रविवार, 31 मार्च 2019

भा.ज.पा. के साहसी निर्णय

पूरे देश में लोकसभा चुनाव की गरमी पूरे यौवन पर है। प्रत्याशियों की घोषणाएं हो रही हैं। हर दिन दलबदल के समाचार सुर्खियां बन रहे हैं। इस दल से उसमें तथा उससे इसमें आने को स्वार्थी नेतागण दलबदल की बजाय दिलबदल कह रहे हैं; पर सच्चाई सबको पता है। आयाराम-गयाराम की राजनीति भारत में नयी नहीं है। ऐसे अवसरवादी लोगों के लिए ही ‘‘जहां मिलेगी तवा परात, वहीं कटेगी सारी रात’’ वाली कहावत बनी है।


इस चुनावी दौर में वंशवाद भी अपने पूरे वीभत्स रूप में प्रकट होता है। किसी का टिकट काटकर उसकी पत्नी या बेटे को देना आम बात है। वंशवादी राजनीति की नींव भारत में कांग्रेस ने डाली। मोतीलाल नेहरू ने राजनीति छोड़ते समय गांधी जी से यह वचन ले लिया था कि भविष्य में वे हर जगह जवाहरलाल को महत्व देंगे। इसका रहस्य क्या था, ये तो पता नहीं; पर गांधी जी ने इस वचन को आजीवन निभाया। इससे देश को कितनी हानि हुई, इसका संपूर्ण विश्लेषण अभी बाकी है; पर इतना निश्चित है कि कांग्रेस में यह बीमारी इंदिरा गांधी, संजय, राजीव, सोनिया, राहुल और अब प्रियंका तक निर्बाध रूप से चल रही है।

इसकी देखादेखी देश के अधिकांश राजनीतिक दल आज निजी जागीर बन कर रह गये हैं। अखिलेश यादव, मायावती,  अजीत सिंह, प्रकाश सिंह बादल, लालू यादव, ओमप्रकाश चैटाला, रामविलास पासवान, चंद्रबाबू नायडू, के.चंद्रशेखर राव, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, शरद पवार, उद्धव ठाकरे.. आदि केवल नाम नहीं, एक पार्टी भी हैं। इनकी इच्छा ही वहां आदेश माना जाता है। इनके पैर छुए बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकता। ये बात दूसरी है कि पीढ़ी बदलते ही पार्टी में जूतमपैजार होने लगती है और फिर उसे टूटते देर नहीं लगती। उ.प्र. में मुलायम परिवार, हरियाणा में चैटाला परिवार, महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार आदि इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। आंध्र में चंद्रबाबू नायडू ने अपने ससुर की विरासत कब्जा ली, जबकि एन.टी.रामाराव के बेटे पीछे रह गये।

कुछ दलों में परिवार की विरासत के साथ ही जातीय  या मजहबी किलेबंदी भी पूरी है। एक जाति या मजहब का एक दल। मायावती, पासवान, अखिलेश, नीतीश, लालू आदि का अपने जाति पर कब्जा है। ये जहां रहेंगे, उनके सजातीय वोट भी वहां चले जाते हैं। इसलिए चुनाव के समय बने गठबंधन केवल जातीय वोटों का जोड़तोड़ ही होते हैं। वहां न समान विचारधारा है और न कार्यक्रम। अजीत सिंह, महबूबा, उमर अब्दुल्ला, औवेसी, राजभर जैसे कई छुटभैये नेता किसी एक राज्य के कुछ जिलों में प्रभाव रखते हैं। चुनाव में इनकी पूछ भी बढ़ जाती है।

इसी तरह राजनेताओं के लिए उम्र कुछ अर्थ नहीं रखती। वह एक बढ़ती संख्या मात्र है। यदि भावना में बहकर उनके मजहबी, जातीय या क्षेत्रीय वोटर गोलबंद हो जाते हैं, तो वे मरते दम तक चुनाव लड़ सकते हैं। बुढ़ापा भगाने की सर्वश्रेष्ठ दवा चुनाव ही है। देवेगोड़ा, मुलायम सिंह, मनमोहन सिंह, नरसिंहराव, अजीत सिंह, प्रकाश सिंह बादल आदि उदाहरण सामने हैं।

ऐसे माहौल में भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह के नेतृत्व में कुछ नये और शुभ संकेत दिये हैं। उन्होंने वंशवाद और मरते दम तक की जाने वाली राजनीति पर गहरी चोट की है। मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही अपने मंत्रिमंडल में उन लोगों को रखा, जिनकी आयु 75 वर्ष से कम थी। अब उन्होंने ऐसे सांसदों को फिर से टिकट नहीं दिया, जो इस आयुसीमा से अधिक के हो गये हैं। लालकृष्ण आडवानी, भुवनचंद्र खंडूरी, भगतसिंह कोश्यारी की सीटों पर नये प्रत्याशी घोषित हो चुके हैं। कलराज मिश्र ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया है। मुरली मनोहर जोशी चुप हैं; पर यह स्पष्ट है कि उन्हें भी टिकट नहीं मिलेगा।

उत्तराखंड में खंडूरी जी का संबंध कांग्रेस नेता हेमवती नंदन बहुगुणा के परिवार से है। यद्यपि वे भी चरणसिंह की तरह दलबदल के उस्ताद थे। इस परिवार में विजय बहुगुणा, साकेत बहुगुणा, रीता बहुगुणा जोशी और खंडूरी जी की बेटी आजकल भा.ज.पा. की ओर से राजनीति में  सक्रिय है। खंडूरी जी चाहते थे कि भा.ज.पा. उनके बेटे मनीष को उनकी जगह सांसद का चुनाव लड़ाये; पर पार्टी ने मना कर दिया। अतः उसने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। इसमें परिवार की कितनी शह है, यह तो समय ही बताएगा।

वंशवादी कांग्रेस में तो अधिकांश टिकट घूमफिर कर कुछ परिवारों में ही बंट जाते हैं। भा.ज.पा. में यद्यपि निचले स्तर पर तो वंशवाद है; पर शीर्ष नेतृत्व इससे मुक्त है। काफी समय से यह तो साफ था कि आडवाणी जी इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे; पर उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, इस बारे में कई चर्चाएं थीं। उनका बेटा राजनीति से दूरी बनाकर अपने कारोबार में व्यस्त रहता है; पर उनकी बेटी प्रतिभा सामाजिक और राजनीतिक कामों में सक्रिय है। वह दिल्ली और गांधीनगर में प्रायः पिता के साथ दिखायी भी देती है। लोग सोचते थे कि वह उनकी राजनीतिक उत्तराधिकारी होगी; पर इससे भा.ज.पा. में भी शीर्ष नेतृत्व पर वंशवाद का आरोप लग जाता। अतः आडवाणी जी ने इसके लिए साफ मना कर दिया।

आडवाणी जी पर आज पार्टी में भले ही कोई जिम्मेदारी न हो; पर भा.ज.पा. को दो से 200 तक पहुंचाने में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। उन्हें राजनीति में आदर्श माना जाता है। एक समय तो अटल जी की बजाय भा.ज.पा. में उन्हें ही संघ का वास्तविक प्रतिनिधि माना जाता था। इसलिए आडवाणी जी और भा.ज.पा. के वर्तमान नेतृत्व का यह निर्णय बहुत ही अच्छा है। इससे देश भर के पार्टीजनों को स्पष्ट संदेश गया है।

भा.ज.पा. को आगे बढ़कर कुछ नियम और भी बनाने चाहिए। जैसे एक परिवार से एक ही व्यक्ति चुनावी राजनीति में रहे। इससे मेनका गांधी, राजनाथ सिंह और डा. रमन सिंह जैसों को तय करना होगा कि राजनीति में उन्हें रहना है या उनके बेटों को। इसी तरह चुनावी राजनीति में आने और जाने की आयुसीमा का निर्धारण भी जरूरी है। कई समाजशास्त्रियों का मत है कि यह 50 और 75 होनी चाहिए। सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कुछ करने के लिए 25 साल कम नहीं होते। महिलाओं का एक तिहाई प्रतिनिधित्व भी होना ही चाहिए।

यद्यपि ऐसे नियम बनाने के लिए सब दलों की सहमति और संविधान में संशोधन जरूरी है; पर किसी भी चीज की शुरुआत कहीं से तो होती ही है। भा.ज.पा. ने वंशवाद और चुनावी राजनीति में आयुसीमा पर एक बड़ी लाइन खींची है। यह जितनी दूर तक जाएगी, देश का उतना ही भला होगा।