बुधवार, 5 जून 2019

अब अलोकतांत्रिक दलों की बारी


2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी हार सामान्य घटना नहीं है। यह इस बात की प्रतीक है कि अब भारतीय राजनीति में कांग्रेस जैसे विचारहीन और अलोकतांत्रिक दलों के दिन पूरे हो रहे हैं।

1947 से पहले कांग्रेस गांधीजी के नेतृत्व में आजादी के लिए अहिंसक संघर्ष करने वाले सभी लोगों और समुदायों का एक मंच थी। इसीलिए आजादी के बाद उन्होंने इसे भंग करने का सुझाव दिया था, जिससे लोग अपने विचारों के अनुसार राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ें। फिर जनता जिसे चुने, वह देश चलाये; पर सत्तालोभी नेहरू यह पकी खीर छोड़ने को राजी नहीं हुए। गांधीजी इससे बहुत दुखी थे। उनकी हत्या देश के लिए दुखद थी; पर इससे नेहरू की लाटरी खुल गयी। क्रमशः इस परिवार ने पार्टी पर कब्जा कर लिया। तब से कांग्रेस पार्टी नेहरू, इंदिरा, संजय, राजीव और अब मैडम सोनिया परिवार की बंधक है।

कांग्रेस का इतिहास रहा है कि जिस किसी ने इस प्रथम परिवार से आगे बढ़ने की कोशिश की, उसे पटरी से उतार दिया गया। गांधीजी ने कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में लोकतांत्रिक विधि से अध्यक्ष चुने गये सुभाष चंद्र बोस को साल भर भी टिकने नहीं दिया। उन्हें भय था कि जनता और सेना में लोकप्रिय सुभाष बाबू कहीं जवाहर लाल नेहरू से आगे न निकल जाएं। फिर उन्होंने कुशल प्रशासक और राज्यों से समर्थन प्राप्त सरदार पटेल को पीछे कर नेहरू को प्रधानमंत्री बनवा दिया। नेहरू ने भी राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, मालवीयजी, डा. अम्बेडकर, आचार्य कृपलानी जैसे योग्य नेताओं को सदा हाशिये पर ही रखा।

उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने भी इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। उन्होंने यही व्यवहार मोरारजी देसाई, के.कामराज, जगजीवनराम, नीलम संजीव रेड्डी आदि के साथ किया। इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद राजीव ने कांग्रेस के अनुभवी और वरिष्ठतम नेता प्रणव मुखर्जी को पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मैडम सोनिया के कारण शरद पवार, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, के.चंद्रशेखर राव, जगन मोहन रेड्डी आदि पार्टी से बाहर हुए। आज ये सब नेता और उनके दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस के विकल्प बन चुके हैं।

राहुल के कारण हेमंत बिस्व शर्मा ने पार्टी छोड़ी और अब वे पूर्वोत्तर भारत में कांग्रेस की जड़ंे खोद रहे हैं। कई बार अपमानित होकर पंजाब के कैप्टेन अमरिन्द्र सिंह ने जब पार्टी छोड़ने की धमकी दी, तब जाकर उन्हें पिछली विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया गया। अन्यथा वहां भी कांग्रेस साफ हो जाती। पूरे देश में जमीनी नेता कांग्रेस से दूर जा रहे हैं, चूंकि इस परिवार को यह पसंद नहीं है कि कोई इनसे आगे निकल सके।

इस कांग्रेसी कुसंस्कृति से निकले बाकी दलों का भी यही हाल है। मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, लालू यादव, अजीत सिंह, शरद यादव, रामविलास पासवान, ओमप्रकाश चैटाला, चंद्रबाबू नायडू, देवेगोड़ा, फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती आदि ऐसे ही नाम हैं। सत्ता के साथ रहना ही इनकी एकमात्र नीति है। मायावती, प्रकाश सिंह बादल, ठाकरे और करुणानिधि के पुत्र स्टालिन जैसे एक व्यक्ति एक पार्टीके पुरोधा जब तक जीवित हैं, तब तक पार्टी उनकी जेब में रहेगी। उसके बाद उसमें टूट-फूट तय है। हमारा लोकतंत्र ऐसे ही अलोकतांत्रिक, घरेलू और जातीय दलों के कंधे पर आगे बढ़ रहा है। इसे दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे ?

इस बारे में अपवाद दो ही दल हैं। एक हैं वामपंथी और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। कई टुकड़ों में बंटा वामपंथ लगातार सिकुड़ रहा है, चूंकि वह धर्मविरोधी और हिंसाप्रेमी है। भारतीय जनता धर्मप्राण है और वह राजनीतिक हिंसा पसंद नहीं करती। इसलिए जैसे ही उसे विकल्प मिलता है, वह वामपंथ को खारिज कर देती है। बंगाल में यह विकल्प ममता बनर्जी, त्रिपुरा में भा.ज.पा. और केरल में कांग्रेस बन गयी है।

जहां तक भा.ज.पा. की बात है, उस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुछ नियंत्रण रहता है। इसीलिए पहले जनसंघ और आज भा.ज.पा. लोकतांत्रिक बनी हुई है। उसका कोई अध्यक्ष एक-दूसरे का रिश्तेदार नहीं हैं। घरेलू दलों में सबको पता है कि नेताजी जब तक चाहेंगे, तब तक अध्यक्ष रहेंगे और उसके बाद उनका बेटा या बेटी इस कुरसी पर बैठेगा। भा.ज.पा. में नया अध्यक्ष बनना तय है; पर वह कौन होगा, कहना कठिन है। उसके नाम पर चिंतन और मंथन हो रहा है। संभवतः जुलाई में यह तय हो सकेगा।

2019 के चुनाव में यद्यपि कई घरेलू दलों को सफलता मिली है। इनमें नवीन पटनायक, जगनमोहन रेड्डी और स्टालिन के नाम विशेष हैं; पर ये भी अधिक दिन नहीं टिक सकेंगे। भारत में कांग्रेस के कारण घरेलू दलों का प्रादुर्भाव हुआ है। अब जैसे-जैसे कांग्रेस का अवसान हो रहा है, वैसे-वैसे ये दल भी अंत को प्राप्त होंगे। बंगाल के अगले विधानसभा चुनाव में यदि भा.ज.पा. जीत गयी, तो ममता की पार्टी टूट जाएगी। बिहार में लालू और उ.प्र. में मुलायम का जलवा समाप्ति पर है। बिना किसी बैसाखी के नीतीश कुमार भी बेकार हैं। उड़ीसा में नवीन बाबू और पंजाब में प्रकाश सिंह बादल भी अब बुजुर्ग हो चले हैं। उनके जाते ही उनके दल भी बिखर जाएंगे। दक्षिण में ऐसे दलों को समाप्त होने में शायद थोड़ा समय और लगेगा। यद्यपि कर्नाटक से इसकी शुरुआत हो चुकी है।

असल में कांग्रेस ने प्रथम परिवार को सुरक्षित रखने के लिए कभी किसी क्षेत्रीय नेता को नहीं उभरने दिया; पर भा.ज.पा. में राज्यों के नेताओं केे भी अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बनने की पूरी संभावनाएं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और राजनाथ सिंह (उ.प्र.), नितिन गडकरी (महाराष्ट्र), लालकृष्ण आडवानी, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह (गुजरात), कुशाभाऊ ठाकरे (म.प्र.), बंगारू लक्ष्मण और वेंकैया नायडू (आंध्र), जना कृष्णमूर्ति (तमिलनाडु)...आदि इसके उदाहरण हैं। अतः भा.ज.पा. के केन्द्र और इन राज्यों में प्रभावी होने पर ये घरेलू और जातीय दल भी समाप्त होंगे।

राज्य या क्षेत्रीय दल सदा बुरे नहीं होते; पर जब वे अपने परिवार, जाति, जिले या राज्यहित के आगे देशहित को भूल जाते हैं, तब उनका अस्तित्व देश के लिए घातक हो जाता है। दुर्भाग्यवश अधिकांश दलों की स्थिति यही है। वे कांग्रेस के साथ हों या भा.ज.पा. के; पर अब इन क्षेत्रीय, जातीय, घरेलू और अलोकतांत्रिक दलों के दिन सीमित रह गये हैं।

भारत में सरकार बनाने और चलाने के लिए तो नियम हैं; पर राजनीतिक दलों के निर्माण और संचालन के नियम नहीं है। अलोकतांत्रिक दलों के कारण हमारा लोकतंत्र तमाशा बन कर रह गया है। भा.ज.पा. को इस बार बंपर बहुमत मिला है। अगले साल राज्यसभा में भी उसका बहुमत हो जाएगा। यदि वह साहसपूर्वक कुछ ऐसे नियम बनाये, जिससे सब दलों में आतंरिक लोकतंत्र बहाल हो सके, तो देश का बहुत भला होगा।

सोमवार, 3 जून 2019

कांग्रेस और सोनिया परिवार का भविष्य

भारत में हर पांच वर्ष में होने वाला लोकतंत्र का महापर्व सम्पन्न हो चुका है। चुनाव हो गये, परिणाम आ गये। बंगाल में हिंसा हुई। जिन्हें हार का डर था, उन्होंने वोट मशीनों को लेकर खूब हल्ला किया; पर गिनती के बाद अब वे अपने बाल नोच रहे हैं। भा.ज.पा. को पहले से भी अधिक सीटें मिली। जैसे गेहूं के साथ खरपतवार को भी पानी लग जाता है, वैसे ही रा.ज.ग. के उसके साथियों को भी फायदा हुआ; पर आठ सीटें बढ़ने के बावजूद कांग्रेस की लुटिया डूब गयी, इसमें कोई संदेह नहीं है।


इस बीच मोदी सरकार बनी और मंत्रियों ने काम संभाल लिया। अब वे सरकारी काम में व्यस्त हैं। उधर कांग्रेस अपने भविष्य के लिए चिंतित है। राहुल बाबा की मुख्य भूमिका वाला नाटक ‘त्यागपत्र’ मंचित हो रहा है। उन्होंने फरमान जारी किया है कि एक महीने में कांग्रेस अपना नया अध्यक्ष ढूंढ ले, जो सोनिया परिवार से न हो। इशारा सीधे-सीधे प्रियंका वाड्रा की ओर है। उन्हें लाये तो इस आशा से थे कि उ.प्र. में कुछ सीट बढ़ेंगी; पर छब्बे बनने के चक्कर में चैबेजी दुब्बे ही रह गये। पिछली बार दो सीट मिली थी, जो घटकर इस बार एक ही रह गयी। अपनी खानदानी सीट पर ही बेचारे अध्यक्षजी बुरी तरह हार गये। किसी ने ठीक ही कहा है -

न खुदा ही मिला न बिसाल ए सनम
न इधर के रहे न उधर के रहे।।

सच तो ये है कि यदि भा.ज.पा. पांच साल पहले स्मृति ईरानी की ही तरह किसी दमदार व्यक्तित्व को रायबरेली में लगा देती, तो कांग्रेस की मम्मीश्री को भी लेने के देने पड़ जाते; पर उनकी किस्मत बेटाजी के मुकाबले कुछ ठीक थी। लेकिन बुरी तरह हारने के बावजूद बेटाजी की मानसिकता अब भी खुदाई सर्वेसर्वा वाली है। यदि वे अध्यक्ष रहना नहीं चाहते, तो पार्टीजन किसे चुनें, इससे उन्हें क्या मतलब है; पर उन्हें पता है कि यह सब नाटक है, जो कुछ दिन में शांत हो जाएगा। इसके बाद पार्टी फिर से मां-बेटा और बेटी-दामाद के अधीन हो जाएगी।

कांग्रेस का भविष्य क्या होगा, ये शीशे की तरह साफ है। उत्तर भारत में उसका सफाया हो चुका है। उसे इस बार जो सीट मिली हैं, उनमें से पंजाब की सीटें वस्तुतः अमरिन्द्र सिंह की सीटें हैं। अगर कल वे किसी कारण से पार्टी छोड़ दें, या अपना निजी दल बना लें, तो वहां कांग्रेस को कोई पानी देने वाला भी नहीं बचेगा। और इस बात की संभावना भरपूर है। क्योंकि राहुल के दरबार में केवल चमचों को ही पूछा जाता है, जबकि कैप्टेन अमरिन्द्र सिंह जमीनी नेता हैं। फौजी होने के कारण वे काम में विश्वास रखते हैं, चमचाबाजी में नहीं।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने जीते थे। इससे उसके हौसले बुलंद थे। राहुल को लगता था कि इन तीनों राज्यों से कम से कम कांग्रेस को 50 सीटें मिल जाएंगी; पर मिली केवल तीन। कमलनाथ ने एक तीर से दो शिकार किये। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को और भावी मुख्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को निबटा दिया। दिग्विजय का तो अब कोई भविष्य नहीं है; पर सिंधिया के भा.ज.पा. में चले जाने की पूरी संभावना है।

राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की आपसी लड़ाई ने खेल बिगाड़ दिया। पायलट चाहते थे कि अशोक गहलोत की नाक थोड़ी छिले, जिससे वे पूरे मुख्यमंत्री बन सकें; पर जनता ने दोनों की नाक ही काट ली। अब म.प्र. और राजस्थान की सरकारों पर भी खतरा मंडरा रहा है। छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भूपेश बघेल ने अच्छा प्रदर्शन किया था। कांग्रेस को असली जीत तो वहीं मिली थी; पर मोदी लहर के चलते लोकसभा चुनाव में बाजी पलट गयी।

कर्नाटक में सरकार होने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन लचर रहा। अब वहां की सरकार भी खतरे में है। कांग्रेस की इज्जत केवल केरल में बची, जहां मुस्लिम लीग का उसे समर्थन था। राहुल भी सुरक्षित सीट की तलाश में वायनाड इसीलिए गये थे। शेष दक्षिण में तेलंगाना में तीन और तमिलनाडु में द्रमुक के समर्थन से उसे आठ सीट मिली हैं। अर्थात पंजाब, केरल और तमिलनाडु के अलावा सभी जगह कांग्रेस को औरों द्वारा छोड़ी गयी जूठन से ही संतोष करना पड़ा है। 30-40 और उससे अधिक सीटों वाले राज्य में एक या दो सीट जूठन ही तो है।

अब प्रश्न यह है कि कांग्रेस की यह दुर्दशा क्यों हुई ? उत्तर भी सीधा सा है कि इसका कारण लचर नेतृत्व है। असल में कांग्रेस गांधी-नेहरू और अब सोनिया परिवार की जकड़ से बाहर आना नहीं चाहती। इंदिरा गांधी के समय से ही पार्टी को इस परिवार ने बंधक बना रखा है। जैसे लम्बे समय तक पिंजरे में बंद पक्षी पिंजरा खुलने पर भी बाहर नहीं निकलता, यही हालत कांग्रेस वालों की हो गयी है। उनका मनोबल गिर चुका है। इस परिवार से हटकर जो लोग कांग्रेस में आगे बढ़े, उनका अपमान कौन भूल सकता है ? सीताराम केसरी को पार्टी के कार्यालय में धक्के देकर कुर्सी से हटाया गया था। नरसिंहराव के शव तक को भी कांग्रेस दफ्तर में नहीं आने दिया गया था। मनमोहन सिंह केबिनेट के निर्णय को प्रेस वार्ता में राहुल ने फाड़ दिया था। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष बनकर अपमानित होने से अच्छा चुपचाप रहकर जो लाभ मिल सके, उसे उठाना ही है। इसीलिए मनोबल से शून्य सब कांग्रेसी फिर से राहुल को ही अध्यक्ष बने रहने के लिए हुआं-हुआं कर रहे हैं।

सच तो ये है कि सोनिया परिवार भी कांग्रेस से कब्जा नहीं छोड़ सकता। कांग्रेस भले ही रसातल में हो; पर उसके पास अथाह सम्पत्ति तो है ही। यदि कोई और अध्यक्ष बन गया, और उसने सोनिया परिवार को इस सम्पदा से बेदखल कर दिया; तो फिर ये लोग कहां जाएंगे ? सोनिया परिवार के हर सदस्य पर घोटालों के कारण जेल का खतरा मंडरा रहा है। यदि राहुल अध्यक्ष बने रहेंगे, तो उनके जेल जाने पर पूरी पार्टी हंगामा करेगी; और यदि वे अध्यक्ष न रहे, तो कोई क्यों चिल्लाएगा ? इसलिए चाहे जो हो; पर राहुल ही पार्टी के अध्यक्ष बने रहेंगे; और यदि कोई कुछ दिन के लिए खड़ाऊं अध्यक्ष बन भी गया, तो पैसे की पावर सोनिया परिवार के हाथ में ही रहेगी।

इसलिए फिलहाल तो कांग्रेस और राहुल दोनों का भविष्य अंधकार में ही है। केरल के अलावा पूरे देश में किसी राज्य में कांग्रेस सांसदों की संख्या दहाई में नहीं है। कांग्रेस वाले इतने निराश हो चुके हैं कि उन्होंने एक महीने तक टी.वी. की वार्ताओं में भी जाने से मना कर दिया है। ठीक भी तो है; अध्यक्षजी की मूर्खताओं के लिए वे गाली क्यों खाएं ?

यद्यपि लोकतंत्र में सबल विपक्ष का होना भी जरूरी है; पर कांग्रेस जिस तरह लगातार सिकुड़ और सिमट रही है, वह चिंताजनक है। अतः जो जमीनी और सचमुच देश से प्यार करने वाले कांग्रेसी हैं, उन्हें एक साथ मिलकर सोनिया परिवार के विरुद्ध विद्रोह करना चाहिए। उन्हें चाहिए कि सबसे पहले वे कांग्रेस में लोकतंत्र बहाल करें। सोनिया परिवार भारत में रहे या विदेश में; संसद में रहे या जेल में। उसे अपने हाल पर छोड़ दें। चूंकि व्यक्ति से बड़ा दल और दल से बड़ा देश है।

पर क्या वे ऐसी हिम्मत करेंगे ? कांग्रेस का भविष्य इसी से तय होगा।