सोमवार, 9 सितंबर 2019

दुनिया मनदी जोरां नूं..

साहित्य में कहावतों का बड़ा महत्व है। उनके माध्यम से बड़ी बात को भी छोटे में कहा जा सकता है। पंजाबी में एक कहावत है - दुनिया मनदी जोरां नूं, लख लानत कमजोरां नूं। (दुनिया दमदार को ही मानती है, इसलिए कमजोर पर लाख लानत है।) ऐसा ही अर्थ प्रकट करने वाली कुछ कहावतें और भी हैं। जैसे - उगते सूरज को अघ्र्य देना, जहां दम वहां हम, जहां मिलेगी तवा परात वहीं कटेगी सारी रात, हवा देखकर रुख बदलना, जैसी ढपली वैसा राग.. आदि। भारत के राजनीतिक क्षेत्र में इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है।

इसका ताजा उदाहरण देखिए। गत 30 अगस्त, 2019 को एक बड़े मुस्लिम नेता मौलाना अरशद मदनी दिल्ली में झंडेवाला स्थित संघ कार्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत से मिलने पहुंचे। इस भेंट का अधिकृत ब्यौरा जारी न होने से मीडियाकर्मी अपनी-अपनी तरह से इसका विश्लेषण कर रहे हैं। 

श्री अरशद मदनी का संबंध ‘जमीअत उलेमा ए हिन्द’ और देवबंद (मूल नाम देववृंद) स्थित मुस्लिम (सुन्नी) शिक्षा के बड़े केन्द्र ‘दारुल उल उलूम’ से है। यहां के छात्र और समर्थक ‘देवबंदी’ कहलाते हैं। इस संस्था के साथ कई वाद और विवाद भी जुड़े हैं। कोई इसे आजादी के लिए लड़ने वाली संस्था कहता है, तो कोई इस्लामी आतंकियों का निर्माण और शरणस्थल। यहां के फतवे भी यदाकदा चर्चा में आ जाते हैं। इस संस्थान से जुड़े मदनी परिवार की पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुस्लिम राजनीति में बड़ी भूमिका है। इसलिए इसका कोई न कोई सदस्य सदा सांसद या विधायक रहता ही है।  

इस परिवार के ही एक नेता श्री अरशद मदनी दिल्ली में श्री मोहन भागवत से मिलने गये थे। वे वहां क्यों और किसके माध्यम से गये और वहां क्या बात हुई, यह विषय गौण है। सच तो यह है कि ताकत की तरफ सब झुकते ही हैं। इन दिनों भारत की राजनीति में भा.ज.पा. का झंडा चढ़ा हुआ है। यह भी सब जानते हैं कि भा.ज.पा. के पीछे असली ताकत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है। इसलिए कांग्रेस के नेता राहुल गांधी जैसे लोग संघ से लड़ने की बात कहते हैं, वहां उनकी ही पार्टी के कई लोग भा.ज.पा. से संपर्क बढ़ा रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि अब कांग्रेस में जान नहीं रही और भा.ज.पा. की ताकत लगातार बढ़ रही है।

वैसे संघ या उसकी समविचारी संस्थाओं के प्रति उन लोगों का प्रेम नया नहीं है, जो कभी संघ के प्रबल विरोधी होते थे। 1975 में इंदिरा गांधी ने अपनी भ्रष्ट सत्ता को बचाने तथा संजय गांधी को स्थापित करने के लिए देश में आपातकाल लगा दिया। विपक्षी नेताओं को जेल में डालकर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। लोकतंत्र की इस हत्या के विरुद्ध संघ के नेतृत्व में अहिंसक संघर्ष हुआ। 1977 के लोकसभा चुनाव में संघ ने पूरी जान लगा दी। अतः कांग्रेस हार गयी। तानाशाह इंदिरा गांधी और उनके साहबजादे भी खेत रहे। लोकतंत्र जीता और मोरारजी भाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। 

इस दौरान पूरे देश ने संघ की ताकत को देखा। संघ की उपेक्षा या विरोध करने वालों को विश्वास ही नहीं होता था कि शाखा पर कबड्डी खेलने वाले जरूरत पड़ने पर जेल भी जा सकते हैं। इसलिए कुछ लोग जिज्ञासावश, तो कुछ उसकी शक्ति के कारण संघ की ओर आकर्षित हुए। उसी दौरान दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम बुखारी भी संघ कार्यालय पर सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस से मिलने आये थे। भेंट के कुछ देर बाद उन्होंने कहा कि नमाज का समय हो रहा है, इसलिए मैं चलूंगा। बालासाहब ने उनसे कुछ देर और रुकने का आग्रह करते हुए कहा कि आप चाहें, तो यहीं नमाज पढ़ लें। बुखारी की आंखें फैल गयीं। वे तो संघ को मुसलमानों का दुश्मन समझते थे; पर यहां तो ऐसा कुछ नहीं था। अंततः बुखारी ने वहीं नमाज पढ़ी और फिर दोनों में आगे बात भी हुई।

पर कुछ समय बाद जनता पार्टी में शामिल सत्तालोलुप कांग्रेसियों और समाजवादियों के कारण जनता सरकार गिर गयी और इंदिरा गांधी फिर सत्ता में आ गयीं। ऐसा होते ही बुखारी महोदय फिर संघ को गाली देने लगे। कुल मिलाकर बात ताकत की ही है। संघ तो सब पंथ, सम्प्रदाय और मजहब वालों से संपर्क बनाकर रखता है; पर बहुत से लोग उसकी ओर तभी आकर्षित होते हैं, जब भा.ज.पा. सत्ता में होती है। सुदर्शनजी इस दिशा में काफी सक्रिय थे। उनके आग्रह पर संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेशजी के संरक्षण में ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ का गठन हुआ, जो समझदार, शिक्षित और देशप्रेमी मुसलमानों की एक सशक्त संस्था है। अटलजी के शासन के दौरान कई बड़े ईसाई पादरी भी सुदर्शनजी से मिलने आये थे। 

सुदर्शनजी के निधन पर दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुई श्रद्धांजलि सभा में इमामों की एक बड़ी संस्था के मुखिया डा. उमेर अहमद इलियासी भी आये थे। उन्होंने वहां अपने श्रेष्ठ हिन्दू पूर्वजों को याद कर कहा कि हम विदेशी नहीं, सौ प्रतिशत भारतीय मुसलमान हैं। उन्होंने पिछले दिनों हरिद्वार में स्वामी सत्यमित्रानंदजी की श्रद्धांजलि सभा में भी भारत माता की जय के नारे लगवाये और गोमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग की। उस सभा में श्री मोहन भागवत के अलावा कई राज्यों के राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी उपस्थित थे।

राजनीति में विचारधारा गौण होने से ‘आयाराम गयाराम’ अब आम हो गया है। इन दिनों भा.ज.पा. में जिस तरह थोक में कांग्रेस और अन्य दलों के नेता आ रहे हैं, उससे संघ और भा.ज.पा. की वैचारिक शुचिता के आग्रही लोग भी चिंतित हैं। आज भा.ज.पा. के साथ जो लोग गठबंधन में शामिल हैं, उनमें से अधिकांश कांग्रेस की गोद में भी बैठ चुके हैं; पर अब भा.ज.पा. का झंडा बुलंद देखकर वे उसकी जी हुजूरी कर रहे हैं। बात वही ताकत की है।

इसलिए जो लोग श्री मदनी के संघ कार्यालय जाने पर हैरान हैं, भगवान उन्हें लम्बी उम्र दे। चूंकि उन्हें ऐसे कई प्रसंग अभी और देखने हैं। संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक (स्व.) मोरोपंत पिंगले कहते थे कि कहीं सौर ऊर्जा संयंत्र लगा हो, तो बिजली खुद ही पैदा होने लगती है। ऐसे ही शाखा और उसके कार्यक्रमों से भी संगठन रूपी बिजली पैदा होती है। 

दुनिया चाहे जो कहे, पर शाखाओं से निर्मित संगठन की ये ऊर्जा सब ओर फैल चुकी है। अंधों को ये भले ही न दिखे, पर उसकी आंच तो उन्हें भी लग ही रही है। वह दिन दूर नहीं, जब बुखारी, मदनी, ओवैसी, नकवी, सईद, शेख, खान, अंसारी और कुरैशी....आदि अपने हिन्दू गोत्र बताते हुए अयोध्या में कारसेवा करते मिलेंगे; पर इसके साथ यह भी जरूरी है कि सज्जन हिन्दू शक्ति के निर्माण में लगे लोग राजनीतिक चमक दमक में फंसकर अपना मूल काम न भूल जाएं। क्योंकि किसी ने ठीक ही कहा है - दुनिया मनदी जोरां नूं।