शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

रोहिंग्या मुसलमान : समस्या और समाधान

रोहिंग्या मुसलमान इन दिनों केवल भारत ही नहीं, तो बंगलादेश के लिए भी सिरदर्द बन गये हैं। ये लोग मूलतः बंगलादेशी ही हैं, जो बर्मा के सीमावर्ती क्षेत्र में रहते हैं। काम-धंधे के लिए बर्मा आते-जाते हुए हजारों परिवार वहां के अराकान या रखाइन क्षेत्र में बस गये, जो आज लाखों हो गये हैं। 

आज तो भारत, बंगलादेश और बर्मा अलग-अलग देश हैं; पर 1935 तक भारत, बर्मा और श्रीलंका का एक ही गर्वनर जनरल (वायसराय) होता था। ब्रिटिश संसद ने ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935’ से इन्हें अलग किया; पर लम्बे समय से वहां रहने के बावजूद बर्मा इन्हें अपना नागरिक नहीं मानकर अब निकाल रहा है। इसी से यह संकट उत्पन्न हुआ है। इसका कारण ये है कि कबीलाई जीवन होने के कारण हिंसा, लड़कियां उठाना और दूसरों के धर्मस्थल तोड़ना इनकी स्वाभाविक वृत्ति है।  

बर्मा एक बौद्ध देश है। बौद्ध समुदाय अहिंसक और शांतिप्रिय है। काफी समय से वे लोग इनके उपद्रव सह रहे थे; पर जब पानी सिर से ऊपर हो गया, तो उन्हें लगा कि अब भी यदि चुप रहे, तो हम अपने देश में ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे। फिर हमारी दशा ऐसी ही होगी, जैसी बंगलादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं की है। अतः कुछ लोग शस्त्र लेकर इनं पर पिल पड़े। इनके नेता हैं मांडले के बौद्ध भिक्षु आशिन विराथु। वे पिछले 15 साल से इसमें लगे हैं। यद्यपि इसके लिए उन्हें 25 साल की सजा भी हुई; पर जनता के दबाव में सरकार को इन्हें सात साल बाद ही छोड़ना पड़ा। बाहर आकर ये फिर उसी काम में लग गये हैं।

पांचजन्य 1.10.2017 के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने रोहिंग्याओं को जापान के विरुद्ध लड़ने को शस्त्र दिये थे। उन्होंने कहा कि जीतने पर वे रोहिंग्याओं के लिए एक अलग मुस्लिम देश बना देंगे; लेकिन शस्त्र पाकर वे हिन्दुओं और बौद्धों का संहार करने लगे। केवल एक ही दिन (28.3.1942) में उन्होंने 20 हजार बौद्धों को मार डाला। हत्या और हिंसा का यह तांडव आगे भी चलता रहा। 

1946 में स्वतंत्र होते ही बर्मा की सेना ने इनके विरुद्ध कार्यवाही कर इनकी कमर तोड़ दी। अतः ये शांत हो गये; पर 1971 में बंगलादेश बनने पर कई आतंकी समूह बनाकर ये फिर सक्रिय हो गयेे। दुनिया के अधिकांश मुस्लिम देशों ने इन्हें समर्थन और पड़ोसी बंगलादेश ने इन्हें शस्त्र दिये। इस प्रकरण के बाद आशिन विराथु सक्रिय हुए। 28.5.2012 को एक बौद्ध महिला के बलात्कार एवं हत्या से पूरा देश भड़क उठा और फिर हर बौद्ध विराथु का समर्थक बन गया।

बर्मा की राष्ट्रपति आंग सान सू की नोबेल विजेता एवं मानवाधिकारवादी हैं; पर बर्मा का जमीनी सच देखकर उन्होंने भी रोहिंग्याओं को कहा है कि वे या तो शांति से रहें या कोई दूसरा देश देख लें। बर्मा में सेना को अनेक शासकीय अधिकार भी हैं। उनकी इच्छा के बिना संसद कुछ नहीं कर सकती। सेना रोहिंग्याओं को सबक सिखाना चाहती है। अतः वह इन्हें खदेड़ रही है। इससे ये यहां-वहां भाग रहे हैं। बंगलादेश के मूल नागरिक और वहां रिश्तेदारी होने से अधिकांश लोग वहीं जा रहे हैं। कुछ समुद्री मार्ग से सऊदी अरब, यू.ए.ई. पाकिस्तान, थाइलैंड, मलयेशिया, इंडोनेशिया आदि में भी गये हैं। भारत में इनकी संख्या 40,000 से चार लाख तक कही जाती है। 

भारत में जो रोहिंग्या हैं, वे हर जगह अपने स्वभाव के अनुसार आसपास की खाली सरकारी जगह घेरकर मस्जिद और मदरसे आदि बना रहे हैं। हर दम्पति के पास छह-सात बच्चे भी हैं। अतः उनके आवास के पास गंदगी रहती है। सघन बस्तियों में उन्होंने कुछ दुकानें भी बना ली हैं। कुछ लोग मजदूरी आदि करने लगे हैं। इससे जहां एक ओर भारतीय संसाधनों पर बोझ बढ़ रहा है, वहां वे भारतीयों का रोजगार भी छीन रहे हैं। अर्थात जो स्थिति बंगलादेशी घुसपैठियों की है, वही क्रमशः इनकी हो रही है। अतः विस्फोटक होने से पहले ही समस्या सुलझानी होगी।

लेकिन ये हो कैसे ? सर्वप्रथम तो दुनिया के सब मुस्लिम देश अपने मजहबी भाइयों को गले लगायें। वे दो-चार हजार करके इन्हें आपस में बांट लें। भारत उन्हें वहां तक पहुंचा दे। या फिर ये सब हिन्दू या बौद्ध हो जाएं। भारत एक हिन्दू देश है। बौद्ध मत भी विशाल हिन्दू धर्म का ही अंग है। इससे भारतीयों की स्वाभाविक सहानुभूति उन्हें मिलेगी। मंदिर जाने से उनकी हिंसा और उग्रता घटेेगी। 20-30 साल में वे अपने कुसंस्कारों से मुक्त हो जाएंगे। दिल्ली में कुछ रोहिंग्या चर्च का आर्थिक और सामाजिक सहयोग पाने को ईसाई हो गये हैं। जब वे ईसाई हो सकते हैं, तो अपने पुरखों के पवित्र हिन्दू धर्म में भी आ सकते हैं। 

दूसरा रास्ता उन्हें निकालने का है। यह बात कई केन्द्रीय मंत्रियों ने कही है; पर ये आसानी से तो जाएंगे नहीं। सरकार तो कई पार्टियों की बनीं; पर आज तक बंगलादेशी घुसपैठिये वापस नहीं भेजे गये। जो बात तब सच थी, वो आज भी सच है। इसलिए सेक्यूलरों के शोर पर ध्यान न देकर सख्ती करनी होगी। भारत सरकार इन्हें पकड़कर सौ-सौ के समूह में नौकाओं में बैठा दे। मानवता के नाते साथ में कुछ दिन का खाना, पानी और बच्चों के लिए दूध आदि रखकर इन्हें भारतीय समुद्री सीमा के पार छोड़ दिया जाए। फिर जहां इनकी किस्मत इन्हें ले जाए, ये वहीं चले जाएं।

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

रोहिंग्या शरणार्थी और सद्गुण विकृति

इन दिनों भारत में चर्चा गरम है कि बर्मा से आये रोहिंग्याओं को शरण दें या नहीं ? कुछ सेक्यूलरवादी पुरोधा इसके समर्थन में न्यायालय में भी गये हैं। इनका तर्क है कि भारत में सदा से ही शरणागत के संरक्षण की परम्परा रही है। अतः इस बार भी इसका पालन होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी फिलहाल इन्हें निकालने पर रोक लगा दी है।

भारतीय धार्मिक साहित्य में राजा शिबि की कथा आती है। कहते हैं कि एक बार वे दरबार में बैठे थे कि एक भयभीत कबूतर आकर उनकी गोद में छिप गया। उसके पीछे एक बाज भी आ गया। बाज ने राजा से कबूतर वापस मांगा। राजा ने यह कहकर मनाकर दिया कि शरणागत की रक्षा मेरा धर्म है। बाज ने कहा कि कबूतर उसका आहार है और उसका आहार छीनना भी अधर्म है। राजा ने उसे किसी और पशु-पक्षी का मांस देना चाहा, तो बाज ने कहा कि कबूतर को बचाने के लिए किसी और को मारना भी तो अधर्म ही है।

राजा बड़े असमंजस में पड़ गया। अंततः सहमति इस पर हुई कि वह कबूतर के भार के बराबर अपना मांस दे दे। अतः तराजू के एक पलड़े में कबूतर और दूसरे में राजा अपना मांस रखने लगा; पर आधे से अधिक शरीर का मांस चढ़ने पर भी कबूतर वाला पलड़ा नीचे रहा। अतः राजा स्वयं पलड़े में बैठ गये। ऐसा होते ही पलड़ा झुक गया। आकाश से फूल बरसने लगे। कबूतर और बाज भी अपने असली रूप में आ गये। वे राजा की परीक्षा लेने आये इंद्र और अग्निदेव थे। ऐसी ही कथा श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप की भी है, जिन्होंने नंदिनी गाय की रक्षा के लिए सिंह के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया था। 

शरणागत की रक्षा के कुछ ताजे प्रसंग और भी हैं। दो अक्तूबर 1996 को ग्राम सामतसर (चुरू, राजस्थान) के निहालचन्द बिश्नोई ने शिकारियों की गोली से घायल एक शरणागत हिरण की प्राणरक्षा में अपनी जान दे दी। 1999 में राष्ट्रपति महोदय ने उन्हें मरणोपरान्त ‘शौर्य चक्र’ से सम्मानित किया। जनसत्ता 1.5.2004 के अनुसार जिला जैसलमेर, राजस्थान के हरिसिंह राजपुरोहित ने शिकारियों से तीतर को बचाने के लिए अपने प्राण दे दिये। इंडिया टुडे 6.6.2005 के अनुसार जिला सुरेन्द्रनगर (गुजरात) के मुली कस्बे में गत 600 साल से वीर सोधा परमारों की याद में मेला होता है। यहां शरणागत घायल तीतर की रक्षार्थ सोधा और चाबड़ों में युद्ध हुआ था। इसमें 200 सोधा और 400 चाबड़ मारे गये थे। 

ये प्रसंग बताते हैं कि भारत में शरणागत की रक्षा की सुदीर्घ परम्परा है; पर इसका पालन विदेशी और विधर्मी के साथ करें या नहीं, यह भी विचारणीय है। क्योंकि यहां प्रश्न देश-रक्षा का भी है, जिसके सामने निजी प्रतिज्ञा या सम्मान बहुत छोटी चीज है। पहले देश, बाद में सब कुछ; पर कुछ लोगों ने देश और धर्म की बजाय निजी, जातीय या क्षेत्रीय सम्मान को महत्व दिया, जिससे आगे चलकर बहुत हानि हुई। वीर सावरकर ने इसे ही ‘सद्गुण विकृति’ कहा है। राजस्थान के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं।

पंडित चंद्रशेखर पाठक कृत ‘पृथ्वीराज’ के अनुसार गजनी का सुल्तान मोहम्मद गौरी और उसका चचेरा भाई मीर हुसेन दोनों एक वेश्या ‘चित्ररेखा’ के आशिक थे। मीर हुसेन इसे भगाकर भारत ले आया। उसकी याचना पर नागौर में शिकार खेल रहे पृथ्वीराज ने उसे शरण दे दी। साथ ही हिसार और हांसी की जागीर देकर उसे दरबार में अपने दाहिने हाथ की ओर बैठने का सम्मान भी दिया। पता लगने पर मो. गौरी ने इन्हें वापस मांगा; पर शरणागत रक्षक पृथ्वीराज नहीं माने। इसका दुष्परिणाम क्या हुआ, यह सबको पता है। कहते हैं कि पृथ्वीराज और गौरी के बैर का यही मुख्य कारण था।

पृथ्वीराज चौहान के वंशज और रणथंभौर के शासक हमीरदेव ने भी अलाउद्दीन खिलजी के एक विद्रोही सेनानायक मीर मोहम्मद शाह और उसके कुछ साथियों को शरण दी थी। शाह कुछ समय पहले ही मुसलमान बना था तथा अलाउद्दीन से उसके मतभेद का कारण गुजरात की लूट का बंटवारा था। इस कारण अलाउद्दीन और हमीरदेव में युद्ध हुआ। हमीरदेव, उनका पूरा परिवार, सेना और राज्य बलि चढ़ गया; पर वे पीछे नहीं हटे। तभी से ये कहावत प्रसिद्ध है - 

सिंह गमन, सत्पुरुष वचन, कदली फले इक बार
तिरया तेल, हमीर हठ, चढ़े न दूजी बार।

मेड़ता के शासक राव जयमल एक समय अकबर के मित्र थे। कई युद्धों में दोनों ने एक-दूसरे का साथ दिया; पर जब जयमल ने अकबर के एक विद्रोही सेनापति सर्फुद्दीन को शरण दी, तो उनके संबंध बिगड़ गये। अतः अकबर ने मेड़ता पर हमलाकर जयमल को भागने पर मजबूर कर दिया। जयमल को मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने शरण देकर बदनौर की जागीर प्रदान की। इससे अकबर मेवाड़ पर चढ़ गया। इस युद्ध में अकबर की सेना से लड़ते हुए जयमल मारा गया। उसके पुत्र कुंवर शार्दूल सिंह ने भी सर्फुद्दीन की रक्षा में वीरगति पायी, जब वह उसे नागौर से मेड़ता ला रहा था। कहते हैं, तभी से अकबर के मन में मेवाड़ राज्य के प्रति स्थायी शत्रुता के बीज पड़े। यह संघर्ष आगे महाराणा प्रताप के काल में भी जारी रहा।

इन प्रसंगों का निष्कर्ष बस इतना ही है कि यदि हिन्दू राजाओं ने शरण देते समय विदेशी और विधर्मियों की मानसिकता का ध्यान रखा होता, तो उन्हें और भारत को इतने दुर्दिन नहीं देखने पड़ते। ‘‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पायी..’’ ऐसी ही गलतियों के लिए कहा गया है।

यद्यपि भारत में शरण और भी कई समुदायों ने ली है। अपनी पुण्यभूमि छूटने के बाद यहूदी दुनिया भर में भटके। हर जगह उन्हें ठोकरें मिलीं। अपवाद रहा तो बस भारत। यहां उन्हें शरण भी मिली और प्रेम भी; पर वे यहां रच-बस गये। अतः संख्या में बहुत कम होते हुए भी उनका योगदान सराहनीय है। 1971 युद्ध के एक नायक जनरल जैकब यहूदी ही थे।

यही इतिहास पारसियों का है। जब वे विस्थापित होकर भारत आये, तो उनका भी स्वागत हुआ। वे यहां दूध में शक्कर जैसे घुलमिल गये। अतः मानेकशा, टाटा, नरीमन, सोहराबजी, गोदरेज आदि सैकड़ों नाम आज भारत के गौरव हैं। दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बती, श्रीलंका से तमिल और बंगलादेश से चकमा बौद्ध भी शरणार्थी होकर भारत आये हैं; पर इनके कारण भारत को कभी समस्या नहीं हुई।

लेकिन शरणार्थी के नाम पर बंगलादेश से आये मुस्लिम घुसपैठियों को देखें। ये हमारा रोजगार छीन रहे हैं तथा जहां भी हैं, वहां कानून-व्यवस्था के लिए समस्या बने हैं। दिल्ली और उसके आसपास सम्पन्न घरों में सफाई आदि करने वाली मुन्नी, चुन्नी, बबली, बेबी, सोना, गुड्डी आदि नामधारी लाखों महिलाएं बंगलादेशी हैं। वे खुद को बंगलादेश से लगे बिहार के पूर्णिया जिले की कहती हैं। पूर्णिया में बंगला आसानी से बोली और समझी जाती है; पर उनके पति, बच्चों और निवास आदि के बारे में थोड़ा गहराई से पूछें, तो असलियत पता लग जाती है। पुरुष मजदूरी और रिक्शाचालन, तो बच्चे कूड़ा-संग्रह और चोरी-उठाईगीरी में लगे हैं। वोट के लालची नेताओं ने उनके वोट, आधार और राशन कार्ड बनवा दिये हैं। इससे वे यहां के नागरिक हो गये हैं। गत 12 जुलाई, 2017 को नौएडा की ‘महागुण सोसायटी’ में घरेलू कामगार महिला के साथियों द्वारा किया गया पथराव किसी से छिपा नहीं है।

इस संदर्भ में रोहिंग्या मुसलमानों पर विचार करें। आज उनकी संख्या 40 हजार हो या चार लाख; पर कल जब वे बंगलादेशियों की तरह यहां जम जाएंगे, तब क्या होगा ? अतः निष्कर्ष स्पष्ट है कि इन्हें शरण देना भारत के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए घातक है।