शुक्रवार, 2 मार्च 2018

उत्तराखंड में पलायन

इन दिनों उत्तराखंड की किसी भी सभा, गोष्ठी या सेमिनार में जाएं, वहां सबसे अधिक चिंता पलायन की होती है। मजे की बात ये भी है कि पलायन रोकने के सूत्र बताने वाले विशेषज्ञ प्रायः दिल्ली, नौएडा, लखनऊ, चंडीगढ़, मुंबई आदि से आते हैं। जो लोग खुद को आज भी उत्तराखंड वाला कहते हैं, वे भी देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, कोटद्वार, काशीपुर, रुद्रपुर, हल्द्वानी, खटीमा या टनकपुर जैसे मैदानी क्षेत्र में बस गये हैं। अपना गांव छोड़ चुके ऐसे लोग जब पलायन रोकने के उपाय बताते हैं, तो ऐसा लगता है मानो दशमुख रावण ही व्यासपीठ पर बैठकर रामकथा सुना रहा हो। अधिकांश पहाड़ी गांवों में या तो बुजुर्ग बचे हैं या फिर वे लोग, जिनके पास नीचे घर या जमीन खरीदने लायक पैसा नहीं है। इसीलिए घरों में ताले लग रहे हैं और गांव लगातार खाली हो रहे हैं। 

पिछले दिनों ऐसी ही एक गोष्ठी में जाने का मौका मिला। वहां जो सुना, उससे उनकी कठिनाई समझ में आती है। सबसे बड़ी समस्या इस समय बंदरों की है। फसल बोते ही बंदर उसे उजाड़ देते हैं। पहले वे तेज आवाज वाले पटाखों से डरते थे; पर अब नहीं। पटाखे जलाते ही वे कुछ दूर जाकर फिर लौट आते हैं। बंदर केवल फसल ही नहीं उजाड़ते, वे घर के बाहर रखी खाद्य सामग्री भी उठा लेते हैं। कभी-कभी तो हाथ से ही छीन लेते हैं। बच्चों और अकेले बैठे धूप सेक रहे बुजुर्गों को वे काट भी लेते हैं। पहले लोग घर की छत पर कद्दू या मकई सुखा देते थे; पर अब बंदरों के कारण यह संभव नहीं रहा। बंदरों से बचने को कुछ लोगों ने कुत्ते पाले; पर उनके कारण वहां बाघ आने लगता है और मौका मिलते ही वह कुत्ते को उठा लेता है। यदि गांव वाले बाघ को मार दें, तो उन पर मुकदमा दर्ज हो जाता है। बाघ को मारें, तो मुकदमा और न मारें तो अपनी जान का खतरा। अतः लोग दोनों तरफ से पिस रहे हैं।

बंदरों की जनसंख्या वृद्धि का एक कारण जंगलों का विस्तार भी है। पहले गांव के लोग रसोई के लिए जंगल से ही लकड़ी लाते थे; पर अब हर घर में गैस आ गयी है। इससे जंगलों का कटान रुका है। यह महिलाओं के स्वास्थ्य, सुविधा और पर्यावरण के लिहाज से तो अच्छा है; पर इससे बंदर भी बढ़ रहे हैं। बंदरों को मारना लोग अच्छा नहीं समझते और यह संभव भी नहीं है। अतः उनकी जनसंख्या नियंत्रण का कोई व्यावहारिक उपाय सोचना होगा।

उत्तराखंड के ऊंचाई वाले गांवों में सेब की फसल अच्छी होती है। सेब के पेड़ों को कम से कम दो महीने खूब ठंडा मौसम चाहिए; लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के चलते सेब पट्टी पीछे खिसक रही है। पहाड़ में छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेत होते हैं। दूर-दूर होने से वहां खेती में कठिनाई आती है। चकबंदी है तो; पर वह स्वैच्छिक है। यदि गांव में सब चाहें, तभी यह संभव है। जो लोग नौकरी आदि के कारण नीचे बस गये हैं, उन्हें इसमें कोई रुचि नहीं है। अतः जो लोग वहां रह रहे हैं, वे परेशान हैं।

समस्या उन किसानों के साथ भी है, जो तराई में बसे हैं। वहां हाथियों ने उन्हें दुखी कर रखा है। अत्यधिक दोहन से जल का स्तर गिर गया है और प्राकृतिक तालाब सूख गये हैं। अतः प्यासे हाथी जंगल से निकलकर नदी या नहर तक आते हैं। इस दौरान रास्ते में पड़ने वाले खेत और मकानों को वे नष्ट कर देते हैं। कई जंगलों को बिजली के हल्के करेंट वाली तारों से घेरा गया है; पर हाथी पेड़ तोड़कर उनके ऊपर गिरा देते हैं। इससे तार टूट जाते हैं और फिर हाथी उसी को स्थायी रास्ता बना लेते हैं। 

आजकल पहाड़ में तेजी से विकास हो रहा है। बारहमासी (ऑल वैदर) रोड तथा बांधों पर काम हो रहा है। सरकार चाहती है कि लाखों की बजाय करोड़ों पर्यटक यहां आएं। अतः हवाई यातायात बढ़ाने के लिए हवाई अड्डे तथा हैलिपैड बन रहे हैं। यह सोच गलत नहीं है। पहाड़ की आर्थिकी का आधार फौज या नौकरी के लिए बाहर गये लोग तथा धार्मिक पर्यटन ही है। विकास के लिए नयी सड़कों का निर्माण, पुरानी सड़कों का चौड़ीकरण और इसके लिए रास्ते में आने वाले भवन तथा खेतों का अधिग्रहण जरूरी है। इसके लिए सरकार भरपूर मुआवजा देती है; पर मुआवजा मिलते ही व्यक्ति मैदानी क्षेत्र में घर खरीद लेता है। बुजुर्ग तो अपने पुश्तैनी गांव में रहना चाहते हैं; पर युवा नहीं। ऐसे में युवा पीढ़ी के आगे बुजुर्गों को झुकना पड़ता है। इस प्रकार यह मुआवजा भी पलायन में सहायक हो रहा है। लोगों का सुझाव है कि मुआवजे की बजाय शासन वहां मकान बनाकर दे और यह काम उजाड़ने से पहले होना चाहिए।

पहाड़ से पलायन का एक कारण शिक्षा भी है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ें। इसके लिए वह हर कष्ट उठाने को तैयार है। जिसके पास भी थोड़ा पैसा है, वह मैदानी क्षेत्र में मकान खरीद कर या किराये पर लेकर बच्चों को पढ़ा रहा है। परिवार की महिलाओं में से एक बच्चों के साथ रहती है, तो दूसरी गांव में। जो बच्चे मैदानी क्षेत्रों में रहकर पढ़ रहे हैं, वे बड़े होकर फिर यहीं बस जाते हैं। यदि प्राथमिक, जूनियर तथा हाई स्कूल तक की अच्छी शिक्षा गांवों के आसपास हो, तो जहां एक ओर शिक्षा का स्तर सुधरेगा, वहां शिक्षा के लिए पलायन भी रुकेगा। 

यही हाल स्वास्थ्य सुविधाओं का भी है। कई जगह अस्पताल तो हैं; पर डॉक्टर नहीं। डॉक्टर हैं, तो अच्छा भवन, उपकरण या बिजली नहीं। इसलिए डॉक्टर हो या अध्यापक या कोई अन्य सरकारी कर्मचारी, सब नीचे आना चाहते हैं। यह मानसिकता बदलना कठिन है। यद्यपि पहाड़ में जैविक खेती की संभावनाएं हैं; पर शासन का ध्यान इधर कम है। पहाड़ी उपज की बिक्री की भी समस्या है। यदि हर न्याय पंचायत केन्द्र पर अच्छी मंडी हो, तो गांव के युवाओं को घर के पास ही रोजगार मिल सकता है। शासन ने सभी न्याय पंचायत केन्द्रों का विकास नये शहरों के रूप में करने की घोषणा की है। यह अच्छा प्रयास है। यदि इन स्थानों पर अच्छे स्कूल, अस्पताल तथा मनोरंजन केन्द्र भी बनें, तो पलायन की गति कम होगी।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून बनने से भी पलायन बढ़ा है। ग्राम प्रधान हो या कोई और जन प्रतिनिधि, सब बार-बार यहां आते हैं। सरकारी योजनाओं ने सबकी जेबें भर दी हैं। ऐसे में शहर की चकाचौंध से प्रभावित होकर अधिकांश ने देहरादून में ही घर बना लिया है। ठीक भी है, जब सरकार ही पहाड़ में रहना नहीं चाहती, तो वे क्यों रहें ? राजधानी के लिए गैरसैण का चयन राज्य बनने से पहले ही हो गया था। सरकार ने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए अरबों रुपया खर्च कर वहां विधान भवन आदि बनाये भी हैं; पर देहरादून की सुख-सुविधा छोड़कर कोई नेता या अधिकारी वहां स्थायी रूप से बसना नहीं चाहता।

यों तो हर व्यक्ति वर्तमान से आगे बढ़ना चाहता है। मैदानी क्षेत्रों में गांव के सम्पन्न लोग शहर में भी एक मकान बना लेते हैं। फिर परिवार के कुछ लोग स्थायी रूप से वहीं बस जाते हैं। अर्थात पलायन वहां भी है; पर उत्तराखंड में पलायन खतरनाक है। चूंकि यह राज्य चीन और नेपाल की सीमा से लगा है। यदि सीमावर्ती गांव खाली हो गये, तो वहां कब शत्रु आकर बैठ जाए, कहना कठिन है। एक खास बात यह भी है कि पलायन की चिंता बड़ी आयु वालों को ही है। युवा पीढ़ी अपना कैरियर बनाने में व्यस्त है। कई पेंशनभोगी बुजुर्ग गांव में रहना चाहते हैं; पर स्वास्थ्य की चिंता तथा बच्चों का मोह उन्हें बांध लेता है। ऐसे में यदि पलायन रोकना है, तो केन्द्र और राज्य सरकार के साथ समाज को भी मिलकर काम करना होगा।