बुधवार, 3 मई 2017

विपक्षी एकता की (अ)संभावनाएं

विपक्षी एकता की खिचड़ी पकाने के प्रयास फिर से हो रहे हैं। 1947 के बाद केन्द्र और राज्यों में प्रायः कांग्रेस का ही वर्चस्व रहता था। विपक्ष के नाम पर कुछ जनसंघी, तो कुछ वामपंथी ही सदनों में होते थे। 1967 में डा. राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के प्रयास से पहली बार यह खिचड़ी पकी और उत्तर भारत के कई राज्यों में कांग्रेस विरोधी दलों की संयुक्त सरकारें बनीं। तबसे ही विपक्षी एकता की बात चल पड़ी।

लेकिन तबसे गंगा-यमुना में न जाने कितना पानी बह चुका है। 1975 के आपातकाल में इंदिरा गांधी ने विपक्ष के अधिकांश तथा अपनी पार्टी के भी कुछ विद्रोही नेताओं को जेल में बंद कर दिया। वहां इन नेताओं के पास कुछ काम नहीं था। यह भी पता नहीं था कि बाहर निकलेंगे या नहीं ? ऐेसे में फिर से दिल मिलने लगे। कहते भी हैं कि दुख मिलाता है और सुख दूर करता है। अतः विपक्षी एकता की खिचड़ी फिर पकने लगी। इस बार इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

इंदिरा गांधी ने सत्ता को सदा अपने परिवार की चेरी बनाये रखने के लिए देश में तानाशाही थोपी थी; पर इसके साथ उसने संघ पर भी प्रतिबंध लगा दिया। संघ प्रत्यक्ष राजनीति तो नहीं करता; पर स्वयंसेवक उन दिनों प्रायः ‘भारतीय जनसंघ’ में सक्रिय थे, जो धीरे-धीरे कांग्रेस का स्थान ले रहा था। इंदिरा गांधी को उसकी धूर्त मंडली ने कहा कि जहां से जनसंघ को शक्ति मिल रही है, उस संघ को कुचल दो। इंदिरा गांधी ने यही किया; पर प्रतिबंध और लोकतंत्र की हत्या के विरोध में संघ ने देश भर में जन जागरण एवं सत्याग्रह किया। संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) छद्म वेष में जेल में बंद नेताओं से मिले और उन्हें साथ आने को कहा। अधिकांश नेता भयभीत थे; लेकिन 1977 में चुनाव घोषित होने पर उन्होंने साहस जुटाया और फिर जो हुआ, वह इतिहास में लिखा है।

इस विपक्षी एकता के नाम पर ‘जनता पार्टी’ बनी। इसमें परदे के पीछे संघ और परदे के आगे श्री जयप्रकाश नारायण की बड़ी भूमिका थी। लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनसंघ को भी कुछ मंत्रीपद मिले। यद्यपि उनके काम और त्याग के हिसाब से ये कम थे। जेल में सर्वाधिक लोग संघ-जनसंघ के ही थे; पर विपक्षी एकता बनाये रखने के लिए वे चुप रहे। जयप्रकाश जी को राष्ट्रपति बनने का आग्रह किया गया; पर वे नहीं माने। संघ भी संगठन और सेवा के पुराने काम में लग गया। अर्थात विपक्षी एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोग स्वयं राजनीति से बाहर ही रहे। 

पर यह विपक्षी एकता शीघ्र ही बिखर गयी। चरणसिंह और जगजीवन राम लड़ने लगे कि मंत्रिमंडल में नंबर दो कौन है ? आखिर दोनों को उपप्रधानमंत्री बनाकर राजी किया गया। फिर राजनारायण, मधु लिमये, चंद्रशेखर जैसे समाजवादियों ने जनसंघ वालों पर दबाव डाला कि वे संघ से नाता तोड़ें। कुछ मूर्ख तो संघ को ही भंग करने को कहने लगे; पर जनसंघ वालों ने साफ कह दिया कि यह संबंध मां-बेटे जैसा अटूट है। इस पर पार्टी और सरकार में खूब तकरार हुई। 

इधर इंदिरा गांधी मौका ताक रही थी। उन्होंने सत्तालोलुप चरणसिंह को दाना डाला और उन्हें प्रधानमंत्री बनाकर सरकार गिरा दी। भारत में वही एकमात्र प्रधानमंत्री हैं, जो एक भी दिन संसद नहीं गये। इसके बाद फिर चुनाव हुए। जनता पार्टी टूट चुकी थी। जनसंघ घटक ने ‘भारतीय जनता पार्टी’ बना ली। इससे विपक्षी एकता की आत्मा नष्ट हो गयी। इंदिरा गांधी ने नारा दिया कि सत्ता उन्हें दें, जो सरकार चला सकें। अतः जनता ने उन्हें बहुमत दे दिया।

यह विपक्षी एकता क्यों नहीं चली ? एक तो इसमें अधिकांश सत्ता के भूखे कांग्रेसी और झगड़ालू समाजवादी थे। असली विपक्ष तो केवल जनसंघ ही था; पर ये लोग उसके ही पीछे पड़ गये। उन्हें डर था कि संघ के जमीनी काम से जनसंघी सब ओर छा जाएंगे और भविष्य में हमारे बच्चे मुंह ही ताकते रहेंगे। दूसरा नेताओं को कुरसी के लिए लड़ता देख जयप्रकाश जी उदासीन हो गये। अतः विपक्षी एकता की दुकान बंद हो गयी।

इसके बाद विपक्षी एकता का प्रयास विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय में हुआ। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में राजीव गांधी तीन चौथाई बहुमत से प्रधानमंत्री बने; पर वे बोफोर्स की दलाली में फंस गये। इस पर वी.पी.सिंह ने विद्रोह का झंडा उठा लिया। उनके पीछे एक बार फिर सारा विपक्ष आ गया। इस बार दलों के विलय की बजाय एक मोरचा बनाया गया। इसे सफलता मिली और 1989 में वी.पी.सिंह प्रधानमंत्री बन गये।

पर वी.पी.सिंह आते ही मुस्लिम तुष्टीकरण के गीत गाने लगे। इधर विश्व हिन्दू परिषद का श्रीराम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था। उधर देवीलाल ने वी.पी.सिंह की नाक में दम कर रखा था। उससे छुटकारे के लिए वी.पी.सिंह ने मंडल कमीशन की धूल खा रही रिपोर्ट जारी कर दी। देश में आरक्षण विरोधी आग लग गयी; पर अपने ओ.बी.सी. वोट मजबूत होते देख वी.पी.सिंह खुश थे। मुस्लिम वोट के लिए उन्होंने श्रीरामरथ के यात्री लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। इससे भा.ज.पा. ने समर्थन वापस ले लिया। अब कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने; पर कुछ समय बाद कांग्रेस ने हाथ खींच लिया। 1991 में हुए नये चुनावों के बीच ही राजीव गांधी की हत्या हो गयी। उस सहानुभूति के बल पर कांग्रेस एक बार फिर जीत गयी और नरसिंहराव प्रधानमंत्री बन गये। विपक्षी एकता की पतीली फिर चूल्हे से उतर गयी।

यहां भी बात वही थी कि विपक्षी एकता की बात करने वालों का असली उद्देश्य कांग्रेस को हटाना नहीं, बल्कि खुद प्रधानमंत्री बनना था; और ऐसे लोग कई थे। इसलिए कांग्रेस के हटते ही ये आपस में लड़ने लगते थे। 

कुछ ऐसा ही माहौल इस समय भी है। अब भा.ज.पा. और नरेन्द्र मोदी की दुंदुभि बज रही है। अतः इनके विरोध की हांडी चढ़ाने का प्रयास हो रहा है; पर क्या इनके पास नानाजी देशमुख और जयप्रकाश नारायण जैसे सत्ता को ठुकराने वाले लोग हैं ? क्या सबको जोड़ने में अदृश्य गोंद की भूमिका निभाने वाला संघ जैसा कोई सेवाभावी संगठन है ? परिदृश्य तो उल्टा ही है। मृतप्रायः कांग्रेस के मालिक राहुल बाबा प्रधानमंत्री पद पर अपना पुश्तैनी हक समझते हैं। उधर नीतीश कुमार बिहार की जीत से खुद को असली दावेदार मानने लगे हैं। दावा तो अरविंद केजरीवाल का भी था; पर इन दिनों उनकी झाड़ू ही टूट के कगार पर है।

कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है; पर अभी तो विपक्षी एकता का प्रयास असंभावनाओं का तमाशा ही लगता है।