शनिवार, 13 जनवरी 2018

कोरेगांव विवाद और जातिभेदी राजनीति

नया वर्ष चाहे अंग्रेजी हो या भारतीय; पर उत्सवप्रिय भारतीय उसे जोरशोर से मनाते हैं। लेकिन 2018 का प्रारम्भ एक कटु विवाद के साथ हुआ है। वह है पुणे के पास कोरेगांव में एक युद्ध की 200 वीं वर्षगांठ पर हुआ जातीय संघर्ष। एक जनवरी, 1818 के इस युद्ध के बारे में सबका अपना-अपना दृष्टिकोण है; पर यह निश्चित है कि इससे भारत में अंग्रेजों की जड़ें मजबूत हुईं। यद्यपि 1757 में हुए पलासी के युद्ध में जीत से उनका प्रभाव तो बढ़ ही गया था; पर कोरेगांव की यह लड़ाई निर्णायक सिद्ध हुई।

एक समय सिक्खों की तरह मराठे भी भारत की प्रमुख शक्ति थे। 1760-61 में पानीपत की लड़ाई हुई। उसमें अहमद शाह अब्दाली से पराजय के बाद यह शक्ति कमजोर होकर महाराष्ट्र तक ही सिमट गयी। कोरेगांव की लड़ाई भी उन्होंने गिरे हुए मनोबल से लड़ी थी। वहां हुए पराभव से यह शक्ति स्थायी रूप से कुंठित हो गयी और अंग्रेजी राज प्रबल हो गया। इससे मराठों के साथ ही अन्य बड़े राजाओं की हिम्मत भी टूट गयी। फिर उन्होंने अंग्रेजों से सीधा संघर्ष नहीं किया। यद्यपि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर गढ़मंडल की रानी अवन्तीबाई जैसे अपवाद भी हैं। अधिकांश छोटे राजे, रजवाड़ों और जमीदारों ने भी अंग्रेजों का मुकाबला किया। जनजातीय (वनवासी) समूहों ने भी अपनी सीमित शक्ति और परम्परागत हथियारों के बलपर डटकर मुकाबला किया; पर बड़ों ने एक बार कंधे झुकाये, तो फिर वे झुके ही रहे।

उन दिनों महाराष्ट्र में शिवाजी के वंशज अर्थात क्षत्रिय मराठों का शासन था; पर वास्तविक शक्ति उनके प्रधानमंत्री अर्थात पेशवा के हाथों में थी। ये पेशवा मराठी ब्राह्मणों के चितपावन गोत्र से होते थे। राजकाज का केन्द्र पुणे का शनिवार बाड़ा था। शिवाजी के पौत्र छत्रपति शाहू जी के मन में समाज के दुर्बल और निर्धन वर्ग के प्रति बहुत प्रेम था। उन्होंने ही सबसे पहले अपने राज्य में आरक्षण व्यवस्था लागू की थी। इसलिए इन वर्गों में प्रभाव रखने वाले नेता और दल उन्हें बहुत मानते हैं। मायावती ने उ.प्र. में मुख्यमंत्री बनने पर लखनऊ के किंग जार्ज मैडिकल कॉलिजके बाहर शाहू जी की भव्य धातु प्रतिमा लगवाकर उसका नाम छत्रपति शाहू जी महाराज मैडिकल कॉलिजकर दिया था। 

लेकिन शाहू जी के उत्तराधिकारी इतने उदार नहीं थे। पेशवाओं के मन में भी निर्धन वर्ग के प्रति कोई प्रेम और सम्मान नहीं था। कहते हैं कि उन्हें अपनी कमर में झाड़ू बांधकर तथा गले में थूक के लिए लोटा लटकाकर चलना पड़ता था। इसलिए वे क्षत्रिय मराठों और ब्राह्मण पेशवाओं से घृणा करने लगे। ये लोग भी शरीर और स्वभाव से वीर थे। शाहू जी के समय तक इन्हें सेना में लिया जाता था; पर फिर यह बंद हो गया।

अब उनके पास न शिक्षा थी, न व्यापार और न ही खेती। अतः उनके सामने खाने-कमाने और अपने परिवार को पालने की बड़ी समस्या आ गयी। अंग्रेजों की नीति सदा बांटों और राज करोकी रही है। उन्होंने इस मजबूरी का लाभ उठाने के लिए सेना में महार रेजिमेंटबना दी। अतः इन वर्गों के युवक फौज में भर्ती होने लगे। इस प्रकार अंग्रेजों ने इनके मन में शासक वर्ग के प्रति भरी घृणा को एक संगठित रूप दे दिया।

उन दिनों नियमित सेनाएं बहुत कम होती थीं। युद्ध की स्थिति में राजा की ओर से मुनादी होने पर इच्छुक लोग सेना में भर्ती हो जाते थे। पड़ोसी राज्यों या देशों से भी लोग आ जाते थे। उनका मुख्य उद्देश्य धनलाभ ही होता था। जो राजा या जमींदार उन्हें भरती कर ले, वे उसके लिए ही लड़ते थे। युद्ध में घायल या मृत्यु होने पर खेती की जमीनें दी जाती थीं। लूट में भी कुछ हिस्सा मिल जाता था। युद्ध के बाद सैनिकों को गांव और बिरादरी में सम्मान मिलता था। नियमित सेना की प्रथा भारत में विदेशियों की देखादेखी ही आयी है।

कोरेगांव युद्ध में मराठा सेना के अग्रणी दस्ते में अधिकांश अरबी मुसलमान थे। उस सेना में महाराष्ट्र के अन्य निर्धन वर्ग के हिन्दू भी थे। अंग्रेजों की सेना में महारों के साथ ही बंगाल और मद्रास के निर्धन वर्गों के लोग भी थे। मालिकों के नजरिये से ये मराठों और अंग्रेजों का, जबकि सैनिकों के नजरिये से ये महारों और मुसलमानों का युद्ध था। अंग्रेज अपनी सत्ता स्थायी करने के लिए चाहते थे कि जातिभेद के ये बीज पेड़ बन जाएं। इसलिए उन्होंने वहां एक स्मारक बना दिया। उसमें 27 महार और 22 अन्य (कुल 49) सैनिकों के नाम लिखे हैं।

तुलसी बाबा ने कहा है, ‘‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’’ इसीलिए सब इस युद्ध को अपने-अपने चश्मों से देख रहे हैं; पर यह निर्विवाद है कि इसमें अंग्रेज जीते और भारत की हानि हुई। अतः इसे किसी जाति, वर्ग या समुदाय की जीत कहना उचित नहीं है।

कैसा दुर्भाग्य है कि अंग्रेजों के जाने के 70 साल बाद भी हम जातियों के नाम पर लड़ रहे हैं। जातिवाद को मिटाना आसान नहीं है; पर हम जातिभेद को तो मिटा ही सकते हैं। जन्म के कारण किसी को ऊंचा या नीचा मानना केवल अपराध ही नहीं, पाप भी है। इस मिटाने के लिए हमें अपनी चुनाव प्रणाली बदलनी होगी। क्योंकि यह जातिभेद को हिंसक जातीय संघर्ष की ओर बढ़ा रही है। 1947 के बाद का परिदृश्य इसका गवाह है। कोरेगांव विवाद को बढ़ाने के पीछे भी भारतद्वेषी गुटों की राजनीति ही है, और कुछ नहीं।

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

मकर संक्रांति और पानीपत का युद्ध

मकर संक्रांति के साथ जुड़ें प्रसंगों में सबसे महत्वपूर्ण है 1761 ई. में हुआ पानीपत का युद्ध। यद्यपि इसमें मराठा सेनाएं हार गयीं; पर उसके बाद पश्चिम से कोई शत्रु दिल्ली तक नहीं आ सका। विजयी अहमदशाह अब्दाली ने भी वापस काबुल जाने में ही अपनी खैर समझी। यह युद्ध महाराष्ट्र नहीं, बल्कि दिल्ली की रक्षार्थ हुआ था। युद्ध से पूर्व अब्दाली ने सदाशिव भाऊ को संदेश भेजा था कि यदि वे पंजाब को सीमा मान लें, तो वह सन्धि को तैयार है; पर भाऊ ने इसे यह कहकर ठुकरा दिया कि भारत की सीमा अटक तक है।

छत्रपति शिवाजी के पौत्र शाहूजी के पेशवा बाजीराव ने दक्षिण में अर्काट तथा फिर बंगाल, बिहार, उड़ीसा में विजय प्राप्त की। 40 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु से इस अभियान को धक्का लगा। अतः नेपाल और यमुना के मध्य क्षेत्र पर रोहिले और पठान काबिज हो गये। 1747 में नादिरशाह की हत्या के बाद उसका सहयोगी अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान का अमीर बन गया। 

बाजीराव के बाद उनके 19 वर्षीय पुत्र नानासाहब पेशवा बने। उनके नेतृत्व में मराठों ने 1750 में पठानों और रोहिलों को हराया तथा मुल्तान, सिन्ध, पंजाब, राजपूताना, रुहेलखंड आदि की चैथ वसूली के अधिकार प्राप्त कर लिये। इससे चिंतित नजीबुद्दौला, बेगम मलका जमानी और मौलवी वलीउल्लाह ने ‘इस्लाम खतरे में’ कहकर नवाबों, निजाम और जमीदारों से सम्पर्क किया। अहमदशाह अब्दाली को भी पत्र लिखकर भारत में ‘दारुल इस्लाम’ की स्थापना को कहा। उन्होंने लिखा कि मराठा, जाट और सिखों को हराने का निर्णय ‘जन्नत की अदालत’ में हुआ है। दिल्ली की मुगल सल्तनत मराठों के हाथ का खिलौना है। अतः वे इसे नष्ट करें और नादिरशाह की तरह वापस जाने की बजाय यहीं राज्य करें। 

अब्दाली निमन्त्रण पाकर भारत की ओर बढ़ने लगा; पर हर बार उसे पंजाब ने टक्कर दी। 1744 से 1750 तक उसने पांच बार हमला किया। ऐसे में जब मराठों ने दिल्ली के मुगल दरबार की नाक में नकेल डाली, तो सिख बहुत खुश हुए। रघुनाथराव पेशवा के नेतृत्व में मराठा सेना जब पंजाब पहुंची, तो शालीमार बाग (लाहौर) में भव्य स्वागत समारोह हुआ। 

1753-54 में अब्दाली ने दिल्ली तक आकर मराठों को पीछे हटा दिया। यह सुनकर रघुनाथराव पेशवा पुणे से चल दिये। उन्होंने शिन्दे तथा होल्कर के साथ दिल्ली पर कब्जा कर अपनी मर्जी से राजा, वजीर तथा सेनापति बनाये। इससे नाराज होकर राजा सूरजमल मल्हारराव होल्कर से भिड़ गये; पर दूरदर्शी रघुनाथराव ने उनसे सन्धि कर आगरा तथा निकटवर्ती क्षेत्र पर उनके अधिकार को पूर्ववत मान लिया।

रघुनाथराव के वापस होते ही 1756 में अब्दाली फिर आ गया। होली के दो दिन बाद (1.3.1757) उसने मथुरा में तीर्थयात्रियों के खून से होली खेली। सूरजमल के पुत्र जवाहरसिंह ने उससे टक्कर ली। 2,000 सशस्त्र नागा साधुओं सहित 10,000 हिन्दू तथा 20,000 अफगानी मारे गये। अब्दाली ने आगरा पर हमलाकर सूरजमल से जुर्माना वसूलने का विफल प्रयास भी किया। इसी समय फैले हैजे से उसके सैनिक मरने लगे। अतः दिल्ली में गद्दी पर अपने मोहरे बैठाकर वह काबुल लौट गया।

यह सुनकर रघुनाथराव फिर उत्तर भारत की ओर आये। उन्होंने मेरठ, सहारनपुर, रोहतक और दिल्ली पर कब्जाकर अपनी पसंद के लोग सत्ता में बैठाये। फिर वे पंजाब गये और पटियाला राज्य के सेनापति आलासिंह जाट के साथ सरहिन्द को जीता। इस युद्ध में हजारों अफगान सैनिक मरे। अब्दाली द्वारा नियुक्त अधिकारी काबुल भाग गये। रघुनाथराव ने अटक तक भगवा झंडा फहरा दिया। 

अब्दाली का प्रतिनिधि नजीबुद्दौला भयवश मराठों की जी-हुजूरी करने के साथ ही बेगम मलका जमानी तथा मौलवी वलीउल्लाह के साथ बार-बार अब्दाली को फिर भारत आने को पत्र लिख रहा था। उसने मराठों के प्रतिनिधि दत्ताजी शिन्दे को बंगाल विजय के लिए प्रेरित कर उनकी सेना को वर्षाकाल में उफनती गंगा और यमुना के बीच फंसा दिया। इधर अब्दाली भी दिल्ली की ओर चल दिया था। दत्ताजी की सेनाएं बुराड़ी-जगतपुर (वर्तमान दिल्ली) में थी। इस प्रकार वे नजीब और अब्दाली की सेनाओं के बीच घिर गये। वे इस धोखे से बहुत नाराज थे और नजीब को दंड देना चाहते थे। अतः उन्होंने पूरी ताकत से हमला बोल दिया।

10 जनवरी, 1760 को हुए युद्ध में नजीब की सहायता को कुतुबशाह और अहमदखान बंगश भी आ गये। दत्ताजी को गोली लगी और वे घोड़े से गिर पड़े। इस पर कुतुबशाह हाथी से उतरकर बोला, ‘‘क्यों पटेल, मुसलमानों से फिर लड़ोगे ?’’ निडर दत्ताजी ने उत्तर दिया, ‘‘हां, बचेंगे तो और भी लड़ेंगे।’’ कुतुबशाह ने काफिर कहकर लात मारी और उनका सिर काटकर अब्दाली को भेंट करने ले गया। युद्ध में दत्ताजी ने भले ही वीरगति पाई; पर उनका वीर वाक्य ‘‘हां, बचेंगे तो और भी लड़ेंगे’’ महाराष्ट्र के घर-घर में गूंज गया।

यह समाचार पुणे पहुंचने पर सदाशिवराव भाऊ तथा नानासाहब पेशवा के बड़े पुत्र विश्वासराव के नेतृत्व में सेना को इधर भेजा गया। भाऊ ने उत्तर के हिन्दू राजे-रजवाड़ों तथा मुस्लिम सूबेदारों, नवाबों आदि को पत्र लिखकर विदेशी अब्दाली के विरुद्ध सहयोग मांगा; पर कोई साथ नहीं आया। उधर नजीबखान, लखनऊ के नवाब नासिरुद्दौला, फरुखाबाद-बरेली के अहमदखान बंगश, पीलीभीत के मीरबेग आदि ने कुरान के सामने कसम ली कि वे दिल्ली की सत्ता दक्षिण (अर्थात मराठों) के पास नहीं जाने देंगे। 

दत्ताजी के निधन से बिखरी मराठा सेना सदाशिव और विश्वासराव के आने की खबर सुनकर फिर एकत्र होने लगी। सूरजमल भी इनके साथ आ गये। उन्होंने एक अगस्त, 1760 को फिर दिल्ली जीत ली। कुछ दिन बाद मराठा छावनी में ‘श्रीमंत विश्वासराव पेशवा का दरबार’ आयोजित हुआ। अब्दाली उन दिनों अनूपशहर तथा शुजाउद्दौला यमुना पार छावनी डाले था। वर्षाकाल के कारण युद्ध संभव नहीं था। अतः दोनों पक्ष सर्दी की प्रतीक्षा करने लगे।

दरबार की सूचना पाकर मौलवी वलीउल्लाह तथा नजीबुद्दौला ने मुसलमानों से इस हिन्दू राज्य को मिटाने का आह्नान किया। कुछ मुस्लिम जागीरदार मराठों के साथ भी थे। इससे नाराज होकर सूरजमल वापस भरतपुर चले गये। यद्यपि पानीपत के युद्ध तक तथा उसके बाद भी उन्होंने शस्त्र, अन्न, वस्त्र व नकद राशि से मराठों की सहायता की। उनकी रानी किशोरी ने इसमें विशेष रुचि ली।

मौसम ठीक होते ही भाऊसाहब ने हमला कर दिया। कुंजपुरा के युद्ध में कुतुबशाह, अब्दुल समदखान और किलेदार निजाबत खान पकड़े गये। भाऊसाहब ने दत्ताजी का बलिदान याद कर कुतुबशाह और समदखान के कटे सिर अब्दाली को भेज दिये। इससे क्रुद्ध अब्दाली पानीपत आ गया। भाऊसाहब भी एक नवम्बर, 1760 को वहां पहुंच गये। 22 नवम्बर को जनकोजी शिन्दे ने हमला किया। इसमें अब्दाली की भारी क्षति हुई। इसके जवाब में सात दिसम्बर (अमावस्या) की रात में अब्दाली ने हमला बोला। इसमें भी मराठों की जीत हुई; पर सेनापति बलवन्तराव मेहन्दले मारे गये। पति के शव के साथ उनकी पत्नी रात में ही चिता पर चढ़ गयी।

इन दोनों युद्धों की क्षति से अब्दाली चिंतित हो गया। उधर मराठे भी राशन और रसद के अभाव तथा ठंड से परेशान थे। भाऊसाहब ने 14 जनवरी, 1761 को प्रातः दस बजे हमला किया। तोपों की मार से विरोधियों को धकेलते हुए वे दिल्ली की ओर बढ़ने लगे। इससे चिंतित अब्दाली ने अपनी बेगमों को हटाने के लिए घोड़े तैयार कराये तथा भागते सैनिकों को साहस दिलाकर फिर आगे भेजा। 

इसी बीच मराठा तोपखाने का नायक इब्राहिम खान गारदी तथा गोली लगने से घोड़े पर सवार विश्वासराव मारे गये। इससे सेना में भगदड़ मच गयी। सैनिकों को उत्साह दिलाने के लिए दोनों हाथों में तलवार लेकर सेनापति भाऊ शत्रुओं में घुस गये। इसी समय अब्दाली ने अपने सुरक्षित 6,000 ऊंटसवार बंदूकधारी सैनिक भेज दिये। उन्हांेने ढूंढ-ढूंढकर भाऊ, जनकोजी शिन्दे, तुकोजी शिन्दे आदि को मार डाला। इससे मराठे नेतृत्वविहीन हो गये और अब्दाली जीत गया।

इस युद्ध में लगभग 50,000 मराठा सैनिक तथा इतने ही अन्य लोग मारे गये। महाराष्ट्र का कोई परिवार ऐसा नहीं था, जिसने अपना कोई परिजन न खोया हो। जीत के बावजूद अब्दाली की हिम्मत टूट गयी और वह काबुल लौट गया। विजेता होने पर भी उसने वहां से अनेक उपहारों के साथ अपना दूत पुणे की राजसभा में सन्धिवार्ता हेतु भेजा। 

इस युद्ध का एक कटु और दुःखद सत्य यह है कि मराठों का साथ देने की बजाय राजस्थान के रजवाड़े अब्दाली की जीत से प्रसन्न हुए। सूरजमल युद्ध से अलग तो रहे; पर इसके परिणाम से वे भी दुखी हुए। एक विद्वान ने लिखा है कि यदि यह युद्ध न होता, तो 1947 के बाद दिल्ली भारत की बजाय पाकिस्तान की राजधानी होती। ऐसे में आज भी यह निर्णय करना कठिन है कि इस युद्ध का वास्तविक विजेता कौन था ?