शनिवार, 11 अगस्त 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दलित

दलित शब्द कब, कहां और क्यों प्रचलित हुआ, इस पर कई मत हैं। प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था के बावजूद दलित नहीं थे। कहते हैं कि भारत में इस्लामी हमलावरों ने कुछ लोगों का दलन और दमन कर उन्हें घृणित कामों में लगाया। आज भी किसी चीज को बुरी तरह तोड़ने को दलना ही कहते हैं। दाल और दलिया शब्द यहीं से बना है। 

सैकड़ों साल तक ऐसा होने पर ये लोग ‘दलित’ कहलाने लगे, जबकि ये प्रखर हिन्दू थे। इनमें से अधिकांश क्षत्रिय थे और इनके राज्य भी थे; पर फिर इनकी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और शैक्षिक दशा बिगड़ती गयी और ये अलग-थलग पड़ गये। अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक इन भेदों को और बढ़ाया। आजकल सरकारी भाषा में इस वर्ग को अनुसूचित जाति कहते हैं। 

आजादी के बाद सबने सोचा था कि ये स्थिति बदलेगी; पर वोट के लालची सत्ताधीशों ने कुछ नहीं किया। अब चूंकि ये बहुत बड़ा वोट बैंक बन चुके हैं, इसलिए सब दलों की इन पर निगाह है। अतः कांग्रेस वाले भा.ज.पा. को और भा.ज.पा. वाले कांग्रेस को दलित विरोधी बताते हैं। 

इन दिनों राहुल बाबा भा.ज.पा. को कोसते हुए संघ को भी उसमें लपेट लेते हैं। यद्यपि इससे उन्हीं का नुकसान हो रहा है। वो संघ को जितना गाली देंगे, संघ वाले चुनाव में उतनी ताकत से कांग्रेस का विरोध करेंगे। इसका दुष्परिणाम 2014 में वे देख ही चुके हैं। गत नौ अगस्त को भी राहुल बाबा ने एक रैली में संघ को दलित विरोधी कहा।  

संघ यद्यपि इस सामाजिक विभाजन को ठीक नहीं मानता; पर जमीनी सच तो ये है ही। इसलिए ‘जाति तोड़ो’ जैसे राजनीतिक आंदोलन चलाने की बजाय संघ इनकी आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक स्थिति सुधारने का प्रयास कर रहा है। अपने गली-मोहल्ले के लोगों के सुख-दुख में सहभागी होना स्वयंसेवक का स्थायी स्वभाव है। इसीलिए विरोधी विचार वाले भी उसका आदर करते हैं। 

आपातकाल के बाद संघ का नाम और काम बढ़ने पर सेवा कार्यों को संगठित रूप दिया गया। सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस का इस पर बहुत जोर था। 1989 में संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार की जन्मशती वर्ष का केन्द्रीय विचार सेवा ही था। अतः संघ की रचना में भी ‘सेवा विभाग’ शामिल कर हर राज्य में ‘सेवा भारती’ आदि संस्थाओं का गठन किया गया। 

ये संस्थाएं नगर तथा गांवों की निर्धन बस्तियों में शिक्षा, चिकित्सा तथा संस्कार के काम करती हैं। डा. हेडगेवार जन्मशती के अवसर पर ‘सेवा निधि’ एकत्र कर कार्यकर्ताओं की एक विशाल मालिका तैयार की गयी। इनके बल पर आज स्वयंसेवक डेढ़ लाख से भी अधिक सेवा प्रकल्प चला रहे हैं। 

कुछ संस्थाएं ग्राम्य विकास के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। संघ के अलावा भी देश भर में हजारों संस्थाएं सच्चे मन से सेवा में संलग्न हैं। इनमें समन्वय बना रहे तथा वे एक-दूसरे के अनुभव का लाभ उठाएं, इसके लिए ‘राष्ट्रीय सेवा भारती’ का गठन हुआ है। अब हर राज्य में ‘सेवा संगम’ आयोजित किये जाते हैं। इनमें सैकड़ों संस्थाएं अपने स्टाॅल तथा प्रदर्शिनी आदि लगाती हैं। इससे छोटी संस्थाओं को भी पहचान मिलती है। हर पांचवे साल इनका राष्ट्रीय सम्मेलन भी होता है। 

अधिकांश हिन्दू मंदिर तथा धार्मिक संस्थाएं भी कुछ सेवा के काम करती हैं। इन्हें जोड़ने के लिए कई राज्यों में हिन्दू आध्यात्मिक मेले प्रारम्भ हुए हैं। सेवा निजी ही नहीं, सामाजिक साधना भी है। अतः कई संस्थाएं बनाकर स्वयंसेवक समाज की जरूरत के अनुसार काम कर रहे हैं। 

वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती, सेवा भारती, विश्व हिन्दू परिषद, भारत विकास परिषद, विद्यार्थी परिषद, दीनदयाल शोध संस्थान, भारतीय कुष्ठ निवारक संघ, विवेकानंद केन्द्र आदि का इनमें विशेष योगदान है। इनके द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास से रोजगार, ग्राम एवं कृषि विकास, कुरीति निवारण, नारी उत्थान और स्वावलम्बन, गो संवर्धन जैसे हजारों प्रकल्प चलाये जा रहे हैं। अनुसूचित जाति और जनजातियां इनसे विशेष रूप से लाभान्वित होती हैं।

संघ के कार्यकर्ता जिस निर्धन बस्ती में काम करते हैं, वहां अपनी राजनीतिक दुकान लगाये नेता उनका विरोध करते हैं; पर कुछ समय बाद बस्ती के लोग उन नेताओं को ही भगा देते हैं। क्योंकि सेवा के कार्य से उस बस्ती वालों का ही भला होता है। राहुल बाबा चाहे जितना चिल्लाएं; पर संघ का काम इन बस्तियों में लगातार बढ़ रहा है।

बुधवार, 8 अगस्त 2018

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और महिलाएं

जब से राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं, तब से वे कुछ अधिक ही बोलने लगे हैं; पर इससे उनका अज्ञान भी लगातार प्रकट हो रहा है। वे कई बार कह चुके हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महिला विरोधी है। गत सात अगस्त 2018 को दिल्ली में कांग्रेस के महिला सम्मेलन में उन्होंने फिर यही बात दोहरायी। 

असल में उन्हें पता ही नहीं है कि संघ केवल पुरुषों का संगठन है। इसमें महिलाएं सदस्य बन ही नहीं सकतीं; पर ऐसा ही ‘राष्ट्र सेविका समिति’ नाम का महिला संगठन भी है, जिसमें पुरुष नहीं जाते। दोनों के कार्यालय, कार्यकर्ता और शाखाएं अलग हैं। शाखा में मुख्यतः शारीरिक कार्यक्रम (खेल, आसन, व्यायाम आदि) होते हैं। इन्हें लड़के और लड़कियां या पुरुष और स्त्रियां एक साथ नहीं कर सकते। 

जैसे कबड्डी को ही लें। इसमें खिलाड़ी आपस में गुत्थमगुत्था हो जाते हैं। अतः इसे युवक और युवतियां एक साथ नहीं खेल सकते। ऐसा ही अन्य कार्यक्रमों के साथ है। इसलिए संघ की शाखा पूरी तरह पुरुष वर्ग की होती है और समिति की शाखा महिला वर्ग की। साल में एक-दो कार्यक्रम सामूहिक भी होते हैं; पर व्यावहारिक कठिनाई के कारण दोनों की दैनिक गतिविधि, शाखा, शिविर आदि अलग हैं।

आइए, राष्ट्र सेविका समिति के बारे में कुछ जानें। शाखा में जाने से स्वयंसेवक के विचार और व्यवहार में भारी परिवर्तन होता है। ऐसा ही अनुभव हुआ वर्धा निवासी श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर को, जब उनके बेटे शाखा जाने लगे। इससे उनके मन में यह भावना पैदा हुई कि ऐसा ही संगठन महिलाओं और लड़कियों के लिए भी होना चाहिए। कुछ दिन बाद जब संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार वर्धा आये, तो श्रीमती केलकर ने उनसे भेंट की। डा. जी ने उनके विचारों का स्वागत करते हुए उन्हें महिला वर्ग के लिए अलग संगठन बनाने को कहा। डा. जी ने कहा कि ये दोनों संगठन रेल की पटरियों की तरह साथ-साथ और एक दूसरे के पूरक बन कर तो चलेंगे; पर आपस में मिलेंगे नहीं। 

इस प्रकार विजयादशमी (25 अक्तूबर, 1936) को वर्धा में ‘राष्ट्र सेविका समिति’ की स्थापना हुई। इसकी कार्यशैली संघ जैसी ही है। समिति में भी गुरु का स्थान व्यक्ति बजाय ‘परम पवित्र भगवा ध्वज’ को दिया गया है। इसकी शाखा तथा शिविरों में नारियों को शारीरिक और मानसिक रूप से सबल और समर्थ बनाने वाले कार्यक्रमों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

श्रीमती केलकर (वंदनीय मौसी जी) अति सामाजिक, धार्मिक और साहसी महिला थीं। 1947 में देश विभाजन से कुछ समय पूर्व तक उन्होंने कराची तथा सिंध में प्रवास किया था। समिति जीजाबाई के मातृत्व, रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व और देवी अहिल्याबाई होल्कर की कर्तव्यपरायणता को नारियों के लिए आदर्श मानती है। इसके साथ ही सेविकाएं दुष्टों को मारने और सज्जनों को अभयदान देने वाली देवी पार्वती के अष्टभुजा रूप की भी वंदना करती हैं। 

समिति पांच उत्सव (वर्ष प्रतिपदा, गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, विजयादशमी तथा मकर संक्रांति) अपनी शाखाओं में मनाती हैं। इसके अलावा देश, धर्म और समाज के उत्थान में योगदान देने वाली महान महिलाओं की जयंती तथा पुण्यतिथियां भी मनायी जाती हैं। हर चार-पांच साल बाद राष्ट्रीय सम्मेलन होते हैं।

हिन्दू संस्थाओं द्वारा समय-समय पर चलाये गये गोरक्षा, कश्मीर बचाओ, असम समस्या, धर्मान्तरण का विरोध, स्वदेशी का प्रचलन, श्रीराम जन्मभूमि जैसे राष्ट्रीय अभियानों में भी सेविकाएं सक्रिय रहती हैं। समिति ने अपने बलबूते पर भी कई देशव्यापी कार्यक्रम किये हैं। इनमें वंदे मातरम् स्मृति शताब्दी, डा. अम्बेडकर जन्मशती, रानी लक्ष्मीबाई का 125 वां बलिदान दिवस, भगिनी निवेदिता का 125 वां जन्मदिवस, देवी अहिल्या द्विशताब्दी, रानी मां गाइडिन्ल्यू जन्मशती आदि प्रमुख हैं। देश की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात सैनिकों को राखी भेजने की शुरुआत समिति ने ही की थी। अब इसे अनेक अन्य संस्थाओं ने भी अपना लिया है।  

समिति चित्र प्रदर्शिनी, संस्कार केन्द्र, नाटक, कथा, विद्यालय, चिकित्सालय, छात्रावास, पुस्तकालय, वाचनालय, भजन मंडली, योगासन केन्द्र, पुरोहित प्रशिक्षण, साहित्य प्रकाशन आदि से समाज की सेवा कर रही है। समिति द्वारा हिन्दू संवत्सर के अनुसार छपने वाली ‘वार्षिक दिनदर्शिका’ देश ही नहीं, तो विदेश में भी बहुत लोकप्रिय है। 

समिति की अनेक सेविकाएं शिक्षा, नौकरी या कारोबार के लिए विदेश जाती रहती हैं। हजारों सेविकाएं विवाह के बाद वहीं बस गयी हैं। वे वहीं समिति का काम करती हैं। विदेशों में संघ की अधिकांश शाखाएं साप्ताहिक हैं। उनमें स्वयंसेवक सपरिवार आते हैं। इससे भी वहां समिति का काम बढ़ रहा है। विदेश में बसे स्वयंसेवक एवं उनके परिजनों के लिए प्रायः हर पांच साल बाद भारत में एक सप्ताह का शिविर होता है। इसमें समिति की सेविकाएं भी आती हैं।