शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

कूड़ाघर बनता भारत

दिल्ली से उ.प्र. की सीमा में प्रवेश करते समय गाजियाबाद से कुछ पहले, सीधे हाथ पर गाजीपुर में बना कूड़े का पहाड़ सबको दिखता है। इतना ही नहीं दुर्गंध के कारण वह महसूस भी होता है। उड़ती हुई चीलें, कौए और कूड़े के पहाड़ में से अपने काम की चीजें तलाशते बच्चे वहां हर दिन ही दिखायी देते हैं। ये बच्चे ऐसी चीजें बटोरते हैं, जो कबाड़ी के पास बिक सकें। प्रायः ये बच्चे नंगे हाथ-पैर, केवल कच्छा और बनियान पहने इस खतरनाक काम में लगे रहते हैं। 

इस कचरे के सड़ने से गैस बनती है, उससे बचने को वहां से गुजरने वाले अपनी कार के शीशे चढ़ा लेते हैं। बस, पैदल या अन्य यात्री नाक पर हाथ रख लेते हैं। इसके बाद वे दिल्ली सरकार या गाजियाबाद नगर निगम और उ.प्र. की सरकार पर लानत भेजते हैं। कूड़ा बटोरने वाले निर्धन और अनाथ बच्चे वहीं बैठकर बीड़ी-सिगरेट पीते हैं। इससे उस कूड़े के ढेर में कई बार आग लग जाती है। 

अखबारों में यह कई बार छपा कि इसकी ऊंचाई लगातार बढ़ते हुए अपनी निर्धारित सीमा से बहुत आगे निकल गयी है। ऐसे में कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है; पर किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया। पिछले एक सितम्बर को यह कूड़े का पहाड़ गिर गया। कुछ लोग इसमें दब कर मर गये। कुछ वाहन कूड़े के धक्के से पास की नहर में जा गिरे। इससे दिल्ली और अन्य नगरों का कूड़ा और इसका निस्तारण चर्चा का विषय बन गया।

सच तो यह है कि कूड़ा आज हर नगर के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है। इसका मुख्य कारण हमारी वर्तमान जीवन शैली है। पहले विवाह के दहेज में सिलाई मशीन अनिवार्य चीज थी। जीवन में सादगी थी। अतः महिलाएं घर पर ही बड़ों के पुराने कपड़ों से बच्चों के छोटे कपड़े बना लेती थीं। कुछ कपड़ों को जोड़-तोड़ कर बच्चों के बस्ते तथा बाजार से सामान लाने के थैले बन जाते थे। दोपहर की गप्प गोष्ठी में पड़ोसी महिलाओं से नये डिजाइन मिल जाते थे; पर अब वह समय टी.वी. और मोबाइल ने छीन लिया है। अतः अब हर चीज रैडिमेड है। 

पैकिंग में प्लास्टिक का उपयोग बढ़ रहा है। यद्यपि प्लास्टिक ने जीवन को सरल बनाया है। उसके कारण करोड़ों पेड़ कटने से बचे हैं; पर सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि ये नष्ट नहीं होता और इसके कारण किसी चीज के बार-बार उपयोग की आदत समाप्त हो गयी है। परिणाम है हर गली में लगा कूड़े का ढेर।

यद्यपि समय की घड़ी उल्टी नहीं घुमायी जा सकती; लेकिन ‘पुरानी नींव नये निर्माण’ की तर्ज पर कहीं न कहीं संतुलन जरूर बनाना पड़ेगा। नहीं तो कूड़े जैसी बेकार लगने वाली चीज ही समस्या बन जाएगी। इन दिनों कूड़े से सड़क और पैट्रोल आदि बनाने की बात प्रायः सुनने और पढ़ने में आती है; पर ये प्रयोग अभी सर्वव्यापी नहीं हो सके। अर्थात किसी न किसी स्तर पर ये अव्यावहारिक हैं। इसलिए कूड़े के निस्तारण का कुछ और ही उपाय सोचना होगा।

घरों से कूड़ा एकत्र करने के लिए प्रायः सभी नगरों में कूड़ा गाड़ियां घूमती हैं। वे इसके लिए कुछ शुल्क वसूलती हैं। फिर वे यह कूड़ा शहर से कहीं दूर डाल देती हैं; पर जहां भी ये कूड़ा डलता है, वहां के लोग इसका विरोध करते हैं। क्योंकि कुछ ही दिन में वहां कुत्ते, बिल्ली, चूहे, कौए और चील जैसे मांसाहारी जीवों का डेरा लगने लगता है। कूड़े की दुर्गंध और उससे होने वाले रोग भी परेशान करते हैं। 

गली या मोहल्ले में जहां सरकारी कूड़ेदान रखे जाते हैं, वहां का भी बुरा हाल हो जाता है। यद्यपि जैविक (फल और सब्जी के छिलके, बासी भोजन, घास, पत्ते जैसे गीले) और अजैविक (बोतल, कपड़ा, धातु की चीजें, धूल, मिट्टी जैसे सूखे कूड़े) के लिए अलग कूड़ेदान होते हैं; पर लोगों का स्वभाव उन्हें अलग रखने का नहीं है। वे घर से प्लास्टिक की थैलियों में सारा कूड़ा एक साथ लाते हैं। फिर उसे बाजार या दफ्तर जाते समय उनमें से किसी में भी फेंक देते हैं। प्रायः वे इसके लिए स्कूटर या कार से उतरते भी नहीं हैं। भूमिगत कूड़ेदानों के मुंह पर भी कूड़ा बिखरा रहता है।

कुछ देशों में प्रशासन लोगों को कई रंग की बड़ी थैलियां देता है। उसमें लोग कूड़े को अलग-अलग रखकर निर्धारित दिन आने वाली कूड़ागाड़ी में डालते हैं। भारत में भी ऐसी व्यवस्था बनी है; पर हम अपनी आदत से मजबूर हैं। वस्तुतः आजादी के बाद हमें अपने अधिकार तो बताये गये; पर कर्तव्यों की चर्चा नहीं हुई। राजनेताओं ने कहा कि तुम हमें वोट दो और पांच साल के लिए सो जाओ। इसीलिए सब ओर अव्यवस्था दिखायी देती है। कूड़े की समस्या भी उनमें से एक है।

इसलिए यदि कूड़े से बचना है, तो यथासंभव मूल स्थान पर ही इसे निबटाना होगा। केन्द्रीकरण हर समस्या का निदान नहीं है। इस नाम पर हम अपनी समस्या आगे खिसका देते हैं। घरेलू कूड़ा गली में, गली का मोहल्ले में और वहां का नगर निगम से होकर गाजीपुर जैसे कूड़ापहाड़ में। इसलिए सबसे पहली बात तो ये है कि कूड़ा निकले ही कम। अतः बार-बार प्रयोग होने वाली चीजें काम में लाने की आदत डालनी होगी। कपड़े का थैला इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं। यदि घर पर न भी बने, तो बाजार में कपड़े या जूट के थैले मिलते हैं, जो कई महीने तक चल जाते हैं।

फल, सब्जी, बासी भोजन, किचन गार्डन या क्यारी की बेकार घास, पत्ते, फूल, गाय या भैंस जैसे दुधारु पशु के मल और मूत्र आदि से घर में ही जैविक खाद बना सकते हैं। कोलतार जैसे ड्रम के आकार वाले इसके यंत्र अब बनने लगे हैं। इससे रसोई के लिए उपयोगी गैस भी मिलती है। जहां बिजली नहीं है, वहां इससे प्रकाश भी कर सकते हैं। इस संयंत्र के प्रयोग के लिए जन जागरण के साथ ही कुछ सख्ती भी होनी चाहिए। इसके कारोबार में भी काफी गुंजाइश है। यदि कोई व्यापारी बुद्धि का युवा इस ओर ध्यान दे, तो कुछ साल में ही हर नगर में केबल की तार और डिश टी.वी. जैसा इसका भी संजाल फैल सकता है। इससे बिजली और रसोई गैस का खर्च बचेगा और कूड़े से भी मुक्ति मिलेगी। यानि एक पंथ कई काज।

आजकल बड़ी संख्या में बहुमंजिला कालोनी और अपार्टमेंट बन रहे हैं। इसकी अनुमति देते समय शासन यह देखे कि वहां के कूड़े का वहीं निस्तारण हो। जब वहां बिजली, पानी, पार्क, तरणताल, क्लब, सुरक्षा आदि की व्यवस्था होती है, तो कूड़े की भी हो सकती है। सभी फैक्ट्रियों, विद्यालयों, धार्मिक स्थलों आदि पर भी ये नियम लागू हों। अर्थात विकेन्द्रीकरण से इस समस्या के समाधान में सहयोग होगा।

नरेन्द्र मोदी द्वारा चलाये गये ‘स्वच्छता अभियान’ का असर अभी बहुत कम है। ये तभी सफल होगा, जब हमारे दिमाग साफ होंगे। अतः कूड़े के प्रति हमें अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। तभी गाजीपुर जैसी दुर्घटनाएं बंद हो सकेंगी।

सोमवार, 4 सितंबर 2017

पैसे और परिवार में संतुलन जरूरी

इन दिनों मीडिया में इंटरनेट के माध्यम से स्मार्ट फोन या कम्प्यूटर पर खेले जाने वाले खेल ‘ब्लू व्हेल’ की बहुत चर्चा हो रही है। इस खेल ने अब तक भारत में कई बच्चों की जान ले ली है। विदेश के आंकड़े उपलब्ध नहीं है; पर निःसंदेह वहां यह संख्या कुछ अधिक ही होगी। इसके स्वरूप के आधार पर इसे खेल कहना बिल्कुल अनुचित है। फिर भी इसने सब बच्चों के अभिभावकों को चिंतित जरूर कर दिया है।

इस हिंसक खेल में बच्चों को 50 दिन में 50 कठिन काम करने होते हैं। इन्हें करते हुए वह अपनी बांह पर कुछ निशान लगाता है। इससे धीरे-धीरे वहां व्हेल मछली का चित्र बनने लगता है। इसका अंतिम काम आत्महत्या है। छोटे और भोले बच्चे क्रमशः इसके जाल में फंसते हुए अंततः आत्महत्या कर लेते हैं। सुना है कि भारत और अन्य कई देशों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है तथा इसके रूसी निर्माता को गिरफ्तार कर लिया है।

ये खेल तो शायद आज या कल बंद हो जाए; पर ऐसा कोई दूसरा खेल फिर शुरू नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है; पर इसकी चर्चा से जिस समस्या की ओर लोगों का ध्यान गया है, वह है बच्चों का अकेलापन। यह कैसे हो सकता है कि घर में मां-बाप और भाई-बहिनों के रहते हुए भी किसी को ये पता न लगे कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है ? इसका अर्थ है समस्या कहीं और है।

असल में पिछले 25-30 साल में हमारे समाज में कई परिवर्तन  हुए हैं। सम्पन्नता बढ़ी है तथा शहरीकरण की अति के चलते संयुक्त परिवार टूटे हैं। कैरियर के चक्कर में विवाह देर से होने लगे हैं। तलाक भी खूब होने लगे हैं। पति-पत्नी दोनों के कामकाजी होने से बच्चों की संख्या घटी है। शिक्षा, विवाह और चिकित्सा महंगे हुए हैं। मोबाइल जैसे उपकरण सर्वसुलभ हुए हैं; पर इनसे जहां अनेक सुविधाएं मिली हैं, तो अकेलापन, अवसाद, रक्तचाप, मधुमेह जैसे रोग भी तेजी से बढ़े हैं। यह इस सिक्के का दूसरा पहलू है। इसी की चरम परिणिति आत्महत्या है। 

आजकल समाज में मोटा पैसा कमाने वाले ही सफल माने जाते हैं। भले ही वे सही-गलत कुछ भी करें। जनसंख्या तो बढ़ी है; पर कम्प्यूटर के कारण नौकरियां घटी हैं। अतः उनके लिए मारामारी अधिक है। किसानों के बच्चे भी अब खेती करना नहीं चाहते। महीने में कई लाख रु. कमाने वाले व्यापारियों के बच्चे भी एक लाख रु. की नौकरी के पीछे भाग रहे हैं। नौकरी की इस होड़ के चलते हर बड़े शहर में कैरियर संस्थान खुल गये हैं, जहां बच्चों को सफलता के शिखर पर पहुंचाने का दावा किया जाता है; पर हर बच्चा तो वहां नहीं पहुंच सकता। परिणाम वही शारीरिक और मानसिक रोग।

इसे विचारों का पीढ़ीगत अंतर भी कह सकते हैं; पर क्या यह सच नहीं है कि 25-30 साल पहले लोग अभावों के बावजूद अधिक सुखी थे। तब अवसाद, रक्तचाप, मधुमेह या आत्महत्या जैसे रोग बहुत कम थे। क्योंकि व्यक्ति के जीवन में परिवार का महत्व था। लोग आपस में खूब बातें करते थे, जबकि अब महत्व केवल पैसे का है। समस्या की जड़ यही है।

आज से 30-40 साल पहले तक परिवार प्रायः संयुक्त तथा हर दम्पति के चार-पांच बच्चे भी होते थे; पर अब सम्पन्नता के बावजूद यह संख्या कहीं दो से आगे नहीं है। कुछ लोग ये कहकर एक से ही संतोष कर ले रहे हैं कि इसे ही ठीक से पढ़ा लें। पता नहीं ये कहां और कैसी नौकरी करेगा ? ऐसे में यदि पैसा पास में होगा, तभी बुढ़ापा ठीक से कटेगा। इसलिए लोग आज के साथ ही कल के लिए भी भरपूर पैसा बचा लेना चाहते हैं। यद्यपि जनसंख्या की अति का समर्थन नहीं किया जा सकता; पर इसकी कमी भी ठीक नहीं है। 

संयुक्त और मध्यम आकार के परिवार के कई लाभ थे। छोटी-मोटी बीमारी दादी के नुस्खों से ही ठीक हो जाती थीं। महिलाएं घर या बाहर कहीं व्यस्त हैं, तो बुजुर्गों के संरक्षण में बच्चे सुरक्षित रहकर खेलते या पढ़ते रहते थे। बड़े बच्चे भी छोटों को संभाल लेते थे। इस तरह संयुक्त परिवार सेफ्टी वाल्व का काम करते थे; पर इनके अभाव में बच्चे हों या बड़े, सब टी.वी., मोबाइल या कम्प्यूटर की शरण में हैं। 

फेसबुक के निर्माता और दुनिया के शीर्ष धनपति मार्क जुकरबर्ग के अनुसार उसके अभिभावकों ने 12 साल का होने तक उसे कम्प्यूटर नहीं दिया और वह भी अपने बच्चों के साथ यही करेगा। ऐसा कहने वाले जुकरबर्ग की बुद्धिमत्ता पर संदेह का कोई कारण नहीं है। पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए वोट मांगते समय अमरीकी परिवार बचाने के लिए प्रयास करने का वायदा किया था। स्पष्ट है कि परिवार का महत्व अब विदेशी भी समझ रहे हैं।

महिलाएं नौकरी करें या नहीं, और करें तो कब करें, इस पर मतभिन्नता हो सकती है; पर प्रकृति ने उन्हें संतानोत्पत्ति और उनके पालन की विशेष जिम्मेदारी दी है, जिसे पुरुष नहीं कर सकते। इसकी उपेक्षा घातक हो सकती है। इन दिनों पुरुष भी काफी व्यस्त हो गये हैं। बड़े शहरों में आने-जाने में ही कई घंटे लग जाते हैं। पहले बाजार में साप्ताहिक बंदी होती थी। बच्चे इसकी प्रतीक्षा करते थे, जिससे पिता के साथ समय बिता सकें; पर सरकार चाहती है कि पश्चिमी देशों की तरह बाजार सातों दिन और 24 घंटे खुलें। इससे व्यापार, बिजली का खर्च और रात्रिकालीन अपराध कितने बढ़ेंगे, ये तो पता नहीं; पर परिवार जरूर बरबाद हो जाएंगे। यहां हमें अमरीका की बजाय भूटान का अनुसरण करना होगा, जहां प्रगति का आधार ‘खुशहाली इंडैक्स’ को बनाया गया है।

पैसे और परिवार का ये संघर्ष हमारे समाज की नयी परिघटना है। इसमें कौन जीतेगा, ये कहना कठिन है। लोग कोल्हू के बैल बनकर बच्चों के लिए पैसा कमाते हैं; पर इस चक्कर में उनकी आपस में कई दिन तक बात ही नहीं होती। बुजुर्ग तो जैसे-तैसे समय गुजार लेते हैं; पर बच्चे इस अकेलेपन को नहीं झेल पाते। ऐसे में उनका साथी बनता है कम्प्यूटर, मोबाइल और ‘ब्लू व्हेल’ जैसे घातक खेल।

मेरे पड़ोस में कई कोचिंग केन्द्र हैं। वहां दिन भर भीड़ लगी रहती है। युवाओं को देखकर अच्छा लगता है; पर जब एक दुपहिये पर तीन (और कभी-कभी चार) लड़के-लड़कियां अशालीन कपड़ों में फंसे दिखते हैं, तो आंखें झुक जाती हैं। सिगरेट पीना वहां आम बात है। शनिवार की शाम, गली की आड़ में प्रायः पीना-पिलाना और इससे आगे भी बहुत कुछ हो जाता है। ऐसे में कुछ कहना भी खतरे से खाली नहीं है।

गांव और छोटे नगरों के हजारों युवा कोचिंग के लिए कमरे किराये पर लेकर या छात्रावासों में रहते हैं। अभिभावक सोचते हैं कि हम उन्हें पढ़ाकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं; पर उन्हें पता ही नहीं लगता कि उनके बच्चे किससे दोस्ती कर रहे हैं ? इसमें से ही ‘लव जेहाद’ जैसी दुर्घटनाएं भी हो रही हैं, जिससे प्रायः साम्प्रदायिक तनाव और दंगे हो जाते हैं।

यद्यपि कैरियर और पैसे के महत्व को नकारा नहीं जा सकता; पर इन दोनों में संतुलन जरूरी है। ऐसा न हो कि जिनके लिए पैसा कमा रहे हैं, वे ही हाथ से निकल जाएं। तब सिर पकड़कर यही कहना होगा, ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाले सनम; न इधर के रहे न उधर के रहे।’’

इस संतुलन के लिए समाजशास्त्री कुछ सूत्र बताते हैं। इनके सपरिवार पालन से किसके मन में क्या चल रहा है, ये पता लगेगा। कोई समस्या होगी, तो ‘ब्लू व्हेल’ जैसे विस्फोट से पहले ही उसका समाधान हो जाएगा। ये सूत्र हैं - 1. रात का भोजन 2. अपने इष्ट की साप्ताहिक पूजा 3. मासिक मनोरंजन 4. वार्षिक तीर्थयात्रा।

कई लोगों ने इनके प्रयोग से घर की खुशियां बढ़ाई हैं। आप भी करके देखें।