शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

युद्ध और मनोबल

किसी भी लड़ाई में शारीरिक दमखम और अस्त्र-शस्त्रों के साथ मनोबल का भी बहुत महत्व होता है। आजकल तकनीक का भी उपयोग होने लगा है। अतः उसके महत्व से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। फिर भी मनोबल की भूमिका तो है ही। इसके कई उदाहरण इतिहास में प्रसिद्ध हैं। 

एक राजा दूसरे राज्य पर हमला करने से पूर्व सैनिकों के साथ अपनी कुलदेवी के मंदिर में गया। वहां पूजा के बाद उसने जेब से एक सिक्का निकालकर सैनिकों से कहा कि इसे उछालने पर यदि देवी का चित्र ऊपर आया, तो हम जीतेंगे, अन्यथा नहीं। जब उसने सिक्का उछाला, तो देवी का चित्र ही ऊपर आया। इससे सैनिकों का उत्साह बढ़ गया और कम संख्या होते हुए भी वे जीत गये। बाद में पता लगा कि यह राजा की एक चाल थी। वास्तव में उस सिक्के के दोनों ओर देवी का ही चित्र बना था।

ऐसे ही एक राजा जब लड़ने गया, तो शत्रु के क्षेत्र में प्रवेश करते ही उसका पैर फिसल गया। उसने हाथ का सहारा लेकर स्वयं को किसी तरह गिरने से बचाया। इससे सैनिक हताश हो गये; पर राजा ने कहा कि मेरी उंगली में पहनी हुई राजमुद्रा की छाप इस भूमि पर लग गयी है। यह ईश्वरीय संकेत है कि यह भूमि तो हमारी हो गयी। अब युद्ध तो केवल औपचारिकता मात्र है। इससे सैनिक उत्साह में आ गये और युद्ध जीत लिया गया।

ऐसे उदाहरण अनेक हैं। परीक्षा के दिनों में छात्र, मैच से पहले खिलाड़ी, बच्चों की बीमारी में माताएं और नौकरी के लिए इंटरव्यू देने वाले युवा मनोबल बढ़ाने के लिए कई तरह की पूजा और टोने-टोटके भी करते हैं। इससे लाभ होता है या नहीं, ये तो वही जानें; पर मन का प्रभाव शरीर और बुद्धि पर पड़ता जरूर है। इसीलिए ‘मन के हारे हार और मन के जीते जीत’ की बात कही गयी है।

भारतीय राजनीति में इन दिनों जो हो रहा है, उसमें भी दो बड़े दलों के मनोबल का स्पष्ट प्रभाव दिख रहा है। सत्ताधारी भा.ज.पा. का मनोबल नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में आकाश पर है, तो कांग्रेस का मनोबल ‘इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा कोई वहां गिरा की तरह पूरी तरह तितर-बितर हो चुका है।

2014 के लोकसभा चुनाव से कांग्रेस का पतन शुरू हुआ। इसके बाद सोनिया मैडम ने खानदानी पार्टी की कमान अपने पुत्र राहुल को सौंप दी। इससे कुछ समय कांग्रेस में उत्साह पैदा हुआ। लोगों को लगा कि युवा अध्यक्ष नये सिरे से पार्टी का गठन करेंगे; पर नये और पुरानों की लड़ाई में पार्टी कहीं की नहीं रही।

यद्यपि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा। म.प्र., छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने भा.ज.पा. से सत्ता छीन ली। इससे कांग्रेस वालों को लगा कि अब 2019 के लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही होगा; पर क्षेत्रीय पार्टियों ने उन्हें महत्व नहीं दिया। हर क्षत्रप अपने राज्य में कांग्रेस को दो-चार सीट देकर टरकाना चाहता था। अतः कांग्रेस को पूरी ताकत झोंकने पर भी कुल जमा 52 सीटें ही मिलीं। यानि ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाल ए सनम। न इधर के रहे न उधर के रहे।’’ जो तीन राज्य उसने जीते थे, वहां भी उसकी नाक कट गयी।

तबसे कांग्रेस का मनोबल रसातल में पहुंच गया। पार्टी के सर्वेसर्वा ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया। दो महीने से अधिक हो गये, दल का कोई मुखिया ही नहीं है। लोगों को समझ ही नहीं आ रहा कि अपनी बात किससे कहें ? अतः सांसद और विधायक भी कांग्रेस छोड़ रहे हैं। जिस बस में चालक ही न हो, उसमें बैठने वाला मूर्ख ही कहलाएगा। यही हाल कांग्रेस का है। कर्नाटक और गोवा में जो हुआ, वह नेतृत्व के नाकारापन का ही परिणाम है। अन्य राज्यों में भी यही स्थिति है।

दूसरी ओर भा.ज.पा. का मनोबल आसमान पर है। वहां नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बाद अब जगत प्रकाश नड्डा और नये संगठन मंत्री बी.एल.संतोष के आने से कार्यकर्ता उत्साहित हैं। लोकसभा में पहले से भी अधिक सीटें जीतना आसान नहीं होता; पर यह हुआ है। अब लोगों को लग रहा है कि कहीं म.प्र. और राजस्थान की सरकारें भी न गिर जाएं। हाथी का पांव पड़ने से कितनी हड्डियां टूटेंगी, कौन जाने ?

बची खुची कसर देश के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी पूरी कर रही है। तीन तलाक पर हर मुसलमान महिला और समझदार पुरुष सरकार के साथ है; पर पार्टी नेतृत्व शतुरमुर्ग की तरह मिट्टी में सिर दबाकर खतरा टलने की प्रतीक्षा में है। अनुच्छेद 370 का विषय पिछले 70 साल से सुलग रहा है। लोगों की तीन पीढि़यां कश्मीर समस्या के हल की बात सुनते हुए बीत गयीं। हजारों सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। छह लाख हिन्दू घाटी से निष्कासित होकर नरक भोग रहे हैं; पर  मुसलमान वोटों के लालची किसी दल ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। 

पर अब शासन ने कठोर निर्णय लेकर उस पेड़ को ही काट दिया, जिस पर आतंकवादी पनप रहे थे। जनभावना इस समय परिवारवाद के भी विरुद्ध है। अतः सारा देश इस निर्णय से खुश है; पर मुखियाविहीन कांग्रेस को समझ ही नहीं आ रहा कि वे क्या करें ? जिसे लोकसभा में नेता बनाया, उस अधीररंजन चैधरी का अपनी जुबान पर ही नियंत्रण नहीं है। पार्टी के मालिक सोनिया मैडम और राहुल बाबा उदासीन हैं। अतः पार्टीजन अपनी इच्छा और समझ से व्यवहार कर रहे हैं।

असल में कांग्रेस कई साल से जमीनी सच से कोसों दूर है। इसलिए पार्टी के पुराने और प्रबुद्ध नेता इस विषय पर शासन का समर्थन कर रहे हैं। जर्नादन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अभिषेक मनु सिंघवी, दीपेन्द्र हुड्डा, डा. कर्णसिंह आदि छोटे नेता नहीं हैं। इनमें से कई तो राहुल के जन्म से पहले से ही कांग्रेस में हैं। राज्यसभा में तो पार्टी के सचेतक भुवनेश्वर कालिता ही पार्टी छोड़ गये; पर राहुल बाबा अपनी दुनिया में मस्त हैं। संसद का सत्र समाप्त हो गया है। हो सकता है वे तन-मन और दिमाग की ठंडक के लिए फिर विदेश चले जाएं।

सच तो ये है कि देश भर में कांग्रेस के हर नेता और कार्यकर्ता का मनोबल गिरा हुआ है। अतः हर राज्य में अराजकता का माहौल है। इसका लाभ भा.ज.पा. वाले उठा रहे हैं। अनुच्छेद 370 के नाम पर बाकी दलों में भी असंतोष पनप रहा है। इसलिए कुछ नेता इसे हटाने की बजाय हटाने की प्रक्रिया पर आपत्ति कर रहे हैं। कुछ पार्टियों ने इसके विरोध में वोट देने की बजाय सदन से बहिष्कार कर अपनी नाक बचाने का प्रयास किया है।

दुनिया चाहे जो कहे, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के इस मास्टर स्ट्रोक ने हर दल की बखिया उधेड़ दी है। अब उनके आगे कुआं है और पीछे खाई। अतः भा.ज.पा. का मनोबल चरम पर है और उसे आगामी चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी सफलता मिलनी निश्चित है।

बुधवार, 7 अगस्त 2019

आधी रहे न पूरी पावे

हर व्यक्ति की तरह हर राजनीतिक दल का भी अपना मूल चरित्र या स्वभाव होता है। इसे उसकी आत्मा या प्राणतत्व भी कह सकते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे ‘स्वधर्म’ कहा है। (स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः)। इसकी जड़ें उसके इतिहास और भूगोल में रहती हैं। अतः वह चाह कर भी इससे हट नहीं सकता। तीन तलाक और अनुच्छेद 370 पर संसद में जो हुआ, उसने एक बार फिर इसे सही सिद्ध कर दिया है। 

सबसे पहले कांग्रेस पार्टी की चर्चा करें। यद्यपि किसी समय यह आजादी के लिए संघर्ष करने वालों का एक मंच थी; पर लाल, बाल, पाल और गोपाल कृष्ण गोखले के राजनीतिक परिदृश्य से विदा होने के बाद कांग्रेस पूरी तरह गांधीजी के हाथ में आ गयी। इसके बाद कांग्रेस में मुस्लिम तुष्टीकरण का नया अध्याय शुरू हो गया।  

भारत से कोई मतलब न होते हुए भी खिलाफत आंदोलन का समर्थन, केरल में निरपराध हिन्दुओं पर मुस्लिम मोपलाओं के अत्याचारों का समर्थन कर उन्हें वीर मोपला कहना, मोहम्मद अली जिन्ना की जी हुजूरी, मुसलमानों द्वारा की जाने वाली गोहत्या पर चुप्पी, झंडा कमेटी की सर्वसम्मत राय के बावजूद भगवे झंडे की बजाय तिरंगे को राजकीय ध्वज बनाना, देश का मजहब के आधार पर विभाजन, मजहबी दंगों में हिन्दुओं को पिटने, लुटने और मरने के बावजूद पाकिस्तान में ही बने रहने की सलाह; पर बिहार में मुसलमानों पर मार पड़ते ही उनकी रक्षा में जा पहुंचना, कश्मीर पर हमला करने के बाद भी पाकिस्तान को 55 करोड़ रु. देने का दुराग्रह..जैसे सैकड़ों उदाहरण दिये जा सकते हैं।

गांधीजी की इस परम्परा को उनके परम शिष्य और उत्तराधिकारी जवाहर लाल नेहरू ने आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने मित्र शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर में राजा बनाने के लिए महाराजा हरिसिंह को निर्वासन दे दिया। इतने पर ही संतोष नहीं, तो अनुच्छेद 370 और फिर धारा 35 ए लाकर पूरे राज्य को उनकी बपौती बना दिया। अयोध्या में श्रीराममंदिर का विषय सोमनाथ की तरह हल हो सकता था; पर उनका रवैया सदा ढुलमुल ही रहा। गोरक्षा को वे बेकार की बात मानते थे। हिन्दी की बजाय वे उर्दू के परम हिमायती थे। हिन्दू कोड बिल में तो उन्होंने रुचि ली; पर मुस्लिम समाज में सुधार और महिलाओं की दशा सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया।

इंदिरा गांधी का समय कुछ अपवाद रहा। शायद इसका कारण संजय गांधी का प्रभाव हो; पर राजीव गांधी ने फिर यही लीक पकड़ ली। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद उन्होंने मुल्लाओं को खुश करने के लिए संसद में कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं के हितों पर फिर कुठाराघात कर दिया। उनके पास लोकसभा में 403 सदस्य थे। वे चाहते तो इस बारे में सर्वसम्मत कानून बन सकता था; पर मुस्लिम तुष्टीकरण कांग्रेस का मूलमंत्र होने के कारण वे साहस नहीं दिखा सके। 

कुछ समय तक तो कांग्रेस को इसका लाभ मिला; पर फिर देश में हिन्दुत्व का उभार होने लगा। राम मंदिर आंदोलन इस दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इसका लाभ उठाकर भारतीय जनता पार्टी आगे बढ़ने लगी; पर कांग्रेस कूपमंडूक ही बनी रही। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने रही-सही कसर पूरी कर दी। अतः वह अब देश और अधिकांश राज्यों की राजनीति में अप्रासंगिक हो चली है। 

2014 के लोकसभा चुनावों में भारी पराजय के बाद बनी ए.के.एंटनी कमेटी ने कहा था कि कांग्रेस की छवि हिन्दू विरोधी और मुस्लिमों की समर्थक जैसी बन गयी है। इसे बदलने के लिए 2019 के चुनाव में राहुल गांधी सैकड़ों मंदिरों में गये। कैलास मानसरोवर यात्रा की। जनेऊ और नकली गोत्र का सहारा भी लिया। प्रियंका भी इसी लाइन पर चली; पर वे अपने दाग नहीं धो सके। इसलिए अब वे फिर से उसी तुष्टीकरण पर लौट रहे हैं, चूंकि कांग्रेस के प्राण उसी में हैं। 

लोकसभा में अनुच्छेद 370 पर हो रही बहस के दौरान राहुल ने एक ट्वीट किया, जिसमें इसे हटाने के निर्णय को मूर्खतापूर्ण कहा है। वे न जाने किस दुनिया में जी रहे हैं। उन्हें आज भी लगता है कि इसे हटाने से मुसलमान नाराज हो जाएंगे और इससे कांग्रेस को नुकसान होगा; पर वे यह भूल रहे हैं कि उनके इस कदम से हिन्दू उनसे इतने दूर हो जाएंगे कि बची-खुची कांग्रेस कहीं की नहीं रहेगी। कई कांग्रेसी इसे समझ रहे हैं; पर राहुल बाबा अपनी पप्पूगिरी छोड़ने को राजी नहीं हैं। 

अब भारतीय जनता पार्टी को देखें। उसकी आत्मा हिन्दुत्व में है। अपने पूर्वावतार भारतीय जनसंघ के समय से ही वह संपूर्ण गोवंश की रक्षा, जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण, समान नागरिक संहिता, भारतीय भाषाओं का सम्मान, राम मंदिर निर्माण और अवैध धर्मान्तरण पर प्रतिबंध आदि की बात करती रही है। बीच में एक समय ऐसा आया, जब लोकसभा में उसके दो ही लोग पहुंच सके। यद्यपि इसका मुख्य कारण राजीव गांधी को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति थी; पर इससे भा.ज.पा. में चिंता गहरा गयी। अतः उन्होंने गांधीवादी समाजवाद का नारा दिया; पर यह कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतरा। क्योंकि जनसंघ और भा.ज.पा. की नींव में हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद है। ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाल ए सनम’’ वाला हाल होता देख पार्टी ने इस ढकोसले को जल्दी ही अलविदा कह दिया।

इसके बाद पार्टी ने फिर से हिन्दुत्व की राह पकड़ी। संघ ने भा.ज.पा. को गोविंदाचार्य, प्रमोद महाजन, सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चैहान, उमा भारती, नितिन गडकरी, सुशील मोदी, प्रकाश जावड़ेकर, नरेन्द्र मोदी जैसे कई युवा और ऊर्जावान कार्यकर्ता दिये। इनमें से कुछ प्रचारक थे, तो कुछ गृहस्थ। कुछ संघ में तो कुछ विद्यार्थी परिषद में काम कर रहे थे। अटलजी के बदले पार्टी की कमान आडवाणीजी को सौंपी गयी। इससे पार्टी में नव उत्साह का संचार हुआ।

अब आडवाणीजी के नेतृत्व में राममंदिर के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकाली गयी। मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक तिरंगा यात्रा हुई। इनसे परिदृश्य बदलता गया और आज नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भा.ज.पा. की पूर्ण बहुमत की सरकार दिल्ली में स्थापित है। मोदी ने धर्मान्तरण के कारोबार में लगे एन.जी.ओ को मिल रहे विदेशी धन को रोका है। तीन तलाक के फंदे से मुस्लिम महिलाओं को मुक्त किया है तथा जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन कर राज्य को सच्ची आजादी दिलाई है। ये पार्टी के हिन्दुत्व के एजेंडे को और मजबूत करने वाले कदम ही हैं।

क्षेत्रीय दलों का भी यही हाल है। उ.प्र. में समाजवादी पार्टी, बिहार में नीतीश बाबू तथा बंगाल में ममता बनर्जी अपनी जीत में मुस्लिम वोटों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। इसलिए तीन तलाक और 370 पर वे सरकार के साथ नहीं गये। मायावती का मूलाधार दलित वोट हैं। उन्होंने 370 पर सरकार का साथ दिया, चूंकि इससे जम्मू-कश्मीर में दलित हिन्दुओं को नागरिकता एवं अच्छी नौकरी मिल सकेगी। अन्य क्षेत्रीय दल भी इसी तरह अलग-अलग हिस्सों में बंटे हैं।

सच तो ये है कि अधिकांश नेताओं को देश या जनता की नहीं, अपनी सम्पत्ति और खानदानी सत्ता की चिंता है और इसके लिए वोट बैंक जरूरी है। जैसे कहानियों में राक्षस की जान पिंजरे में बंद किसी तोते में होती है, ऐसी ही स्थिति इन दलों की है। वे सब जानते हुए भी उन प्रतिगामी विचारों से चिपककर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। 

तीन तलाक और 370 पर देश के मूड को न समझने वाले दलों के भविष्य पर किसी ने ठीक ही कहा है - 

आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी रहे न पूरी पावे।।