की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। विजय पाने के इच्छुक राजा सन्धि में कमी निकाल कर उसे तोड़ देते हैं।)

जब वनवास पूरा कर पांडव वापस आये, तो कौरवों ने उन्हें राजसत्ता नहीं दी। इससे युद्ध का माहौल बनने लगा। श्रीकृष्ण यह नहीं चाहते थे। अतः वे संधि का प्रस्ताव लेकर कौरव सभा में गये; पर जाने से पहले द्रौपदी ने अपने खुले केश दिखाकर कहा कि ये दुःशासन के रक्त से गीले होने के बाद ही बंधेंगे। इससे श्रीकृष्ण के हाथ बंध गये। कौरव सभा से आकर श्रीकृष्ण ने पांडवों को सब हाल बताया। इस पर कुंती ने कहा कि जिस समय के लिए क्षत्राणियां अपने पुत्रों को जन्म देती हैं, वह समय आ गया है। इसलिए अब पीछे हटना कायरता होगी। वह प्रसंग भी प्रसिद्ध है जब युद्ध के दौरान कंुती ने कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताकर पांच में चार पांडवों के प्राण सुरक्षित कर लिये। द्रौपदी ने भी भीष्म के पास जाकर उनकी मृत्यु का रहस्य पूछ लिया।

मत्स्यकन्या, गांधारी, कुंती और द्रौपदी का व्यवहार क्या महिला राजनीति नहीं थी ? श्रीकृष्ण द्वारा कुंती को कर्ण के पास और द्रौपदी को भीष्म पितामह के पास भेजने को क्या राजनीति में महिलाओं का उपयोग नहीं कहेंगे ?

होली हमें राजा हिरण्यकशिपु, उसकी साध्वी पत्नी कयाधु, पुत्र प्रह्लाद और दुष्ट बहिन होलिका की याद दिलाती है। कयाधु समझ गयी थी कि पति को सुधारना असंभव है। अतः उसने प्रह्लाद को संस्कारित किया। भविष्य की तैयारी करते हुए सेना और शासन में अपने विश्वस्त लोगों को बैठाया। जनता को जागरूक किया। इसीलिए प्रह्लाद को मारने के सब षड्यंत्र विफल हुए; और अंततः फागुन पूर्णिमा की रात में जनता ने राजमहल पर हमला कर दिया। हिरण्यकशिपु और होलिका मारी गयी। इस प्रकार होलिका की राजनीति विफल और मां कयाधु की राजनीति सफल हुई।

राजनीति में महिलाओं के भी अच्छे और खराब प्रसंग प्रसिद्ध हैं। जीजाबाई, इंदौर की रानी अहिल्या, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, गढ़मंडल की रानी अवंतीबाई, देवल रानी, हाड़ी रानी, कित्तूर की रानी चेनम्मा आदि के नाम सुनकर सीना चौड़ा हो जाता है। दूसरी ओर सम्राट अशोक की युवा पत्नी तिष्यरक्षिता ने बड़ी रानी पद्मावती के पुत्र कुणाल पर झूठा आरोप लगाकर उसे मृत्युदंड दिलवा दिया। यद्यपि सच पता लगने पर सम्राट ने उसे भी प्राणदंड दिया। रानी सुनीति ने राजा उत्तानपाद की गोद में बड़ी रानी सुमति के पुत्र को नहीं बैठने दिया। यद्यपि इस चोट और मां के मार्गदर्शन ने उसे धु्रव का अटल स्थान दिलवा दिया। हिन्दू और मुस्लिम शासकों की पटरानी, रानी, रखैल और दासियों के बीच चलने वालों षड्यंत्रों से इतिहास के ग्रंथ तथा लोक आख्यान भरे हैं। दिल्ली के इतिहास में रजिया सुल्तान  को कुशल प्रशासक के रूप में याद किया जाता है। शाहजहां का शासन वस्तुतः नूरजहां ही चलाती थी। 1789 में फ्रांस की राज्यक्रांति में राजा के साथ उसकी अय्याश रानी मेरी एंटोयनेट को भी मृत्युदंड दिया गया था।

महिलाओं का उपयोग राजनीति साधने में भी होता है। गांधारी का धृतराष्ट्र से और सैल्यूकस की बेटी हेलन का चंद्रगुप्त से विवाह इसीलिए हुआ था। विवाह से रिश्ते ही नहीं, राजघराने भी मजबूत होते रहे हैं। कई हिन्दू घराने अपनी बहिन-बेटियां मुस्लिम शासकों को देकर सुरक्षित हो गये; पर कई स्वाभिमानी राजाओं ने इसके बजाय लड़ना और मरना स्वीकार किया। इसीलिए लोग आज चित्तौड़ के जौहर को याद करते हैं, उन कायर राजाओं को नहीं।

पश्चिम में तो प्रभावी लोगों के संग विषकन्याओं को चिपकाने का षड्यंत्र ही चलता है। विदेश में पढ़ने वाले प्रभावी घरानों के लड़कों से उनकी दोस्ती करा दी जाती है। फिर वह पत्नी बने या कुछ और, पर उससे वे सदा दबे रहते हैं। इन महिलाओं ने भी राजनीति को प्रभावित किया है। नेहरू की लेडी माउंटबेटन तथा जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री रामचंद्र काक की विदेशी पत्नी से मित्रता थी। उनके दबाव से ही जम्मू-कश्मीर का विषय संयुक्त राष्ट्र में पहुंचा। सिक्किम के शासक की अमरीकी पत्नी ने भारत में विलय में कई बाधाएं डालीं; पर वह विफल हुई। अतः वह अपने बच्चों के साथ महल की कीमती और महत्वपूर्ण सामग्री लेकर स्वदेश चली गयी। भारत में भी कई नेताओं की पत्नियां विदेशी हैं। उनमें से कौन स्वाभाविक रूप से आयी हैं और कौन षड्यंत्रपूर्वक, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

कई राजनीतिक महिलाएं जहां एक ओर कुशल प्रशासक सिद्ध हुई हैं, वहां तानाशाही, वंशवाद और भ्रष्टाचार के मामले में भी वे कम नहीं रहीं। इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान तोड़ा; पर कांग्रेस की टूट और आपातकाल की कालिख भी उनके ही नाम दर्ज है। मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता और शशिकला के उदाहरण तो ताजे ही हैं। यहां इजराइल की गोल्डा मायर, इंग्लैंड की मार्गरेट थेचर, श्रीलंका में श्रीमाओ भंडारनायके आदि को भी याद करना होगा, जिन्होंने अपने काम से विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। 

महिलाओं की राजनीति में भागीदारी कब और कितनी हो, इस बारे में अलग-अलग राय हो सकती है; पर यह तो सच ही है कि महिलाओं को प्रकृति ने बच्चों के पालन की एक विशेष जिम्मेदारी दी है। उसे निभाते हुए, जब बच्चे मां के बिना भी रह सकें, तब उन्हें राजनीति में आना चाहिए। यदि ऐसा हो, तो फिर चुनाव में उन्हें कितने प्रतिशत स्थान मिलें, यह गौण हो जाता है। दुर्भाग्यवश इस बारे में सब दलों को जाति, वंश और मजहब के हिसाब से जिताऊ पुरुषों के घर की महिलाएं ही दिखायी देती हैं। जीतने पर उनका काम भी पुरुष ही करते हैं। इससे महिलाएं स्वयं ही दूसरे दर्जे की राजनेता बन रही हैं।


असल में राजनीति का अर्थ केवल चुनाव लड़ना ही नहीं है। सामाजिक कार्यों में भाग लेकर नीति निर्माताओं को सही निर्णय के लिए मजबूर करना भी राजनीति ही है। यदि महिलाएं इसे समझें, तो उनकी भागीदारी दस या बीस नहीं, सौ प्रतिशत हो सकती है।