शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

कांग्रेस में घर वापसी

काफी लम्बी हिचक और ना-नुच के बावजूद राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन ही गये। जैसे व्यापारियों के लड़के इच्छा न होने पर भी अपनी नियति मानकर कारोबार में लग जाते हैं। यद्यपि ऐसे अधिकांश लोग आधुनिक शिक्षा और युवा उत्साह के कारण घरेलू कारोबार को कई गुना बढ़ा भी देते हैं। देश हो या विदेश, उद्योगपतियों की नयी पीढ़ी कारोबार को नयी ऊंचाइयों पर ले जा रही है।

इसी तरह राहुल गांधी भी काफी समय तो टालते रहे; पर ‘‘ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे..’’ की तर्ज पर आखिरकार उन्होंने अध्यक्ष बनना मान ही लिया। जैसे लड़के की शादी के बाद मां-बाप सोचते हैं कि उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। अब आगे बेटा और बहू जानें या उनकी किस्मत। बस ऐसा ही राहुल के साथ है। अब कांग्रेस का भविष्य उनके पल्लू के साथ बंधा है।

पिछले दिनों राहुल गांधी ने अपील करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी जैसी फासिस्ट ताकतों से मुकाबला करने के लिए वे सब पुराने लोग वापस घर आ जाएं, जो कभी कांग्रेस छोड़कर चले गये थे। संघ और विश्व हिन्दू परिषद वाले लम्बे समय से ‘घर वापसी’ के काम में लगे हैं। वे कहते हैं कि भारत के उन सब लोगों को अपने पूर्वजों के पवित्र हिन्दू धर्म में लौट आना चाहिए, जो डर, लालच या अन्य किसी कारण से विधर्मी हो गये थे; पर राहुल जी के मुंह से ये बात पहली बार ही सुनी है।

पर इस अपील के साथ ही राहुल गांधी को ये भी सोचना होगा कि आखिर उनका भरापूरा घर छोड़कर लोग गये क्यों ? जब तक इस मूल बीमारी को वे नहीं समझेंगे और इसका निदान नहीं करेंगे, तब तक लोगों का वापस आना तो दूर, घर छोड़कर जाने का क्रम ही बना रहेगा।

सच तो ये है कि कांग्रेस में मूल बीमारी वंशवाद है। मोतीलाल से शुरू होकर जवाहर लाल, इंदिरा गांधी, संजय, राजीव और सोनिया मैडम से होती हुए यह बीमारी अब राहुल गांधी तक आ पहुंची है। इन्हें लगता है कि भले ही भारत में लोकतंत्र हो; पर राज करने का हक उन्हीं को है। इसका सीधा सा अर्थ है कि पार्टी हो या सरकार, नंबर एक की कुर्सी इस परिवार के लिए आरक्षित है। बाकी को नंबर दो या तीन से ही संतोष करना होगा। भले ही वे कितने भी योग्य, चरित्रवान, देशभक्त और पार्टी के लिए समर्पित हों।

कांग्रेस पार्टी में इसके कई उदाहरण हैं। जवाहर लाल नेहरू ने अपने सामने ही अपनी बेटी इंदिरा गांधी को पार्टी अध्यक्ष और मंत्री बना दिया था, जबकि उनसे वरिष्ठ कई लोग मौजूद थे। डा. लोहिया, चरणसिंह, आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण आदि पहले कांग्रेसी ही थे; पर फिर इनके नेहरू और इंदिरा गांधी से मतभेद हो गये, इनमें वंशवाद एक प्रमुख कारण था। नेहरू और शास्त्री जी के जाने से मोरारजी देसाई आदि की इच्छाएं फिर जाग गयीं। क्योंकि वे भी राजनीति में संन्यासी बनने तो आये नहीं थे; पर कामराज के सहयोग से प्रधानमंत्री बनने पर इंदिरा गांधी ने पुराने लोगों से पिंड छुड़ाने के लिए 1969 में पार्टी ही तोड़ दी। असल में वे अपनी अगली पीढ़ी के लिए कुर्सी सुरक्षित करना चाहती थीं। अतः कई वरिष्ठ लोगों ने कांग्रेस ही छोड़ दी।  

1977 में आपातकाल के बाद मोरारजी प्रधानमंत्री बने; पर पुराने कांग्रेसियों और समाजवादियों ने सरकार नहीं चलने दी। 1980 में फिर सत्ता पाकर इंदिरा गांधी उत्तराधिकारी के नाते अपने छोटे बेटे संजय को आगे बढ़ाने लगीं, जबकि आपातकाल में वे खूब बदनाम हो चुके थे; पर उनके बड़े भाई राजीव राजनीति से दूर रहते थे। अतः इंदिरा जी के पास कोई विकल्प नहीं था; पर 1980 में संजय की मृत्यु के बाद उन्होंने राजीव को जबरन राजनीति में खींच लिया। 1975 से 1988 के बीच इस परिवार के दखल से दुखी होकर चंद्रशेखर, रामधन, कृष्णकांत, मोहन धारिया, नीलम संजीव रेड्डी और फिर विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे कई जमीनी नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद यदि राष्ट्रपति जैलसिंह चाहते, तो वे प्रणव मुखर्जी या नारायण दत्त तिवारी जैसे किसी वरिष्ठ नेता को प्रधानमंत्री बना सकते थे; पर वे भी इंदिरा जी के अहसानों से दबे थे। अतः उन्होंने अनुभवशून्य राजीव गांधी को शपथ दिला दी। इससे कांग्रेस फिर उस परिवार की बंधुआ बन गयी। इससे नाराज होकर प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी आदि ने कांग्रेस छोड़ दी; पर दाल न गलने पर वे फिर गुलामी में लौट आये।

1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने। सोनिया जी दुख में डूब गयीं। ऐसा लगा कि अब इस परिवार की काली छाया से कांग्रेस मुक्त हो गयी है; पर सीताराम केसरी के अध्यक्ष काल में मैडम का सत्ता मोह जाग उठा। इसके लिए राजीव के मित्रों का आग्रह था या किसी बाहरी शक्ति का, यह कहना कठिन है; पर यह सच है कि 1998 में सोनिया मंडली ने कांग्रेस कार्यालय में आकर बुजुर्ग केसरी चाचा को अपमानित कर कुर्सी कब्जा ली। कांग्रेस एक बार फिर इस परिवार के दुष्चक्र में फंस गयी।

इसके बाद 18 साल तक कांग्रेस पर सोनिया जी का कब्जा रहा। इस दौरान महाराष्ट्र में शरद पवार और बंगाल में ममता बनर्जी जैसे जनाधार वाले नेता कांग्रेस छोड़ गये। तेजी से उभर रहे राजेश पायलेट 2000 में और माधवराव सिंधिया 2001 में हुई दुर्घटनाओं में मारे गये। पता नहीं यह नियति थी या षड्यंत्र ? 2004 में लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी। सोनिया ने जनाधारहीन मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, जिससे भविष्य में राहुल के लिए कोई बाधा उत्पन्न न हो।

पिछले तीन साल से बीमार मम्मीश्री तो नाममात्र की अध्यक्ष थीं। राहुल ही कांग्रेस के सर्वेसर्वा थे। सभी निर्णय वही लेते थे। तब भी नेताओं के कांग्रेस छोड़ने का क्रम जारी रहा। हेमंत बिस्व शर्मा पूर्वोत्तर भारत में कांग्रेस के बड़े नेता थे; पर कई बार आग्रह के बाद भी राहुल ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। जब मिले, तब भी बात सुनने की बजाय वे अपने कुत्ते से खेलते रहे। इससे अपमानित होकर हेमंत ने कांग्रेस छोड़ दी और आज असम में भा.ज.पा. की सरकार है। अब वे शेष राज्यों में कांग्रेस को उखाड़ने में लगे हैं।

इस परिवार द्वारा लोगों का अपमान आम बात है। संजय इस मामले में कुख्यात थे। 1982 में राजीव गांधी ने हैदराबाद में हवाई अड्डे पर आंध्र के मुख्यमंत्री टी.अंजैया को डांटा था। 1987 में प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रेस वार्ता में ही विदेश सचिव श्री वेंकटेश्वरन को हटा दिया था। अंग्रेजी न जानने के कारण उन्होंने जैलसिंह को कई बार अपमानित किया। नरसिंह राव की मृत्यु के बाद मैडम जी ने उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया। हैदराबाद में भी शवदाह का ठीक प्रबंध नहीं किया गया। 

ऐसे माहौल में ‘घर वापसी’ की अपील का क्या अर्थ है ? शरद पवार, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक आदि पुराने कांग्रेसी हैं। इनका अपने राज्यों में भारी जनाधार भी है, जबकि राहुल की जड़ें किसी राज्य में नहीं है। वे जहां से सांसद हैं, उस उ.प्र. में उन्हें पिछले चुनाव में अखिलेश यादव की साइकिल पर बैठने के बावजूद सात सीट मिली हैं। ऐसे में क्या वे या उनकी मम्मी किसी पुराने और जमीनी नेता को कांग्रेस का अध्यक्ष या भावी प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाएंगे ?

यह प्रश्न किसी से भी पूछें, उत्तर नकारात्मक ही होगा। लोकतंत्र विरोधी जिस गंदी परम्परा को मोतीलाल नेहरू ने शुरू किया था, उसे राहुल नहीं छोड़ सकते। ऐसे में ‘घर वापसी’ की ये अपील एक ढकोसला मात्र है।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

मीडिया का बदलता रूप

हिन्दी शब्द ‘माध्यम’ से अंग्रेजी में ‘मीडियम’ और मीडिया बना। एक जगह की बात या घटना को दूसरी जगह पहुंचाने में जो व्यक्ति या उपकरण माध्यम बनता है, वही मीडिया है। सृष्टि के जन्मकाल से ही किसी न किसी रूप में मीडिया का अस्तित्व रहा है और आगे भी रहेगा।

भारतीय दृष्टिकोण से यदि देखें, तो हमारे यहां नारद जी पहले पत्रकार हैं। इसीलिए उनकी जयंती (ज्येष्ठ कृष्ण 2) वास्तविक ‘पत्रकारिता दिवस’ है। 30 मई को देश भर में ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ मनाया जाता है। चूंकि 1826 में इस दिन श्री जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से हिन्दी का पहला साप्ताहिक अखबार ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ शुरू किया था। उस दिन नारद जयंती ही थी। यद्यपि अर्थाभाव में यह 11 दिसम्बर 1827 को बंद हो गया; पर पत्रकारिता के इतिहास में नारद जयंती को पुनर्जीवित कर गया। 

कहते हैं कि नारद जी की पहुंच देव, गंधर्व, नाग आदि लोकों से लेकर आकाश और पाताल तक थी। वे अपनी वीणा लेकर ‘नारायण-नारायण’ करते हुए हर उस जगह पहंुच जाते थे, जहां उनकी जरूरत होती थी। दुर्भाग्य से हमारी फिल्मों और दूरदर्शन ने उनकी छवि एक जोकर और यहां-वहां आग लगाने वाले व्यक्ति की बनायी है। जबकि वे लोकहितकारी पत्रकार थे। उनके सामने जनता का हित सर्वोपरि रहता था।

श्रीकृष्ण के जन्म का ही उदाहरण लें। अपनी बहिन देवकी को ससुराल छोड़ने जाते समय हुई भविष्यवाणी से चिंतित होकर कंस ने देवकी ओर वसुदेव को जेल में बंद कर दिया। इसके बाद वह देवकी की आठवीं संतान की प्रतीक्षा करने लगा। नारद जी जानते थे कि जब तक कंस के पाप का घड़ा नहीं भरेगा, तब तक जनता में विद्रोह नहीं होगा। इसलिए वे आठ पंखुड़ी वाला कमल लेकर कंस के पास गये और उसकी आठवीं पंखुड़ी पहचानने को कहा। इससे कंस भ्रमित हो गया। उसने अपनी दुष्ट मंडली से पूछा, तो सबने देवकी के सभी बच्चों को मारने की सलाह दी। कंस ने ऐसा ही किया।

लेकिन इससे लोगों में आक्रोश बढ़ता गया और सबने तय कर लिया कि चाहे जो हो, पर आठवीं संतान को बचाना ही है। इसलिए श्रीकृष्ण के जन्म लेते ही जेल के पहरेदार, लुहार आदि ने उनके निकलने का प्रबंध कर दिया। नाव वालों ने ऐसी मजबूत नाव बनायी, जो दूर से शेषनाग जैसी दिखती थी और उससे श्रीकृष्ण को उफनती यमुना पार करा दी गयी। फिर इसी तरह गोकुल से देवकी की नवजात कन्या को ले भी आये। इसके बाद कंस को सूचना दी गयी। यह कथा नारद जी की बुद्धिमत्ता और योजकता को बताती है। 

कोई कह सकता है कि नारद जी हर युग और काल में कैसे हो सकते हैं ? वस्तुतः नारद जी कोई व्यक्ति न होकर एक संस्था या उसके पदाधिकारी थे, जैसे आजकल प्राचार्य, अध्यक्ष या मुख्यमंत्री आदि होते हैं। इसलिए नारद जी आज भी हैं और आगे भी रहेंगे।

सत् और त्रेता के बाद द्वापर युग आता है। तब विज्ञान बहुत उन्नत था। इसीलिए कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत का आंखों देखा हाल संजय ने हस्तिनापुर में बैठे धृतराष्ट्र को सुनाया था। अर्थात तब भी दूरदर्शन जैसा कोई उपकरण अवश्य रहा होगा। महाभारत का युद्ध 5,156 साल पहले हुआ था। उसमें विज्ञान की समूची प्रगति दांव पर लग गयी थी। इससे विश्व की अधिकांश जनसंख्या और विज्ञान भी नष्ट हो गया। 

लेकिन मीडिया की जरूरत फिर भी बनी रही। कभी कबूतर, घोड़े या ऊंट सवारों से संदेशवाहकों का काम लिया जाता था। कहते हैं कि 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा सेना की पराजय का समाचार एक महीने बाद महाराष्ट्र पहुंच सका था। पर्वत और वनों में ढोल की थाप से संदेश पहुंचाए जाते थे। ‘ढोल सागर’ नामक गं्रथ में इसकी जानकारी मिलती है, यद्यपि अब उसका बहुत कम भाग ही उपलब्ध है। 

अंग्रेजों ने भारत में 1850 में टेलिफोन की तारें लगायीं। इससे कहीं भी हुए सैन्य विद्रोह की सूचना तुरंत देश भर में पहुंच जाती थी। 1857 में कोलकता की बैरकपुर छावनी और फिर कुछ दिन बाद मेरठ छावनी में विद्रोह हुआ। टेलिफोन से इसकी सूचना सब छावनियों में पहुंच गयी और वहां कार्यरत भारतीय सैनिकों से हथियार ले लिये गये। यह कमाल टेलिफोन का ही था। इसीलिए भारतीय स्वाधीनता सेनानी हर जगह सबसे पहले टेलिफोन की तारें काटते थे। 

इन तारों से टेलिग्राम भी होते थे। 1854 में इसकी व्यावसायिक सेवाएं शुरू हुईं। 1902 में ये वायरलैस हो गया; पर एक समय पत्रकार इसी से लिखित समाचार अखबारों को भेजते थे। पुरानी पड़ जाने से 2013 में यह सेवा बंद कर दी गयी। इसी में से फिर टेलिप्रिंटर का जन्म हुआ, जो अखबारों के लिए अनिवार्य चीज थी। हर समाचार एजेंसी के अपने टेलिप्रिंटर होते थे। ‘भाषा’ भारत की तथा ‘रायटर्स’ विश्व की प्रमुख एजेंसी है। पहले केवल अंग्रेजी टेलिप्रिंटर ही थे; पर फिर हिन्दुस्थान समाचार ने हिन्दी टेलिप्रिंटर बना लिया। इसके बाद फैक्स मशीन आ गयी। कम्प्यूटर, मोबाइल और ई.मेल के दौर में अब वह भी पुरानी हो गयी है। 

एक समय केवल प्रिंट मीडिया ही था; पर फिर टी.वी. आ गया। चूंकि दृश्य सदा लिखित सामग्री से अधिक प्रभावी होता है। कबीर दास जी ने भी ‘आंखों देखी’ को ‘कागद की लेखी’ से अधिक महत्व दिया है। अब घर के टी.वी. से आगे मोबाइल टी.वी. और सोशल मीडिया आ गया है। इसके आगे क्या होगा, कहना कठिन है। हो सकता है पोलियो की तरह बच्चों को मीडिया का भी टीका लगा दिया जाएगा। फिर न टी.वी. की जरूरत होगी और न मोबाइल या इंटरनेट की। विज्ञान जो न कराए वह थोड़ा ही है। 

कहते हैं कि विज्ञान का हर नया उपकरण पुराने को बाहर कर देता है; लेकिन इसके बावजूद एक चीज कभी बाहर नहीं हुई और होगी भी नहीं। वह है पत्रकार। क्योंकि मशीन कितनी भी उन्नत हो जाए; पर उसे चलाता तो आदमी ही है। इसलिए पत्रकार का ठीक रहना जरूरी है। उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता चाहे जो हो; पर समाचार के साथ विचार का घालमेल ठीक नहीं है। एक ही सभा की रिपोर्ट करते समय एक संवाददाता फोटो में खाली कुर्सियों वाला क्षेत्र दिखाता है, तो दूसरा भरी हुई। कई संवाददाता किसी से सुनकर समाचार छाप देते हैं। कुछ लोग जानबूझ कर विवाद खड़ा कर देते हैं। इससे पत्रकार और अखबार दोनों की छवि खराब होती है। इससे बचना ही उचित है। चंूकि मीडिया जगत में विश्वसनीयता सबसे बड़ी चीज है।

किसी समय पत्रकारिता का अर्थ समाचार संकलन ही होता था; पर अब खेल, सिनेमा, फोटो, साहित्य, थाना, कोर्ट, राजनीतिक व सामाजिक संस्थाओं के लिए भी अलग-अलग संवाददाता होते हैं। विधा चाहे जो हो, पर पत्रकार के लिए खूब पढ़ना और भाषा पर अधिकार जरूरी है। गलत तथ्य देना अपराध ही नहीं, पाप भी है। ऐसा कहते हैं कि किसी समय मीडिया मिशन था; पर अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी गिरावट आयी है। अतः वह कमीशन से होते हुए सेंसेशन तक पहुंच गया है; लेकिन हजारों पत्रकार आज भी निष्ठा से काम कर रहे हैं। इसीलिए बदलते समय के साथ मीडिया का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।