शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

भारी धुंध और गोवंशीय खेती

इन दिनों दिल्ली और पूरा उत्तर भारत भारी धुंध से परेशान है। प्रशासन ने कई जगह अगले आदेश तक छोटे बच्चों के स्कूल बंद करा दिये हैं। सांस तथा फेफड़े के मरीजों को विशेष सावधानी रखने तथा अधिकाधिक तरल पदार्थ लेने को कहा जा रहा है। सुबह टहलने जाने वालों को भी कुछ दिन घर पर ही रहने की सलाह दी गयी है। अनेक सार्वजनिक कार्यक्रम निरस्त किये जा रहे हैं।

आजकल टी.वी. पर जो समाचार आ रहे हैं, उनमें हजारों लोग मुंह पर रूमाल या कपड़े का मास्क लगाये दिखते हैं। कई तरह के छोटे, बड़े और सुंदर डिजायनों वाले मास्क भी बाजार में खूब बिकने लगे हैं। धुंध से बड़ी संख्या में सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं। रेलगाड़ियां अत्यधिक देरी से चल रही हैं। हवाई सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। अतः सरकारी कामकाज भी ढीला पड़ गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी पुरानी आदत के अनुसार इसका दोष हरियाणा और पंजाब की सरकारों पर मढ़ दिया है। उनका कहना है कि वहां के किसान खेत में पड़ी पराली को जला रहे हैं। इससे भारी धुआं पैदा हो रहा है, जो दिल्ली और आसपास तक आकर यहां के लोगों का जीना दूभर कर रहा है। चौराहे के सिपाही तथा दुकानदार सबसे अधिक परेशान हैं। वे जाएं तो जाएं कहां ? 

केजरीवाल साहब का कहना है कि इन राज्यों की सरकारों को चाहिए कि वे इस पराली को खरीद लें; पर अत्यधिक बुद्धिमान इस महापुरुष ने कभी खेती तो की नहीं। वे गेहूं और धान में या ईख और बाजरे की फसल में अंतर नहीं कर सकते। इसलिए उन्हें पता ही नहीं कि यह पराली दो-चार नहीं करोड़ों टन होती है। कोई सरकार इसे नहीं खरीद सकती। उनके बजट में इसका प्रावधान ही नहीं होता। और यदि खरीद भी ले, तो वह इसे रखेगी कहां और इसका होगा क्या ?

कुछ लोग विदेशी तर्ज पर दिल्ली में हैलिकॉप्टर से पानी छिड़कने की सलाह दे रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि चार-छह दिन में यह धुआं स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। ऐसा होते ही एक साल के लिए यह शोर भी दब जाएगा। दिल्ली सरकार ने फिर कुछ दिन के लिए निजी कारों को सम-विषम संख्या के अनुसार चलाने का आदेश दिया है। सब लोग चिंतित तो हैं; पर वे इस समस्या के मूल में जाना नहीं चाहते। यदि इस पर ध्यान दें, तो केवल धुंध ही नहीं, और भी कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। 

भारत को गांव और खेती प्रधान देश माना जाता है; पर पिछले कुछ सालों से खेती के प्रति लोगों का रुझान घट रहा है। किसानों के बच्चे भी अब गांव में रहना और खेती करना नहीं चाहते। हल चलाना, पशुओं की सानी करना और गोबर में हाथ डालना अब पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया गया है। अतः वे सब शहरों में रहकर कोई नौकरी करना चाहते हैं। परिवार भी छोटे हो रहे हैं। शिक्षा प्राप्त करना तो अच्छा है; पर यह शिक्षा हमें खेती और पशुपालन से दूर कर रही है, यह इसका दूसरा और खराब पहलू भी है।

भारत की खेती परम्परागत रूप से गोवंश पर आधारित थी। हर किसान के घर में उसकी जमीन के अनुपात में गाय, बैल आदि होते ही थे। इससे जहां उसके परिवार को ताजा दूध और घी मिलता था, वहां बैल खेती के काम आते थे। गोमूत्र, गोबर और खेत की खर-पतवार आदि से उत्तम खाद और कीटनाशक बनते थे। इससे खेती सस्ती पड़ती थी तथा घर का हर प्राणी स्वस्थ और व्यस्त रहता था। गोवंश घर के सदस्य की भांति ही रहते और पलते थे। खेत से उनके लिए ताजा चारा आ जाता था। गेहूं, दाल, चावल, फल आदि मनुष्य खाते थे, तो उनकी घासफूस और छिलकों से पशुओं का पेट भर जाता था। इस प्रकार सब एक-दूसरे पर आश्रित थे। कोई चीज व्यर्थ नहीं जाती थी। अतः पर्यावरण का संरक्षण होता था।

पर अब परिदृश्य काफी बदल गया है। छोटे परिवार और युवा वर्ग की उदासीनता के कारण खेती करने वाले हाथ लगातार घट रहे हैं; पर गांव में खेती की जमीन तो उतनी ही है। अतः लोग मजबूरी में पशुओं की बजाय मशीन आधारित खेती की ओर झुक रहे हैं। अब जुताई, बुआई और कटाई के लिए टैªक्टर तथा डीजल से चलने वाले हार्वेस्टर आदि यंत्र आ गये हैं। छोटे किसान भी अब एक-दो दिन के लिए किराये पर इन्हें लेकर ही काम चला रहे हैं। इनसे जहां एक ओर प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, वहां खेती भी महंगी होती जा रही है। तेल के लिए विदेशों पर निर्भरता इसका एक अन्य पहलू है। 

पहले गेहूं, धान आदि का अवशिष्ट (पराली) पशुओं के खाने के काम आता था; पर अब पशुओं के अभाव में किसानों के सामने समस्या है कि वे इसे कहां ले जाएं ? उन्हें अगली फसल के लिए खेत खाली और फिर तैयार करना है। हाथ से कटाई करने पर पौधा नीचे जड़ के पास से काटा जाता है; लेकिन मशीनों से कटाई होने पर लगभग एक फुट अवशेष खेत में ही रह जाता है। उससे निबटने का उन्हें एक ही रास्ता नजर आता है और वह है इसे जलाना। आजकल पंजाब, हरियाणा आदि के हर गांव में पराली जल रही है। इससे ही दिल्ली और आसपास धुंध के बादल छाए हैं।

हमारे देश के कई अति शिक्षित और विदेशी डिग्रीधारी कृषि पंडित इस समस्या का समाधान भी दुनिया के दूसरे देशों की तर्ज पर ही करना चाहते हैं; पर हर आदमी को हर मर्ज में एक ही गोली देने से काम नहीं चलता। ऐसे ही विदेशी प्रणाली से भारत की समस्या का समाधान नहीं होगा। हमें तो अपने तरीके से ही इससे निबटना होगा; और इसका निदान गोवंश आधारित खेती ही है। इससे पराली जलने की बजाय फिर से पशुओं के पेट में जाएगी। अतः धुंध से छुटकारा मिलेगा। विदेशी तेल, बीज और कीटनाशक आदि पर निर्भरता कम होगी तथा जैविक खाद से खेत भी उर्वर होंगे। 

किसी विद्वान ने कहा है, ‘‘एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाये।’’ अर्थात ठीक से समझ-बूझकर यदि एक को साध लिया, तो सब ठीक हो जाता है; पर यदि बिना सोचे-समझे सबको साधने का प्रयास किया, तो कुछ भी हाथ नहीं आता। अतः भारत को फिर से गोवंश आधारित खेती की ओर लौटने की आवश्यकता है। इससे ही सबका कल्याण होगा।